प्रभास खण्ड · अध्याय 379
सोमेश्वरोत्पत्तिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.379.1)
सारस्वत उवाच वस्त्रापथे महाक्षेत्रे नगरे वामने पुरा । पुत्रशोकाभिसंतप्तो वसिष्ठो भगवानृषिः
sārasvata uvāca vastrāpathe mahākṣetre nagare vāmane purā | putraśokābhisaṁtapto vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ
सारस्वत ने कहा - प्राचीन काल में वस्त्रापथ नामक महाक्षेत्र में, वामन नगर में, पुत्र-शोक से संतप्त भगवान् ऋषि वसिष्ठ -
श्लोक 2 (skanda.7.379.2)
आजगाम तपस्तप्तुं स्वर्णरेखानदीतटे । ईशानकोणे नगरात्स्वर्णरेखानदीजले
ājagāma tapastaptuṁ svarṇarekhānadītaṭe | īśānakoṇe nagarātsvarṇarekhānadījale
स्वर्णरेखा नदी के तट पर, नगर के ईशान कोण में, स्वर्णरेखा नदी के जल में तप करने आए।
श्लोक 3 (skanda.7.379.3)
स्नात्वा ध्यात्वा शिवं देवं मनसाऽचिन्तयद्यदा । तदा रुद्रः समायातस्त्रिनेत्रो वृषभध्वजः । महर्षे तव तुष्टोऽहं किं करोमि वदस्व तत्
snātvā dhyātvā śivaṁ devaṁ manasā'cintayadyadā | tadā rudraḥ samāyātastrinetro vṛṣabhadhvajaḥ | maharṣe tava tuṣṭo'haṁ kiṁ karomi vadasva tat
स्नान कर, शिव देव का ध्यान करते हुए जब उन्होंने मन में उनका चिंतन किया, तब त्रिनेत्र, वृषभ-ध्वज रुद्र वहाँ आए - हे महर्षे, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, कहो मैं क्या करूँ।
श्लोक 4 (skanda.7.379.4)
वसिष्ठ उवाच यदि तुष्टो महादेव वरो देयो ममाधुना । तदाऽत्र भवता स्थेयं यावदाचंद्रतारकम्
vasiṣṭha uvāca yadi tuṣṭo mahādeva varo deyo mamādhunā | tadā'tra bhavatā stheyaṁ yāvadācaṁdratārakam
वसिष्ठ ने कहा - हे महादेव, यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे अभी वर देना चाहते हैं, तो आप यहाँ चन्द्र-तारे रहने तक निवास करें।
श्लोक 5 (skanda.7.379.5)
अत्र स्नानं करिष्यंति ये नराः पापकर्मिणः । तेषां पापक्षयो देव कर्तव्यो भवता सदा
atra snānaṁ kariṣyaṁti ye narāḥ pāpakarmiṇaḥ | teṣāṁ pāpakṣayo deva kartavyo bhavatā sadā
यहाँ जो पापकर्मी मनुष्य स्नान करेंगे, हे देव, उनके पापों का नाश आप सदैव करें।
श्लोक 6 (skanda.7.379.6)
नरा ये पापकर्माणः पूजयंति त्रिलोचनम् । तान्नरान्नय देवेश विमानैः शिवमंदिरम्
narā ye pāpakarmāṇaḥ pūjayaṁti trilocanam | tānnarānnaya deveśa vimānaiḥ śivamaṁdiram
जो पापकर्मी मनुष्य त्रिलोचन की पूजा करते हैं, हे देवेश, उन मनुष्यों को विमानों द्वारा शिव-मंदिर ले जाइए।
श्लोक 7 (skanda.7.379.7)
सारस्वत उवाच तथेत्युक्ता हरो देवस्तत्रैवांतर धीयत । हिरण्यकशिपुं हत्वा नरसिंहो महाबलः । त्रैलोक्यमिंद्राय ददौ कालरुद्रं स्वयं ययौ
sārasvata uvāca tathetyuktā haro devastatraivāṁtara dhīyata | hiraṇyakaśipuṁ hatvā narasiṁho mahābalaḥ | trailokyamiṁdrāya dadau kālarudraṁ svayaṁ yayau
सारस्वत ने कहा - 'तथास्तु' कहकर देव हर वहीं अंतर्धान हो गए। हिरण्यकशिपु का वध कर महाबली नृसिंह ने तीनों लोक इन्द्र को दे दिए और स्वयं कालरुद्र होकर चले गए।
श्लोक 8 (skanda.7.379.8)
तदन्वये बलिर्जातः स चातीव बला धिकः । एकातपत्रां पृथिवीं बलिश्चक्रे बलाधिकः । अकृष्टपच्या सुजला धरित्री सस्यशालिनी
tadanvaye balirjātaḥ sa cātīva balā dhikaḥ | ekātapatrāṁ pṛthivīṁ baliścakre balādhikaḥ | akṛṣṭapacyā sujalā dharitrī sasyaśālinī
उसी वंश में अत्यंत बलशाली बलि उत्पन्न हुआ। बलशाली बलि ने पृथ्वी को एकछत्र राज्य बना लिया; बिना जोते ही पकने वाली, जल-समृद्ध, फसलों से भरी धरा -
श्लोक 9 (skanda.7.379.9)
गन्धवंति च पुष्पाणि रसवंति फलानि च । आस्कन्धफलिनो वृक्षाः पुटके पुटके मधु
gandhavaṁti ca puṣpāṇi rasavaṁti phalāni ca | āskandhaphalino vṛkṣāḥ puṭake puṭake madhu
पुष्प सुगन्धित थे, फल रसीले थे, वृक्ष तने पर ही फल देते थे, हर पोर में मधु था।
श्लोक 10 (skanda.7.379.10)
चतुर्वेदा द्विजाः सर्वे क्षत्रिया युद्धकोविदाः । गोषु सेवापरा वैश्याः शूद्राः शुश्रूषणे रताः ।
caturvedā dvijāḥ sarve kṣatriyā yuddhakovidāḥ | goṣu sevāparā vaiśyāḥ śūdrāḥ śuśrūṣaṇe ratāḥ |
सभी ब्राह्मण चारों वेदों के ज्ञाता थे, क्षत्रिय युद्ध-विद्या में निपुण थे, वैश्य गौ-सेवा में तत्पर थे, शूद्र सेवा में रत थे।
श्लोक 11 (skanda.7.379.11)
सदाचारा जनपदा ईतिव्याधिविवर्जिताः । हृष्टपुष्टजनाः सर्वे सदानंदाः सदोद्यताः
sadācārā janapadā ītivyādhivivarjitāḥ | hṛṣṭapuṣṭajanāḥ sarve sadānaṁdāḥ sadodyatāḥ
जनपद सदाचारी थे, उत्पात और रोगों से रहित थे; सब लोग हृष्ट-पुष्ट, सदा आनंदित और सदा उद्यमी थे।
श्लोक 12 (skanda.7.379.12)
कुंकुमागुरुलिप्तांगाः सुवेषाः साधुमंडिताः । दारिद्र्यदुःखमरणैर्विमुक्ताश्चिरजीविनः
kuṁkumāguruliptāṁgāḥ suveṣāḥ sādhumaṁḍitāḥ | dāridryaduḥkhamaraṇairvimuktāścirajīvinaḥ
