प्रभास खण्ड · अध्याय 380
सारस्वतप्रोक्ततीर्थयात्राविधाने श्रीदामोदरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.380.1)
सारस्वत उवाच अथासौ वामनो विप्रो लब्धज्ञानो भवार्चने । जगाम तद्वनं रम्यं गिरे रैवतकस्य यत्
sārasvata uvāca athāsau vāmano vipro labdhajñāno bhavārcane | jagāma tadvanaṁ ramyaṁ gire raivatakasya yat
सारस्वत ने कहा - तब वह वामन ब्राह्मण, भव की पूजा से ज्ञान प्राप्त कर, रैवतक पर्वत के उस रमणीय वन में गया,
श्लोक 2 (skanda.7.380.2)
यत्र वृक्षा बहुविधा दीर्घशाखाः फलान्विताः । वटोदुम्बरबिल्वाश्च सर्जार्जुनकदंबकाः
yatra vṛkṣā bahuvidhā dīrghaśākhāḥ phalānvitāḥ | vaṭodumbarabilvāśca sarjārjunakadaṁbakāḥ
जहाँ अनेक प्रकार के, लंबी शाखाओं वाले, फलों से युक्त वृक्ष थे - वट, गूलर, बिल्व, साल, अर्जुन और कदम्ब,
श्लोक 3 (skanda.7.380.3)
पलाशाश्वत्थनिंबाश्च धवाटीवारुणीद्रुमाः । शमीकंकोललिंबांश्च बीजपूरी च दाडिमः
palāśāśvatthaniṁbāśca dhavāṭīvāruṇīdrumāḥ | śamīkaṁkolaliṁbāṁśca bījapūrī ca dāḍimaḥ
पलाश, पीपल, नीम, धव, अटवारुणी के वृक्ष, शमी, कंकोल, नींबू, बीजपूरी और अनार,
श्लोक 4 (skanda.7.380.4)
बदरी निंबकः पूगः कदली शल्लकी शिवा । तालहिंतालशिरसा बीजकावंशखादिराः
badarī niṁbakaḥ pūgaḥ kadalī śallakī śivā | tālahiṁtālaśirasā bījakāvaṁśakhādirāḥ
बेर, नीम, सुपारी, केला, शल्लकी, शिवा-वृक्ष, ताड़, हिंताल, शिरीष, बीजक, बाँस और खदिर -
श्लोक 5 (skanda.7.380.5)
अजगासनगागुच्छा इंगुदीकोरवेंगुदाः । ब्रह्मवृक्षाः कुरुबकाः करंजाः पुत्रजीविनः ।
ajagāsanagāgucchā iṁgudīkoraveṁgudāḥ | brahmavṛkṣāḥ kurubakāḥ karaṁjāḥ putrajīvinaḥ |
अजगासन-गुच्छे, इंगुदी और कोरवेंगुदी, ब्रह्म-वृक्ष, कुरुबक, करंज और पुत्रजीवा,
श्लोक 6 (skanda.7.380.6)
अंकोल्लाः पारिभद्राश्च कलंबाः पनसास्तथा । उज्ज्वलाश्च हरिद्राश्च गंगडीवायवा द्रुमाः
aṁkollāḥ pāribhadrāśca kalaṁbāḥ panasāstathā | ujjvalāśca haridrāśca gaṁgaḍīvāyavā drumāḥ
अंकोल्ल, पारिभद्र, कलंब, कटहल, उज्ज्वल और हरिद्रा के वृक्ष, गंगडी और वायव वृक्ष -
श्लोक 7 (skanda.7.380.7)
तेसुण्डकाः शिरीषाश्च खर्जूरीकरवंदिकाः । सेवाली शाल्मली शाला मधूकाश्च विभीतकाः
tesuṇḍakāḥ śirīṣāśca kharjūrīkaravaṁdikāḥ | sevālī śālmalī śālā madhūkāśca vibhītakāḥ
तेसुण्डक, शिरीष, खजूर और करौंदे, सेवाली, शाल्मली, साल, महुआ और विभीतक,
श्लोक 8 (skanda.7.380.8)
हरीतक्यः कटाहाश्च कर्यष्टा आटरूषकाः । विकच्छवः कपित्थाश्च रोहिणीवेत्रकद्रुमाः
harītakyaḥ kaṭāhāśca karyaṣṭā āṭarūṣakāḥ | vikacchavaḥ kapitthāśca rohiṇīvetrakadrumāḥ
हरीतकी, कटाह, कर्यष्टा, अटरूषक, विकच्छव, कैथ, रोहिणी और बेंत के वृक्ष -
श्लोक 9 (skanda.7.380.9)
मदनफलानिर्गुण्डीपाटलानंदिपादपाः । लवंगैलालवल्यश्च सन्ताना अगरुद्रुमाः
madanaphalānirguṇḍīpāṭalānaṁdipādapāḥ | lavaṁgailālavalyaśca santānā agarudrumāḥ
मदन-फल, निर्गुंडी, पाटल और नंदि के वृक्ष, लौंग, इलायची और लवली, सन्तान और अगुरु वृक्ष -
श्लोक 10 (skanda.7.380.10)
श्रीखण्डकर्पूरनगाः कल्पवृक्षा नगोतमाः । वामनेन तदा दृष्टाश्छायावृक्षाः सुरार्चिताः
