प्रभास खण्ड · अध्याय 377
यात्राविधिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.377.1)
सारस्वत उवाच गंगोदकं मधुघृते कुंकुमागुरुचंद नम् । गुग्गुलं बिल्वपत्राणि बकपुष्पं च यो वहेत्
sārasvata uvāca gaṁgodakaṁ madhughṛte kuṁkumāgurucaṁda nam | guggulaṁ bilvapatrāṇi bakapuṣpaṁ ca yo vahet
सारस्वत ने कहा - जो गंगाजल, मधु, घृत, कुंकुम, अगुरु, चन्दन, गुग्गुल, बिल्वपत्र और बकपुष्प लेकर चले -
श्लोक 2 (skanda.7.377.2)
पदचारी शुचितनुर्भारं स्कन्धे निधाय च । तीर्थे स्नात्वा शिवं विष्णुं ब्रह्माणं शंकरं प्रियम्
padacārī śucitanurbhāraṁ skandhe nidhāya ca | tīrthe snātvā śivaṁ viṣṇuṁ brahmāṇaṁ śaṁkaraṁ priyam
पैदल चलते हुए, शुद्ध शरीर से, कंधे पर भार रखकर, तीर्थ में स्नान करके - शिव, विष्णु, ब्रह्मा और प्रिय शंकर को -
श्लोक 3 (skanda.7.377.3)
दृष्ट्वा निवेदयेद्यस्तु स मुक्तः सर्वबन्धनैः । स नरो गणतां याति यावदाभूतसंप्लवम्
dṛṣṭvā nivedayedyastu sa muktaḥ sarvabandhanaiḥ | sa naro gaṇatāṁ yāti yāvadābhūtasaṁplavam
देखकर जो इन वस्तुओं को अर्पित करता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है; वह मनुष्य प्रलय-काल तक गणपद को प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (skanda.7.377.4)
कलत्रमित्रपुत्रैर्वा भ्रातृभिः स्वजनैर्नरैः । सहितो वा नरैर्याति तीर्थे देवं विचिंत्य च
kalatramitraputrairvā bhrātṛbhiḥ svajanairnaraiḥ | sahito vā narairyāti tīrthe devaṁ viciṁtya ca
चाहे पत्नी, मित्र, पुत्र, भाई, स्वजन अथवा अन्य मनुष्यों के साथ हो, वह तीर्थ में देव का ध्यान करते हुए जाता है।
श्लोक 5 (skanda.7.377.5)
देवमूर्तिं शुभां कृत्वा रथस्थां सुप्रतिष्ठिताम् । चन्दनागुरुकर्पूरैरर्चितां कुंकुमेन च
devamūrtiṁ śubhāṁ kṛtvā rathasthāṁ supratiṣṭhitām | candanāgurukarpūrairarcitāṁ kuṁkumena ca
देव की शुभ मूर्ति बनाकर, उसे रथ पर सुदृढ़ स्थापित कर, चन्दन, अगुरु, कर्पूर और कुंकुम से पूजित करके -
श्लोक 6 (skanda.7.377.6)
पूजयन्विविधैः पुष्पैर्धूपदीपादिकैर्नृप । गीतनृत्यैः सवादित्रैर्हास्यलास्यैरनेकधा
pūjayanvividhaiḥ puṣpairdhūpadīpādikairnṛpa | gītanṛtyaiḥ savāditrairhāsyalāsyairanekadhā
हे राजन्, विविध पुष्पों, धूप-दीप आदि से पूजा करते हुए, गीत-नृत्य और वाद्यों सहित, हास्य और लास्य के अनेक प्रकारों से -
श्लोक 7 (skanda.7.377.7)
धरित्रीं कांचनं गाश्च जलान्नवसनानि च । तृणेन्धने प्रियां वाणीं यच्छन्याति नरो यदि
dharitrīṁ kāṁcanaṁ gāśca jalānnavasanāni ca | tṛṇendhane priyāṁ vāṇīṁ yacchanyāti naro yadi
