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प्रभास खण्ड · अध्याय 381

शिवरात्रिमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 380अध्याय-सूचीअध्याय 382

श्लोक 1 (skanda.7.381.1)

राजोवाच अथासौ वामनो विप्रः प्रविष्टो गहने वने । एकाकी किं चकाराथ कौतुकं तद्वदस्व मे

rājovāca athāsau vāmano vipraḥ praviṣṭo gahane vane | ekākī kiṁ cakārātha kautukaṁ tadvadasva me

राजा ने कहा - फिर वह वामन ब्राह्मण घने वन में प्रविष्ट होकर अकेला क्या आश्चर्यजनक कार्य करने लगा? वह मुझे बताइए।

श्लोक 2 (skanda.7.381.2)

सारस्वत उवाच अथासौ वामनो विप्रो गत्वा रैवतके गिरौ । स्वर्णरेखानदीतोये स्नात्वाथ विधिपूर्वकम्

sārasvata uvāca athāsau vāmano vipro gatvā raivatake girau | svarṇarekhānadītoye snātvātha vidhipūrvakam

सारस्वत ने कहा - फिर वह वामन ब्राह्मण रैवतक पर्वत पर जाकर, स्वर्णरेखा नदी के जल में विधिपूर्वक स्नान करके -

श्लोक 3 (skanda.7.381.3)

सुगंधपुष्पधूपाद्यैर्देवं संपूज्य भक्तितः । तस्थौ तदग्रतो राजन्नेकाकी निर्जने वने

sugaṁdhapuṣpadhūpādyairdevaṁ saṁpūjya bhaktitaḥ | tasthau tadagrato rājannekākī nirjane vane

सुगंधित पुष्प, धूप आदि से भक्तिपूर्वक देव की पूजा कर, हे राजन्, उनके सम्मुख निर्जन वन में अकेला खड़ा हो गया।

श्लोक 4 (skanda.7.381.4)

सर्वसत्त्वसमायुक्ते सरीसृपसमाकुले । अनेकस्वरसंघुष्टे मयूरध्वनिनादिते

sarvasattvasamāyukte sarīsṛpasamākule | anekasvarasaṁghuṣṭe mayūradhvaninādite

वह वन सभी प्राणियों से युक्त, सरीसृपों से भरा, अनेक स्वरों से गुंजित, मोर की ध्वनि से नादित था,

श्लोक 5 (skanda.7.381.5)

कोकिलारावरम्ये च वनकुक्कुटघोषिते । खद्योतद्योतिते तस्मिन्वलीमुखविधूनिते

kokilārāvaramye ca vanakukkuṭaghoṣite | khadyotadyotite tasminvalīmukhavidhūnite

कोयल के मधुर स्वर से रमणीय, वन-कुक्कुटों के कोलाहल से युक्त, जुगनुओं से जगमगाता, बंदरों से हिलता-डुलता,

श्लोक 6 (skanda.7.381.6)

क्वचिद्वंशाग्निना शांते क्वचित्पुष्पितपादपे । गगनासक्तविटपे सूर्यतापविवर्जिते

kvacidvaṁśāgninā śāṁte kvacitpuṣpitapādape | gaganāsaktaviṭape sūryatāpavivarjite

कहीं बाँस की अग्नि से शांत, कहीं फूलों से लदे वृक्षों वाला, आकाश को छूती शाखाओं वाला, सूर्य के ताप से रहित,

श्लोक 7 (skanda.7.381.7)

लुब्धकाघात संत्रस्तभ्रांतसूकरशंबरे । संहृष्टक्षत्रियवातस्थानदानविचक्षणे

lubdhakāghāta saṁtrastabhrāṁtasūkaraśaṁbare | saṁhṛṣṭakṣatriyavātasthānadānavicakṣaṇe

व्याधों के प्रहार से भयभीत भटकते सूअर-सांभर वाला, तथा क्षत्रियों को हर्षित करने वाले विश्राम-स्थलों में दान देने में निपुण -

श्लोक 8 (skanda.7.381.8)

अनेकाश्चर्यसंपन्नं सस्मार मनसा हरिम् । तं भीतमिव विज्ञाय नरसिंहः समाययौ

anekāścaryasaṁpannaṁ sasmāra manasā harim | taṁ bhītamiva vijñāya narasiṁhaḥ samāyayau

अनेक आश्चर्यों से भरे उस वन में उसने मन ही मन हरि का स्मरण किया। उसे मानो भयभीत जानकर नरसिंह वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 9 (skanda.7.381.9)

रक्षार्थं तस्य विप्रस्य बभाषे पुरतः स्थितः । न भेतव्यं त्वया विप्र वद ते किं करोम्यहम्

rakṣārthaṁ tasya viprasya babhāṣe purataḥ sthitaḥ | na bhetavyaṁ tvayā vipra vada te kiṁ karomyaham

उस ब्राह्मण की रक्षा के लिए, सामने खड़े होकर उन्होंने कहा - हे विप्र, तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं, कहो मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ।

श्लोक 10 (skanda.7.381.10)

विप्र उवाच यदि तुष्टो वरो देयो नरसिंह त्वया मम । सदात्र रक्षा कर्त्तव्या सर्वेषां तीर्थवासिनाम्

vipra uvāca yadi tuṣṭo varo deyo narasiṁha tvayā mama | sadātra rakṣā karttavyā sarveṣāṁ tīrthavāsinām

ब्राह्मण ने कहा - हे नरसिंह, यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं, तो आप यहाँ के समस्त तीर्थवासियों की सदा रक्षा करें।

श्लोक 11 (skanda.7.381.11)

देवस्याग्रे सदा स्थेयं यावदिंद्राश्चतुर्द्दश । एवमस्त्विति तं प्रोच्य तथा चक्रे हरिस्तदा

devasyāgre sadā stheyaṁ yāvadiṁdrāścaturddaśa | evamastviti taṁ procya tathā cakre haristadā

आप देव के सम्मुख सदा तब तक स्थित रहें जब तक चौदह इन्द्र न बदल जाएँ। 'ऐसा ही हो' कहकर हरि ने वैसा ही किया।

श्लोक 12 (skanda.7.381.12)

अतो दामोदरस्याग्रे नरसिंहः स पूज्यते । वनं सौम्यं कृतं तेन तीर्थरक्षां करोति सः

ato dāmodarasyāgre narasiṁhaḥ sa pūjyate | vanaṁ saumyaṁ kṛtaṁ tena tīrtharakṣāṁ karoti saḥ

इसीलिए दामोदर के सम्मुख नरसिंह पूजित होते हैं। उन्होंने वन को सौम्य बना दिया और वे तीर्थ की रक्षा करते हैं।

श्लोक 13 (skanda.7.381.13)

भूतप्रेतादिसंवासो वने तस्मिन्न जायते । नरसिंहप्रभावेन नष्टं सिंहादिजं भयम्

bhūtapretādisaṁvāso vane tasminna jāyate | narasiṁhaprabhāvena naṣṭaṁ siṁhādijaṁ bhayam

उस वन में भूत-प्रेत आदि का वास नहीं होता; नरसिंह के प्रभाव से सिंह आदि से उत्पन्न भय नष्ट हो गया है।

श्लोक 14 (skanda.7.381.14)

कार्त्तिके वासरे विष्णोर्द्वादश्यां पारणे कृते । दामोदरं नमस्कृत्य भवं द्रष्टुं ततो ययौ

kārttike vāsare viṣṇordvādaśyāṁ pāraṇe kṛte | dāmodaraṁ namaskṛtya bhavaṁ draṣṭuṁ tato yayau

