प्रभास खण्ड · अध्याय 378
तीर्थयात्राविधिवर्णने श्राद्धदानादिमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.378.1)
सारस्वत उवाच छित्त्वा शुभाशुभं कर्म मुक्तिमिच्छेच्छिवां ततः । इदं न शक्यते कर्त्तुं शुभं कार्यं तदा नरैः
sārasvata uvāca chittvā śubhāśubhaṁ karma muktimicchecchivāṁ tataḥ | idaṁ na śakyate karttuṁ śubhaṁ kāryaṁ tadā naraiḥ
सारस्वत ने कहा - शुभ और अशुभ दोनों कर्मों को काटकर ही व्यक्ति को कल्याणकारी मुक्ति की इच्छा करनी चाहिए, परन्तु यह शुभ कार्य मनुष्यों द्वारा सहज ही नहीं किया जा सकता।
श्लोक 2 (skanda.7.378.2)
उत्थायोत्थाय स्नातव्यं पूज्यौ हरिहरौ स्वयम् । सत्यं वाच्यं हितं कार्यं दानं देयं स्वशक्तितः
utthāyotthāya snātavyaṁ pūjyau hariharau svayam | satyaṁ vācyaṁ hitaṁ kāryaṁ dānaṁ deyaṁ svaśaktitaḥ
प्रतिदिन उठकर स्नान करना चाहिए, हरि और हर की स्वयं पूजा करनी चाहिए, सत्य बोलना चाहिए, हितकारी कार्य करना चाहिए, और अपनी शक्ति के अनुसार दान देना चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.7.378.3)
परापवादभीरुत्वं परदारान्विवर्जयेत् । सुवर्णभूमिहरणब्रह्मदेवस्ववर्जनम्
parāpavādabhīrutvaṁ paradārānvivarjayet | suvarṇabhūmiharaṇabrahmadevasvavarjanam
दूसरों की निन्दा से भयभीत रहना चाहिए, परस्त्री का त्याग करना चाहिए, तथा स्वर्ण, भूमि, ब्राह्मण और देवता के धन के अपहरण से बचना चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.7.378.4)
ब्राह्मणस्त्रीनरेंद्राणां बालवृद्धतपस्विनाम् । पितृमातृगुरूणां च नाप्रियं मनसा वदेत्
brāhmaṇastrīnareṁdrāṇāṁ bālavṛddhatapasvinām | pitṛmātṛgurūṇāṁ ca nāpriyaṁ manasā vadet
ब्राह्मणों, स्त्रियों, राजाओं, बालकों, वृद्धों, तपस्वियों, माता-पिता और गुरुजनों के विषय में मन से भी अप्रिय वचन नहीं कहना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.7.378.5)
देशकालपरिज्ञानं पात्रापात्रविवेचनम् । छाया नृणां न वक्तव्या तक्राग्नींधनकांजिकम्
deśakālaparijñānaṁ pātrāpātravivecanam | chāyā nṛṇāṁ na vaktavyā takrāgnīṁdhanakāṁjikam
देश और काल का ज्ञान रखना चाहिए, पात्र और अपात्र का विवेचन करना चाहिए; मनुष्यों को छाया देने से मना नहीं करना चाहिए, तथा छाछ, अग्नि, ईंधन और कांजी भी नहीं नकारने चाहिए।
श्लोक 6 (skanda.7.378.6)
औषधं शाकमर्थिभ्यो दातव्यं गृह मेधिभिः । एकादशीपंचदशीचतुर्दश्यष्टमीषु च
auṣadhaṁ śākamarthibhyo dātavyaṁ gṛha medhibhiḥ | ekādaśīpaṁcadaśīcaturdaśyaṣṭamīṣu ca
गृहस्थों को याचकों को औषधि और शाक देना चाहिए - विशेषतः एकादशी, पूर्णिमा, चतुर्दशी और अष्टमी के दिनों में,
श्लोक 7 (skanda.7.378.7)
अमावास्याव्यतीपातसंक्रांतिग्रहणेषु च । वैधृते पितृमात्रोश्च क्षयाहदिवसेषु च
amāvāsyāvyatīpātasaṁkrāṁtigrahaṇeṣu ca | vaidhṛte pitṛmātrośca kṣayāhadivaseṣu ca
अमावस्या, व्यतीपात, संक्रांति, ग्रहण, वैधृति, माता-पिता की तिथि, और क्षय-तिथि के दिनों में भी।