śrīkhaṇḍakarpūranagāḥ kalpavṛkṣā nagotamāḥ | vāmanena tadā dṛṣṭāśchāyāvṛkṣāḥ surārcitāḥ
चन्दन, कर्पूर के वृक्ष, कल्पवृक्ष, सर्वश्रेष्ठ वृक्ष - देवताओं द्वारा पूजित इन छाया-वृक्षों को वामन ने तब देखा।
श्लोक 11 (skanda.7.380.11)
उदयास्तमने येषां छाया न प्रतिहन्यते । तेषां दर्शनमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्
udayāstamane yeṣāṁ chāyā na pratihanyate | teṣāṁ darśanamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet
जिनकी छाया उदय से अस्त तक कभी भंग नहीं होती, उनके दर्शन मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.7.380.12)
ये जनाः पुण्यकर्माणस्तेषां ते दृष्टिगोचराः । एतान्पश्यन्ययौ वृक्षांस्ततो रैवतकं गिरिम्
ye janāḥ puṇyakarmāṇasteṣāṁ te dṛṣṭigocarāḥ | etānpaśyanyayau vṛkṣāṁstato raivatakaṁ girim
जो लोग पुण्यकर्मा होते हैं, वे ही इन वृक्षों के दृष्टिगोचर होते हैं। इन वृक्षों को देखते हुए वामन रैवतक पर्वत की ओर आगे बढ़े।
श्लोक 13 (skanda.7.380.13)
यावन्निरीक्षते तुंगं शिखरं तस्य मूर्द्धनि । आश्चर्यं ददृशे विप्रो महल्लोकभयंकरम्
yāvannirīkṣate tuṁgaṁ śikharaṁ tasya mūrddhani | āścaryaṁ dadṛśe vipro mahallokabhayaṁkaram
ज्यों ही उसने उसके ऊँचे शिखर को उसकी चोटी पर देखा, उस ब्राह्मण ने एक आश्चर्य देखा, जो जन-सामान्य के लिए अत्यंत भयंकर था।
श्लोक 14 (skanda.7.380.14)
धूमज्वलनमध्यस्थान्पुरुषान्पंच पश्यति । कृष्णांगान्खेचरान्रौद्रान्कृष्णागुरुविभूषितान्
dhūmajvalanamadhyasthānpuruṣānpaṁca paśyati | kṛṣṇāṁgānkhecarānraudrānkṛṣṇāguruvibhūṣitān
उसने धुएँ और अग्नि के मध्य खड़े पाँच पुरुषों को देखा - काले अंगों वाले, आकाश-चारी, भयंकर, कृष्ण-अगुरु से विभूषित,
श्लोक 15 (skanda.7.380.15)
सारमेय समारूढान्करिहस्तान्समेखलान् । खङ्गखेटकहस्तांश्च डमरुड्डामरस्वनान्॥।३५ । सघर्घरीकचरणन्यासनादितपर्वतान् । फेत्कारभासुराकारान्काशकुञ्चितमूर्द्धजान्
sārameya samārūḍhānkarihastānsamekhalān | khaṅgakheṭakahastāṁśca ḍamaruḍḍāmarasvanān|35 | saghargharīkacaraṇanyāsanāditaparvatān | phetkārabhāsurākārānkāśakuñcitamūrddhajān
कुत्तों पर सवार, हाथ में गजदंत लिए, करधनी बाँधे, हाथों में खड्ग-ढाल लिए, डमरुओं के तुमुल स्वर वाले, घुँघरुओं से बजते चरण-न्यास से पर्वतों को गुंजाते हुए, फेत्कार से भयंकर आकृति वाले, काश-सम पके-घुँघराले केशों वाले,
श्लोक 16 (skanda.7.380.16)
नरमांसवसासारकवलव्यग्रतालुकान् । जनगंधसमाज्ञानभवतीव्रविलोचनान्
naramāṁsavasāsārakavalavyagratālukān | janagaṁdhasamājñānabhavatīvravilocanān
मनुष्य के मांस-मेद के कवलों में व्यस्त तालुओं वाले, मनुष्यों की गंध को पहचानने में समर्थ तीव्र नेत्रों वाले -
श्लोक 17 (skanda.7.380.17)
पञ्चाग्निसाधनाव्याप्तदिव्यचक्षुः प्रभावतः । देवान्पश्यति विप्रेन्द्रो ज्ञातकार्यपरंपरः
pañcāgnisādhanāvyāptadivyacakṣuḥ prabhāvataḥ | devānpaśyati viprendro jñātakāryaparaṁparaḥ
पंचाग्नि-साधना से प्राप्त दिव्य दृष्टि के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें देवता जानकर, उनके कार्य-क्रम को समझ गया।
श्लोक 18 (skanda.7.380.18)