कार्तिक द्वादशी को विष्णु का पारणा करके, दामोदर को प्रणाम कर, वह फिर भव के दर्शन के लिए चला।

श्लोक 15 (skanda.7.381.15)

चतुर्दश्यां कृतस्नानो भवं संपूज्य भावतः । भवभावभवं पापं भस्मीभूतं भवार्चनात्

caturdaśyāṁ kṛtasnāno bhavaṁ saṁpūjya bhāvataḥ | bhavabhāvabhavaṁ pāpaṁ bhasmībhūtaṁ bhavārcanāt

चतुर्दशी को स्नान कर भव की भावपूर्वक पूजा करने पर, संसार से उत्पन्न पाप भव-अर्चना से भस्म हो गया।

श्लोक 16 (skanda.7.381.16)

स क्षीणपापनिचयो जातो देवस्य दर्शनात् । भवस्याग्रे स्थितं शांतं तथा वस्त्रापथस्य च

sa kṣīṇapāpanicayo jāto devasya darśanāt | bhavasyāgre sthitaṁ śāṁtaṁ tathā vastrāpathasya ca

देव के दर्शन से उसके पापों का संचय क्षीण हो गया - भव के सम्मुख शांत स्थित उस वस्त्रापथ के रक्षक को भी उसने देखा।

श्लोक 17 (skanda.7.381.17)

तं कालमेघं समभ्यर्च्य ततो वस्त्रापथं ययौ । देवं संपूज्य मंत्रैः स वेदोक्तैर्विधिपूर्वकम्

taṁ kālameghaṁ samabhyarcya tato vastrāpathaṁ yayau | devaṁ saṁpūjya maṁtraiḥ sa vedoktairvidhipūrvakam

उन कालमेघ की पूजा कर फिर वह वस्त्रापथ गया; वेदोक्त मंत्रों से विधिपूर्वक देव की पूजा करके,

श्लोक 18 (skanda.7.381.18)

धूपदीपादिनैवेद्यैः सर्वं चक्रे स वामनः । प्रदक्षिणाशतं कृत्वा भवस्याग्रे व्यवस्थितः

dhūpadīpādinaivedyaiḥ sarvaṁ cakre sa vāmanaḥ | pradakṣiṇāśataṁ kṛtvā bhavasyāgre vyavasthitaḥ

धूप-दीप-नैवेद्य से वामन ने सब कुछ किया; सौ प्रदक्षिणाएँ कर वह भव के सम्मुख स्थित हुआ।

श्लोक 19 (skanda.7.381.19)

यावन्निरीक्षते सर्वं तावत्पश्यति पर्वतम् । उज्जयंतं गिरिवरं मैनाकस्य सहोदरम्

yāvannirīkṣate sarvaṁ tāvatpaśyati parvatam | ujjayaṁtaṁ girivaraṁ mainākasya sahodaram

जब वह चारों ओर देख रहा था, तब उसने पर्वत को देखा - मैनाक के सहोदर, श्रेष्ठ पर्वत उज्जयंत को -

श्लोक 20 (skanda.7.381.20)

सुराष्ट्रदेशे विख्यातं युगादौ प्रथमं स्थितम् । भूधरं भूधरैर्युक्तं शिलापादपमंडितम्

surāṣṭradeśe vikhyātaṁ yugādau prathamaṁ sthitam | bhūdharaṁ bhūdharairyuktaṁ śilāpādapamaṁḍitam

सुराष्ट्र देश में विख्यात, युगादि से ही प्रथम स्थित, पर्वतों से युक्त, शिला और वृक्षों से सुशोभित।

श्लोक 21 (skanda.7.381.21)

तं दृष्ट्वा चिंतयामास सूक्ष्मान्धर्मान्स वामनः । अल्पायासान्सुबहुलान्पुत्रलक्ष्मीप्रदायकान्

taṁ dṛṣṭvā ciṁtayāmāsa sūkṣmāndharmānsa vāmanaḥ | alpāyāsānsubahulānputralakṣmīpradāyakān

उसे देखकर वामन ने सूक्ष्म धर्मों का चिंतन किया - जो अल्प प्रयास वाले, अत्यंत फलदायी, पुत्र और लक्ष्मी देने वाले हैं -

श्लोक 22 (skanda.7.381.22)

अवश्यं क्रिय माणेषु स्वधर्म उपजायते । दृष्ट्वा नदीं सागरगां स्नात्वा पापैः प्रमुच्यते

avaśyaṁ kriya māṇeṣu svadharma upajāyate | dṛṣṭvā nadīṁ sāgaragāṁ snātvā pāpaiḥ pramucyate

निश्चय ही किए जाने पर स्वधर्म उत्पन्न होता है। समुद्र-गामिनी नदी को देखकर, स्नान करके मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.7.381.23)

गां स्पृष्ट्वा ब्राह्मणं नत्वा संपूज्य गुरुदेवताः । तपस्विनं यतिं शांतं श्रोत्रियं ब्रह्मचारिणम्

gāṁ spṛṣṭvā brāhmaṇaṁ natvā saṁpūjya gurudevatāḥ | tapasvinaṁ yatiṁ śāṁtaṁ śrotriyaṁ brahmacāriṇam

गाय को स्पर्श कर, ब्राह्मण को नमस्कार कर, गुरु-देवताओं की पूजा कर, तपस्वी, शांत यति, श्रोत्रिय और ब्रह्मचारी को,

श्लोक 24 (skanda.7.381.24)

पितरं मातरं भगिनीं तत्पतिं दुहितां पतिम् । भागिनेयमथ दौहित्रं मित्रसंबधिबांधवान् । संभोज्य पातकैः सर्वैर्मुच्यंते गृहमेधिनः

pitaraṁ mātaraṁ bhaginīṁ tatpatiṁ duhitāṁ patim | bhāgineyamatha dauhitraṁ mitrasaṁbadhibāṁdhavān | saṁbhojya pātakaiḥ sarvairmucyaṁte gṛhamedhinaḥ

पिता, माता, बहिन और उसके पति, पुत्री और उसके पति, भांजे, दौहित्र, मित्र, संबंधी और बांधवों को भोजन कराकर गृहस्थ समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.7.381.25)

राजा गजाश्वनकुलं सतीवृषमहीधराः । आदर्शक्षीरवृक्षाश्च सततान्नप्रदास्तु ते

rājā gajāśvanakulaṁ satīvṛṣamahīdharāḥ | ādarśakṣīravṛkṣāśca satatānnapradāstu te

राजा, गज, अश्व, नेवला, सती, बैल, पर्वत, दर्पण और दूध देने वाला वृक्ष - ये सतत फलदायी हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.381.26)

दृष्टमात्राः पुनन्त्येते ये नित्यं सत्यवादिनः । वेदधर्मकथां श्रुत्वा भुक्तिमुक्तिप्रदा नरान्

dṛṣṭamātrāḥ punantyete ye nityaṁ satyavādinaḥ | vedadharmakathāṁ śrutvā bhuktimuktipradā narān

इनका दर्शन मात्र ही पवित्र करता है, जो सदा सत्यवादी हैं। वेद-धर्म की कथा सुनकर वे मनुष्यों को भोग-मोक्ष प्रदान करते हैं -

श्लोक 27 (skanda.7.381.27)

स्मृत्वा हरिहरौ गंगां कृत्वा तीरेण मार्जनम् । गत्वा जागरणे विष्णोर्दत्त्वा दानं च शक्तितः

smṛtvā hariharau gaṁgāṁ kṛtvā tīreṇa mārjanam | gatvā jāgaraṇe viṣṇordattvā dānaṁ ca śaktitaḥ