श्लोक 8 (skanda.7.378.8)
युगादिमन्वादिदिने गृहे कार्यो महोत्सवः । तीर्थे वा गमनं कार्यं गृहाच्छतगुणं यतः
yugādimanvādidine gṛhe kāryo mahotsavaḥ | tīrthe vā gamanaṁ kāryaṁ gṛhācchataguṇaṁ yataḥ
युगादि और मन्वादि के दिनों में घर में महोत्सव करना चाहिए, या तीर्थ में जाना चाहिए, क्योंकि वहाँ घर की अपेक्षा सौ गुना फल मिलता है।
श्लोक 9 (skanda.7.378.9)
इद्रियाणां जयः कार्यो मद्यं द्यूतं विवर्जयेत् । विवादं गमनं युद्धं गृही यत्नेन वर्जयेत्
idriyāṇāṁ jayaḥ kāryo madyaṁ dyūtaṁ vivarjayet | vivādaṁ gamanaṁ yuddhaṁ gṛhī yatnena varjayet
इन्द्रियों को जीतना चाहिए, मद्य और जुआ त्यागना चाहिए; गृहस्थ को विवाद, अनावश्यक यात्रा और युद्ध का सतत् प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.7.378.10)
स्नानं दानं जपो होमो देवपूजा द्विजार्चनम् । अक्षयं जायते सर्वं विधिवच्चेद्भवेत्कृतम्
snānaṁ dānaṁ japo homo devapūjā dvijārcanam | akṣayaṁ jāyate sarvaṁ vidhivaccedbhavetkṛtam
स्नान, दान, जप, हवन, देव-पूजा और ब्राह्मण-अर्चना - ये सब, यदि विधिपूर्वक किए जाएँ, तो अक्षय फल देने वाले होते हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.378.11)
एकापि गौः प्रदातव्या वस्त्रालंकारभूषणा । दोग्ध्री सवत्सा तरुणी द्विजमुख्याय कल्पिता
ekāpi gauḥ pradātavyā vastrālaṁkārabhūṣaṇā | dogdhrī savatsā taruṇī dvijamukhyāya kalpitā
एक भी गाय देनी चाहिए, वस्त्र और आभूषणों से सज्जित, दूध देने वाली, बछड़े सहित, युवा - एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के लिए संकल्पित।
श्लोक 12 (skanda.7.378.12)
संप्राप्य भारतं खंडं मानुषं जन्म चोत्तमम् । धन्यो ददाति यो धेनुं स नरः सूर्यमण्डलम् । भित्त्वा याति विमानेन गम्यमानो गवादिभिः
saṁprāpya bhārataṁ khaṁḍaṁ mānuṣaṁ janma cottamam | dhanyo dadāti yo dhenuṁ sa naraḥ sūryamaṇḍalam | bhittvā yāti vimānena gamyamāno gavādibhiḥ
भारतखंड और उत्तम मानव-जन्म को पाकर जो धन्य मनुष्य गौ का दान करता है, वह सूर्यमण्डल को भेदकर विमान द्वारा, गौओं आदि से घिरा हुआ, [परम गति को] जाता है।
श्लोक 13 (skanda.7.378.13)
सप्त जन्मानि पापानि कृत्वा पापीह चाधमः । एको ददाति यो धेनुं मुच्यते सर्वपातकैः
sapta janmāni pāpāni kṛtvā pāpīha cādhamaḥ | eko dadāti yo dhenuṁ mucyate sarvapātakaiḥ
सात जन्मों तक पाप करने वाला अधम पापी भी, यदि एक बार गौ का दान करता है, तो समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.7.378.14)
यदा स नीयते बद्धो यममार्गेण किंकरैः । तदा नंदा समागत्य स्वं पुत्रमिव पश्यति
yadā sa nīyate baddho yamamārgeṇa kiṁkaraiḥ | tadā naṁdā samāgatya svaṁ putramiva paśyati
जब वह यम के दूतों द्वारा बाँधकर यम-मार्ग पर ले जाया जाता है, तब नन्दा (गौ) आकर उसे अपने पुत्र के समान देखती है।
श्लोक 15 (skanda.7.378.15)
