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प्रभास खण्ड · अध्याय 376

वस्त्रापथयात्राविधानवर्णनम्

अध्याय 375अध्याय-सूचीअध्याय 377

श्लोक 1 (skanda.7.376.1)

ईश्वर उवाच सारस्वतस्य विप्रस्य श्रुत्वा भोजनृपो वचः । विवर्णवदनो भूत्वा प्रगृह्यांघ्री वचोऽब्रवीत्

īśvara uvāca sārasvatasya viprasya śrutvā bhojanṛpo vacaḥ | vivarṇavadano bhūtvā pragṛhyāṁghrī vaco'bravīt

ईश्वर ने कहा - सारस्वत ब्राह्मण के वचन सुनकर राजा भोज का मुख विवर्ण हो गया, और उनके चरण पकड़कर वे बोले।

श्लोक 2 (skanda.7.376.2)

मुने नैवं त्वया वाच्यं गंतव्यं निश्चितं मया । नराणां पुण्यदा यात्रा कथयस्व कथं भवेत्

mune naivaṁ tvayā vācyaṁ gaṁtavyaṁ niścitaṁ mayā | narāṇāṁ puṇyadā yātrā kathayasva kathaṁ bhavet

हे मुने, आप ऐसा मत कहिए, मैंने जाने का निश्चय कर लिया है। मनुष्यों को पुण्य देने वाली यह यात्रा किस प्रकार सम्पन्न होती है, मुझे बताइए।

श्लोक 3 (skanda.7.376.3)

किं ग्राह्यं किं च मोक्तव्यं किं देयं किं न दीयते । तीर्थोपवासः स्नानं च संध्यास्नानविधिक्रमः । पूजा निद्रा जपो रात्रौ सर्वं संक्षेपतो वद

kiṁ grāhyaṁ kiṁ ca moktavyaṁ kiṁ deyaṁ kiṁ na dīyate | tīrthopavāsaḥ snānaṁ ca saṁdhyāsnānavidhikramaḥ | pūjā nidrā japo rātrau sarvaṁ saṁkṣepato vada

क्या ग्रहण करना चाहिए, क्या त्याग देना चाहिए, क्या देना चाहिए और क्या नहीं देना चाहिए? तीर्थ में उपवास, स्नान, संध्या-स्नान की विधि-क्रम, पूजा, रात्रि में शयन और जप - यह सब संक्षेप में मुझे बताइए।

श्लोक 4 (skanda.7.376.4)

सारस्वत उवाच सुराष्ट्रदेशे गन्तव्यं गिरौ रैवतके यदि । नृप यात्राविधिं वक्ष्ये त्वमेकाग्रमनाः शृणु ।

sārasvata uvāca surāṣṭradeśe gantavyaṁ girau raivatake yadi | nṛpa yātrāvidhiṁ vakṣye tvamekāgramanāḥ śṛṇu |

सारस्वत ने कहा - यदि सुराष्ट्र देश में स्थित रैवतक पर्वत पर जाना है, तो हे राजन्, मैं यात्रा की विधि बताता हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनिए।

श्लोक 5 (skanda.7.376.5)

बृहस्पतिबलं गृह्य सूर्यं संतर्प्य चोत्तमम् । वामतः पृष्ठतः सर्वं वृत्वा संशोध्य वासरम्

bṛhaspatibalaṁ gṛhya sūryaṁ saṁtarpya cottamam | vāmataḥ pṛṣṭhataḥ sarvaṁ vṛtvā saṁśodhya vāsaram

बृहस्पति के बल को जानकर और उत्तम सूर्य को तर्पण देकर, वाम और पृष्ठ दिशा में सब कुछ की परीक्षा कर, दिन का शोधन करके -

श्लोक 6 (skanda.7.376.6)