हरि-हर का स्मरण कर, गंगा-तट पर शुद्धि कर, विष्णु के जागरण में जाकर, अपनी शक्ति के अनुसार दान देकर,

श्लोक 28 (skanda.7.381.28)

तांबूलं कुसुमं दीपं नैवेद्यं तुलसीदलम् । गीतं नृत्यं च वाद्यं च विधाय सुरमंदिरे

tāṁbūlaṁ kusumaṁ dīpaṁ naivedyaṁ tulasīdalam | gītaṁ nṛtyaṁ ca vādyaṁ ca vidhāya suramaṁdire

तांबूल, पुष्प, दीप, नैवेद्य, तुलसीदल, गीत, नृत्य और वाद्य देवमंदिर में अर्पित करके -

श्लोक 29 (skanda.7.381.29)

एते सूक्ष्माः स्मृता धर्माः क्रियमाणा महोदयाः । अतो गिरीन्द्रं पश्यामि सर्वदेवालयं शुभम्

ete sūkṣmāḥ smṛtā dharmāḥ kriyamāṇā mahodayāḥ | ato girīndraṁ paśyāmi sarvadevālayaṁ śubham

ये सूक्ष्म धर्म स्मृत हैं, जिनके करने से महान उदय होता है। अब मैं इस पर्वतराज को देखूँगा, जो सभी देवताओं का शुभ आलय है।

श्लोक 30 (skanda.7.381.30)

तेषां करतले स्वर्गः शिखरं यांति ये नराः

teṣāṁ karatale svargaḥ śikharaṁ yāṁti ye narāḥ

जो मनुष्य उसके शिखर पर चढ़ते हैं, स्वर्ग मानो उनकी हथेली में होता है।

श्लोक 31 (skanda.7.381.31)

इति ज्ञात्वा समा रूढो वामनो गिरिमूर्द्धनि । ऐरावतपदाक्रांत्या यत्र तोयं विनिःसृतम्

iti jñātvā samā rūḍho vāmano girimūrddhani | airāvatapadākrāṁtyā yatra toyaṁ viniḥsṛtam

ऐसा जानकर वामन पर्वत की चोटी पर चढ़ा, जहाँ ऐरावत के चरण के दबाव से जल निकला था।

श्लोक 32 (skanda.7.381.32)

ततः शिखरमारूढां भवानीं स्कन्दमातरम् । द्रष्टुं स वामनो याति शिखरे गगनाश्रिते

tataḥ śikharamārūḍhāṁ bhavānīṁ skandamātaram | draṣṭuṁ sa vāmano yāti śikhare gaganāśrite

फिर वामन स्कन्द-माता भवानी के दर्शन के लिए, जो आकाश-स्पर्शी शिखर पर आरूढ़ थीं, वहाँ गया।

श्लोक 33 (skanda.7.381.33)

यथायथा गिरिवरे समारोहंति मानवाः । तथातथा विमुच्यंते पातकैः सर्वदेहिनः

yathāyathā girivare samārohaṁti mānavāḥ | tathātathā vimucyaṁte pātakaiḥ sarvadehinaḥ

जैसे-जैसे मनुष्य इस श्रेष्ठ पर्वत पर चढ़ते हैं, वैसे-वैसे समस्त देहधारी पापों से मुक्त होते जाते हैं।

श्लोक 34 (skanda.7.381.34)

इति कृत्वा मतिं विप्रो जगाम गिरिमूर्द्धनि । भवभक्तो भवानीं स ददर्श स्कन्दमातरम्

iti kṛtvā matiṁ vipro jagāma girimūrddhani | bhavabhakto bhavānīṁ sa dadarśa skandamātaram

ऐसा निश्चय कर ब्राह्मण पर्वत की चोटी पर गया; भव का भक्त होकर उसने स्कन्द-माता भवानी के दर्शन किए।

श्लोक 35 (skanda.7.381.35)

अंबेति भाषते स्कंदस्ततोऽन्ये सर्वदेवताः । पृथिव्यां मानवाः सर्वे पाताले सर्वपन्नगाः

aṁbeti bhāṣate skaṁdastato'nye sarvadevatāḥ | pṛthivyāṁ mānavāḥ sarve pātāle sarvapannagāḥ

स्कन्द उन्हें 'अम्बा' कहकर संबोधित करते हैं, और वैसे ही अन्य सभी देवता, पृथ्वी के सभी मनुष्य, और पाताल के सभी सर्प भी।

श्लोक 36 (skanda.7.381.36)

अतो ह्यंबेति विख्याता पूज्यते गिरिमूर्द्धनि । संपूज्य विविधैर्मुख्यैः फलैर्नानाविधैर्द्विजः

ato hyaṁbeti vikhyātā pūjyate girimūrddhani | saṁpūjya vividhairmukhyaiḥ phalairnānāvidhairdvijaḥ

इसीलिए वे 'अम्बा' नाम से विख्यात होकर पर्वत की चोटी पर पूजी जाती हैं। विविध श्रेष्ठ फलों से उनकी पूजा कर उस ब्राह्मण ने -

श्लोक 37 (skanda.7.381.37)

गगनासक्तशिखरे संस्थितः कौतुकान्वितः । एकाकी शिखरे तस्मिन्नूर्द्ध्वबाहुर्व्यवस्थितः

gaganāsaktaśikhare saṁsthitaḥ kautukānvitaḥ | ekākī śikhare tasminnūrddhvabāhurvyavasthitaḥ

आकाश को छूती चोटी पर खड़ा होकर, आश्चर्यचकित होकर, अकेला उस शिखर पर भुजाएँ ऊँची किए खड़ा हो गया,

श्लोक 38 (skanda.7.381.38)

निरीक्ष्य मेदिनीं सर्वां सपर्वतससागराम् । आद्यं सनातनं देवं भास्करं त्रिगुणात्मकम्

nirīkṣya medinīṁ sarvāṁ saparvatasasāgarām | ādyaṁ sanātanaṁ devaṁ bhāskaraṁ triguṇātmakam

पर्वतों और सागरों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को निहारते हुए, आद्य, सनातन, त्रिगुणात्मक देव सूर्य को -

श्लोक 39 (skanda.7.381.39)

सर्वतेजोमयं सर्वदेवं देवैर्नमस्कृतम् । भ्रममाणं निराधारं कालमानप्रयोजकम्

sarvatejomayaṁ sarvadevaṁ devairnamaskṛtam | bhramamāṇaṁ nirādhāraṁ kālamānaprayojakam

समस्त तेज से युक्त, सर्वदेव, देवताओं द्वारा नमस्कृत, बिना आधार के भ्रमण करने वाले, काल-मान के प्रयोजक -

श्लोक 40 (skanda.7.381.40)

यावत्पश्यति तं विप्रस्तावत्पश्यति शंकरम् । दिगंबरं भवं देवं समंतादश्मगुंठितम्

yāvatpaśyati taṁ viprastāvatpaśyati śaṁkaram | digaṁbaraṁ bhavaṁ devaṁ samaṁtādaśmaguṁṭhitam

उसे देखते-देखते ब्राह्मण ने शंकर को देखा - दिगंबर भव देव, चारों ओर पाषाण से आच्छादित,

श्लोक 41 (skanda.7.381.41)

बुद्धरूपाकृतिं देवं सर्वज्ञं गुणभूषितम् । कृशांगं जटिलं सौम्यं व्योममार्गे स्वयं स्थितम्

buddharūpākṛtiṁ devaṁ sarvajñaṁ guṇabhūṣitam | kṛśāṁgaṁ jaṭilaṁ saumyaṁ vyomamārge svayaṁ sthitam