एते क्षेत्राधिपाः पञ्च महादेवेन निर्मिताः । महाबला रैवतके निवसंति गिरौ सदा ।
ete kṣetrādhipāḥ pañca mahādevena nirmitāḥ | mahābalā raivatake nivasaṁti girau sadā |
ये पाँच क्षेत्रपाल महादेव द्वारा निर्मित हैं, महाबली, जो रैवतक पर्वत पर सदा निवास करते हैं।
श्लोक 19 (skanda.7.380.19)
स्वेच्छाचारान्नरान्मर्त्त्यान्वारयति नगे तथा । हरिं हरं नदीं देवीं न पश्यंति गिरिं यथा
svecchācārānnarānmarttyānvārayati nage tathā | hariṁ haraṁ nadīṁ devīṁ na paśyaṁti giriṁ yathā
ये पर्वत पर स्वेच्छाचारी मर्त्य मनुष्यों को इसलिए रोकते हैं, ताकि वे बिना उचित भाव के हरि, हर, देवी-नदी और पर्वत के दर्शन न करें।
श्लोक 20 (skanda.7.380.20)
दृष्ट्वा ज्ञात्वा स्तुतिं चक्रे ध्यात्वा देवं महेश्वरम् । जयंति दुष्टदैत्येंद्रयुद्धध्यानांकितं वपुः । बिभ्रति भ्रातरो ये ते पंचेंद्रसमविक्रमाः
dṛṣṭvā jñātvā stutiṁ cakre dhyātvā devaṁ maheśvaram | jayaṁti duṣṭadaityeṁdrayuddhadhyānāṁkitaṁ vapuḥ | bibhrati bhrātaro ye te paṁceṁdrasamavikramāḥ
उन्हें देखकर, पहचानकर, महेश्वर देव का ध्यान करते हुए वामन ने स्तुति की - 'जय हो उन भाइयों की, जिनके शरीर दुष्ट दैत्येन्द्रों से युद्ध हेतु सज्जित हैं, जिनका पराक्रम पाँच इन्द्रों के समान है -
श्लोक 21 (skanda.7.380.21)
रुद्रवक्त्रोद्भवा दक्षा दक्षाध्वरविनाशकाः । स्वावलीढाहुतीनष्टभीतवाडवनंदिताः
rudravaktrodbhavā dakṣā dakṣādhvaravināśakāḥ | svāvalīḍhāhutīnaṣṭabhītavāḍavanaṁditāḥ
जो रुद्र के मुख से उत्पन्न, कुशल, दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले, अपनी ही आहुतियों से भयभीत वडवाग्नि को आनन्दित करने वाले हैं -
श्लोक 22 (skanda.7.380.22)
कुङ्कुमागरुकर्पूरलिप्तांगाः सुविभूषिताः । मदिरामोदमत्तांगनृत्यगीतकराः सुराः
kuṅkumāgarukarpūraliptāṁgāḥ suvibhūṣitāḥ | madirāmodamattāṁganṛtyagītakarāḥ surāḥ
कुंकुम, अगुरु, कर्पूर से लिप्त अंगों वाले, सुसज्जित, मदिरा की सुगन्ध से मत्त अंगों से नृत्य-गान करने वाले वे देवगण -
श्लोक 23 (skanda.7.380.23)
ब्रह्मांडभ्रमणश्रांत स्वगंधत्रस्तसंचराः । मनोजवाः कामगमा क्षेत्रपाला जयंति ते
brahmāṁḍabhramaṇaśrāṁta svagaṁdhatrastasaṁcarāḥ | manojavāḥ kāmagamā kṣetrapālā jayaṁti te
ब्रह्मांड में भ्रमण करते-करते श्रांत, अपनी ही गंध से सबको भगा देने वाले, मन के समान वेगवान, इच्छानुसार गमन करने वाले क्षेत्रपालों की जय हो।
श्लोक 24 (skanda.7.380.24)
इत्यादिवचनात्तुष्टा द्विजस्याग्रे स्वयं स्थिताः । एकपादोऽस्म्यहं चैको द्वितीयो गिरिदारुणः
ityādivacanāttuṣṭā dvijasyāgre svayaṁ sthitāḥ | ekapādo'smyahaṁ caiko dvitīyo giridāruṇaḥ
इन आदि वचनों से प्रसन्न होकर वे स्वयं ब्राह्मण के सामने खड़े हुए - 'मैं एकपाद हूँ, दूसरा गिरिदारुण है,
श्लोक 25 (skanda.7.380.25)
तृतीयो मेघनादस्तु सिंहनादश्चतुर्थकः । पंचमः कालमेघोऽहं कुर्मः किं ते वदस्व तत्
tṛtīyo meghanādastu siṁhanādaścaturthakaḥ | paṁcamaḥ kālamegho'haṁ kurmaḥ kiṁ te vadasva tat
तीसरा मेघनाद है, चौथा सिंहनाद है, और पाँचवाँ मैं कालमेघ हूँ। बताओ, हम तुम्हारे लिए क्या करें?'