चंद्रलग्नं ग्रहाज्ज्ञात्वा बलिष्ठाज्जन्मराशितः । शकुनं च शुभं लब्ध्वा प्रस्थातव्यं नृपैर्नृप

caṁdralagnaṁ grahājjñātvā baliṣṭhājjanmarāśitaḥ | śakunaṁ ca śubhaṁ labdhvā prasthātavyaṁ nṛpairnṛpa

जन्मराशि से सबसे बलवान ग्रह द्वारा चन्द्र-लग्न को जानकर और शुभ शकुन पाकर, हे राजन्, राजाओं को प्रस्थान करना चाहिए।

श्लोक 7 (skanda.7.376.7)

तीर्थे सदैव गंतव्यं सर्वे मासाश्च शोभनाः । तिथयश्चोत्तमाः सर्वाः स्नानदानार्चनादिषु

tīrthe sadaiva gaṁtavyaṁ sarve māsāśca śobhanāḥ | tithayaścottamāḥ sarvāḥ snānadānārcanādiṣu

तीर्थ में जाना सदैव उचित है, सभी महीने शुभ हैं, और स्नान, दान, पूजा आदि के लिए सभी तिथियाँ उत्तम हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.376.8)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां मासांते पूर्णिमादिने । संक्रांतौ ग्रहणे काला एते प्रोक्ता भवार्चने

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ māsāṁte pūrṇimādine | saṁkrāṁtau grahaṇe kālā ete proktā bhavārcane

अष्टमी, चतुर्दशी, मासांत की पूर्णिमा के दिन, संक्रांति और ग्रहण के समय - ये सब भव (शिव) की पूजा के लिए कहे गए काल हैं।

श्लोक 9 (skanda.7.376.9)

कैलासं पर्वतं त्यक्त्वा देवीं देवांश्च संगतान् । वैशाखे पंचदश्यां तु भूमिं भित्त्वा भवोऽभवत्

kailāsaṁ parvataṁ tyaktvā devīṁ devāṁśca saṁgatān | vaiśākhe paṁcadaśyāṁ tu bhūmiṁ bhittvā bhavo'bhavat

कैलास पर्वत को छोड़कर, देवी और एकत्रित देवताओं सहित, वैशाख की पूर्णिमा को भूमि को भेदकर भव (शिव) प्रकट हुए।

श्लोक 10 (skanda.7.376.10)

तस्मिन्नेव दिने देवी स्वर्णरेखा नदी तलात् । पंथानं वासुकिं प्राप्य सर्वपापप्रणाशनी

tasminneva dine devī svarṇarekhā nadī talāt | paṁthānaṁ vāsukiṁ prāpya sarvapāpapraṇāśanī

उसी दिन देवी स्वर्णरेखा नदी, समस्त पापों का नाश करने वाली, धरातल से वासुकि के मार्ग को पाकर -

श्लोक 11 (skanda.7.376.11)

ऐरावतपदाक्रांत उज्जयन्तो महागिरिः । सुस्राव तोयं बहुधा गजपादोद्भवं शुचि

airāvatapadākrāṁta ujjayanto mahāgiriḥ | susrāva toyaṁ bahudhā gajapādodbhavaṁ śuci

ऐरावत के चरण से आक्रांत महान पर्वत उज्जयन्त ने गजपाद से उत्पन्न पवित्र जल को अनेक धाराओं में प्रवाहित किया।

श्लोक 12 (skanda.7.376.12)

देवा ब्रह्मादयः सर्वे गंगाद्याः सरितस्तथा । वस्त्रापथे महाक्षेत्रे भवभावेन संगताः

devā brahmādayaḥ sarve gaṁgādyāḥ saritastathā | vastrāpathe mahākṣetre bhavabhāvena saṁgatāḥ

ब्रह्मा आदि सभी देवता और गंगा आदि सभी नदियाँ, भव के प्रति भक्ति-भाव से वस्त्रापथ नामक महाक्षेत्र में एकत्र हुईं।

श्लोक 13 (skanda.7.376.13)