बुद्ध-सी आकृति वाले देव, सर्वज्ञ, गुणों से भूषित, कृश शरीर वाले, जटाधारी, सौम्य, आकाश-मार्ग में स्वयं स्थित।

श्लोक 42 (skanda.7.381.42)

श्रीशिव उवाच शृणु वामन तुष्टोऽहं दास्ये ते विविधान्वरान् । त्रैलोक्यव्यापिनी वृद्धिर्भविष्यति न संशयः

śrīśiva uvāca śṛṇu vāmana tuṣṭo'haṁ dāsye te vividhānvarān | trailokyavyāpinī vṛddhirbhaviṣyati na saṁśayaḥ

श्री शिव ने कहा - सुनो वामन, मैं प्रसन्न हूँ, मैं तुम्हें विविध वर दूँगा। तीनों लोकों में व्याप्त होने वाली समृद्धि होगी, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 43 (skanda.7.381.43)

प्रतिभास्यंति ते वेदा गीतनृत्यादिकं च यत् । असाध्यसाधनी शक्ति भविष्यति तव स्थिरा । परं वस्त्रापथे गत्वा कुरु तीर्थावलोकनम्

pratibhāsyaṁti te vedā gītanṛtyādikaṁ ca yat | asādhyasādhanī śakti bhaviṣyati tava sthirā | paraṁ vastrāpathe gatvā kuru tīrthāvalokanam

तुम्हें वेद प्रतिभासित होंगे, गीत-नृत्य आदि भी; असाध्य को साधने वाली शक्ति तुममें स्थिर होगी। अब वस्त्रापथ जाकर तीर्थों का अवलोकन करो।

श्लोक 44 (skanda.7.381.44)

वामन उवाच वस्त्रापथे महादेव यानि तीर्थानि तानि मे । वद देव विशेषेण यद्यस्ति करुणा मयि

vāmana uvāca vastrāpathe mahādeva yāni tīrthāni tāni me | vada deva viśeṣeṇa yadyasti karuṇā mayi

वामन ने कहा - हे महादेव, वस्त्रापथ में जो तीर्थ हैं, वे मुझे बताइए - विशेष रूप से, यदि मुझ पर आपकी करुणा है।

श्लोक 45 (skanda.7.381.45)

रुद्र उवाच वस्त्रापथस्य वायव्ये कोणे दिव्यं सरोवरम् । तस्य पश्चिमदिग्भागे जालिर्गहनपल्लवा

rudra uvāca vastrāpathasya vāyavye koṇe divyaṁ sarovaram | tasya paścimadigbhāge jālirgahanapallavā

रुद्र ने कहा - वस्त्रापथ के वायव्य कोण में एक दिव्य सरोवर है; उसके पश्चिम दिशा में सघन पत्तों वाली जालि है,

श्लोक 46 (skanda.7.381.46)

बिल्ववृक्षमयी मध्ये लिंगं तत्रास्ति मृन्मयम् । यत्रासौ लुब्धकः सिद्धो गतो मम पुरे पुरा

bilvavṛkṣamayī madhye liṁgaṁ tatrāsti mṛnmayam | yatrāsau lubdhakaḥ siddho gato mama pure purā

बिल्व वृक्षों से युक्त उसके मध्य में एक मिट्टी का लिंग है - जहाँ वह सिद्ध हुआ लुब्धक पूर्वकाल में मेरे नगर गया था।

श्लोक 47 (skanda.7.381.47)

तस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्या विनश्यति । इंद्रो वै वृत्रहा यस्मिन्विमुक्तो ब्रह्महत्यया

tasya darśanamātreṇa brahmahatyā vinaśyati | iṁdro vai vṛtrahā yasminvimukto brahmahatyayā

उसके दर्शन मात्र से ब्रह्महत्या नष्ट हो जाती है; इन्द्र, वृत्र का हंता, जिसके प्रभाव से ब्रह्महत्या से मुक्त हुए।

श्लोक 48 (skanda.7.381.48)

तस्माद्रुत्तरदिग्भागे धनदेन प्रतिष्ठितम् । लिंगं त्रैलोक्यविख्यातं तत्र देवी त्रिशूलिनी

tasmādruttaradigbhāge dhanadena pratiṣṭhitam | liṁgaṁ trailokyavikhyātaṁ tatra devī triśūlinī

उससे उत्तर दिशा में कुबेर द्वारा प्रतिष्ठित लिंग है, जो तीनों लोकों में विख्यात है; वहाँ त्रिशूलधारिणी देवी भी हैं -

श्लोक 49 (skanda.7.381.49)

यस्या दर्शनमात्रेण पुत्रोऽस्य नलकूबर । पाशानुषक्तहस्तोऽभूद्देवं चक्रे त्रिशूलिनम्

yasyā darśanamātreṇa putro'sya nalakūbara | pāśānuṣaktahasto'bhūddevaṁ cakre triśūlinam

जिनके दर्शन मात्र से उनका पुत्र नलकूबर, जिसका हाथ पाश से बँधा हुआ था, मुक्त हुआ और उन्हें त्रिशूलिनी देवी बना दिया।

श्लोक 50 (skanda.7.381.50)

भवस्य नैर्ऋते कोणे गणो हेरंबसंज्ञितः । यमेन कुर्वता लिंगं प्रथमं च प्रतिष्ठितः

bhavasya nairṛte koṇe gaṇo heraṁbasaṁjñitaḥ | yamena kurvatā liṁgaṁ prathamaṁ ca pratiṣṭhitaḥ

भव के नैर्ऋत्य कोण में हेरंब नामक गण हैं - एक लिंग जो सर्वप्रथम यम द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था,

श्लोक 51 (skanda.7.381.51)

विचित्रं तस्य माहात्म्यं चित्रगुप्तोऽति विस्मितः । दृष्ट्वा समागतो द्रष्टुं देवं तं मृन्मयं पुरा

vicitraṁ tasya māhātmyaṁ citragupto'ti vismitaḥ | dṛṣṭvā samāgato draṣṭuṁ devaṁ taṁ mṛnmayaṁ purā

उसकी महिमा विचित्र है; चित्रगुप्त अत्यंत आश्चर्यचकित होकर उसे देखने पूर्वकाल में उस मिट्टी के देव के पास आए।

श्लोक 52 (skanda.7.381.52)

तेनापि निर्मितं लिंगं तस्मिन्क्षेत्रे द्विजोत्तम । चित्रगुप्तेश्वरंनाम विख्यातं भुवन त्रये

tenāpi nirmitaṁ liṁgaṁ tasminkṣetre dvijottama | citragupteśvaraṁnāma vikhyātaṁ bhuvana traye

उसके द्वारा भी उस क्षेत्र में एक लिंग बनाया गया, हे द्विजोत्तम, जो तीनों लोकों में 'चित्रगुप्तेश्वर' नाम से विख्यात है।

श्लोक 53 (skanda.7.381.53)

पश्चिमेन चकारोच्चैः प्रजापतिरुदारधीः । केदाराख्यं तदा लिंगं गिरौ रैवतके स्थितम् । प्रजापतिः स्वयं तस्थौ तत्र पर्वतसानुनि

paścimena cakāroccaiḥ prajāpatirudāradhīḥ | kedārākhyaṁ tadā liṁgaṁ girau raivatake sthitam | prajāpatiḥ svayaṁ tasthau tatra parvatasānuni

पश्चिम में उदार-बुद्धि प्रजापति ने अत्यंत गंभीरता से 'केदार' नामक लिंग बनाया, जो रैवतक पर्वत पर स्थित है; प्रजापति स्वयं उसी पर्वत-श्रेणी पर स्थित रहे।

श्लोक 54 (skanda.7.381.54)