विजित्य हुंकृतेनैव तान्दूतान्दूरतः स्थितान् । गोप्रदं तं समादाय प्रयाति शिवमन्दिरम्
vijitya huṁkṛtenaiva tāndūtāndūrataḥ sthitān | gopradaṁ taṁ samādāya prayāti śivamandiram
एक हुंकार से ही उन दूतों को दूर भगाकर, वह उस गौ-दाता को साथ लेकर शिव के मंदिर की ओर प्रस्थान करती है।
श्लोक 16 (skanda.7.378.16)
वृषो धर्म हति प्रोक्तो येन मुक्तः स मुच्यते । गोषु मध्ये पितॄन्सर्वान्हरमुद्दिश्य वा हरिम्
vṛṣo dharma hati prokto yena muktaḥ sa mucyate | goṣu madhye pitṝnsarvānharamuddiśya vā harim
बैल को साक्षात् धर्म कहा गया है, जिसके दान से मनुष्य मुक्त हो जाता है। गौओं के मध्य ही हर या हरि को उद्दिष्ट करके समस्त पितरों का [तर्पण करना चाहिए] -
श्लोक 17 (skanda.7.378.17)
सूर्यब्रह्मपुरे वासो जायते ब्रह्मवासरे । दृढं ककुद्मिनं संतं युवानं भारसाधनम्
sūryabrahmapure vāso jāyate brahmavāsare | dṛḍhaṁ kakudminaṁ saṁtaṁ yuvānaṁ bhārasādhanam
इससे सूर्य के ब्रह्मपुर में एक ब्रह्म-दिवस तक निवास प्राप्त होता है। एक सुदृढ़, कूबड़ वाला, युवा, भार ढोने में समर्थ बैल -
श्लोक 18 (skanda.7.378.18)
हलक्षमं बलीवर्दं दत्त्वा विप्राय पर्वसु । तमारुह्य नरो याति गोलोकं शिवसंनिधौ
halakṣamaṁ balīvardaṁ dattvā viprāya parvasu | tamāruhya naro yāti golokaṁ śivasaṁnidhau
जो हल जोतने में समर्थ है, ऐसा बैल पर्व-दिनों में ब्राह्मण को देकर, मनुष्य उसी पर आरूढ़ होकर शिव के समीप गोलोक को जाता है।
श्लोक 19 (skanda.7.378.19)
अश्वं सास्तरणं दत्त्वा खलीनेन च संयुतम् । अश्वराजबलात्स्वर्गे मोदते ब्राह्मवासरम्
aśvaṁ sāstaraṇaṁ dattvā khalīnena ca saṁyutam | aśvarājabalātsvarge modate brāhmavāsaram
काठी और लगाम सहित घोड़ा देकर, अश्वराज (उच्चैःश्रवा) के बल से स्वर्ग में एक ब्रह्म-दिवस तक आनन्द भोगता है।
श्लोक 20 (skanda.7.378.20)
गजदानाद्गजेंद्रेण नीयते नंदनं वनम् । पृथिव्यां सागरांतायामेष राजा भविष्यति
gajadānādgajeṁdreṇa nīyate naṁdanaṁ vanam | pṛthivyāṁ sāgarāṁtāyāmeṣa rājā bhaviṣyati
गज-दान से वह गजेन्द्र द्वारा नन्दन वन को ले जाया जाता है, और आगे वह समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी का राजा होगा।
श्लोक 21 (skanda.7.378.21)
गृहं सोपस्करं दत्त्वा विप्राय गृहमेधिने । लभते नंदने दिव्यं विमानं सार्वकामिकम्
gṛhaṁ sopaskaraṁ dattvā viprāya gṛhamedhine | labhate naṁdane divyaṁ vimānaṁ sārvakāmikam
साज-सज्जा सहित घर एक गृहस्थ ब्राह्मण को देकर, वह नन्दन वन में समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला दिव्य विमान प्राप्त करता है।
श्लोक 22 (skanda.7.378.22)
द्रव्यं पृथिव्यां परमं सुवर्णं हृष्यंति देवा यदि दीयते ततः । सूर्योपि तस्मै रुचिरं विमानं ददाति तावद्भ्रमतेऽत्र यावत्
dravyaṁ pṛthivyāṁ paramaṁ suvarṇaṁ hṛṣyaṁti devā yadi dīyate tataḥ | sūryopi tasmai ruciraṁ vimānaṁ dadāti tāvadbhramate'tra yāvat