यदि मनुष्य भूमि, स्वर्ण, गौएँ, जल, अन्न, वस्त्र, तृण, ईंधन और प्रिय वचन देते हुए यात्रा करे -
श्लोक 8 (skanda.7.377.8)
देवांगनाकरग्राहगृहीतो नन्दनं वनम् । प्राप्य भुंक्ते शुभान्भोगान्यावदाचन्द्रतारकम्
devāṁganākaragrāhagṛhīto nandanaṁ vanam | prāpya bhuṁkte śubhānbhogānyāvadācandratārakam
देवांगना के हाथ से पकड़ा जाकर, नन्दन वन को प्राप्त कर, वह चन्द्र-तारे रहने तक शुभ भोगों को भोगता है।
श्लोक 9 (skanda.7.377.9)
तीर्थे संचरितः पुरुषो रोगैः प्राणान्विमुञ्चति । अदृष्ट्वा दैवतं तीर्थे दृष्टतीर्थफलं लभेत्
tīrthe saṁcaritaḥ puruṣo rogaiḥ prāṇānvimuñcati | adṛṣṭvā daivataṁ tīrthe dṛṣṭatīrthaphalaṁ labhet
तीर्थ में विचरण करते हुए जो पुरुष रोगों से प्राण त्यागता है, वह देवता को देखे बिना भी तीर्थ-दर्शन का फल पाता है।
श्लोक 10 (skanda.7.377.10)
संसारदोषान्विविधान्विचिन्त्य स्त्रीपुत्रमित्रेष्वपि बंधमुक्तः । विज्ञाय बद्धं पुरुषं प्रधानैः स सर्वतीर्थानि करोति देहम्
saṁsāradoṣānvividhānvicintya strīputramitreṣvapi baṁdhamuktaḥ | vijñāya baddhaṁ puruṣaṁ pradhānaiḥ sa sarvatīrthāni karoti deham
संसार के विविध दोषों पर विचार कर, पत्नी, पुत्र और मित्रों के प्रति भी बन्धन से मुक्त होकर, तथा पुरुष को प्रधान तत्त्वों से बद्ध जानकर - वह अपने शरीर को ही समस्त तीर्थ बना लेता है।
श्लोक 11 (skanda.7.377.11)
आजन्मजन्मांन्तरसंचितानि दग्ध्वा स पापानि नरो नरेन्द्र । तेजोमयं सर्वगतं पुराणं भवोद्भवं पश्यति मुच्यते सः
ājanmajanmāṁntarasaṁcitāni dagdhvā sa pāpāni naro narendra | tejomayaṁ sarvagataṁ purāṇaṁ bhavodbhavaṁ paśyati mucyate saḥ
जन्म-जन्मान्तर में संचित पापों को भस्म कर, हे नरेन्द्र, वह मनुष्य तेजोमय, सर्वव्यापी, पुरातन, भव के उद्गम को देखता है और मुक्त हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.7.377.12)
तीर्थे विप्रवचो ग्राह्यं स्नात्वा संध्यार्चनादिकम् । दर्भास्तिला हविष्यान्नं प्रयोगाः श्रद्धया कृताः
tīrthe vipravaco grāhyaṁ snātvā saṁdhyārcanādikam | darbhāstilā haviṣyānnaṁ prayogāḥ śraddhayā kṛtāḥ
तीर्थ में ब्राह्मण के वचन ग्रहण करने चाहिए; स्नान करके संध्या-पूजा आदि, कुश, तिल और हविष्यान्न - ये सब प्रयोग श्रद्धापूर्वक किए जाने चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.7.377.13)
अगस्त्यं भृङ्गराजं च पुष्पं शतदलं शुभम् । कर्पूरागुरुश्रीखंडं कुंकुमं तुलसीदलम्
agastyaṁ bhṛṅgarājaṁ ca puṣpaṁ śatadalaṁ śubham | karpūrāguruśrīkhaṁḍaṁ kuṁkumaṁ tulasīdalam
अगस्त्य-पुष्प, भृंगराज, शुभ शतदल कमल, कर्पूर, अगुरु, चन्दन, कुंकुम और तुलसीदल -