रुद्र उवाच इंद्रेश्वरस्य माहात्म्यं कथयिष्ये शृणुष्व तत् । ईशानकोणे विख्यातं भवस्य विदितं मम

rudra uvāca iṁdreśvarasya māhātmyaṁ kathayiṣye śṛṇuṣva tat | īśānakoṇe vikhyātaṁ bhavasya viditaṁ mama

रुद्र ने कहा - अब मैं इन्द्रेश्वर की महिमा कहूँगा, सुनो; वह ईशान कोण में विख्यात है, भव का ही, मुझे ज्ञात है।

श्लोक 55 (skanda.7.381.55)

वामन उवाच कस्मादिंद्रः समायातः कथं चक्रे हरं हरिः । कथां सविस्तरामेतां कथयस्व मम प्रभो

vāmana uvāca kasmādiṁdraḥ samāyātaḥ kathaṁ cakre haraṁ hariḥ | kathāṁ savistarāmetāṁ kathayasva mama prabho

वामन ने कहा - इन्द्र वहाँ क्यों आए, और हरि ने हर को कैसे बनाया? यह विस्तृत कथा मुझे बताइए, हे प्रभो।

श्लोक 56 (skanda.7.381.56)

रुद्र उवाच लुब्धकस्तु पुरा सिद्धः शिवरात्रिप्रजागरात् । शिवलोके तदा प्राप्तं विमानं गणसंयुतम्

rudra uvāca lubdhakastu purā siddhaḥ śivarātriprajāgarāt | śivaloke tadā prāptaṁ vimānaṁ gaṇasaṁyutam

रुद्र ने कहा - पूर्वकाल में एक लुब्धक शिवरात्रि के जागरण से सिद्ध हुआ; उसे तब शिवलोक में गणों सहित एक विमान प्राप्त हुआ,

श्लोक 57 (skanda.7.381.57)

सर्वत्रगं सुरुचिरं दिव्यस्त्रीगीतनादितम् ॥ तदारुह्य समायातो द्रष्टुं तां नगरीं हरेः

sarvatragaṁ suruciraṁ divyastrīgītanāditam tadāruhya samāyāto draṣṭuṁ tāṁ nagarīṁ hareḥ

जो सर्वत्रगामी, अत्यंत सुंदर, दिव्य स्त्रियों के गीत से गुंजित था। उस पर आरूढ़ होकर वह हरि की उस नगरी को देखने आया,

श्लोक 58 (skanda.7.381.58)

यस्यां युद्धं समभवद्गणानां यमकिंकरैः । आगच्छमानं तं ज्ञात्वा देवराजेन चिंतितम्

yasyāṁ yuddhaṁ samabhavadgaṇānāṁ yamakiṁkaraiḥ | āgacchamānaṁ taṁ jñātvā devarājena ciṁtitam

जहाँ गणों और यम के दूतों के बीच युद्ध हुआ था। उसे आता हुआ जानकर देवराज ने विचार किया -

श्लोक 59 (skanda.7.381.59)

पूज्योऽयं हरवत्सर्वैश्चित्रगुप्तयमादिभिः । इंद्रो गजं समारुह्य महिषेण यमो यतः

pūjyo'yaṁ haravatsarvaiścitraguptayamādibhiḥ | iṁdro gajaṁ samāruhya mahiṣeṇa yamo yataḥ

यह हर के समान चित्रगुप्त और यम आदि सभी द्वारा पूज्य है। इन्द्र गज पर आरूढ़ हुए, और यम महिष पर,

श्लोक 60 (skanda.7.381.60)

विधाय लेखनीं कर्णे चित्रगुप्तो यमाज्ञया । ततो हूता गणाः सर्वे ये नीता धरणीतलात्

vidhāya lekhanīṁ karṇe citragupto yamājñayā | tato hūtā gaṇāḥ sarve ye nītā dharaṇītalāt

चित्रगुप्त ने यम की आज्ञा से कान पर लेखनी रखकर, धरती से लाए गए सभी गणों को बुलाया।

श्लोक 61 (skanda.7.381.61)

निजापराधसंतप्ता गतास्ते दक्षिणामुखम् ॥ आथित्यपू जा कर्तव्या लुब्धके गृहमागते

nijāparādhasaṁtaptā gatāste dakṣiṇāmukham āthityapū jā kartavyā lubdhake gṛhamāgate

अपने ही अपराध से संतप्त होकर वे दक्षिण दिशा को चले गए। फिर इन्द्र ने सोचा - घर आए हुए लुब्धक की अतिथि-पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.7.381.62)

अपूजिते गते ह्यस्मिन्हरो मां शपयिष्यति । तस्मात्पूजां करिष्यामि यथा तुष्यति शंकरः

apūjite gate hyasminharo māṁ śapayiṣyati | tasmātpūjāṁ kariṣyāmi yathā tuṣyati śaṁkaraḥ

यदि यह बिना पूजा के चला गया, तो हर मुझे शाप देंगे। अतः मैं ऐसी पूजा करूँगा कि शंकर प्रसन्न हों।

श्लोक 63 (skanda.7.381.63)

देवं द्रष्टुं समायातं ददर्शादूरतः स्थितम् । विमानस्थं हराकारं सूर्यकोटिसमप्रभम्

devaṁ draṣṭuṁ samāyātaṁ dadarśādūrataḥ sthitam | vimānasthaṁ harākāraṁ sūryakoṭisamaprabham

उसने देव को देखने आए हुए उस लुब्धक को दूर से देखा - विमान पर स्थित, हर के रूप में, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी,

श्लोक 64 (skanda.7.381.64)

संस्तूयमानं चरितैः शिवरात्रेः शिवस्य च । माघे मासे चतुर्द्दश्यां कृष्णायां जागरे कृते

saṁstūyamānaṁ caritaiḥ śivarātreḥ śivasya ca | māghe māse caturddaśyāṁ kṛṣṇāyāṁ jāgare kṛte

शिवरात्रि और शिव के चरित से स्तुत होते हुए - माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को जागरण किए जाने पर -

श्लोक 65 (skanda.7.381.65)

तदेवं जायते सर्वं सुरेश्वर धरातले । एवं देवांगना काचिदाचक्षंती पुरंदरम् । निवार्य हस्तमुद्यम्य गजेंद्रं चारुलोचना

tadevaṁ jāyate sarvaṁ sureśvara dharātale | evaṁ devāṁganā kācidācakṣaṁtī puraṁdaram | nivārya hastamudyamya gajeṁdraṁ cārulocanā

तब यह सब पृथ्वी पर होता है, हे सुरेश्वर। इस प्रकार एक सुंदर नेत्रों वाली देवांगना पुरंदर से कहते हुए, हाथ उठाकर गजेन्द्र को रोकते हुए -

श्लोक 66 (skanda.7.381.66)

किं दानैर्बहुभिर्दत्तैर्व्रतैः किं किं सुरार्चनैः । किं योगैः किं तपोभिश्च ब्रह्मचर्य्यैः सुरेश्वर

kiṁ dānairbahubhirdattairvrataiḥ kiṁ kiṁ surārcanaiḥ | kiṁ yogaiḥ kiṁ tapobhiśca brahmacaryyaiḥ sureśvara

अनेक दानों से, व्रतों से, देव-पूजा से क्या लाभ? हे सुरेश्वर, योग, तप और ब्रह्मचर्य से क्या लाभ?

श्लोक 67 (skanda.7.381.67)

गयायां पिंडदानेन प्रयागमरणेन किम् । सोमेश्वरे सरस्वत्यां सोमपर्वणि किं गतैः

gayāyāṁ piṁḍadānena prayāgamaraṇena kim | someśvare sarasvatyāṁ somaparvaṇi kiṁ gataiḥ

गया में पिंडदान से, प्रयाग में मरण से क्या लाभ? सोमेश्वर, सरस्वती या सोम-पर्व में जाने से क्या लाभ?