पृथ्वी पर स्वर्ण सर्वोत्तम द्रव्य है; उसके दान से देवगण प्रसन्न होते हैं। तब सूर्य भी उसे मनोहर विमान प्रदान करते हैं, जिस पर वह तब तक विचरण करता है [जब तक सूर्य रहता है]।
श्लोक 23 (skanda.7.378.23)
रौप्यं पितॄणामतिवल्लभं तद्दत्त्वा नरो निर्मलतामुपैति । सोमस्य लोकं लभते स तावद्भुवे निवद्धा ऋषयो हि यावत्
raupyaṁ pitṝṇāmativallabhaṁ taddattvā naro nirmalatāmupaiti | somasya lokaṁ labhate sa tāvadbhuve nivaddhā ṛṣayo hi yāvat
चाँदी पितरों को अत्यन्त प्रिय है; उसका दान देकर मनुष्य निर्मलता को प्राप्त होता है। वह सोम के लोक को तब तक प्राप्त करता है, जब तक सप्तर्षि पृथ्वी से बंधे रहते हैं।
श्लोक 24 (skanda.7.378.24)
श्रीखंडकर्पूरसमाकुलानि तांबूलरत्नादिफलानि दत्त्वा । पुष्पाणि वस्त्राणि सुखेन याति साकं शशांकं दिवि देववृंदैः ।
śrīkhaṁḍakarpūrasamākulāni tāṁbūlaratnādiphalāni dattvā | puṣpāṇi vastrāṇi sukhena yāti sākaṁ śaśāṁkaṁ divi devavṛṁdaiḥ |
चन्दन और कर्पूर से युक्त तांबूल, रत्न आदि फल, पुष्प और वस्त्र देकर, वह सुखपूर्वक देव-समूहों सहित आकाश में चन्द्रमा के साथ चला जाता है।
श्लोक 25 (skanda.7.378.25)
तक्रोदकतैलघृतदुग्धेक्षुरसमधूनि यो दद्यात् । खर्जूरखंडद्राक्षावातामांजीरकैः साकम्
takrodakatailaghṛtadugdhekṣurasamadhūni yo dadyāt | kharjūrakhaṁḍadrākṣāvātāmāṁjīrakaiḥ sākam
जो छाछ, जल, तेल, घृत, दूध, ईख-रस और मधु का दान करता है, साथ ही खजूर, खण्ड, दाख, बादाम और अनार का भी -
श्लोक 26 (skanda.7.378.26)
दर्भाक्षतमृद्गोमयदूर्वायज्ञोपवीतानि । तिलचर्मसूर्यपिटकं दत्त्वा ख्यातश्चिरं स्वर्गे
darbhākṣatamṛdgomayadūrvāyajñopavītāni | tilacarmasūryapiṭakaṁ dattvā khyātaściraṁ svarge
कुश, अक्षत, मिट्टी, गोबर, दूर्वा, यज्ञोपवीत, तिल, चर्म और सूर्य-पिटक का दान देकर, वह स्वर्ग में चिरकाल तक विख्यात रहता है।
श्लोक 27 (skanda.7.378.27)
आत्माहाराच्चतुर्भागं सिद्धान्नाद्यदि दीयते । हन्तकारः स तं दत्त्वा ध्रुवं याति ध्रुवालये ।
ātmāhārāccaturbhāgaṁ siddhānnādyadi dīyate | hantakāraḥ sa taṁ dattvā dhruvaṁ yāti dhruvālaye |
यदि अपने ही भोजन में से एक चौथाई भाग, पके हुए अन्न में से, दिया जाए, तो हत्यारा भी उसे देकर निश्चय ही ध्रुव के धाम को जाता है।
श्लोक 28 (skanda.7.378.28)
आत्माहारप्रमाणेन प्रत्यहं गोषु दीयते । गवाह्निकं तासु दत्त्वा नरो याति सुरालयम्
ātmāhārapramāṇena pratyahaṁ goṣu dīyate | gavāhnikaṁ tāsu dattvā naro yāti surālayam
अपने भोजन के परिमाण के अनुसार प्रतिदिन गौओं को जो दिया जाता है, वह दैनिक गोचारा उन्हें देकर मनुष्य देवलोक को जाता है।
श्लोक 29 (skanda.7.378.29)
कंडनीपेषणीचुल्लीमार्जनीभिश्च यत्कृतम् । पापं गृही क्षालयति ददद्भिक्षां दिनं प्रति
kaṁḍanīpeṣaṇīcullīmārjanībhiśca yatkṛtam | pāpaṁ gṛhī kṣālayati dadadbhikṣāṁ dinaṁ prati