वस्त्रापथस्य क्षेत्रस्य प्रमाणं शृणु भूपते । हरस्य त्यजतो भूमौ पतितं वस्त्रभूषणम्

vastrāpathasya kṣetrasya pramāṇaṁ śṛṇu bhūpate | harasya tyajato bhūmau patitaṁ vastrabhūṣaṇam

हे भूपते, वस्त्रापथ क्षेत्र का प्रमाण सुनिए - हर द्वारा त्यागे जाते समय भूमि पर जो वस्त्र और भूषण गिरे,

श्लोक 14 (skanda.7.376.14)

तावन्मात्रं स्मृतं क्षेत्रं देवैर्वस्त्रापथं कृतम् । उत्तरेण नदी भद्रा पूर्वस्यां योजनद्वयम्

tāvanmātraṁ smṛtaṁ kṣetraṁ devairvastrāpathaṁ kṛtam | uttareṇa nadī bhadrā pūrvasyāṁ yojanadvayam

उतने ही विस्तार को देवताओं द्वारा वस्त्रापथ नामक क्षेत्र माना गया है। उत्तर में भद्रा नदी है, पूर्व में दो योजन की दूरी है।

श्लोक 15 (skanda.7.376.15)

दक्षिणेन बलेः स्थानमुज्जयन्तो नदीमनु । अपरस्यां परं नद्यो संगमं वामनात्पुरात्

dakṣiṇena baleḥ sthānamujjayanto nadīmanu | aparasyāṁ paraṁ nadyo saṁgamaṁ vāmanātpurāt

दक्षिण में बलि का स्थान है, और उज्जयन्त नदी के अनुसार है। पश्चिम में, वामन के नगर से आगे, नदियों का संगम है।

श्लोक 16 (skanda.7.376.16)

एतद्वस्त्रापथं क्षेत्रं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । क्षेत्रस्य विस्तरो ज्ञेयो योजनानां चतुष्टयम्

etadvastrāpathaṁ kṣetraṁ bhuktimuktipradāyakam | kṣetrasya vistaro jñeyo yojanānāṁ catuṣṭayam

यह वस्त्रापथ क्षेत्र भोग और मोक्ष दोनों देने वाला है। क्षेत्र का विस्तार चार योजन जानना चाहिए।

श्लोक 17 (skanda.7.376.17)

वैशाखपंचदश्यां तु भवो भावेन भूपते । पूज्यते शिवलोके तु स्थीयते ब्रह्मवासरम्

vaiśākhapaṁcadaśyāṁ tu bhavo bhāvena bhūpate | pūjyate śivaloke tu sthīyate brahmavāsaram

वैशाख की पूर्णिमा को, हे राजन्, भव की भक्ति-भाव से पूजा की जाती है, और शिवलोक में एक ब्रह्म-दिवस तक निवास किया जाता है।

श्लोक 18 (skanda.7.376.18)

अतो वसंते संप्राप्ते प्रयाणं कुरु भूपते । निगृह्य नियमान्भूत्वा शुचिः स्नातो जितेन्द्रियः

ato vasaṁte saṁprāpte prayāṇaṁ kuru bhūpate | nigṛhya niyamānbhūtvā śuciḥ snāto jitendriyaḥ

अतः वसंत के आने पर, हे राजन्, यात्रा कीजिए - नियमों का पालन करते हुए, शुद्ध, स्नात, और जितेन्द्रिय होकर।

श्लोक 19 (skanda.7.376.19)

गजवाजिरथांस्त्यक्ता पदाभ्यां याति यो नरः । पुष्पकेण विमानेन स याति शिवमंदिरम्

gajavājirathāṁstyaktā padābhyāṁ yāti yo naraḥ | puṣpakeṇa vimānena sa yāti śivamaṁdiram

जो मनुष्य हाथी, घोड़े और रथ त्यागकर पैदल जाता है, वह पुष्पक विमान द्वारा शिव के मंदिर को जाता है।

श्लोक 20 (skanda.7.376.20)

एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च । भिक्षाहारेण तोयेन फलाहारेण वा यदि

ekabhaktena naktena tathaivāyācitena ca | bhikṣāhāreṇa toyena phalāhāreṇa vā yadi

यदि वह एक समय भोजन से, रात्रि-भोजन से, अयाचित भोजन से, भिक्षा के आहार से, केवल जल से, या केवल फल के आहार से यात्रा करे -

श्लोक 21 (skanda.7.376.21)

उपवासेन कृच्छ्रेण शाकाहारेण याति यः । स याति सुन्दरीवृन्दैर्वीज्यमानो गणैर्दिवि

upavāsena kṛcchreṇa śākāhāreṇa yāti yaḥ | sa yāti sundarīvṛndairvījyamāno gaṇairdivi

जो उपवास से, कृच्छ्र व्रत से, या शाकाहार से यात्रा करता है, वह स्वर्ग में सुन्दरियों के समूह द्वारा पंखा झले जाने योग्य गणों में जाता है।

श्लोक 22 (skanda.7.376.22)

मलस्नानं विना मार्गे पादाभ्यंगविवर्जितः । मलधारी क्षीणतनुर्यष्टिहस्तो जितेन्द्रियः

malasnānaṁ vinā mārge pādābhyaṁgavivarjitaḥ | maladhārī kṣīṇatanuryaṣṭihasto jitendriyaḥ

जो मार्ग में मैल धोए बिना, पैरों में तेल लगाए बिना, मैल धारण किए, क्षीण शरीर से, हाथ में लाठी लेकर, इन्द्रियों को वश में करके चलता है -

श्लोक 23 (skanda.7.376.23)

शीतातपजलक्लिष्टः शिवस्मरणतत्परः । यदि याति नरो याति स भित्त्वा सूर्यमंडलम्

śītātapajalakliṣṭaḥ śivasmaraṇatatparaḥ | yadi yāti naro yāti sa bhittvā sūryamaṁḍalam

यदि ऐसा मनुष्य शीत, धूप और जल से पीड़ित होते हुए भी शिव के स्मरण में तत्पर रहकर यात्रा करता है, तो वह सूर्य-मण्डल को भेदकर जाता है।

श्लोक 24 (skanda.7.376.24)

नरकस्थानपि पितॄन्मातृतः पितृतो नृप । अक्षयं सप्त सप्तैव नयेदेवं शिवालये

narakasthānapi pitṝnmātṛtaḥ pitṛto nṛpa | akṣayaṁ sapta saptaiva nayedevaṁ śivālaye

हे राजन्, इस प्रकार वह नरक में स्थित पितरों को भी - माता की ओर से सात और पिता की ओर से सात - शिव के धाम में अक्षय पद पर ले जाता है।

श्लोक 25 (skanda.7.376.25)

लुण्ठन्भूमौ यदा याति मृगचर्मावगुंठितः । दण्डप्रमाणभूमेर्वा संख्यां कुर्वन्नरो यदि

luṇṭhanbhūmau yadā yāti mṛgacarmāvaguṁṭhitaḥ | daṇḍapramāṇabhūmervā saṁkhyāṁ kurvannaro yadi

जब वह मृगचर्म ओढ़े हुए भूमि पर लोटते हुए जाता है, या जब वह मनुष्य दण्ड के परिमाण से भूमि की गणना करते हुए जाता है -

श्लोक 26 (skanda.7.376.26)

अरण्ये निर्जले स्थाने जलांतःपरिपीडितः । शरण्यं शंकरं कृत्वा मनो निश्चलमात्मनः

araṇye nirjale sthāne jalāṁtaḥparipīḍitaḥ | śaraṇyaṁ śaṁkaraṁ kṛtvā mano niścalamātmanaḥ

वन में, जलरहित स्थान में, या जल के भीतर पीड़ित होते हुए भी, शंकर को ही शरण्य मानकर, अपने मन को अविचल रखते हुए -