श्लोक 68 (skanda.7.381.68)

कुरुक्षेत्रगतैः किं स्याद्राहुग्रस्ते दिवाकरे । तुलासुवर्णदानेन वेदपाठेन किं भवेत्

kurukṣetragataiḥ kiṁ syādrāhugraste divākare | tulāsuvarṇadānena vedapāṭhena kiṁ bhavet

सूर्य के राहु-ग्रस्त होने पर कुरुक्षेत्र जाने से क्या मिलता है? तुला-दान, स्वर्ण-दान, वेद-पाठ से क्या मिलता है?

श्लोक 69 (skanda.7.381.69)

सर्वपापक्षयो येन वृषोत्सर्गेण तेन किम् । गोदानं किं करोत्येवं जलदानं तथैव च

sarvapāpakṣayo yena vṛṣotsargeṇa tena kim | godānaṁ kiṁ karotyevaṁ jaladānaṁ tathaiva ca

वृष-उत्सर्ग जो समस्त पापों का नाश करता है, उससे क्या तुलना? गौ-दान और जल-दान भी क्या करते हैं इसकी तुलना में?

श्लोक 70 (skanda.7.381.70)

अयने विषुवे चैव संक्रांतौ कीदृशं फलम् । माघमासे चतुर्दश्यां यादृशं जागरे कृते

ayane viṣuve caiva saṁkrāṁtau kīdṛśaṁ phalam | māghamāse caturdaśyāṁ yādṛśaṁ jāgare kṛte

अयन, विषुव और संक्रांति में कैसा फल है, माघ की चतुर्दशी के जागरण से जैसा फल है?

श्लोक 71 (skanda.7.381.71)

यमः संभाषते वाण्या महिषोपरि संस्थितः । पश्य रुद्रस्य माहात्म्यं चित्रगुप्त विचारय

yamaḥ saṁbhāṣate vāṇyā mahiṣopari saṁsthitaḥ | paśya rudrasya māhātmyaṁ citragupta vicāraya

यम महिष पर स्थित होकर वाणी से बोले - हे चित्रगुप्त, रुद्र की महिमा देखो और विचार करो।

श्लोक 72 (skanda.7.381.72)

अयं स लुब्धको येन हरः संपूजितः पुरा । सुराष्ट्रदेशे विख्यातं तीर्थं वस्त्रापथं शृणु

ayaṁ sa lubdhako yena haraḥ saṁpūjitaḥ purā | surāṣṭradeśe vikhyātaṁ tīrthaṁ vastrāpathaṁ śṛṇu

यह वही लुब्धक है जिसने पूर्वकाल में हर की पूजा की थी। सुराष्ट्र देश में विख्यात वस्त्रापथ नामक तीर्थ को सुनो -

श्लोक 73 (skanda.7.381.73)

उज्जयंतो गिरिस्तत्र तथा रैवतको गिरिः । महती वर्त्तते जालिस्तयोर्मध्ये मया श्रुतम्

ujjayaṁto giristatra tathā raivatako giriḥ | mahatī varttate jālistayormadhye mayā śrutam

वहाँ उज्जयंत पर्वत है, और वैसे ही रैवतक पर्वत भी है; उन दोनों के मध्य एक महती जालि है, ऐसा मैंने सुना है।

श्लोक 74 (skanda.7.381.74)

मृन्मयं वर्तते लिगं रात्रौ चानेन पूजितः । रात्रौ जागरणं कर्त्तुं येन कार्येण चागतः

mṛnmayaṁ vartate ligaṁ rātrau cānena pūjitaḥ | rātrau jāgaraṇaṁ karttuṁ yena kāryeṇa cāgataḥ

वहाँ एक मिट्टी का लिंग है, जिसे इसने रात्रि में पूजा है; रात्रि-जागरण करने के उद्देश्य से ही यह यहाँ आया है।

श्लोक 75 (skanda.7.381.75)

तदस्माभिः कथं वाच्यं स्वयं जानंति ते सुराः । वरांगना वरं द्रष्टुं वरयंति परस्परम् । इंद्रावासात्समायाता नंदने वेगवत्तराः

tadasmābhiḥ kathaṁ vācyaṁ svayaṁ jānaṁti te surāḥ | varāṁganā varaṁ draṣṭuṁ varayaṁti parasparam | iṁdrāvāsātsamāyātā naṁdane vegavattarāḥ

अब हम इसके विषय में क्या कहें? देवगण स्वयं जानते हैं। सुंदरी देवांगनाएँ उस श्रेष्ठ पुरुष को देखने के लिए परस्पर स्पर्धा करने लगीं; वे इन्द्र के आवास से नन्दन वन में शीघ्रता से आईं -

श्लोक 76 (skanda.7.381.76)

विरंचिना रायणशंकरत्विषा देहेन चागच्छति कोऽपि पूरुषः । पुरीं सुरेशाधिपतेर्निरीक्षितुं भर्त्ता ममायं तव चास्ति किं पतिः

viraṁcinā rāyaṇaśaṁkaratviṣā dehena cāgacchati ko'pi pūruṣaḥ | purīṁ sureśādhipaternirīkṣituṁ bharttā mamāyaṁ tava cāsti kiṁ patiḥ

'कोई पुरुष ब्रह्मा-सी या शंकर-सी कांति वाले शरीर से देवाधिपति की नगरी देखने आ रहा है - क्या यह मेरा पति है, या तुम्हारा पति है?'

श्लोक 77 (skanda.7.381.77)

मृदंगवीणा पटहस्वरस्तुतैः प्रवोधिताभिः सुरराजमन्दिरे । देवो हरोऽयं न नरो हराकृतिर्दृष्टोंगनाभिस्तव किं किमावयोः

mṛdaṁgavīṇā paṭahasvarastutaiḥ pravodhitābhiḥ surarājamandire | devo haro'yaṁ na naro harākṛtirdṛṣṭoṁganābhistava kiṁ kimāvayoḥ

मृदंग, वीणा और पटह के स्वरों से जगाई गई अन्य ने देव-राज के मंदिर में कहा - यह हर देव हैं, मनुष्य नहीं जिसने हर का रूप धरा हो - देवांगनाओं द्वारा देखे गए, इसमें तुम्हारा या हमारा क्या है?

श्लोक 78 (skanda.7.381.78)

गायंति काश्चिद्विहसंति काश्चिन्नृत्यंति काश्चित्प्रपठंति काश्चित् । वदन्ति काश्चिज्जयशब्दसंयुतैर्वाक्यैरनेकैर्गुरुसन्निधाने

gāyaṁti kāścidvihasaṁti kāścinnṛtyaṁti kāścitprapaṭhaṁti kāścit | vadanti kāścijjayaśabdasaṁyutairvākyairanekairgurusannidhāne

कोई गाती हैं, कोई हँसती हैं, कोई नृत्य करती हैं, कोई पाठ करती हैं, कोई जय-जयकार के अनेक शब्दों से गुरु के समक्ष बोलती हैं।

श्लोक 79 (skanda.7.381.79)

काचिच्छिवं स्तौति शिवां तथान्या पृच्छत्यथान्या किमु बिल्वपत्रात् । किं वोपवासेन फलं तवेदं निद्राक्षयेणाथ फलं तवैतत्

kācicchivaṁ stauti śivāṁ tathānyā pṛcchatyathānyā kimu bilvapatrāt | kiṁ vopavāsena phalaṁ tavedaṁ nidrākṣayeṇātha phalaṁ tavaitat

कोई शिव की स्तुति करती है, कोई शिवा की; कोई पूछती है - क्या यह बिल्वपत्र का फल है? क्या यह उपवास का फल है, या नींद के क्षय का फल है?