ओखली, चक्की, चूल्हे और झाड़ू के प्रयोग से जो पाप उत्पन्न होता है, उसे गृहस्थ प्रतिदिन भिक्षा देकर धो डालता है।
श्लोक 30 (skanda.7.378.30)
ग्रासमात्रा भवेद्भिक्षा सा नित्यं यत्र दीयते । तद्गृहं गृहमन्यच्च स्मशानमिव दृश्यते
grāsamātrā bhavedbhikṣā sā nityaṁ yatra dīyate | tadgṛhaṁ gṛhamanyacca smaśānamiva dṛśyate
जिस घर में प्रतिदिन एक ग्रास मात्र भिक्षा भी दी जाती है, वही घर है; अन्य घर तो श्मशान के समान दिखाई देता है।
श्लोक 31 (skanda.7.378.31)
कुम्भान्सोदकसिद्धान्नांश्छत्रोपानत्कमंडलुम् । अंगुलीयकवासांसि दत्त्वा याति नरो दिवि
kumbhānsodakasiddhānnāṁśchatropānatkamaṁḍalum | aṁgulīyakavāsāṁsi dattvā yāti naro divi
जल से भरे कलश, पका हुआ अन्न, छाता, जूते, कमण्डलु, अंगूठी और वस्त्र देकर, मनुष्य स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 32 (skanda.7.378.32)
श्रांतस्य यानं तृषितस्य पानमन्नं क्षुधार्त्तस्य नरो नरेन्द्र । दत्त्वा विमानेन सुरांगनाभिः संस्तूयमानस्त्रिदिवं स याति
śrāṁtasya yānaṁ tṛṣitasya pānamannaṁ kṣudhārttasya naro narendra | dattvā vimānena surāṁganābhiḥ saṁstūyamānastridivaṁ sa yāti
हे नरेन्द्र, थके हुए को सवारी, प्यासे को पेय, भूखे को अन्न देकर, मनुष्य देव-अंगनाओं द्वारा स्तुति किए जाते हुए विमान से त्रिलोक को जाता है।
श्लोक 33 (skanda.7.378.33)
भोजनं सततं देयं यथाशक्त्या घृत प्लुतम् । तन्मया हि यतः प्राणा अतः पुष्यंति प्राणिनः
bhojanaṁ satataṁ deyaṁ yathāśaktyā ghṛta plutam | tanmayā hi yataḥ prāṇā ataḥ puṣyaṁti prāṇinaḥ
अपनी शक्ति के अनुसार सदैव घृत से सिक्त भोजन देना चाहिए, क्योंकि प्राण उसी से बने हैं; इसी से प्राणी पुष्ट होते हैं।
श्लोक 34 (skanda.7.378.34)
क्षुत्पीडा महती लोके ह्यन्नं तद्भेषजं स्मृतम् । तेन सा शांतिमायाति ततोन्नं देयमुत्तमम्
kṣutpīḍā mahatī loke hyannaṁ tadbheṣajaṁ smṛtam | tena sā śāṁtimāyāti tatonnaṁ deyamuttamam
इस लोक में भूख की पीड़ा बहुत बड़ी है, और अन्न ही उसकी औषधि कही गई है; उसी से वह शान्त होती है, अतः अन्न-दान सर्वोत्तम दान है।
श्लोक 35 (skanda.7.378.35)
अन्नं वस्त्रं फलं तोयं तक्रं शाकं घृतं मधु । पत्रं पुष्पं तथोपानत्कंथां यष्टिं कमंडलुम्
annaṁ vastraṁ phalaṁ toyaṁ takraṁ śākaṁ ghṛtaṁ madhu | patraṁ puṣpaṁ tathopānatkaṁthāṁ yaṣṭiṁ kamaṁḍalum
अन्न, वस्त्र, फल, जल, छाछ, शाक, घृत, मधु, पत्ते, पुष्प, तथा जूते, गुदड़ी, लाठी और कमण्डलु -
श्लोक 36 (skanda.7.378.36)
छत्रपात्रे व्रतं विद्या अक्षमाला सुरार्चनम् । कन्या कुशोपवीतानि बीजौषधगृहाणि च
chatrapātre vrataṁ vidyā akṣamālā surārcanam | kanyā kuśopavītāni bījauṣadhagṛhāṇi ca
छाता, पात्र, व्रत, विद्या, जपमाला, देव-पूजा-सामग्री, कन्यादान, कुश और यज्ञोपवीत, तथा बीज, औषधि और घर -
श्लोक 37 (skanda.7.378.37)
सस्यं क्षेत्रं यज्ञपात्रं योगपट्टं च पादुके । कृष्णाजिनं बुद्धिदानं धर्मादेशकथानकम्