कुंकुम-अगुरु से लिप्त अंगों वाले, सुसज्जित, साधुओं-से सुशोभित, दरिद्रता-दुःख-अकाल-मृत्यु से मुक्त, दीर्घजीवी।
श्लोक 13 (skanda.7.379.13)
दीपोद्द्योतितभूभागा रात्रावपि यथा दिने । विचरंति तथा मर्त्या देवा देवालये यथा ।
dīpoddyotitabhūbhāgā rātrāvapi yathā dine | vicaraṁti tathā martyā devā devālaye yathā |
दीपों से प्रकाशित भूभाग पर रात्रि में भी दिन के समान, मनुष्य वैसे ही विचरण करते थे जैसे देवालय में देवता विचरते हैं।
श्लोक 14 (skanda.7.379.14)
पृथिव्यां स्वर्गरूपायां राज्यं चक्रेऽसुरो बलिः । नित्यं विवाहवादित्रैर्नादितं भूपमंदिरम्
pṛthivyāṁ svargarūpāyāṁ rājyaṁ cakre'suro baliḥ | nityaṁ vivāhavāditrairnāditaṁ bhūpamaṁdiram
असुर बलि ने स्वर्ग-सी बनी पृथ्वी पर राज्य किया; उनका राजभवन सदा विवाह के वाद्यों से गूँजता था।
श्लोक 15 (skanda.7.379.15)
धरित्रीं बुभुजे दैत्यो देवराजो यथा दिवि । देवेन्द्रो बलिना नित्यं यज्ञैः संतोषितस्तदा
dharitrīṁ bubhuje daityo devarājo yathā divi | devendro balinā nityaṁ yajñaiḥ saṁtoṣitastadā
वह दैत्य पृथ्वी को वैसे ही भोगता था जैसे देवराज स्वर्ग को भोगते हैं; इन्द्र भी बलि के यज्ञों से सदा संतुष्ट रहते थे।
श्लोक 16 (skanda.7.379.16)
देवानां दानवानां च नास्ति युद्धं परस्परम् । एक एव महीपालो युद्धं नास्ति धरातले
devānāṁ dānavānāṁ ca nāsti yuddhaṁ parasparam | eka eva mahīpālo yuddhaṁ nāsti dharātale
देवताओं और दानवों में परस्पर युद्ध नहीं था; पृथ्वी पर एक ही राजा था, कहीं युद्ध नहीं था।
श्लोक 17 (skanda.7.379.17)
सपत्नककलिर्नाम नास्ति युद्धं हरेर्गजैः । न सर्प्पनकुलैर्नित्यं न बिडालैश्च मूषकैः
sapatnakakalirnāma nāsti yuddhaṁ harergajaiḥ | na sarppanakulairnityaṁ na biḍālaiśca mūṣakaiḥ
शत्रुता या कलह नाम की कोई वस्तु नहीं थी; सिंह और हाथी में युद्ध नहीं होता था, न सर्प-नेवले में, न बिल्ली-चूहे में सदा।
श्लोक 18 (skanda.7.379.18)
मैत्रीभावं गतं सर्वं जगत्स्थावर जंगमम् । त्रैलोक्यभ्रमणं कृत्वा नारदो नंदने वने
maitrībhāvaṁ gataṁ sarvaṁ jagatsthāvara jaṁgamam | trailokyabhramaṇaṁ kṛtvā nārado naṁdane vane
चराचर सम्पूर्ण जगत् मैत्री-भाव को प्राप्त हो गया था। तीनों लोकों में भ्रमण करते हुए नारद नन्दन वन में -
श्लोक 19 (skanda.7.379.19)
गतो न पश्यते युद्धं त्रैलोक्ये सचराचरे । तावत्तस्योदरे पीडा महती समजायत
gato na paśyate yuddhaṁ trailokye sacarācare | tāvattasyodare pīḍā mahatī samajāyata
वहाँ पहुँचकर उन्हें चराचर त्रैलोक्य में कहीं युद्ध नहीं दिखा; इतने में उनके उदर में महान् पीड़ा उत्पन्न हुई।
श्लोक 20 (skanda.7.379.20)
न मे स्नानादिना कार्यं तर्प्पणैः किं प्रयोजनम् । जपहोमादिना सर्वमन्यथा मम चेष्टितम्
na me snānādinā kāryaṁ tarppaṇaiḥ kiṁ prayojanam | japahomādinā sarvamanyathā mama ceṣṭitam
मुझे स्नान आदि से क्या प्रयोजन, तर्पण से क्या काम? जप-हवन आदि से भी मेरा कार्य अन्यथा ही है।
श्लोक 21 (skanda.7.379.21)
तत्स्नानं यत्र युध्यन्ते गजा दंतविघट्टनैः । सा संध्या यत्र निहतैः कबन्धैर्भूर्विभूषिता
tatsnānaṁ yatra yudhyante gajā daṁtavighaṭṭanaiḥ | sā saṁdhyā yatra nihataiḥ kabandhairbhūrvibhūṣitā
मेरा स्नान तो वही है जहाँ हाथी दाँतों की टक्कर से लड़ते हैं; मेरी संध्या वही है जहाँ धरती मृत धड़ों से सुशोभित होती है।
श्लोक 22 (skanda.7.379.22)
कुंतघातविनिर्भिन्नगजकुम्भोद्भवासृजा । तृप्यंति यत्र क्रव्यादास्तर्पणं तन्मम प्रियम्
kuṁtaghātavinirbhinnagajakumbhodbhavāsṛjā | tṛpyaṁti yatra kravyādāstarpaṇaṁ tanmama priyam
भाले के प्रहार से विदीर्ण गजों के कुम्भस्थलों से बहते रक्त से जहाँ मांसाहारी जीव तृप्त होते हैं, वही तर्पण मुझे प्रिय है।
श्लोक 23 (skanda.7.379.23)
गजशीर्षैरगम्यास्ते निहताः क्षत्रिया रणे । स होमो यत्र हूयंते गजाश्च नरपुंगवाः
gajaśīrṣairagamyāste nihatāḥ kṣatriyā raṇe | sa homo yatra hūyaṁte gajāśca narapuṁgavāḥ
जहाँ युद्ध में मारे गए क्षत्रिय गजों के सिरों से दुर्गम हो जाते हैं, वही मेरा हवन है जहाँ हाथी और श्रेष्ठ पुरुष आहुति बनते हैं।
श्लोक 24 (skanda.7.379.24)
शब्दाग्नौ नारदस्यायं होमस्त्रै लोक्यविश्रुतः । छिन्नपादशिरोहस्तैरंतरांत्रविलबितैः
śabdāgnau nāradasyāyaṁ homastrai lokyaviśrutaḥ | chinnapādaśirohastairaṁtarāṁtravilabitaiḥ
नारद का यह हवन रणघोष की अग्नि में तीनों लोकों में विख्यात है - जहाँ कटे पैर, सिर, हाथ और बिखरी आँतें हों।
श्लोक 25 (skanda.7.379.25)
यदर्च्यते भूमितलं तन्मे नित्यं सुरार्चनम् । किं देवैर्दिवि मे कार्यं किं मनुष्यैर्धरातले
yadarcyate bhūmitalaṁ tanme nityaṁ surārcanam | kiṁ devairdivi me kāryaṁ kiṁ manuṣyairdharātale
धरातल का यही अर्चन मेरी सतत देव-अर्चना है। मुझे स्वर्ग के देवताओं से क्या, धरती के मनुष्यों से क्या काम?