श्लोक 80 (skanda.7.381.80)

तासां नानाविधा वाचः श्रूयन्ते नन्दने वने । ब्रह्मलोकादिका वार्त्ताः कृत्वा च तदनन्तरम्

tāsāṁ nānāvidhā vācaḥ śrūyante nandane vane | brahmalokādikā vārttāḥ kṛtvā ca tadanantaram

उनकी विविध वाणियाँ नन्दन वन में सुनाई देती हैं, ब्रह्मलोक आदि की बातें करते हुए -

श्लोक 81 (skanda.7.381.81)

देवेन्द्रो लुब्धकं भूयो बभाषे कौतुकान्वितः । कस्मिन्देशे गिरौ जालिर्लिंगं यत्रास्ति दर्शय

devendro lubdhakaṁ bhūyo babhāṣe kautukānvitaḥ | kasmindeśe girau jālirliṁgaṁ yatrāsti darśaya

देवेन्द्र ने कुतूहलपूर्वक लुब्धक से फिर पूछा - किस देश के, किस पर्वत की, जालि में वह लिंग है, मुझे दिखाओ।

श्लोक 82 (skanda.7.381.82)

लुब्धक उवाच सुराष्ट्रदेशे विख्यातो यस्मिन्देशे सरस्वती । वाडवं शिरसा धृत्वा प्रविष्टा लवणोदधौ

lubdhaka uvāca surāṣṭradeśe vikhyāto yasmindeśe sarasvatī | vāḍavaṁ śirasā dhṛtvā praviṣṭā lavaṇodadhau

लुब्धक ने कहा - सुराष्ट्र नामक विख्यात देश में, जहाँ सरस्वती वडवाग्नि को सिर पर धारण कर लवण-समुद्र में प्रवेश करती है,

श्लोक 83 (skanda.7.381.83)

यत्र सा गोमती याति यत्रास्ते गन्धमादनः । उज्जयंतो गिरिवरो यत्र रैवतको गिरिः

yatra sā gomatī yāti yatrāste gandhamādanaḥ | ujjayaṁto girivaro yatra raivatako giriḥ

जहाँ गोमती नदी बहती है, जहाँ गंधमादन है, जहाँ उज्जयंत और रैवतक पर्वत हैं -

श्लोक 84 (skanda.7.381.84)

तत्र वस्त्रापथं क्षेत्रं भवस्तत्र व्यवस्थितः । तत्रास्ते मृन्मयं लिंगं जालिमध्ये सुरोत्तम

tatra vastrāpathaṁ kṣetraṁ bhavastatra vyavasthitaḥ | tatrāste mṛnmayaṁ liṁgaṁ jālimadhye surottama

वहीं वस्त्रापथ क्षेत्र है, वहीं भव स्थित हैं। वहीं जालि के मध्य वह मिट्टी का लिंग है, हे देवश्रेष्ठ।

श्लोक 85 (skanda.7.381.85)

इन्द्र उवाच सहितैस्तत्र गंतव्यं पूजयिष्ये भवं स्वयम् । जालिमध्ये तथा लिंगं दर्शयस्व च लुब्धक

indra uvāca sahitaistatra gaṁtavyaṁ pūjayiṣye bhavaṁ svayam | jālimadhye tathā liṁgaṁ darśayasva ca lubdhaka

इन्द्र ने कहा - हम सबको वहाँ चलना चाहिए, मैं स्वयं भव की पूजा करूँगा। हे लुब्धक, जालि के मध्य वह लिंग भी मुझे दिखाओ।

श्लोक 86 (skanda.7.381.86)

परदारादिकं पापं दैत्यानां तु विकृंतने । वधे वृत्रस्य संजातं तत्सर्वं क्षालयाम्यहम्

paradārādikaṁ pāpaṁ daityānāṁ tu vikṛṁtane | vadhe vṛtrasya saṁjātaṁ tatsarvaṁ kṣālayāmyaham

परस्त्री-गमन आदि पाप, दैत्यों के संहार और वृत्र-वध से उत्पन्न पाप - वह सब मैं वहाँ धो डालूँगा।

श्लोक 87 (skanda.7.381.87)

इत्युक्त्वा सहिताः सर्वे संप्राप्ता गिरिमूर्द्धनि । वाहनानि च ते त्यक्त्वा प्रस्थिताः पादचारिणः

ityuktvā sahitāḥ sarve saṁprāptā girimūrddhani | vāhanāni ca te tyaktvā prasthitāḥ pādacāriṇaḥ

ऐसा कहकर सब मिलकर पर्वत की चोटी पर पहुँचे; अपने वाहन त्यागकर वे पैदल ही आगे बढ़े।

श्लोक 88 (skanda.7.381.88)

उज्जयन्तगिरेर्मूर्ध्नि गजराजः समागतः । तदाग्रचरणं तस्य ददौ मूर्धनि कारणात्

ujjayantagirermūrdhni gajarājaḥ samāgataḥ | tadāgracaraṇaṁ tasya dadau mūrdhani kāraṇāt

उज्जयंत पर्वत की चोटी पर गजराज (ऐरावत) आए; किसी कारणवश उन्होंने अपना अग्रचरण उसकी चोटी पर रखा।

श्लोक 89 (skanda.7.381.89)

तेनाक्रान्तो गिरिवरस्तोयं सुस्राव निर्मलम् । गजपादोद्भवं वारि भविष्यति सदा स्थिरम्

tenākrānto girivarastoyaṁ susrāva nirmalam | gajapādodbhavaṁ vāri bhaviṣyati sadā sthiram

उससे दबकर उस श्रेष्ठ पर्वत ने निर्मल जल प्रवाहित किया; गज-पाद से उत्पन्न वह जल सदैव स्थिर रहेगा।

श्लोक 90 (skanda.7.381.90)

इति प्रोक्तं सुरेन्द्रेण लोकानां हितकाम्यया । सर्वे समागतास्तत्र यत्र जालिर्व्यवस्थिता

iti proktaṁ surendreṇa lokānāṁ hitakāmyayā | sarve samāgatāstatra yatra jālirvyavasthitā

लोकों के हित की कामना से देवराज ने ऐसा कहा; सब उस स्थान पर एकत्र हुए जहाँ जालि स्थित थी।

श्लोक 91 (skanda.7.381.91)

संपूज्य विविधैः पुष्पैर्माघमासे चतुर्दशी । तस्यां जागरणं कृत्वा सञ्जातो निर्मलो हरिः

saṁpūjya vividhaiḥ puṣpairmāghamāse caturdaśī | tasyāṁ jāgaraṇaṁ kṛtvā sañjāto nirmalo hariḥ

विविध पुष्पों से पूजा कर, माघ मास की चतुर्दशी को वहाँ जागरण करके हरि (इन्द्र) निर्मल हो गए।

श्लोक 92 (skanda.7.381.92)

वस्त्रापथे भवं पूज्य हरिं रैवतके गिरौ । इन्द्रेश्वरं प्रतिष्ठाप्य संप्राप्तः स्वनिकतनम्

vastrāpathe bhavaṁ pūjya hariṁ raivatake girau | indreśvaraṁ pratiṣṭhāpya saṁprāptaḥ svanikatanam

वस्त्रापथ में भव की और रैवतक पर्वत पर हरि की पूजा कर, 'इन्द्रेश्वर' की स्थापना कर, वे अपने निवास को लौटे।

श्लोक 93 (skanda.7.381.93)