sasyaṁ kṣetraṁ yajñapātraṁ yogapaṭṭaṁ ca pāduke | kṛṣṇājinaṁ buddhidānaṁ dharmādeśakathānakam
अन्न, खेत, यज्ञ-पात्र, योगपट्ट और खड़ाऊँ, कृष्णाजिन, बुद्धि का दान, और धर्म के उपदेश तथा कथाओं का वर्णन -
श्लोक 38 (skanda.7.378.38)
अथैतत्संततं देयं तेन श्रेयो महद्भवेत् । सर्वपापक्षयं कृत्वा दाता याति शिवालयम्
athaitatsaṁtataṁ deyaṁ tena śreyo mahadbhavet | sarvapāpakṣayaṁ kṛtvā dātā yāti śivālayam
यह सब निरन्तर दान करना चाहिए; इससे महान् कल्याण होता है। समस्त पापों का क्षय करके दाता शिव के धाम को जाता है।
श्लोक 39 (skanda.7.378.39)
श्राद्धे गृहस्था भोक्तव्याः कुलीना वेदपारगाः । अक्रोधनाः स्नानशीलाः स्वदेशाचारतत्पराः
śrāddhe gṛhasthā bhoktavyāḥ kulīnā vedapāragāḥ | akrodhanāḥ snānaśīlāḥ svadeśācāratatparāḥ
श्राद्ध में ऐसे गृहस्थों को भोजन कराना चाहिए जो कुलीन हों, वेद में पारंगत हों, क्रोधरहित हों, स्नानशील हों, और अपने देश के आचार का पालन करने वाले हों -
श्लोक 40 (skanda.7.378.40)
आमंत्र्य पूर्वदिवसे निरीहा अपि ये द्विजाः । अलोलुपा व्याधिहीना न तु ये ग्रामयाजिनः
āmaṁtrya pūrvadivase nirīhā api ye dvijāḥ | alolupā vyādhihīnā na tu ye grāmayājinaḥ
जिन्हें एक दिन पहले निमंत्रित किया गया हो, जो निःस्पृह, लोभरहित और रोगरहित ब्राह्मण हों - परन्तु जो ग्राम-याजक (शुल्क लेकर पूजा कराने वाले) हों, वे नहीं।
श्लोक 41 (skanda.7.378.41)
तेषां पुरः प्रदातव्यं पिंडदानं विधानतः । श्राद्धं श्रद्धाविहीनेन कृतमप्यकृतं भवेत्
teṣāṁ puraḥ pradātavyaṁ piṁḍadānaṁ vidhānataḥ | śrāddhaṁ śraddhāvihīnena kṛtamapyakṛtaṁ bhavet
उनके समक्ष विधिपूर्वक पिण्डदान करना चाहिए। श्रद्धा से रहित व्यक्ति द्वारा किया गया श्राद्ध, किया हुआ होते हुए भी न किए हुए के समान होता है।
श्लोक 42 (skanda.7.378.42)
तस्माच्छ्रद्धान्वितैः श्राद्धं कर्त्तव्यं क्रोधवर्जितैः । वानप्रस्थो ब्रह्मचारी पथिकस्तीर्थसेवकः
tasmācchraddhānvitaiḥ śrāddhaṁ karttavyaṁ krodhavarjitaiḥ | vānaprastho brahmacārī pathikastīrthasevakaḥ
अतः श्रद्धा से युक्त और क्रोधरहित लोगों को ही श्राद्ध करना चाहिए। वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, पथिक, तीर्थ-सेवक -
श्लोक 43 (skanda.7.378.43)
अतिथिर्वैश्वदेवांते स पूज्यः श्राद्धकर्मणि । सर्वदा यतयः पूज्याः स्वशक्त्या गृहमेधिभिः
atithirvaiśvadevāṁte sa pūjyaḥ śrāddhakarmaṇi | sarvadā yatayaḥ pūjyāḥ svaśaktyā gṛhamedhibhiḥ
और वैश्वदेव के अंत में आया अतिथि - ये सब श्राद्ध-कर्म में पूजनीय हैं। संन्यासी सदैव गृहस्थों द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार पूजनीय हैं।
श्लोक 44 (skanda.7.378.44)
यात्राविधिमथो वक्ष्ये सेतिहासं नृपोत्तम
yātrāvidhimatho vakṣye setihāsaṁ nṛpottama
अब, हे राजोत्तम, मैं यात्रा की विधि को उसके इतिहास सहित कहूँगा।