श्लोक 26 (skanda.7.379.26)
पन्नगैः किं तु पाताले न युध्यन्ते परस्परम् । तथा करिष्ये देवेन्द्रादुपेन्द्राच्च धरातले
pannagaiḥ kiṁ tu pātāle na yudhyante parasparam | tathā kariṣye devendrādupendrācca dharātale
पाताल में सर्प भी तो परस्पर युद्ध नहीं करते! अतः मैं देवेन्द्र और उपेन्द्र के बीच धरती पर वैसा ही करूँगा।
श्लोक 27 (skanda.7.379.27)
रसातलं बलिर्यातु सत्यमस्तु वचो मम । जीवितेनापि राज्येन यदा दामोदरं हरिम्
rasātalaṁ baliryātu satyamastu vaco mama | jīvitenāpi rājyena yadā dāmodaraṁ harim
बलि को रसातल जाना ही होगा, मेरा वचन सत्य हो! जब वह अपने जीवन और राज्य से भी दामोदर हरि को -
श्लोक 28 (skanda.7.379.28)
तोषयिष्यति यत्नेन तदेन्द्रोऽसौ भविष्यति । देवेन्द्रो वृत्रहा भूत्वा भ्रष्टराज्यो भविष्यति
toṣayiṣyati yatnena tadendro'sau bhaviṣyati | devendro vṛtrahā bhūtvā bhraṣṭarājyo bhaviṣyati
प्रयत्नपूर्वक तुष्ट करेगा, तब वह इन्द्र बनेगा। देवेन्द्र, वृत्रघाती होकर भी, राज्य-भ्रष्ट हो जाएगा।
श्लोक 29 (skanda.7.379.29)
यदा वस्त्रापथे गत्वा भवं भावेन पूजयेत् । सुराधिपस्तदा भूयो ब्रह्महत्याविवर्जितः
yadā vastrāpathe gatvā bhavaṁ bhāvena pūjayet | surādhipastadā bhūyo brahmahatyāvivarjitaḥ
जब वह वस्त्रापथ जाकर भव की भाव-पूर्वक पूजा करेगा, तब देवराज पुनः ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त हो जाएगा।
श्लोक 30 (skanda.7.379.30)
अनेन मन्त्रजाप्येन स शांतोदरवे दनः । नारदो देवराजस्य समीपं सहसा ययौ
anena mantrajāpyena sa śāṁtodarave danaḥ | nārado devarājasya samīpaṁ sahasā yayau
इस मंत्र-जाप से उनके उदर की पीड़ा शांत हुई, और नारद तुरंत देवराज के समीप गए।
श्लोक 31 (skanda.7.379.31)
सिंहासनं समारुह्य नन्दने संस्थितो हरिः । आस्ते परिवृतो देवेर्देवराजो महाबलः ।
siṁhāsanaṁ samāruhya nandane saṁsthito hariḥ | āste parivṛto deverdevarājo mahābalaḥ |
सिंहासन पर आरूढ़, नन्दन वन में विराजमान, देवों से घिरे महाबली देवराज हरि बैठे थे।
श्लोक 32 (skanda.7.379.32)
निरीक्षमाणो नृत्यन्तीं रंभां तां सुरसुन्दरीम् । आयांतं ददृशे देवो नारदं विस्मयान्वितः
nirīkṣamāṇo nṛtyantīṁ raṁbhāṁ tāṁ surasundarīm | āyāṁtaṁ dadṛśe devo nāradaṁ vismayānvitaḥ
नृत्य करती सुरसुन्दरी रम्भा को निहारते हुए देव ने आते हुए नारद को देखा, और आश्चर्यचकित हो गए।
श्लोक 33 (skanda.7.379.33)
अहो विरुद्धो भगवान्नारदो मयि दृश्यते । नृत्यते किं न वा नृत्ये गीयते किं न गीयते
aho viruddho bhagavānnārado mayi dṛśyate | nṛtyate kiṁ na vā nṛtye gīyate kiṁ na gīyate
अहो, भगवान् नारद मुझसे रुष्ट प्रतीत होते हैं। नृत्य चलता रहे या न रहे? गान गाया जाए या न गाया जाए?
श्लोक 34 (skanda.7.379.34)
वाद्यतां तालमानैः किं यावच्चिंतापरो हरिः । ऋषिः समागतस्तावज्जलाभ्युक्षणत त्परः
vādyatāṁ tālamānaiḥ kiṁ yāvacciṁtāparo hariḥ | ṛṣiḥ samāgatastāvajjalābhyukṣaṇata tparaḥ
क्या ताल-मान से वाद्य बजते रहें? - इतना सोच ही रहे थे कि ऋषि पास आ गए, जल छिड़ककर स्वागत करने को तत्पर।
श्लोक 35 (skanda.7.379.35)
सिंहासनं परित्यज्य समुत्थायाग्रतः स्थितः । स्वागतेनाभिवाद्याथ बभाषे नारदं हरिः
siṁhāsanaṁ parityajya samutthāyāgrataḥ sthitaḥ | svāgatenābhivādyātha babhāṣe nāradaṁ hariḥ
सिंहासन त्यागकर, उठकर सामने खड़े हुए, हरि ने स्वागत-वचनों से अभिवादन करते हुए नारद से कहा -
श्लोक 36 (skanda.7.379.36)
महर्षे स्वागतं तेऽद्य कुतो वाऽऽग म्यते त्वया । स्नाने संध्यार्चने होमे कुशलं तव विद्यते
maharṣe svāgataṁ te'dya kuto vā''ga myate tvayā | snāne saṁdhyārcane home kuśalaṁ tava vidyate
हे महर्षे, आज आपका स्वागत है; आप कहाँ से आ रहे हैं? स्नान, संध्या-अर्चना, हवन में आपका कुशल तो है न?
श्लोक 37 (skanda.7.379.37)
इति प्रोक्तो विहस्याथ बभाषे नारदो हरिम् । यद्येतज्जायते मह्यं किमन्येन प्रयोजनम्
iti prokto vihasyātha babhāṣe nārado harim | yadyetajjāyate mahyaṁ kimanyena prayojanam
ऐसा कहे जाने पर नारद हँसकर हरि से बोले - यदि यही मुझे मिल जाए, तो और किसी वस्तु से क्या प्रयोजन?