श्लोक 26 (skanda.7.380.26)
द्विज उवाच यदि तुष्टा भवंतो मे यदि देयो वरो धुवम् । अहो आप्रलयं यावत्स्थातव्यं मत्प्रतिष्ठितैः
dvija uvāca yadi tuṣṭā bhavaṁto me yadi deyo varo dhuvam | aho āpralayaṁ yāvatsthātavyaṁ matpratiṣṭhitaiḥ
ब्राह्मण ने कहा - यदि आप लोग मुझसे प्रसन्न हैं, और यदि निश्चय ही मुझे वर देना है, तो आप, मेरे द्वारा प्रतिष्ठित होकर, प्रलय-काल तक यहीं ठहरें।
श्लोक 27 (skanda.7.380.27)
एकपादो गिरि तटे प्रहर्षात्प्रथमं स्थितः । वसतौ वसता तेन गिरौ च गिरिदारुणः
ekapādo giri taṭe praharṣātprathamaṁ sthitaḥ | vasatau vasatā tena girau ca giridāruṇaḥ
एकपाद अत्यंत हर्ष से पर्वत-तट पर प्रथम स्थित हुए; उनके साथ पर्वत पर गिरिदारुण भी निवास करने लगे।
श्लोक 28 (skanda.7.380.28)
प्रतिष्ठितः प्रसाद्याथ वरदोऽसौ स्वयं स्थितः । उज्जयंतगिरेर्मूर्ध्नि मेघनादः स्वयं ययौ
pratiṣṭhitaḥ prasādyātha varado'sau svayaṁ sthitaḥ | ujjayaṁtagirermūrdhni meghanādaḥ svayaṁ yayau
प्रतिष्ठित और प्रसन्न हो, वह वरदाता स्वयं वहीं स्थित हुआ; और मेघनाद स्वयं उज्जयंत पर्वत की चोटी पर गए।
श्लोक 29 (skanda.7.380.29)
भवानीशंकरं रम्यं सिंहनादस्तथाविशत् । स्वयं वस्त्रापथेनैव भवस्याग्रे निरूपितः
bhavānīśaṁkaraṁ ramyaṁ siṁhanādastathāviśat | svayaṁ vastrāpathenaiva bhavasyāgre nirūpitaḥ
सिंहनाद भवानी-शंकर के रमणीय स्थान में प्रविष्ट हुए; वे स्वयं वस्त्रापथ द्वारा भव के सम्मुख नियुक्त किए गए।
श्लोक 30 (skanda.7.380.30)
स्वणरेखानदीतीरे कालमेघो महाबलः । सर्वलोकोपकारार्थं तीर्थं संस्थापितं पुरा
svaṇarekhānadītīre kālamegho mahābalaḥ | sarvalokopakārārthaṁ tīrthaṁ saṁsthāpitaṁ purā
स्वर्णरेखा नदी के तट पर महाबली कालमेघ ने अपना स्थान बनाया; इस प्रकार पूर्वकाल में समस्त लोकों के हित के लिए यह तीर्थ स्थापित हुआ।
श्लोक 31 (skanda.7.380.31)
वामनेन स्वयं गत्वा क्षेत्रपालास्तु पूजिताः । पुरा युगादौ राजेंद्र सर्वे देवाः समागताः
vāmanena svayaṁ gatvā kṣetrapālāstu pūjitāḥ | purā yugādau rājeṁdra sarve devāḥ samāgatāḥ
स्वयं वामन द्वारा वहाँ जाकर क्षेत्रपालों की पूजा की गई। हे राजेन्द्र, पूर्वकाल में युगादि में सभी देवता -
श्लोक 32 (skanda.7.380.32)
सुराष्ट्रदेशे संप्राप्ताः पुण्ये रैवतके गिरौ । रक्षार्थं सर्वलोकानां वधार्थं देववैरिणाम्
surāṣṭradeśe saṁprāptāḥ puṇye raivatake girau | rakṣārthaṁ sarvalokānāṁ vadhārthaṁ devavairiṇām
सुराष्ट्र देश के पुण्य रैवतक पर्वत पर पहुँचे थे - समस्त लोकों की रक्षा के लिए, और देवताओं के शत्रुओं के वध के लिए।
श्लोक 33 (skanda.7.380.33)
विष्णोः कण्ठे तदा मुक्ता जयमाला सुरोत्तमैः । दामोदरेति विख्यातं दत्तं नामोत्तमं हरेः
viṣṇoḥ kaṇṭhe tadā muktā jayamālā surottamaiḥ | dāmodareti vikhyātaṁ dattaṁ nāmottamaṁ hareḥ
तब श्रेष्ठ देवताओं द्वारा विष्णु के कंठ में विजय-माला पहनाई गई, और हरि को 'दामोदर' नामक उत्तम नाम दिया गया, जिससे वे विख्यात हुए।
श्लोक 34 (skanda.7.380.34)
तत्रादौ कार्तिके शुक्ले वासरे विष्णुवल्लभे । उपोष्य सहिते देवैस्तत्तीर्थं विष्णुना कृतम्
tatrādau kārtike śukle vāsare viṣṇuvallabhe | upoṣya sahite devaistattīrthaṁ viṣṇunā kṛtam
वहाँ पहले-पहल कार्तिक शुक्ल पक्ष के विष्णु-प्रिय दिन उपवास करके, देवताओं सहित विष्णु ने उस तीर्थ को स्थापित किया।
श्लोक 35 (skanda.7.380.35)
सर्वतीर्थमयी पुण्या स्वर्णरेखा नदी स्थिता । भुक्तिमुक्तिप्रदं पुण्यं विष्णुलोकप्रदायकम्
sarvatīrthamayī puṇyā svarṇarekhā nadī sthitā | bhuktimuktipradaṁ puṇyaṁ viṣṇulokapradāyakam
सर्वतीर्थमयी पवित्र स्वर्णरेखा नदी वहाँ स्थित है, भोग-मोक्ष देने वाली, पुण्यमयी, विष्णुलोक प्रदान करने वाली।