श्लोक 14 (skanda.7.377.14)
बिल्वप्रमाणपिंडेषु दीपोद्द्योतितभूमिषु । तांबूल फलनैवेद्यं तिलदर्भोदकेन च
bilvapramāṇapiṁḍeṣu dīpoddyotitabhūmiṣu | tāṁbūla phalanaivedyaṁ tiladarbhodakena ca
बिल्व-प्रमाण के पिण्डों में, दीपों से प्रकाशित भूमि पर, तांबूल, फल और नैवेद्य को तिल, कुश और जल के साथ अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.7.377.15)
तीर्थे संकल्पितं मर्त्यैस्तदनंतं प्रजायते । अयने विषुवे चैव संक्रांतौ ग्रहणेषु च
tīrthe saṁkalpitaṁ martyaistadanaṁtaṁ prajāyate | ayane viṣuve caiva saṁkrāṁtau grahaṇeṣu ca
तीर्थ में मनुष्यों द्वारा संकल्पित वह दान अनन्त फल देने वाला होता है, विशेषतः अयन, विषुव, संक्रांति और ग्रहण के समय -
श्लोक 16 (skanda.7.377.16)
मासांतेऽपर पक्षे तु क्षयाहे पितृमातृके । गजच्छायां त्रयोदश्यां द्रव्ये प्राप्तौ द्विजोत्तमः
māsāṁte'para pakṣe tu kṣayāhe pitṛmātṛke | gajacchāyāṁ trayodaśyāṁ dravye prāptau dvijottamaḥ
मासांत में, कृष्णपक्ष में, क्षय-तिथि पर, पितृ-मातृ के दिवस पर, गजच्छाया में, त्रयोदशी को, तथा द्रव्य प्राप्त होने पर उत्तम ब्राह्मण को -
श्लोक 17 (skanda.7.377.17)
गृहे श्राद्धं प्रकुर्वीत पितॄणामृणमुक्तये । गृहाच्छतगुणं नद्यां या नदी याति सागरम्
gṛhe śrāddhaṁ prakurvīta pitṝṇāmṛṇamuktaye | gṛhācchataguṇaṁ nadyāṁ yā nadī yāti sāgaram
एक को घर में श्राद्ध करना चाहिए, पितरों के ऋण से मुक्त होने के लिए। घर की अपेक्षा नदी पर सौ गुना फल है, विशेषतः उस नदी पर जो समुद्र में मिलती है।
श्लोक 18 (skanda.7.377.18)
प्रभासे पुष्करे राजन्गंगायां पिंडतारके । प्रयागे नृपगोमत्यां भवदामोदराग्रतः
prabhāse puṣkare rājangaṁgāyāṁ piṁḍatārake | prayāge nṛpagomatyāṁ bhavadāmodarāgrataḥ
प्रभास में, पुष्कर में, हे राजन्, गंगा में, पिण्डतारक में, प्रयाग में, गोमती में, और भव-दामोदर के समक्ष -
श्लोक 19 (skanda.7.377.19)
नर्मदादिषु तीर्थेषु कुर्याच्छ्राद्धं नरो यदि । सर्वपापविनिर्मुक्तः पितरो यांति सद्गतिम्
narmadādiṣu tīrtheṣu kuryācchrāddhaṁ naro yadi | sarvapāpavinirmuktaḥ pitaro yāṁti sadgatim
यदि मनुष्य नर्मदा आदि तीर्थों में श्राद्ध करता है, तो उसके पितर समस्त पापों से मुक्त होकर सद्गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 20 (skanda.7.377.20)
संतानमुत्तमं लब्ध्वा भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् । दिव्यं विमानमारुह्य प्रान्ते याति सुरालयम्
saṁtānamuttamaṁ labdhvā bhuktvā bhogānanuttamān | divyaṁ vimānamāruhya prānte yāti surālayam