श्लोक 38 (skanda.7.379.38)
प्रेक्षणीकस्य ते स्थानं नाहं पश्यामि स्वर्पते । यावद्राज्यं बलेस्तावत्त्वया मे न प्रयोजनम्
prekṣaṇīkasya te sthānaṁ nāhaṁ paśyāmi svarpate | yāvadrājyaṁ balestāvattvayā me na prayojanam
हे स्वर्गपते, मुझे तुम्हारे इन तमाशों के लिए अब कोई स्थान नहीं दिखता। जब तक बलि का राज्य है, तब तक मुझे तुमसे कोई प्रयोजन नहीं।
श्लोक 39 (skanda.7.379.39)
आदित्याद्या ग्रहाः सर्वे काल मानेन योजिताः । आहुत्या प्लाविता मेघा वर्षंति हृषिता भुवि
ādityādyā grahāḥ sarve kāla mānena yojitāḥ | āhutyā plāvitā meghā varṣaṁti hṛṣitā bhuvi
सूर्य आदि सभी ग्रह काल-मान से नियोजित हैं; आहुतियों से पूरित मेघ प्रसन्न होकर पृथ्वी पर वर्षा करते हैं।
श्लोक 40 (skanda.7.379.40)
रोगादिमरणं नास्ति यमो धर्मेण पीडितः
rogādimaraṇaṁ nāsti yamo dharmeṇa pīḍitaḥ
रोग आदि से मृत्यु नहीं होती; यम भी उसके धर्म से पीड़ित है।
श्लोक 41 (skanda.7.379.41)
एकातपत्रां पृथिवीं बुभुजे स नराधिपः । त्रैलोक्यनाथेति महानृपेति संग्रामविद्याकुशलेति नित्यम् । त्रैलोक्यलक्ष्मीकुचकामुकेति संस्तूयते चारणबंदिवृन्दैः ।४१ । ब्रह्मेति कृष्णेति हरेति भूमाविंद्रेति सूर्येति धनाधिपेति । देवारिनाथेति सुराधिपेति जेगीयते चारणबंदिवृन्दैः
ekātapatrāṁ pṛthivīṁ bubhuje sa narādhipaḥ | trailokyanātheti mahānṛpeti saṁgrāmavidyākuśaleti nityam | trailokyalakṣmīkucakāmuketi saṁstūyate cāraṇabaṁdivṛndaiḥ |41 | brahmeti kṛṣṇeti hareti bhūmāviṁdreti sūryeti dhanādhipeti | devārinātheti surādhipeti jegīyate cāraṇabaṁdivṛndaiḥ
वह राजा एकछत्र पृथ्वी को भोगता था; चारण-वृन्दों द्वारा वह सदा 'त्रैलोक्यनाथ', 'महाराज', 'संग्राम-विद्या-कुशल', 'त्रैलोक्य-लक्ष्मी के वक्षस्थल का कामुक' कहकर स्तुत होता था। 'ब्रह्मा', 'कृष्ण', 'हरि', 'इन्द्र', 'सूर्य', 'धनाधिप', 'देवारि-नाथ', 'सुराधिप' कहकर चारण-वृन्द उसे गाते थे।
श्लोक 42 (skanda.7.379.42)
युद्धं विना दैत्यगणा हसंति मत्ताः प्रमत्ताः करिणो नदंति । रथाधिरूढाः पुरुषा भ्रमंति सेनाधिपा स्त्रीषु गृहे रमंति
yuddhaṁ vinā daityagaṇā hasaṁti mattāḥ pramattāḥ kariṇo nadaṁti | rathādhirūḍhāḥ puruṣā bhramaṁti senādhipā strīṣu gṛhe ramaṁti
युद्ध के बिना दैत्यगण हँसते हैं, मतवाले गजराज गरजते हैं, रथारूढ़ पुरुष यों ही विचरते हैं, सेनापति घर में स्त्रियों के साथ रमण करते हैं।
श्लोक 43 (skanda.7.379.43)
यज्ञाग्निधूमेन नभो विराजते सुवर्णरूपा पृथिवी विराजते । शून्यं तु वेदैर्भुवनं च शोभते धिष्ण्यं बलेर्दैर्त्यैगणैश्च शोभते
yajñāgnidhūmena nabho virājate suvarṇarūpā pṛthivī virājate | śūnyaṁ tu vedairbhuvanaṁ ca śobhate dhiṣṇyaṁ balerdairtyaigaṇaiśca śobhate
यज्ञ की अग्नि के धूम से आकाश और स्वर्णमय पृथ्वी सुशोभित होती है; वेदों से (शत्रुता-)शून्य लोक शोभित होता है, और बलि का सिंहासन दैत्य-गणों से सुशोभित होता है।
श्लोक 44 (skanda.7.379.44)
बलिर्न जानाति सुराधिपं त्वां सुराश्च सर्वे बलियज्ञभोजिनः । त्वमेव तेऽरिं हृदि चिंतय स्वयं युक्तं तवेदं कथितं मयेति
balirna jānāti surādhipaṁ tvāṁ surāśca sarve baliyajñabhojinaḥ | tvameva te'riṁ hṛdi ciṁtaya svayaṁ yuktaṁ tavedaṁ kathitaṁ mayeti
बलि तुम्हें देवाधिप के रूप में नहीं जानता, यद्यपि सभी देव बलि के यज्ञ से ही अपना भोजन पाते हैं। तुम स्वयं उसे अपने हृदय में शत्रु मानो - यह उचित बात मैंने तुम्हें कही है।
श्लोक 45 (skanda.7.379.45)
रंभा न राजते रंगे मेनका त्वां न मन्यते । तिलोत्तमापि मनुते बलिराजं सुरेश्वरम्
raṁbhā na rājate raṁge menakā tvāṁ na manyate | tilottamāpi manute balirājaṁ sureśvaram
रम्भा रंग-मंच में नहीं चमकती, मेनका तुम्हें नहीं मानती, तिलोत्तमा भी बलिराज को ही सुरेश्वर मानती है।
श्लोक 46 (skanda.7.379.46)
उर्वशी चैव तं याति सुकेशा सह भाषते । मञ्जुघोषा मुखं वक्त्रं कृत्वा त्वां न निरीक्षते
urvaśī caiva taṁ yāti sukeśā saha bhāṣate | mañjughoṣā mukhaṁ vaktraṁ kṛtvā tvāṁ na nirīkṣate
उर्वशी स्वयं उसके पास जाती है, सुकेशा उससे बातें करती है, मंजुघोषा मुख फेरकर तुम्हारी ओर देखती तक नहीं।
श्लोक 47 (skanda.7.379.47)
पुलोमा पुलकोद्भेदं न करोति बलिं विना । पौलोमी पुरतो गत्वा बलिं स्तौति च मंथरा
pulomā pulakodbhedaṁ na karoti baliṁ vinā | paulomī purato gatvā baliṁ stauti ca maṁtharā
बलि के बिना पुलोमा को रोमांच नहीं होता, पौलोमी उसके आगे जाकर उसकी स्तुति करती है, और मंथरा भी।
श्लोक 48 (skanda.7.379.48)
नारदः पर्वतश्चैव हाहा हूहूश्च तुंबुरुः । बलिराज्यं प्रशंसंति रुद्रस्याग्रे मया श्रुतम् ।
nāradaḥ parvataścaiva hāhā hūhūśca tuṁburuḥ | balirājyaṁ praśaṁsaṁti rudrasyāgre mayā śrutam |
नारद, पर्वत, हाहा, हूहू और तुंबुरु - मैंने स्वयं रुद्र के समक्ष उन्हें बलि के राज्य की प्रशंसा करते सुना है।
श्लोक 49 (skanda.7.379.49)
आज्याहुतीभिः सन्तुष्टा ऋषयो ब्रह्मसद्मनि । ब्रह्मणोऽग्रे प्रशंसंति तदेवं कथितं मया
ājyāhutībhiḥ santuṣṭā ṛṣayo brahmasadmani | brahmaṇo'gre praśaṁsaṁti tadevaṁ kathitaṁ mayā
घृत की आहुतियों से संतुष्ट ऋषिगण ब्रह्मा के सदन में, ब्रह्मा के सम्मुख भी उसकी प्रशंसा करते हैं - यह भी मैंने तुम्हें बता दिया।
श्लोक 50 (skanda.7.379.50)
बृहस्पतिर्यदाचष्टे न तद्वाच्यं मया तव । इंद्राणी बलिनं मत्वा बलिं चित्रेषु पश्यति
bṛhaspatiryadācaṣṭe na tadvācyaṁ mayā tava | iṁdrāṇī balinaṁ matvā baliṁ citreṣu paśyati
बृहस्पति जो कहते हैं, वह मुझे तुमसे कहने की भी आवश्यकता नहीं। इन्द्राणी भी बलि को बलवान मानकर उसकी छवि चित्रों में निहारती है।