श्लोक 36 (skanda.7.380.36)
क्षालनं सर्वपापानां रोगदारिद्र्यनाशनम् । दामोदरं रैवतके परमानंददायकम्
kṣālanaṁ sarvapāpānāṁ rogadāridryanāśanam | dāmodaraṁ raivatake paramānaṁdadāyakam
वह समस्त पापों की धुलाई है, रोग-दरिद्रता का नाशक है; रैवतक का दामोदर परम आनंद देने वाला है।
श्लोक 37 (skanda.7.380.37)
ये पश्यंति विमानैस्ते नीयंते विष्णुमंदिरे । न गृहे कार्तिकः कार्यो विशेषाद्भीष्मपंचकम्
ye paśyaṁti vimānaiste nīyaṁte viṣṇumaṁdire | na gṛhe kārtikaḥ kāryo viśeṣādbhīṣmapaṁcakam
जो उसका दर्शन करते हैं, वे विमानों द्वारा विष्णु-मंदिर ले जाए जाते हैं। कार्तिक-व्रत घर में नहीं करना चाहिए, विशेषतः भीष्म-पंचक तो नहीं ही।
श्लोक 38 (skanda.7.380.38)
पंचकाद्द्वादशी श्रेष्ठा कार्या दामोदरे जले । प्रातःस्नानं प्रकर्त्तव्यं संप्राप्ते कार्तिके जनैः
paṁcakāddvādaśī śreṣṭhā kāryā dāmodare jale | prātaḥsnānaṁ prakarttavyaṁ saṁprāpte kārtike janaiḥ
पंचक में द्वादशी सर्वश्रेष्ठ है, जो दामोदर के जल में की जानी चाहिए। कार्तिक आने पर लोगों को प्रातः स्नान करना चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.7.380.39)
मासोपवासः कर्त्तव्यो यतिभिर्ब्रह्मचारिभिः । सतीभिर्विधवाभिश्च मुक्तिस्थानमभीप्सुभिः
māsopavāsaḥ karttavyo yatibhirbrahmacāribhiḥ | satībhirvidhavābhiśca muktisthānamabhīpsubhiḥ
संन्यासियों, ब्रह्मचारियों, सतियों, विधवाओं और मुक्ति-स्थान की इच्छा रखने वालों को मास-भर का उपवास करना चाहिए,
श्लोक 40 (skanda.7.380.40)
एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च । उपवासेवन कृच्छ्रेण शाकाहारेण वा पुनः
ekabhaktena naktena tathaivāyācitena ca | upavāsevana kṛcchreṇa śākāhāreṇa vā punaḥ
एक समय भोजन से, रात्रि-भोजन से, अयाचित भोजन से, या उपवास, कृच्छ्र व्रत या शाकाहार से।
श्लोक 41 (skanda.7.380.41)
संसेव्यः कार्त्तिके विष्णुर्दीपदानपरैर्नरैः । ब्रह्मचर्यपरैर्मासो नीयते यदि मानवैः
saṁsevyaḥ kārttike viṣṇurdīpadānaparairnaraiḥ | brahmacaryaparairmāso nīyate yadi mānavaiḥ
कार्तिक में दीपदान में तत्पर मनुष्यों द्वारा विष्णु की सेवा की जानी चाहिए; यदि मनुष्य ब्रह्मचर्य में तत्पर रहकर मास बिताएँ -
श्लोक 42 (skanda.7.380.42)
तदा विष्णुपुरे वासः क्रियते विष्णुना सह । पञ्चोपवासाः कर्त्तव्याः संप्राप्ते भीष्मपंचके
tadā viṣṇupure vāsaḥ kriyate viṣṇunā saha | pañcopavāsāḥ karttavyāḥ saṁprāpte bhīṣmapaṁcake
तो विष्णु के साथ विष्णुपुर में वास प्राप्त होता है। भीष्म-पंचक आने पर पाँच उपवास करने चाहिए -
श्लोक 43 (skanda.7.380.43)
एकादशीं समारभ्य पंचमी पूर्णिमादिनम् । तदेतत्पंचकं प्रोक्तं सर्वपापहरं नृणाम्
ekādaśīṁ samārabhya paṁcamī pūrṇimādinam | tadetatpaṁcakaṁ proktaṁ sarvapāpaharaṁ nṛṇām
एकादशी से आरंभ कर पूर्णिमा के बाद पंचमी तक। यह पंचक मनुष्यों के समस्त पापों को हरने वाला कहा गया है।
श्लोक 44 (skanda.7.380.44)
सर्वेषामपि मासानां पञ्चकात्कार्तिकादपि । एकादशी कार्तिकस्य पुण्या दामोदरे कृता
sarveṣāmapi māsānāṁ pañcakātkārtikādapi | ekādaśī kārtikasya puṇyā dāmodare kṛtā
सभी महीनों में, यहाँ तक कि पंचक और कार्तिक से भी बढ़कर, कार्तिक की एकादशी दामोदर में की जाए तो अत्यंत पुण्यकारी है।
श्लोक 45 (skanda.7.380.45)
मिष्टान्नं कार्तिके देयं हविष्यं सघृतप्लुतम् । सुवर्णं रजतं वस्त्रं तोयमन्नं फलानि च
miṣṭānnaṁ kārtike deyaṁ haviṣyaṁ saghṛtaplutam | suvarṇaṁ rajataṁ vastraṁ toyamannaṁ phalāni ca
कार्तिक में मिष्टान्न देना चाहिए, घृत में डूबा हुआ हविष्य, स्वर्ण, चाँदी, वस्त्र, जल, अन्न और फल भी,
श्लोक 46 (skanda.7.380.46)