उत्तम संतान पाकर, अनुपम भोगों को भोगकर, वह दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर अन्त में देवलोक को जाता है।
श्लोक 21 (skanda.7.377.21)
जातकर्मादियज्ञेषु विवाहे यज्ञकर्मणि । देवप्रतिष्ठाप्रारंभे वृद्धिश्राद्धं प्रकल्पयेत्
jātakarmādiyajñeṣu vivāhe yajñakarmaṇi | devapratiṣṭhāprāraṁbhe vṛddhiśrāddhaṁ prakalpayet
जातकर्म आदि संस्कारों में, विवाह में, यज्ञ-कर्म में, और देव-प्रतिष्ठा के आरंभ में वृद्धि-श्राद्ध करना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.7.377.22)
तृप्यन्ति देवताः सर्वा स्तृप्यंति पितरो नृणाम् । वृद्धिश्राद्धकृतो गेहे जायते सर्वमंगलम्
tṛpyanti devatāḥ sarvā stṛpyaṁti pitaro nṛṇām | vṛddhiśrāddhakṛto gehe jāyate sarvamaṁgalam
सभी देवता तृप्त होते हैं, और मनुष्यों के पितर भी तृप्त होते हैं। जिस घर में वृद्धि-श्राद्ध किया जाता है, वहाँ सब मंगल उत्पन्न होता है।
श्लोक 23 (skanda.7.377.23)
कामः क्रोधश्च लोभश्च मोहो मद्यमदादयः । माया मात्सर्यपैशुन्यमविवेको विचारणा
kāmaḥ krodhaśca lobhaśca moho madyamadādayaḥ | māyā mātsaryapaiśunyamaviveko vicāraṇā
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद्य आदि से उत्पन्न मद, माया, मात्सर्य, चुगली, अविवेक और अति-विचारणा -
श्लोक 24 (skanda.7.377.24)
अहंकारो यदृच्छा च चापल्यं लौल्यता नृप । अत्यायासोप्यनायासः प्रमादो द्रोहसाहसम्
ahaṁkāro yadṛcchā ca cāpalyaṁ laulyatā nṛpa | atyāyāsopyanāyāsaḥ pramādo drohasāhasam
अहंकार, स्वेच्छाचार, चंचलता, लोलुपता, हे राजन्, अति-श्रम और आलस्य, प्रमाद, तथा द्रोह-दुस्साहस -
श्लोक 25 (skanda.7.377.25)
आलस्यं दीर्घसूत्रत्वं परदारोपसेवनम् । अल्पाहारो निराहारः शोकश्चौर्यं नृपोत्तम
ālasyaṁ dīrghasūtratvaṁ paradāropasevanam | alpāhāro nirāhāraḥ śokaścauryaṁ nṛpottama
आलस्य, कार्य में विलम्ब, परस्त्री-सेवन, अल्प-आहार या निराहार रहना, शोक और चोरी, हे राजोत्तम -
श्लोक 26 (skanda.7.377.26)
एतान्दोषान्गृहे नित्यं वर्जयन्यदि वर्तते । स नरो मण्डनं भूमेर्देशस्य नगरस्य च
etāndoṣāngṛhe nityaṁ varjayanyadi vartate | sa naro maṇḍanaṁ bhūmerdeśasya nagarasya ca
यदि कोई मनुष्य अपने घर में सदैव इन दोषों का त्याग करते हुए रहता है, तो वह पृथ्वी, देश और नगर का आभूषण है।
श्लोक 27 (skanda.7.377.27)
श्रीमान्विद्वान्कुलीनोऽसौ स एव पुरुषोत्तमः । सर्वतीर्थाभिषेकश्च नित्यं तस्य प्रजायते
śrīmānvidvānkulīno'sau sa eva puruṣottamaḥ | sarvatīrthābhiṣekaśca nityaṁ tasya prajāyate
वही श्रीमान, विद्वान, कुलीन और सर्वश्रेष्ठ पुरुष है; समस्त तीर्थों के अभिषेक का फल उसे सदा ही प्राप्त होता रहता है।
