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प्रभास खण्ड · अध्याय 345

नलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 344अध्याय-सूचीअध्याय 346

श्लोक 1 (skanda.7.345.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं वै हाटकेश्वरम्। जरद्गवात्पूर्वभागे धनुषां षष्टिभिस्त्रिभिः

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi liṅgaṁ vai hāṭakeśvaram| jaradgavāt pūrvabhāge dhanuṣāṁ ṣaṣṭibhistribhiḥ

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर जरद्गव के पूर्व भाग में तिरसठ धनुष की दूरी पर स्थित हाटकेश्वर नामक लिंग के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.345.2)

नाम्ना नलेश्वरं देवि स्थापितं तु नलेन वै। दमयन्तीयुतेनैव ज्ञात्वा क्षेत्रं तदुत्तमम्

nāmnā naleśvaraṁ devi sthāpitaṁ tu nalena vai| damayantīyutenaiva jñātvā kṣetraṁ taduttamam

हे देवि, नाम से नलेश्वर, वह दमयन्ती सहित नल द्वारा उस उत्तम क्षेत्र को जानकर स्थापित किया गया था।

श्लोक 3 (skanda.7.345.3)

तं दृष्ट्वा मानवो देवि पूजयित्वा विधानतः। कलिभिर्मुच्यते जंतुर्द्यूते च विजयी भवेत्

taṁ dṛṣṭvā mānavo devi pūjayitvā vidhānataḥ| kalibhirmucyate jantur dyūte ca vijayī bhavet

हे देवि, उसे देखकर और विधिपूर्वक पूजन करके मनुष्य कलियों (दुर्भाग्य) से मुक्त हो जाता है और जुए में विजयी होता है।

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