श्लोक 51 (skanda.7.379.51)
अनेन वाक्येन सुराधिपस्तु चचाल कोपावरितस्तदानीम् । गजेति वज्रेति जगाद सूतं समानयासिं कवचं रथं च
anena vākyena surādhipastu cacāla kopāvaritastadānīm | gajeti vajreti jagāda sūtaṁ samānayāsiṁ kavacaṁ rathaṁ ca
इस वचन को सुनकर देवराज क्रोध से कांपने लगे। 'गज लाओ! वज्र लाओ!' - उन्होंने सारथी से कहा, 'मेरी तलवार, कवच और रथ लाओ।'
श्लोक 52 (skanda.7.379.52)
रथेन सूर्यो मरुतो गजेन वृषेण रुद्रो महिषेण सौरिः । वाद्यंतु वाद्यानि रणाय मेऽद्य चण्डी गणेशास्त्वरिताः प्रयातु
rathena sūryo maruto gajena vṛṣeṇa rudro mahiṣeṇa sauriḥ | vādyaṁtu vādyāni raṇāya me'dya caṇḍī gaṇeśāstvaritāḥ prayātu
सूर्य रथ से, मरुद्गण, गज से रुद्र वृषभ से, शनि महिष से आएँ; आज मेरे युद्ध के लिए वाद्य बजें; चण्डी और गणेशगण शीघ्र प्रस्थान करें।
श्लोक 53 (skanda.7.379.53)
दृष्ट्वा सुरेन्द्रं संक्रुद्धं बृहस्पतिरुदारधीः । ऋषिमध्ये गतो विद्वान्बभाषे समयोचितम्
dṛṣṭvā surendraṁ saṁkruddhaṁ bṛhaspatirudāradhīḥ | ṛṣimadhye gato vidvānbabhāṣe samayocitam
देवराज को इस प्रकार क्रुद्ध देखकर उदार-बुद्धि बृहस्पति ऋषियों के मध्य जाकर अवसरोचित वचन बोले।
श्लोक 54 (skanda.7.379.54)
सामाद्या नीतयः प्रोक्ताश्चतस्रो मनुना पुरा । सामसाध्येषु कार्येषु दण्डस्तेन न पात्यताम्
sāmādyā nītayaḥ proktāścatasro manunā purā | sāmasādhyeṣu kāryeṣu daṇḍastena na pātyatām
मनु ने पूर्वकाल में साम आदि चार नीतियाँ बताई हैं; जो कार्य साम से सिद्ध हो सके, उसमें दण्ड का प्रयोग न किया जाए।
श्लोक 55 (skanda.7.379.55)
अतो ह्युपेन्द्र्माहूय मंत्रयन्तु सुरोत्तमाः । तदधीनं जगत्सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्
ato hyupendrmāhūya maṁtrayantu surottamāḥ | tadadhīnaṁ jagatsarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram
अतः श्रेष्ठ देवगण उपेन्द्र को बुलाकर मंत्रणा करें; उन्हीं के अधीन यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य है।
श्लोक 56 (skanda.7.379.56)
विनष्टेषु च कार्येषु तस्य वाच्यं शुभाशुभम् । स एव प्रथमं गच्छेत्पृथिव्यां स्वार्थसिद्धये
vinaṣṭeṣu ca kāryeṣu tasya vācyaṁ śubhāśubham | sa eva prathamaṁ gacchetpṛthivyāṁ svārthasiddhaye
कार्य बिगड़ जाने पर उन्हें ही शुभाशुभ बताया जाए; वही सबसे पहले अपने प्रयोजन की सिद्धि हेतु पृथ्वी पर जाएँ।
श्लोक 57 (skanda.7.379.57)
तथेति देवैर्विज्ञप्तस्तथा चक्रे सुरेश्वरः । मन्दरेऽथ गिरौ विष्णुः सत्यलोकात्समागतः
tatheti devairvijñaptastathā cakre sureśvaraḥ | mandare'tha girau viṣṇuḥ satyalokātsamāgataḥ
'ऐसा ही हो' - देवताओं की इस प्रार्थना पर देवेश्वर ने वैसा ही किया। तब विष्णु सत्यलोक से मन्दराचल पर्वत पर आए।
श्लोक 58 (skanda.7.379.58)
ऋषयस्तत्र ते यांतु समानेतुं जनार्द्दनम् । इत्युक्तो नारदः स्वर्गात्स्नातुं प्राप्तः स मन्दरे
ṛṣayastatra te yāṁtu samānetuṁ janārddanam | ityukto nāradaḥ svargātsnātuṁ prāptaḥ sa mandare
वहाँ ऋषिगण जनार्दन को साथ लाने के लिए जाएँ - ऐसा कहे जाने पर नारद स्वर्ग से स्नान करने मन्दराचल पहुँचे।
श्लोक 59 (skanda.7.379.59)
गौतमोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कश्यपः । जमदग्निर्वसिष्ठश्च संप्राप्ता हरिमन्दिरे
gautamo'trirbharadvājo viśvāmitro'tha kaśyapaḥ | jamadagnirvasiṣṭhaśca saṁprāptā harimandire
गौतम, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, कश्यप, जमदग्नि और वसिष्ठ - सब हरि-मंदिर में पहुँचे।
श्लोक 60 (skanda.7.379.60)
गिरौ गंगा जले स्नानं संध्यां चक्रे स नारदः । यावदास्ते तदा हृष्टा वालखिल्या महर्षयः
girau gaṁgā jale snānaṁ saṁdhyāṁ cakre sa nāradaḥ | yāvadāste tadā hṛṣṭā vālakhilyā maharṣayaḥ
पर्वत पर गंगा-जल में स्नान और संध्या नारद ने की; जब वे वहाँ ठहरे थे, तब हर्षित वालखिल्य महर्षिगण -
श्लोक 61 (skanda.7.379.61)
विनयेनाभिवाद्याथ कथयामास नारदः । ऋषयो मन्दरे प्राप्ता विष्णुं नेतुं सुरालये
vinayenābhivādyātha kathayāmāsa nāradaḥ | ṛṣayo mandare prāptā viṣṇuṁ netuṁ surālaye
विनयपूर्वक अभिवादन कर नारद ने कहा - ऋषिगण मन्दराचल पर पहुँचे हैं, विष्णु को देवलोक ले जाने के लिए।
श्लोक 62 (skanda.7.379.62)
ऋषयो दर्शनं कर्त्तुं भवतामपि युज्यते । तदेतद्वचनं श्रुत्वा हर्षितास्ते महर्षयः
ṛṣayo darśanaṁ karttuṁ bhavatāmapi yujyate | tadetadvacanaṁ śrutvā harṣitāste maharṣayaḥ
आपके लिए भी उनके दर्शन करना उचित होगा - यह वचन सुनकर वे महर्षिगण हर्षित हुए।
श्लोक 63 (skanda.7.379.63)
अंगुष्ठपर्वमात्रांस्तान्वामनान्हरिमन्दिरे । गतान्गंगाजले स्नातुं वालखिल्यान्पुरो हरिः
aṁguṣṭhaparvamātrāṁstānvāmanānharimandire | gatāngaṁgājale snātuṁ vālakhilyānpuro hariḥ
अंगूठे के पोर मात्र आकार वाले उन वालखिल्यों को, जो हरि-मंदिर में गंगा-जल में स्नान करने गए थे, हरि ने सामने -
श्लोक 64 (skanda.7.379.64)
जहास वामनान्सर्वान्भाविकार्यबलात्ततः । ब्रह्मपुत्रा वालखिल्याः सर्वे ते शंसितव्रताः
jahāsa vāmanānsarvānbhāvikāryabalāttataḥ | brahmaputrā vālakhilyāḥ sarve te śaṁsitavratāḥ
भावी कार्य के प्रभाव से सभी वामनों पर हँस दिया। ब्रह्मा के पुत्र वे सभी वालखिल्य दृढ़-व्रत थे।
श्लोक 65 (skanda.7.379.65)
लज्जान्विताः क्रोधपरा उच्चैरूचुः परस्परम् । केनापि देवकार्येण वामनोऽयं भविष्यति
lajjānvitāḥ krodhaparā uccairūcuḥ parasparam | kenāpi devakāryeṇa vāmano'yaṁ bhaviṣyati
लज्जित और क्रोधित होकर वे परस्पर ऊँचे स्वर में बोले - किसी देव-कार्य के कारण यह स्वयं वामन ही बने!