श्लोक 28 (skanda.7.377.28)
तदा तीर्थफलं सम्यक्त्यक्तदोषस्य जायते । स्नानं सन्ध्या जपो होमः पितृदेवर्षितर्पणम् । श्राद्धं देवस्य पूजा च त्यक्तदोषस्य जायते
tadā tīrthaphalaṁ samyaktyaktadoṣasya jāyate | snānaṁ sandhyā japo homaḥ pitṛdevarṣitarpaṇam | śrāddhaṁ devasya pūjā ca tyaktadoṣasya jāyate
तभी तीर्थ का सम्यक् फल उसे मिलता है जिसने ये दोष त्याग दिए हैं। स्नान, संध्या, जप, हवन, पितृ-देव-ऋषियों का तर्पण, श्राद्ध और देव-पूजा - ये सब उसी के लिए सफल होते हैं जिसने दोषों का त्याग किया है।
श्लोक 29 (skanda.7.377.29)
प्रयागे वा कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यां च सागरे । गयायां वा रुद्रपदे नरनारायणाश्रमे
prayāge vā kurukṣetre sarasvatyāṁ ca sāgare | gayāyāṁ vā rudrapade naranārāyaṇāśrame
प्रयाग में, या कुरुक्षेत्र में, सरस्वती और सागर में, गया में, या रुद्रपद में, नर-नारायण के आश्रम में -
श्लोक 30 (skanda.7.377.30)
प्रभासे पुष्करे कृष्णे गोमत्यां पिंडतारके । वस्त्रापथे गिरौ पुण्ये तथा दामोदरे नृप
prabhāse puṣkare kṛṣṇe gomatyāṁ piṁḍatārake | vastrāpathe girau puṇye tathā dāmodare nṛpa
प्रभास में, पुष्कर में, कृष्णा में, गोमती में, पिण्डतारक में, पुण्य वस्त्रापथ पर्वत पर, और हे राजन्, दामोदर में -
श्लोक 31 (skanda.7.377.31)
भीमेश्वरे नर्मदायां स्कांदे रामेश्वरादिषु । उज्जयिन्यां महाकाले वाराणस्यां च भूर्भुवः
bhīmeśvare narmadāyāṁ skāṁde rāmeśvarādiṣu | ujjayinyāṁ mahākāle vārāṇasyāṁ ca bhūrbhuvaḥ
भीमेश्वर में, नर्मदा में, स्कन्द-तीर्थ में, रामेश्वर आदि में, उज्जयिनी के महाकाल में, और तीनों लोकों के तीर्थ वाराणसी में -
श्लोक 32 (skanda.7.377.32)
कालिंद्यां मथुरायां च सकृद्याति नरो यदि । सदोषो मुच्यते दोषैर्ब्रह्महत्यादिभिः कृतैः ।
kāliṁdyāṁ mathurāyāṁ ca sakṛdyāti naro yadi | sadoṣo mucyate doṣairbrahmahatyādibhiḥ kṛtaiḥ |
और कालिन्दी तथा मथुरा में - यदि मनुष्य एक बार भी जाता है, तो वह दोषी होते हुए भी ब्रह्महत्या आदि किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 33 (skanda.7.377.33)
अपि कीटः पतंगो वा पक्षी वा सूकरोऽपि वा । खरोष्ट्रकुंजरा वाजिमृगसिंहसरीसृपाः
api kīṭaḥ pataṁgo vā pakṣī vā sūkaro'pi vā | kharoṣṭrakuṁjarā vājimṛgasiṁhasarīsṛpāḥ
चाहे कीड़ा हो, पतंगा हो, पक्षी हो, या सूअर ही क्यों न हो; गधा, ऊँट, हाथी, घोड़ा, मृग, सिंह और सरीसृप -
श्लोक 34 (skanda.7.377.34)
ज्ञानतोऽज्ञानतो राजंस्तेषु स्था नेषु ये मृताः । सर्वे ते पुण्यकर्माणः स्वर्गं भुक्त्वा सुखं बहु