श्लोक 27 (skanda.7.376.27)

सप्तद्वीपवतीं पृथ्वीं समुद्रवसनां नृप । स लब्ध्वा बहुभिर्यज्ञैर्यज्ञे दत्त्वा च मेदिनीम्

saptadvīpavatīṁ pṛthvīṁ samudravasanāṁ nṛpa | sa labdhvā bahubhiryajñairyajñe dattvā ca medinīm

हे राजन्, ऐसा मनुष्य उस फल को प्राप्त करता है जो सात द्वीपों वाली, समुद्र-वसना पृथ्वी को अनेक यज्ञों से पाकर उसे यज्ञ में दान करने से मिलता है।

श्लोक 28 (skanda.7.376.28)

सप्तभौमविमानस्थो दिव्यदेहो हराकृतिः । निरीक्ष्य मेदिनीं मंदं कृत मंगलमण्डनम्

saptabhaumavimānastho divyadeho harākṛtiḥ | nirīkṣya medinīṁ maṁdaṁ kṛta maṁgalamaṇḍanam

सात मंजिलों वाले विमान में स्थित, दिव्य देह और हर के स्वरूप को धारण किए, मंगल-आभूषणों से अलंकृत होकर, वह पृथ्वी को धीरे-धीरे निहारता है।

श्लोक 29 (skanda.7.376.29)

मृगनेत्राभुजस्पर्शलग्नपीनपयोधरः । गीतवाद्यविनोदेन सत्यलोकं व्रजेन्नरः

mṛganetrābhujasparśalagnapīnapayodharaḥ | gītavādyavinodena satyalokaṁ vrajennaraḥ

मृगनयनी स्त्रियों के पूर्ण वक्षस्थल जिनके भुजा-स्पर्श से सटे रहते हैं, ऐसा वह मनुष्य गीत-वाद्य के विनोद के साथ सत्यलोक को जाता है।

श्लोक 30 (skanda.7.376.30)

विधाय भुजवेगं वा पादौ बद्ध्वा शनैः शनैः । मौनेन मानुषो मायां त्यक्त्वा याति शिवालये

vidhāya bhujavegaṁ vā pādau baddhvā śanaiḥ śanaiḥ | maunena mānuṣo māyāṁ tyaktvā yāti śivālaye

अथवा भुजाओं के बल से आगे बढ़ते हुए, या पैरों को बाँधकर धीरे-धीरे, मौन रहकर, माया को त्यागकर जो मनुष्य जाता है, वह शिव के धाम को जाता है।

श्लोक 31 (skanda.7.376.31)

ब्रह्मघ्नो वा सुरापो वा स्तेयी वा गुरुतल्पगः । कृतघ्नो मुच्यते पापैर्मृतो मुक्तिमवाप्नुयात्

brahmaghno vā surāpo vā steyī vā gurutalpagaḥ | kṛtaghno mucyate pāpairmṛto muktimavāpnuyāt

चाहे वह ब्रह्महत्यारा हो, सुरापायी हो, चोर हो, गुरु-पत्नी-गामी हो, या कृतघ्न हो - वह पापों से मुक्त हो जाता है, और मृत्यु के पश्चात् मुक्ति पाता है।

श्लोक 32 (skanda.7.376.32)

मातरं पितरं देशं भ्रातरं स्वजनबांधवान् । ग्रामं भूमिं गृहं त्यक्त्वा कृत्वा चेंद्रियसंयमम्

mātaraṁ pitaraṁ deśaṁ bhrātaraṁ svajanabāṁdhavān | grāmaṁ bhūmiṁ gṛhaṁ tyaktvā kṛtvā ceṁdriyasaṁyamam

माता, पिता, देश, भाई, स्वजन और बांधवों को, गाँव, भूमि और घर को त्यागकर, तथा इन्द्रियों का संयम करके -

श्लोक 33 (skanda.7.376.33)