श्लोक 66 (skanda.7.379.66)
ऋषिभिर्वि ष्णुना सर्वे प्रतिबोध्य प्रसादिताः । भाग्यमोक्षः कदा विष्णोर्भविष्यति तदुच्यताम्
ṛṣibhirvi ṣṇunā sarve pratibodhya prasāditāḥ | bhāgyamokṣaḥ kadā viṣṇorbhaviṣyati taducyatām
ऋषियों द्वारा और विष्णु द्वारा वे सब समझाए और शांत किए गए। उन्होंने पूछा - विष्णु का यह भाग्य-मोक्ष कब होगा, यह बताया जाए।
श्लोक 67 (skanda.7.379.67)
प्रभासादधिकं क्षेत्रं यदा वस्त्रापथं भवेत् । भविष्यति तदा वृद्धिर्ध्रुवमण्डलव्यापिनी । तथा वस्त्रापथं क्षेत्रं भविष्यति यवाधिकम्
prabhāsādadhikaṁ kṣetraṁ yadā vastrāpathaṁ bhavet | bhaviṣyati tadā vṛddhirdhruvamaṇḍalavyāpinī | tathā vastrāpathaṁ kṣetraṁ bhaviṣyati yavādhikam
जब वस्त्रापथ क्षेत्र प्रभास से भी बढ़कर होगा, तब ध्रुव-मण्डल तक व्याप्त होने वाली समृद्धि उत्पन्न होगी; इस प्रकार वस्त्रापथ क्षेत्र यव-मात्र अधिक हो जाएगा।
श्लोक 68 (skanda.7.379.68)
दृष्ट्वा सोमेश्वरं देवं दोषमुक्तो भविष्यति । असाध्यसाधनी शक्तिर्भविष्यति स्थिरा तव
dṛṣṭvā someśvaraṁ devaṁ doṣamukto bhaviṣyati | asādhyasādhanī śaktirbhaviṣyati sthirā tava
देव सोमेश्वर के दर्शन करके वह दोष-मुक्त हो जाएगा; असाध्य को भी साधने वाली शक्ति उसमें स्थिर हो जाएगी।
श्लोक 69 (skanda.7.379.69)
वस्त्रापथे सोमनाथं यः पश्यति स पश्यति । इन्द्रोपेन्द्रौ समालिंग्याथासीनौ तौ वरासने
vastrāpathe somanāthaṁ yaḥ paśyati sa paśyati | indropendrau samāliṁgyāthāsīnau tau varāsane
वस्त्रापथ में जो सोमनाथ को देखता है, वही सच्चा दर्शन करता है। तब इन्द्र और उपेन्द्र एक-दूसरे को आलिंगन कर श्रेष्ठ आसनों पर बैठे।
श्लोक 70 (skanda.7.379.70)
विष्णुरुवाच किं ते कार्यं देवराज तदवश्यं करोम्यहम्
viṣṇuruvāca kiṁ te kāryaṁ devarāja tadavaśyaṁ karomyaham
विष्णु ने कहा - हे देवराज, तुम्हारा क्या कार्य है? वह मैं अवश्य ही करूँगा।
श्लोक 71 (skanda.7.379.71)
इन्द्र उवाच हिरण्यकशिपोर्वंशे बलिर्दैत्यो महा बलः । तेनेदं सकलं व्याप्तं देवा यज्ञभुजः कृताः
indra uvāca hiraṇyakaśiporvaṁśe balirdaityo mahā balaḥ | tenedaṁ sakalaṁ vyāptaṁ devā yajñabhujaḥ kṛtāḥ
इन्द्र ने कहा - हिरण्यकशिपु के वंश में महाबली दैत्य बलि उत्पन्न हुआ है। उसने यह सब कुछ व्याप्त कर लिया है, और देवताओं को केवल यज्ञ-भोगी बना दिया है।
श्लोक 72 (skanda.7.379.72)
देवलोके भूमिलोको गतः सर्वोऽपि केशव । यावन्नो विकृतिं याति पूर्ववैरमनुस्मरन् । भ्रष्टराज्यो बलिस्तावत्पातालमधितिष्ठतु
devaloke bhūmiloko gataḥ sarvo'pi keśava | yāvanno vikṛtiṁ yāti pūrvavairamanusmaran | bhraṣṭarājyo balistāvatpātālamadhitiṣṭhatu
हे केशव, देवलोक भी भूलोक-सा हो गया है। जब तक वह हमारे प्रति पूर्व वैर स्मरण कर विकृत न हो जाए, तब तक राज्य-भ्रष्ट बलि पाताल में ही रहे।
श्लोक 73 (skanda.7.379.73)
सूर्यसोमान्वये कश्चिद्राजा भवतु भूतले
sūryasomānvaye kaścidrājā bhavatu bhūtale
और सूर्यवंश या सोमवंश का कोई राजा पृथ्वी पर राज्य करे।
श्लोक 74 (skanda.7.379.74)
सारस्वत उवाच इत्येतद्वचनं श्रुत्वा स्वयं संचिन्त्य चेतसा । तथा करिष्ये तं प्रोच्य मुनीन्प्राह जनार्दनः
sārasvata uvāca ityetadvacanaṁ śrutvā svayaṁ saṁcintya cetasā | tathā kariṣye taṁ procya munīnprāha janārdanaḥ
सारस्वत ने कहा - यह वचन सुनकर, मन ही मन विचार कर, 'मैं ऐसा ही करूँगा' यह कहकर जनार्दन ने मुनियों से कहा -
श्लोक 75 (skanda.7.379.75)
ऋषयस्तत्र गच्छंतु कारयन्तु महामखम् । अहं तत्रागमिष्यामि साधयिष्यामि तं बलिम्
ṛṣayastatra gacchaṁtu kārayantu mahāmakham | ahaṁ tatrāgamiṣyāmi sādhayiṣyāmi taṁ balim
ऋषिगण वहाँ जाएँ और महायज्ञ करवाएँ; मैं भी वहाँ आऊँगा और उस बलि को साधूँगा।
श्लोक 76 (skanda.7.379.76)
इत्युक्ता मुनयः सर्वे गतास्ते यज्ञमण्डपे । द्वादशाहो महायज्ञः प्रारब्धः सर्वदक्षिणः
ityuktā munayaḥ sarve gatāste yajñamaṇḍape | dvādaśāho mahāyajñaḥ prārabdhaḥ sarvadakṣiṇaḥ
ऐसा कहे जाने पर सभी मुनि यज्ञ-मण्डप में गए। सर्व-दक्षिणा-युक्त एक बारह-दिवसीय महायज्ञ आरंभ हुआ।
श्लोक 77 (skanda.7.379.77)
सुराष्ट्रदेशं विख्यातं क्षेत्रं वस्त्रापथं नृप । तस्य दक्षिणदिग्भागे बलेः सिद्धं महापुरम्
surāṣṭradeśaṁ vikhyātaṁ kṣetraṁ vastrāpathaṁ nṛpa | tasya dakṣiṇadigbhāge baleḥ siddhaṁ mahāpuram
हे राजन्, सुराष्ट्र देश में विख्यात वस्त्रापथ नामक क्षेत्र है; उसके दक्षिण दिशा में बलि का सिद्ध महानगर है।
श्लोक 78 (skanda.7.379.78)
क्षेत्राद्बहिः समारब्धो यज्ञः सर्वस्वदक्षिणः । शुक्रेणामन्त्रिताः सर्वे मुनयो यज्ञकर्मणि । अतिहृष्टो बलिर्यज्ञे ददौ दानान्यनेकधा