jñānato'jñānato rājaṁsteṣu sthā neṣu ye mṛtāḥ | sarve te puṇyakarmāṇaḥ svargaṁ bhuktvā sukhaṁ bahu
हे राजन्, जो प्राणी उन स्थानों में जान-बूझकर या अनजाने में मरते हैं, वे सब पुण्यकर्मा हो जाते हैं और स्वर्ग में बहुत सुख भोगते हैं।
श्लोक 35 (skanda.7.377.35)
चतुर्वर्णेषु सर्वे ते जायंते कर्मबंधनात् । कर्मबंधं विहायाशु मुक्तिं यांति नराः पुनः
caturvarṇeṣu sarve te jāyaṁte karmabaṁdhanāt | karmabaṁdhaṁ vihāyāśu muktiṁ yāṁti narāḥ punaḥ
अपने कर्म-बन्धन के अनुसार वे सब चारों वर्णों में जन्म लेते हैं; और फिर कर्म-बन्धन को त्यागकर मनुष्य शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 36 (skanda.7.377.36)
मोदंते तीर्थमरणात्स्वर्गभोगावसानतः । संप्राप्य भारते खंडे कर्मभूमिं महोदयम्
modaṁte tīrthamaraṇātsvargabhogāvasānataḥ | saṁprāpya bhārate khaṁḍe karmabhūmiṁ mahodayam
तीर्थ में मरण से लेकर स्वर्ग के भोग की समाप्ति तक वे आनन्द भोगते हैं, और फिर भारतखंड में, महान् उदय वाली कर्मभूमि को प्राप्त करते हैं -
श्लोक 37 (skanda.7.377.37)
अनेकाश्चर्यसंयुक्तं बहुपर्वतमंडितम् । गंगायाः सरितः सर्वाः समुद्रैः सह संगताः
anekāścaryasaṁyuktaṁ bahuparvatamaṁḍitam | gaṁgāyāḥ saritaḥ sarvāḥ samudraiḥ saha saṁgatāḥ
जो अनेक आश्चर्यों से युक्त है, अनेक पर्वतों से सुशोभित है, जहाँ गंगा सहित सभी नदियाँ समुद्रों से मिलती हैं -
श्लोक 38 (skanda.7.377.38)
पदेपदे निधानानि संति तीर्थान्यनेकशः । येषां स्मरणमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्
padepade nidhānāni saṁti tīrthānyanekaśaḥ | yeṣāṁ smaraṇamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet
जहाँ पग-पग पर निधान और अनेक तीर्थ हैं, जिनके स्मरण मात्र से ही समस्त पापों का नाश हो जाता है।
श्लोक 39 (skanda.7.377.39)
पातालमार्गा बहवः स्वर्गमार्गश्च दृश्यते । गगने दृश्यते सूर्यो हृदये दृश्यते हरः
pātālamārgā bahavaḥ svargamārgaśca dṛśyate | gagane dṛśyate sūryo hṛdaye dṛśyate haraḥ
वहाँ पाताल के अनेक मार्ग और स्वर्ग का मार्ग भी दिखाई देता है; जैसे आकाश में सूर्य दिखता है, वैसे ही हृदय में हर दिखाई देते हैं।
श्लोक 40 (skanda.7.377.40)
ध्यानेन ज्ञानयोगेन तपसा वचसा गुरोः । सत्येन साहसेनैव दृश्यते भुवनत्रयम्
dhyānena jñānayogena tapasā vacasā guroḥ | satyena sāhasenaiva dṛśyate bhuvanatrayam
ध्यान से, ज्ञान-योग से, तप से, गुरु के वचन से, सत्य से, और साहस से ही तीनों लोक दिखाई पड़ते हैं।
श्लोक 41 (skanda.7.377.41)
वेदस्मृतिपुराणैश्च ये न पश्यंति भूतलम् । पातालं स्वर्गलोकं च वंचितास्ते नरा इह