मासांते विविधं देयं गौस्तिलाः कुसुमानि च । सर्वदानेषु यत्पुण्यं सर्व तीर्थेषु यत्फलम्
māsāṁte vividhaṁ deyaṁ gaustilāḥ kusumāni ca | sarvadāneṣu yatpuṇyaṁ sarva tīrtheṣu yatphalam
मासांत में विविध वस्तुएँ - गौ, तिल और पुष्प - देनी चाहिए। समस्त दानों का जो पुण्य है, समस्त तीर्थों का जो फल है,
श्लोक 47 (skanda.7.380.47)
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्गयायां पिंडदस्य यत् । तत्फलं जायते नॄणां दृष्टे दामोदरे नृप
aśvamedhādibhiryajñairgayāyāṁ piṁḍadasya yat | tatphalaṁ jāyate nṝṇāṁ dṛṣṭe dāmodare nṛpa
अश्वमेध आदि यज्ञों से, या गया में पिंडदान से जो फल मिलता है, हे राजन्, वही फल मनुष्यों को दामोदर के दर्शन से प्राप्त होता है।
श्लोक 48 (skanda.7.380.48)
एकादश्यां कृतस्नानो देव पूजापरो भवेत् । स्नाप्य पञ्चामृतेनैव ततस्तीर्थोदकेन च
ekādaśyāṁ kṛtasnāno deva pūjāparo bhavet | snāpya pañcāmṛtenaiva tatastīrthodakena ca
एकादशी को स्नान कर देव-पूजा में तत्पर होना चाहिए; पंचामृत से और फिर तीर्थ-जल से स्नान कराकर -
श्लोक 49 (skanda.7.380.49)
कुंकुमागरुश्रीखंडकर्पूरोदकमिश्रितैः । पूजयित्वा ततः पुष्पैः शतपत्रैः सुगं धिभिः
kuṁkumāgaruśrīkhaṁḍakarpūrodakamiśritaiḥ | pūjayitvā tataḥ puṣpaiḥ śatapatraiḥ sugaṁ dhibhiḥ
कुंकुम, अगुरु, चन्दन, कर्पूर मिश्रित जल से, फिर सुगन्धित शतपत्र-पुष्पों से पूजा करके -
श्लोक 50 (skanda.7.380.50)
मालतीकुसुमैः शुभ्रैर्बहुभिस्तुलसीदलैः । वस्त्रयज्ञोपवीतं च दत्त्वा धूपं प्रधूपयेत्
mālatīkusumaiḥ śubhrairbahubhistulasīdalaiḥ | vastrayajñopavītaṁ ca dattvā dhūpaṁ pradhūpayet
श्वेत मालती-पुष्पों और अनेक तुलसी-दलों से, वस्त्र और यज्ञोपवीत देकर धूप जलाना चाहिए।
श्लोक 51 (skanda.7.380.51)
दीपं दद्याद्धृतेनैव तैलेनापि घृतं विना । नैवेद्यं विविधं देयं फलं तांबूलमेव च
dīpaṁ dadyāddhṛtenaiva tailenāpi ghṛtaṁ vinā | naivedyaṁ vividhaṁ deyaṁ phalaṁ tāṁbūlameva ca
घृत से ही दीप देना चाहिए, अथवा घृत न हो तो तेल से; विविध नैवेद्य, फल और तांबूल भी देने चाहिए।
श्लोक 52 (skanda.7.380.52)
प्रासादपूजा कर्त्तव्या ध्वजदानादिना नृप । गौः सवत्सा ततो देया संसारार्णवतारिणी
prāsādapūjā karttavyā dhvajadānādinā nṛpa | gauḥ savatsā tato deyā saṁsārārṇavatāriṇī
हे राजन्, ध्वजदान आदि से मंदिर की पूजा करनी चाहिए; फिर बछड़े सहित गाय, जो संसार-सागर से पार कराने वाली है, देनी चाहिए।
श्लोक 53 (skanda.7.380.53)
ततः प्रदक्षिणां कृत्वा गीतवादित्रनिस्वनैः । वेदपाठपुराणैश्च व्याख्यादिव्यकथादिभिः
tataḥ pradakṣiṇāṁ kṛtvā gītavāditranisvanaiḥ | vedapāṭhapurāṇaiśca vyākhyādivyakathādibhiḥ
फिर गीत-वाद्यों की ध्वनि, वेद-पाठ, पुराणों तथा दिव्य कथाओं की व्याख्या के साथ प्रदक्षिणा करके -
श्लोक 54 (skanda.7.380.54)
देवाग्रे जागरः कार्यो दीपो देयोंऽतिभूमिषु । सप्तधान्यमयाः सप्त पर्वता दीपसंयुताः
devāgre jāgaraḥ kāryo dīpo deyoṁ'tibhūmiṣu | saptadhānyamayāḥ sapta parvatā dīpasaṁyutāḥ
देव के सम्मुख जागरण करना चाहिए, सीमा-भूमियों पर दीप देने चाहिए; सात धान्यों से बने सात पर्वत, दीप सहित -
श्लोक 55 (skanda.7.380.55)
फलतांबूलपक्वान्नपूरिताः परिकल्पिताः । विद्वद्भिः श्रोत्रियैः श्रांतैर्ब्राह्मणैर्गृहमेधिभिः
phalatāṁbūlapakvānnapūritāḥ parikalpitāḥ | vidvadbhiḥ śrotriyaiḥ śrāṁtairbrāhmaṇairgṛhamedhibhiḥ
फल, तांबूल और पके अन्न से भरे हुए, विद्वान, श्रोत्रिय, थके हुए ब्राह्मण गृहस्थों द्वारा सजाए जाने चाहिए,
श्लोक 56 (skanda.7.380.56)
स्त्रीभिश्च नरशार्दूल श्रोतव्या वैष्णवी कथा । एवं जागरणं कार्यं रागक्रोधविवर्जितैः