kṣetrādbahiḥ samārabdho yajñaḥ sarvasvadakṣiṇaḥ | śukreṇāmantritāḥ sarve munayo yajñakarmaṇi | atihṛṣṭo baliryajñe dadau dānānyanekadhā
क्षेत्र के बाहर सर्वस्व-दक्षिणा वाला यज्ञ आरंभ हुआ। शुक्राचार्य द्वारा सभी मुनि यज्ञ-कर्म हेतु आमंत्रित किए गए; अत्यंत हर्षित बलि ने यज्ञ में अनेक प्रकार के दान दिए।
श्लोक 79 (skanda.7.379.79)
स्वर्णपात्रेषु सर्वेषु दीयते भोजनं बहु । अतिथिर्ब्राह्मणो विद्वान्सर्वस्वेनापि पूज्यते । दानाद्यज्ञो भवेत्पूर्णो दानहीनो वृथा भवेत्
svarṇapātreṣu sarveṣu dīyate bhojanaṁ bahu | atithirbrāhmaṇo vidvānsarvasvenāpi pūjyate | dānādyajño bhavetpūrṇo dānahīno vṛthā bhavet
स्वर्ण-पात्रों में प्रचुर भोजन दिया जाता था; विद्वान ब्राह्मण अतिथि को सर्वस्व देकर भी पूजा जाता था - दान से ही यज्ञ पूर्ण होता है, दान-रहित यज्ञ व्यर्थ होता है।
श्लोक 80 (skanda.7.379.80)
एतस्मिन्नेव काले तु विष्णुर्वामनतां गतः । मध्यदेशे चतुर्वेदो ब्राह्मणस्तीर्थयात्रिकः । महोदरो ह्रस्वभुजः खञ्जपादो महाशिराः
etasminneva kāle tu viṣṇurvāmanatāṁ gataḥ | madhyadeśe caturvedo brāhmaṇastīrthayātrikaḥ | mahodaro hrasvabhujaḥ khañjapādo mahāśirāḥ
इसी समय विष्णु ने वामन का रूप धारण किया - मध्यदेश में चारों वेदों के ज्ञाता, तीर्थयात्री ब्राह्मण, बड़े पेट, छोटी भुजाओं, लंगड़े पैर और बड़े सिर वाले -
श्लोक 81 (skanda.7.379.81)
महाहनुः स्थूलजंघः स्थूलग्रीवोऽतिलंपटः । श्वेतवस्त्रो बद्धशिखश्छत्रोपानत्कमण्डलून्
mahāhanuḥ sthūlajaṁghaḥ sthūlagrīvo'tilaṁpaṭaḥ | śvetavastro baddhaśikhaśchatropānatkamaṇḍalūn
बड़ी ठुड्डी, मोटी पिंडलियों, मोटी गर्दन वाले, अत्यंत लालायित, श्वेत वस्त्रधारी, शिखा बाँधे, छाता-जूते-कमण्डलु लिए -
श्लोक 82 (skanda.7.379.82)
द्रष्टुं तीर्थान्यनेकानि बभ्राम स महीतले । सुराष्ट्रदेशे संप्राप्तः क्षेत्रे वस्त्रापथे द्विजः
draṣṭuṁ tīrthānyanekāni babhrāma sa mahītale | surāṣṭradeśe saṁprāptaḥ kṣetre vastrāpathe dvijaḥ
अनेक तीर्थों के दर्शन हेतु पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे। वह ब्राह्मण सुराष्ट्र देश के वस्त्रापथ क्षेत्र में पहुँचा।
श्लोक 83 (skanda.7.379.83)
स्वर्णरेखा नदीतीरे चिंतयामास वामनः । प्रथमं किं भवं दृष्ट्वा यामि सोमेश्वरं शिवम्
svarṇarekhā nadītīre ciṁtayāmāsa vāmanaḥ | prathamaṁ kiṁ bhavaṁ dṛṣṭvā yāmi someśvaraṁ śivam
स्वर्णरेखा नदी के तट पर वामन ने विचार किया - पहले भव के दर्शन कर सोमेश्वर के पास जाऊँ,
श्लोक 84 (skanda.7.379.84)
अथ सोमेश्वरं पूज्य पश्चाद्यास्यामि मन्दरम् । इति चिन्तापरो भूत्वा कृत्यं सञ्चिन्त्य चेतसा । अत्र स्थितः सोमनाथं पूजयिष्यामि निश्चितम्
atha someśvaraṁ pūjya paścādyāsyāmi mandaram | iti cintāparo bhūtvā kṛtyaṁ sañcintya cetasā | atra sthitaḥ somanāthaṁ pūjayiṣyāmi niścitam
या पहले सोमेश्वर की पूजा कर फिर मन्दराचल जाऊँ? इस प्रकार चिंतापूर्वक मन में विचार कर उसने निश्चय किया - यहीं ठहरकर सोमनाथ की पूजा अवश्य करूँगा।
श्लोक 85 (skanda.7.379.85)
वस्त्रापथे महाक्षेत्रे भवं सोमेश्वरं वृथा । पूजयंति जना नित्यं तथा कार्यं मया धुवम्
vastrāpathe mahākṣetre bhavaṁ someśvaraṁ vṛthā | pūjayaṁti janā nityaṁ tathā kāryaṁ mayā dhuvam
वस्त्रापथ महाक्षेत्र में लोग नित्य ही सोमेश्वर भव की व्यर्थ पूजा नहीं करते; मुझे भी वैसा ही अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 86 (skanda.7.379.86)
देशानामुत्तमो देशो गिरीणामुत्तमो गिरिः । क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं नदीनामुत्तमा सरित्
deśānāmuttamo deśo girīṇāmuttamo giriḥ | kṣetrāṇāmuttamaṁ kṣetraṁ nadīnāmuttamā sarit
यह देशों में उत्तम देश है, पर्वतों में उत्तम पर्वत है, क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है, नदियों में उत्तम नदी है -
श्लोक 87 (skanda.7.379.87)
दिव्यं वनं वनानां तु देवानामुत्तमो भवः । यदा सोमेश्वरो देवो भूमिं भित्त्वा भविष्यति
divyaṁ vanaṁ vanānāṁ tu devānāmuttamo bhavaḥ | yadā someśvaro devo bhūmiṁ bhittvā bhaviṣyati
वनों में दिव्य वन है, और देवताओं में भव सर्वोत्तम हैं। जब देव सोमेश्वर भूमि को भेदकर प्रकट होंगे -
श्लोक 88 (skanda.7.379.88)
तदाम्रमण्डले दिव्यं क्षेत्रमेतद्यवाधिकम् । चैत्र शुक्लचतुर्दश्यामग्निसाधनतत्परः
tadāmramaṇḍale divyaṁ kṣetrametadyavādhikam | caitra śuklacaturdaśyāmagnisādhanatatparaḥ