vedasmṛtipurāṇaiśca ye na paśyaṁti bhūtalam | pātālaṁ svargalokaṁ ca vaṁcitāste narā iha
जो मनुष्य वेद, स्मृति और पुराणों के द्वारा इस भूतल, पाताल और स्वर्गलोक को नहीं देख पाते, वे वास्तव में ठगे गए हैं।
श्लोक 42 (skanda.7.377.42)
ये विरज्यंति न स्त्रीषु कामासक्ता विचेतसः । देहोन्यथा वरस्त्रीणामन्यथा तैश्च चिंतितम्
ye virajyaṁti na strīṣu kāmāsaktā vicetasaḥ | dehonyathā varastrīṇāmanyathā taiśca ciṁtitam
जो काम में आसक्त और विवेकहीन होकर स्त्रियों से विरक्त नहीं होते, उनके द्वारा स्त्री-शरीर का वास्तविक स्वरूप कुछ और ही, तथा कल्पित स्वरूप कुछ और ही सोचा जाता है।
श्लोक 43 (skanda.7.377.43)
जन्मभूमिषु ते रक्ता जन्यंते जंतवः पुनः । मुक्तिमार्गात्पुनर्भ्रष्टा जायंते पशुयोनिषु
janmabhūmiṣu te raktā janyaṁte jaṁtavaḥ punaḥ | muktimārgātpunarbhraṣṭā jāyaṁte paśuyoniṣu
जन्म-भूमियों में आसक्त वे प्राणी बार-बार जन्म लेते हैं; मुक्ति-मार्ग से पुनः भ्रष्ट होकर वे पशु-योनियों में जन्म लेते हैं।
श्लोक 44 (skanda.7.377.44)
धनानि संप्राप्य वराटिकां ये द्विजातिमुख्याय विधाय पूजाम् । यच्छंति नो निर्मलचेतना ये नराधमा दैवहता मृतास्ते
dhanāni saṁprāpya varāṭikāṁ ye dvijātimukhyāya vidhāya pūjām | yacchaṁti no nirmalacetanā ye narādhamā daivahatā mṛtāste
जो धन पाकर, चाहे वह एक कौड़ी ही क्यों न हो, पूजापूर्वक श्रेष्ठ ब्राह्मण को नहीं देते, जिनका चित्त निर्मल नहीं है - वे नराधम मानो दैव द्वारा आहत होकर मृत ही हैं।
श्लोक 45 (skanda.7.377.45)
देहं सुपुष्टं विजरं च यौवनं लब्ध्वा न गंगादिषु यांति ये नराः । माता पिता नो न सुतो न बांधवो भार्या स्वसा नो दुहिता न विद्यते
dehaṁ supuṣṭaṁ vijaraṁ ca yauvanaṁ labdhvā na gaṁgādiṣu yāṁti ye narāḥ | mātā pitā no na suto na bāṁdhavo bhāryā svasā no duhitā na vidyate
जो मनुष्य पुष्ट शरीर और अजर यौवन पाकर भी गंगा आदि तीर्थों में नहीं जाते, उनके लिए न माता है, न पिता, न पुत्र, न बांधव, न पत्नी, न बहिन और न ही पुत्री विद्यमान है।
श्लोक 46 (skanda.7.377.46)
एकस्तु यो याति कथं न क्लिश्यते मूर्खो न जानाति भवं महेश्वरम् । स्नात्वा न पश्यंति हरं महेश्वरं दैवेन ते वै मुषिता नराधमाः
ekastu yo yāti kathaṁ na kliśyate mūrkho na jānāti bhavaṁ maheśvaram | snātvā na paśyaṁti haraṁ maheśvaraṁ daivena te vai muṣitā narādhamāḥ
जो अकेला ही जाता है, वह भला कैसे कष्ट न भोगे? मूर्ख भव महेश्वर को नहीं जानता। जो स्नान करके भी हर महेश्वर के दर्शन नहीं करते, वे नराधम निश्चय ही दैव द्वारा ठगे गए हैं।