प्रभास खण्ड · अध्याय 347
नारदेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.347.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि पश्चिमे नारदेश्वरीम्। नारदेश्वरसांनिध्ये सर्वदौर्भाग्यनाशनीम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi paścime nāradeśvarīm| nāradeśvarasānnidhye sarvadaurbhāgyanāśanīm
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर पश्चिम में नारदेश्वर के समीप स्थित, सम्पूर्ण दुर्भाग्य का नाश करने वाली नारदेश्वरी देवी के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.347.2)
या नारी पूजयेद्देवीं तृतीयायां समाहिता। तदन्वये न दौर्भाग्ययुक्ता नारी भविष्यति
yā nārī pūjayeddevīṁ tṛtīyāyāṁ samāhitā| tadanvaye na daurbhāgyayuktā nārī bhaviṣyati
जो नारी तृतीया को एकाग्रचित्त होकर उस देवी का पूजन करती है, उसके वंश में कोई भी नारी दुर्भाग्य से युक्त नहीं होगी।