तब आम्रमण्डल में यह दिव्य क्षेत्र यव-मात्र अधिक हो जाएगा। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को अग्नि-साधना में तत्पर होकर -
श्लोक 89 (skanda.7.379.89)
ऊर्ध्वबाहुः सूर्यकाले भवं तावत्स पश्यति । मध्यंदिनं परं याते दिननाथे विलंबिते
ūrdhvabāhuḥ sūryakāle bhavaṁ tāvatsa paśyati | madhyaṁdinaṁ paraṁ yāte dinanāthe vilaṁbite
ऊर्ध्व भुजा किए हुए वह सूर्य-काल में भव को देखता है, जब मध्याह्न बीत चुका हो और सूर्य ढल रहा हो -
श्लोक 90 (skanda.7.379.90)
अग्नि तापांगसंतप्तस्तावत्पश्यति शंकरम् । सोमनाथं शिवं शांतं सर्वदेवनमस्कृतम् । अर्घ्येण पुष्पमिश्रेण जलमिश्रेण भामिनि
agni tāpāṁgasaṁtaptastāvatpaśyati śaṁkaram | somanāthaṁ śivaṁ śāṁtaṁ sarvadevanamaskṛtam | arghyeṇa puṣpamiśreṇa jalamiśreṇa bhāmini
अग्नि-ताप से शरीर संतप्त होते हुए वह शंकर को देखता है - सोमनाथ, शांत शिव, समस्त देवों द्वारा नमस्कृत - अर्घ्य, पुष्प और जल से युक्त होकर, हे भामिनी।
श्लोक 91 (skanda.7.379.91)
सारस्वत उवाच भूमिं भित्त्वाथ देवेशः स्वयं सोमेश्वरः स्थितः । लिंगरूपो महादेवो यावदाब्रह्मवासरम्
sārasvata uvāca bhūmiṁ bhittvātha deveśaḥ svayaṁ someśvaraḥ sthitaḥ | liṁgarūpo mahādevo yāvadābrahmavāsaram
सारस्वत ने कहा - भूमि को भेदकर देवेश सोमेश्वर स्वयं वहाँ स्थित हो गए - महादेव, लिंग-रूप में, ब्रह्म-दिवस के अंत तक।
श्लोक 92 (skanda.7.379.92)
सोमेश्वर उवाच सिद्धस्त्वं मत्प्रसादेन कार्यं सिद्धं भविष्यति । इत्युक्तो वामनो देवं प्रत्युवाच महेश्वरम्
someśvara uvāca siddhastvaṁ matprasādena kāryaṁ siddhaṁ bhaviṣyati | ityukto vāmano devaṁ pratyuvāca maheśvaram
सोमेश्वर ने कहा - मेरी कृपा से तुम सिद्ध हुए, तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा। ऐसा कहे जाने पर वामन ने महेश्वर देव को उत्तर दिया।
श्लोक 93 (skanda.7.379.93)
वामन उवाच यदि तुष्टो महादेव यदि देयो वरो मम । तदाऽत्र लिंगे स्थातव्यमस्तु दिव्यं पुरो मम
vāmana uvāca yadi tuṣṭo mahādeva yadi deyo varo mama | tadā'tra liṁge sthātavyamastu divyaṁ puro mama
वामन ने कहा - हे महादेव, यदि आप प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना है, तो आप यहाँ इस दिव्य लिंग में मेरे सम्मुख सदा स्थित रहें।
श्लोक 94 (skanda.7.379.94)
यस्तु स्वायंभुवं लिंगं वामने नगरे मम । पूजयिष्यति ब्रह्मघ्नो गोघ्नो वा बालघातकः
yastu svāyaṁbhuvaṁ liṁgaṁ vāmane nagare mama | pūjayiṣyati brahmaghno goghno vā bālaghātakaḥ
जो कोई मेरे वामन नगर में इस स्वयंभू लिंग की पूजा करेगा - चाहे वह ब्रह्महत्यारा, गोहत्यारा, बालघातक,
श्लोक 95 (skanda.7.379.95)
गुरुद्रोही स्वर्णचोरो मुच्यते सर्वपातकैः । निर्दोषः पूजयेद्यस्तु सकृत्सोमेश्वरं हरम्
gurudrohī svarṇacoro mucyate sarvapātakaiḥ | nirdoṣaḥ pūjayedyastu sakṛtsomeśvaraṁ haram
गुरु-द्रोही या स्वर्ण-चोर ही क्यों न हो - वह समस्त पातकों से मुक्त हो जाएगा। और जो निर्दोष होकर एक बार भी सोमेश्वर हर की पूजा करता है -
श्लोक 96 (skanda.7.379.96)
मृतो विमानमारुह्य दिव्यस्त्रीपरिवेष्टितः । संस्तूयमानो दिक्पालैर्यातु स्वर्गे शिवालये
mṛto vimānamāruhya divyastrīpariveṣṭitaḥ | saṁstūyamāno dikpālairyātu svarge śivālaye
मृत्यु के पश्चात् विमान पर आरूढ़ होकर, दिव्य स्त्रियों से घिरा हुआ, दिक्पालों द्वारा स्तुत होकर, वह स्वर्ग में शिवालय को जाए -
श्लोक 97 (skanda.7.379.97)
ब्रह्मलोकमतिक्रम्य रुद्रलोके स गच्छतु । तथेत्युक्त्वा सोमनाथस्तत्रैवान्तरधीयत
brahmalokamatikramya rudraloke sa gacchatu | tathetyuktvā somanāthastatraivāntaradhīyata
ब्रह्मलोक को भी लाँघकर वह रुद्रलोक को जाए। 'तथास्तु' कहकर सोमनाथ वहीं अंतर्धान हो गए।
श्लोक 98 (skanda.7.379.98)
प्रकाश्य वामनो लिगं सोमनाथं स्वयंभुवम् । प्राप्तज्ञानो लब्धवृद्धिर्ययौ द्रष्टुं भवं हरम्
prakāśya vāmano ligaṁ somanāthaṁ svayaṁbhuvam | prāptajñāno labdhavṛddhiryayau draṣṭuṁ bhavaṁ haram
स्वयंभू सोमनाथ लिंग को प्रकट कर, ज्ञान और वृद्धि प्राप्त कर वामन भव हर के दर्शन हेतु आगे चले।
श्लोक 99 (skanda.7.379.99)
गंगाद्याः सरितः सर्वाः स्वर्णरेखाजले स्थिताः । एतां सोमेश्वरोत्पत्तिं ये शृण्वंति नराः स्त्रियः । सर्वपापक्षयस्तेषां जायते नात्र संशयः
gaṁgādyāḥ saritaḥ sarvāḥ svarṇarekhājale sthitāḥ | etāṁ someśvarotpattiṁ ye śṛṇvaṁti narāḥ striyaḥ | sarvapāpakṣayasteṣāṁ jāyate nātra saṁśayaḥ
गंगा आदि समस्त नदियाँ स्वर्णरेखा के जल में स्थित हैं। जो स्त्री-पुरुष इस सोमेश्वर की उत्पत्ति-कथा को सुनते हैं, उनके समस्त पापों का नाश होता है, इसमें कोई संशय नहीं।