strībhiśca naraśārdūla śrotavyā vaiṣṇavī kathā | evaṁ jāgaraṇaṁ kāryaṁ rāgakrodhavivarjitaiḥ
और हे नरश्रेष्ठ, स्त्रियों द्वारा भी विष्णु-कथा सुनी जानी चाहिए। इस प्रकार राग-क्रोध से रहित होकर जागरण करना चाहिए।
श्लोक 57 (skanda.7.380.57)
कृत्वा जागरणं रात्रावुदिते सूर्यमडले । पूर्वां संध्यां ततः स्नात्वा कृत्वा मध्याह्नमाचरेत्
kṛtvā jāgaraṇaṁ rātrāvudite sūryamaḍale | pūrvāṁ saṁdhyāṁ tataḥ snātvā kṛtvā madhyāhnamācaret
रात्रि में जागरण कर, सूर्य-मंडल उदित होने पर प्रातः-संध्या कर स्नान करके मध्याह्न का आचरण करना चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.7.380.58)
देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च संतर्प्य विधिपूर्वकम् । कृत्वा श्राद्धं पितॄणां तु दद्याद्दानं स्वशक्तितः
devānpitṝnmanuṣyāṁśca saṁtarpya vidhipūrvakam | kṛtvā śrāddhaṁ pitṝṇāṁ tu dadyāddānaṁ svaśaktitaḥ
देवताओं, पितरों और मनुष्यों को विधिपूर्वक तर्पण देकर, पितरों का श्राद्ध करके, अपनी शक्ति के अनुसार दान देना चाहिए।
श्लोक 59 (skanda.7.380.59)
देवं दामोदरं पूज्य पुष्पधूपादिना पुनः । नरसिंहं सुरं पूज्य वैनतेयं च पूजयेत्
devaṁ dāmodaraṁ pūjya puṣpadhūpādinā punaḥ | narasiṁhaṁ suraṁ pūjya vainateyaṁ ca pūjayet
फिर पुष्प-धूप आदि से देव दामोदर की पूजा कर, देव नरसिंह की पूजा कर, वैनतेय (गरुड़) की भी पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 60 (skanda.7.380.60)
कृत्वा जागरणं रात्रावुत्थाप्य मधुसूदनम् । द्वादशीभुक्तिमासाद्य कार्यं पारणकं नरैः
kṛtvā jāgaraṇaṁ rātrāvutthāpya madhusūdanam | dvādaśībhuktimāsādya kāryaṁ pāraṇakaṁ naraiḥ
रात्रि में जागरण कर, मधुसूदन को जगाकर, द्वादशी का भोजन-काल आने पर मनुष्यों को पारणा करनी चाहिए।
श्लोक 61 (skanda.7.380.61)
ब्राह्मणान्भोजयित्वा च सहितः पुत्रबांधवैः । विकलांधकृपणानां देयमन्नं स्वशक्तितः
brāhmaṇānbhojayitvā ca sahitaḥ putrabāṁdhavaiḥ | vikalāṁdhakṛpaṇānāṁ deyamannaṁ svaśaktitaḥ
पुत्र-बांधवों सहित ब्राह्मणों को भोजन कराकर, अपंग, अंध और दीनों को अपनी शक्ति के अनुसार अन्न देना चाहिए।
श्लोक 62 (skanda.7.380.62)
दामोदरे रैवतके स्वर्णरेखानदीजले । एवं यः कुरुते यात्रां तस्य पुण्यफलं शृणु
dāmodare raivatake svarṇarekhānadījale | evaṁ yaḥ kurute yātrāṁ tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
रैवतक के दामोदर में, स्वर्णरेखा नदी के जल में, जो इस प्रकार यात्रा करता है, उसका पुण्य-फल सुनो -
श्लोक 63 (skanda.7.380.63)
ब्रह्मघ्नश्च सुरापश्च ग्रामसीमाविलोपकः । राजद्रोही गुरुद्रोही मिथ्याव्रतधरश्च यः
brahmaghnaśca surāpaśca grāmasīmāvilopakaḥ | rājadrohī gurudrohī mithyāvratadharaśca yaḥ
ब्रह्महत्यारा, सुरापायी, ग्राम-सीमा का उल्लंघन करने वाला, राजद्रोही, गुरुद्रोही और मिथ्या-व्रत धारण करने वाला,
श्लोक 64 (skanda.7.380.64)
कूटसाक्ष्यप्रदो यश्च यश्च न्यासापहारकः । बालस्त्रीघातको विप्रः संध्यास्नानविवर्जितः
kūṭasākṣyaprado yaśca yaśca nyāsāpahārakaḥ | bālastrīghātako vipraḥ saṁdhyāsnānavivarjitaḥ
झूठी गवाही देने वाला, धरोहर का अपहरण करने वाला, बालक-स्त्री का हत्यारा, संध्या-स्नान से रहित ब्राह्मण,
श्लोक 65 (skanda.7.380.65)
देवब्रह्म स्वहर्त्ता च वेदविक्रयकारकः । कन्याविक्रयकर्त्ता च देवब्राह्मणनिंदकः
devabrahma svaharttā ca vedavikrayakārakaḥ | kanyāvikrayakarttā ca devabrāhmaṇaniṁdakaḥ
देव-ब्राह्मण के धन का चोर, वेद बेचने वाला, कन्या बेचने वाला, तथा देव-ब्राह्मणों की निंदा करने वाला,
श्लोक 66 (skanda.7.380.66)
विश्वासघातको विप्रः शूद्रान्नादोऽथ लुब्धकः । नायकः परदाराणां स्वयंदत्तापहारकः