गृहीत्वा शिवसंस्कारं नरो भ्राम्यति भूतले । द्रष्टुं तीर्थान्यनेकानि पुण्यान्यायतनानि च

gṛhītvā śivasaṁskāraṁ naro bhrāmyati bhūtale | draṣṭuṁ tīrthānyanekāni puṇyānyāyatanāni ca

शिव के संस्कार को ग्रहण कर, मनुष्य पृथ्वी पर भ्रमण करता है, अनेक तीर्थों और पवित्र आयतनों के दर्शन के लिए।

श्लोक 34 (skanda.7.376.34)

कस्मिंस्तीर्थे शुभे स्थाने छित्त्वा संसारबन्धनम् । अभयां दक्षिणां दत्त्वा शिवशिवेति भाषकः

kasmiṁstīrthe śubhe sthāne chittvā saṁsārabandhanam | abhayāṁ dakṣiṇāṁ dattvā śivaśiveti bhāṣakaḥ

किसी शुभ तीर्थ-स्थान में संसार-बन्धन को काटकर, समस्त प्राणियों को अभय-दक्षिणा देकर, 'शिव-शिव' का उच्चारण करते हुए -

श्लोक 35 (skanda.7.376.35)

एकांते निर्जने स्थाने शिवस्मरणतत्परः । यदि तिष्ठति तं यान्ति नमस्कर्तुं नराधिप

ekāṁte nirjane sthāne śivasmaraṇatatparaḥ | yadi tiṣṭhati taṁ yānti namaskartuṁ narādhipa

यदि वह एकांत, निर्जन स्थान में शिव-स्मरण में तत्पर होकर ठहरता है, तो हे नराधिप, देवगण उसे नमस्कार करने के लिए वहाँ आते हैं।

श्लोक 36 (skanda.7.376.36)

आयांति देवताः सर्वे चिह्नं तस्य निरीक्षितुम् । विमानवृन्दैर्नेतव्यः कदासौ पुरुषोत्तमः

āyāṁti devatāḥ sarve cihnaṁ tasya nirīkṣitum | vimānavṛndairnetavyaḥ kadāsau puruṣottamaḥ

सभी देवता उसके चिह्न को देखने के लिए आते हैं, यह सोचते हुए कि यह श्रेष्ठ पुरुष कब विमान-समूहों द्वारा ले जाने योग्य होगा।

श्लोक 37 (skanda.7.376.37)

यदा तु पञ्चत्वमुपैति काले कलेवरं स्कन्धकृतं नरैश्च । निरीक्ष्यमाणः सुरसुन्दरीभिः स नीयमानो मदविह्वलाभिः

yadā tu pañcatvamupaiti kāle kalevaraṁ skandhakṛtaṁ naraiśca | nirīkṣyamāṇaḥ surasundarībhiḥ sa nīyamāno madavihvalābhiḥ

और जब समय आने पर उसका शरीर पंचत्व को प्राप्त होता है, मनुष्यों द्वारा कंधों पर उठाया जाता है, तो देव-सुन्दरियों द्वारा निहारा जाता हुआ, हर्ष-विह्वल उन्हीं सुन्दरियों द्वारा ले जाया जाता है -

श्लोक 38 (skanda.7.376.38)

सुरेन्द्रसूर्याग्निधनेशरुद्रैः संपूज्यमानः शिवरूपधारी । सुरादिलोकान्प्रविमुच्य वेगाच्छिवालये तिष्ठति रुद्रभक्तः

surendrasūryāgnidhaneśarudraiḥ saṁpūjyamānaḥ śivarūpadhārī | surādilokānpravimucya vegācchivālaye tiṣṭhati rudrabhaktaḥ

इन्द्र, सूर्य, अग्नि, कुबेर और रुद्रों द्वारा सम्मानित होकर, शिव-स्वरूप धारण किए हुए, देवलोक आदि को वेगपूर्वक पार कर, वह रुद्र-भक्त शिव के धाम में सदा के लिए निवास करता है।

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