viśvāsaghātako vipraḥ śūdrānnādo'tha lubdhakaḥ | nāyakaḥ paradārāṇāṁ svayaṁdattāpahārakaḥ
विश्वासघाती ब्राह्मण, लोभवश शूद्र का अन्न खाने वाला, परस्त्रियों का दलाल, और अपने ही दिए हुए का अपहरण करने वाला,
श्लोक 67 (skanda.7.380.67)
पर्वमैथुनसेवी च तथा वै सेतुभेदकः । परिणीतामृतुस्नातां स्वयं यो नाभिगच्छति
parvamaithunasevī ca tathā vai setubhedakaḥ | pariṇītāmṛtusnātāṁ svayaṁ yo nābhigacchati
पर्व के दिन मैथुन करने वाला, तथा सेतु को तोड़ने वाला, और जो अपनी ही विवाहित, ऋतु-स्नाता पत्नी के पास स्वयं नहीं जाता -
श्लोक 68 (skanda.7.380.68)
ब्राह्मणी विधवा बाला न भवेच्छ्रुतधारिणी । महापातकिनश्चैते तथान्ये बहवो नृप
brāhmaṇī vidhavā bālā na bhavecchrutadhāriṇī | mahāpātakinaścaite tathānye bahavo nṛpa
यदि वह ब्राह्मण-कन्या विधवा हो और अभी शास्त्र-ज्ञान से रहित हो - ये सब, हे राजन्, महापातकी हैं, और इनके अतिरिक्त और भी अनेक हैं।
श्लोक 69 (skanda.7.380.69)
स्वर्णरेखाजले स्नात्वा दृष्ट्वा दामोदरं हरिम् । रात्रौ जागरणं कृत्वा मुच्यते सर्वपातकैः
svarṇarekhājale snātvā dṛṣṭvā dāmodaraṁ harim | rātrau jāgaraṇaṁ kṛtvā mucyate sarvapātakaiḥ
स्वर्णरेखा के जल में स्नान कर, दामोदर हरि का दर्शन कर, रात्रि में जागरण करके वह समस्त पातकों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 70 (skanda.7.380.70)
न तु ये पापकर्माणः समायाताः प्रजागरे । संसारसागरे तीर्थे गच्छंति न हरेः पुरम्
na tu ye pāpakarmāṇaḥ samāyātāḥ prajāgare | saṁsārasāgare tīrthe gacchaṁti na hareḥ puram
परन्तु जो पापकर्मी जागरण में सम्मिलित नहीं होते, वे संसार-सागर में ही रहकर, तीर्थ होते हुए भी हरि के नगर को नहीं जाते।
श्लोक 71 (skanda.7.380.71)
यथा यथा याति नरः प्रजागरे तथातथा विष्णुपुरे विचिंत्यते । वासः सुरैर्वैष्णवलोकहेतवे मृदंगगीतध्वनिनादिते गृहे
yathā yathā yāti naraḥ prajāgare tathātathā viṣṇupure viciṁtyate | vāsaḥ surairvaiṣṇavalokahetave mṛdaṁgagītadhvaninādite gṛhe
जैसे-जैसे मनुष्य जागरण में भाग लेता है, वैसे-वैसे उसे विष्णुपुर के योग्य समझा जाता है - मृदंग और गीत की ध्वनि से गूँजते घर में देवताओं सहित वैष्णव-लोक-प्राप्ति हेतु वास,
श्लोक 72 (skanda.7.380.72)
गदासि शंखारिधराश्चतुर्भुजा दैतेयदर्पापहरूपधारिणः । प्रगीयमानाः सुरसुंदरीभिस्ते यांति खं खेचरगात्रसंगाः
gadāsi śaṁkhāridharāścaturbhujā daiteyadarpāpaharūpadhāriṇaḥ | pragīyamānāḥ surasuṁdarībhiste yāṁti khaṁ khecaragātrasaṁgāḥ
गदा, तलवार, शंख और चक्र धारण करने वाले चार भुजाओं वाले, दैत्यों का गर्व हरने वाले रूप को धारण करने वाले - देव-सुन्दरियों द्वारा गाए जाते हुए वे आकाश-चारियों के साथ आकाश को जाते हैं।
श्लोक 73 (skanda.7.380.73)
वाराहकल्पे प्रथमं युगादौ दामोदरो रैवतके प्रसिद्धः । सैषा नदी या सरितां वरिष्ठा सोऽयं हरिर्यो भुवनस्य कर्ता
vārāhakalpe prathamaṁ yugādau dāmodaro raivatake prasiddhaḥ | saiṣā nadī yā saritāṁ variṣṭhā so'yaṁ hariryo bhuvanasya kartā
वराह-कल्प में, युग के आरंभ में ही दामोदर रैवतक पर विख्यात हुए; यही वह नदी है जो सरिताओं में श्रेष्ठ है, यही वह हरि हैं जो भुवन के कर्ता हैं।
श्लोक 74 (skanda.7.380.74)
इदं पुराणं पठते शृणोति नरो विमानैर्मधुसूद नालये । देवांगनादत्तभुजश्चतुर्भुजः स नीयते देवगणैरभिष्टुतः
idaṁ purāṇaṁ paṭhate śṛṇoti naro vimānairmadhusūda nālaye | devāṁganādattabhujaścaturbhujaḥ sa nīyate devagaṇairabhiṣṭutaḥ
जो मनुष्य इस पुराण-कथा को पढ़ता या सुनता है, वह विमानों द्वारा मधुसूदन के धाम को जाता है; देव-अंगना द्वारा भुजा पकड़े हुए, चतुर्भुज होकर, देव-गणों द्वारा स्तुत होकर वह ले जाया जाता है।