लुब्धकोऽपि विमानेन संप्राप्तो हरिमन्दिरे । इत्युक्त्वा स भवो देवस्तत्रैवांतरधीयत

lubdhako'pi vimānena saṁprāpto harimandire | ityuktvā sa bhavo devastatraivāṁtaradhīyata

लुब्धक भी विमान द्वारा हरि-मंदिर पहुँच गया। ऐसा कहकर वह भव देव वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 94 (skanda.7.381.94)

वामनोपि ततश्चक्रे तत्र तीर्थावगाहनम् । यादृग्रूपः शिवो दृष्टः सूर्यबिंबे दिगंबरः

vāmanopi tataścakre tatra tīrthāvagāhanam | yādṛgrūpaḥ śivo dṛṣṭaḥ sūryabiṁbe digaṁbaraḥ

वामन ने भी फिर वहाँ तीर्थ में स्नान किया। जिस रूप में शिव को सूर्य-बिंब में, दिगंबर रूप में देखा था -

श्लोक 95 (skanda.7.381.95)

पद्मासनस्थितः सौम्यस्तथा तं तत्र संस्मरन् । प्रतिष्ठाप्य महामूर्त्तिं पूजयामास वासरम्

padmāsanasthitaḥ saumyastathā taṁ tatra saṁsmaran | pratiṣṭhāpya mahāmūrttiṁ pūjayāmāsa vāsaram

पद्मासन में स्थित, सौम्य - उसी रूप का स्मरण करते हुए, वहाँ एक महामूर्ति स्थापित कर उसने एक दिन उसकी पूजा की।

श्लोक 96 (skanda.7.381.96)

मनोऽभीष्टार्थसिद्ध्यर्थं ततः सिद्धिमवाप्तवान् । नेमिनाथशिवेत्येवं नाम चक्रे स वामनः

mano'bhīṣṭārthasiddhyarthaṁ tataḥ siddhimavāptavān | nemināthaśivetyevaṁ nāma cakre sa vāmanaḥ

मन-वांछित अर्थ की सिद्धि के लिए उसे तब सिद्धि प्राप्त हुई; वामन ने उसका नाम 'नेमिनाथ-शिव' रखा।

श्लोक 97 (skanda.7.381.97)

भवस्य पश्चिमे भागे प्रत्यासन्ने धरातले । वामनो वसतिं चक्रे तीर्थे वस्त्रापथे तदा

bhavasya paścime bhāge pratyāsanne dharātale | vāmano vasatiṁ cakre tīrthe vastrāpathe tadā

भव के पश्चिम भाग में, निकटवर्ती भूमि पर, वामन ने तब वस्त्रापथ तीर्थ में अपना निवास बनाया।

श्लोक 98 (skanda.7.381.98)

अतो यवाधिकं प्रोक्तं तीर्थं देवैः सवासवैः । इंद्रेण कुर्वता देवं समागत्य भवाग्रतः

ato yavādhikaṁ proktaṁ tīrthaṁ devaiḥ savāsavaiḥ | iṁdreṇa kurvatā devaṁ samāgatya bhavāgrataḥ

इसीलिए वासव सहित देवताओं द्वारा इस तीर्थ को यव-मात्र अधिक कहा गया - इन्द्र द्वारा वहाँ आकर भव के सम्मुख देव-स्थापना करने से।

श्लोक 99 (skanda.7.381.99)

यवाधिकं प्रभासात्तु तीर्थमेतद्भवाज्ञया । अन्येषां षड्गुणं तीर्थं भविष्यति शिवाज्ञया

yavādhikaṁ prabhāsāttu tīrthametadbhavājñayā | anyeṣāṁ ṣaḍguṇaṁ tīrthaṁ bhaviṣyati śivājñayā

भव की आज्ञा से यह तीर्थ प्रभास से यव-मात्र अधिक है, और शिव की आज्ञा से यह अन्य तीर्थों से छह गुना अधिक होगा।

श्लोक 100 (skanda.7.381.100)

इत्येतत्कथितं सर्वं किमन्यत्परिपृच्छसि

ityetatkathitaṁ sarvaṁ kimanyatparipṛcchasi

इस प्रकार यह सब कह दिया गया; और क्या पूछते हो?

श्लोक 101 (skanda.7.381.101)

राजोवाच शिवरात्रिप्रभावोयमतुलः परिकीर्त्तितः । अजानता कृता तेन लुब्धकेन पुरा श्रुतम्

rājovāca śivarātriprabhāvoyamatulaḥ parikīrttitaḥ | ajānatā kṛtā tena lubdhakena purā śrutam

राजा ने कहा - शिवरात्रि की यह अतुलनीय महिमा कही गई। यह भी सुना कि उस लुब्धक ने अनजाने में ही यह किया था।

श्लोक 102 (skanda.7.381.102)

इदानीं वद कर्त्तव्या कथमन्यैर्जनैर्विभो । किं ग्राह्यं किं नु मोक्तव्यं शिवरात्र्यां वदस्व मे

idānīṁ vada karttavyā kathamanyairjanairvibho | kiṁ grāhyaṁ kiṁ nu moktavyaṁ śivarātryāṁ vadasva me

अब बताइए, अन्य लोगों को इसे कैसे करना चाहिए, हे प्रभो। शिवरात्रि में क्या ग्रहण करना चाहिए, क्या त्यागना चाहिए, यह मुझे बताइए।

श्लोक 103 (skanda.7.381.103)

सारस्वत उवाच संप्राप्य मानुषं जन्म ज्ञात्वा देवं महेश्वरम् । शिवरात्रिः सदा कार्या भुक्तिमुक्तिप्रदायिनी

sārasvata uvāca saṁprāpya mānuṣaṁ janma jñātvā devaṁ maheśvaram | śivarātriḥ sadā kāryā bhuktimuktipradāyinī

सारस्वत ने कहा - मानव जन्म पाकर और महेश्वर देव को जानकर, भोग-मोक्ष देने वाला शिवरात्रि-व्रत सदा करना चाहिए।

श्लोक 104 (skanda.7.381.104)

ईदृशं जायते पुण्यमेकया कृतया नृप । ये कुर्वंति सदा मर्त्त्यास्तेषां पुण्यमनंतकम्

īdṛśaṁ jāyate puṇyamekayā kṛtayā nṛpa | ye kurvaṁti sadā marttyāsteṣāṁ puṇyamanaṁtakam

एक बार करने से ही ऐसा पुण्य उत्पन्न होता है, हे राजन्; जो मनुष्य इसे सदा करते हैं, उनका पुण्य अनंत होता है।

श्लोक 105 (skanda.7.381.105)

द्वादशाब्दं व्रतमिदं कर्त्तव्यं प्रतिवत्सरम् । जीवितं चंचलं नृणां यदि कर्तुं न शक्यते

dvādaśābdaṁ vratamidaṁ karttavyaṁ prativatsaram | jīvitaṁ caṁcalaṁ nṛṇāṁ yadi kartuṁ na śakyate

यह व्रत प्रतिवर्ष बारह वर्षों तक करना चाहिए। परन्तु मनुष्यों का जीवन चंचल है, यदि ऐसा करना संभव न हो -

श्लोक 106 (skanda.7.381.106)

तदा द्वादशभिर्मासैर्व्रत मेतत्समाप्यते । माघमासे चतुर्दश्यां प्रारम्भः क्रियते नृप

tadā dvādaśabhirmāsairvrata metatsamāpyate | māghamāse caturdaśyāṁ prārambhaḥ kriyate nṛpa

तो बारह मासों में ही यह व्रत पूर्ण किया जा सकता है। हे राजन्, माघ मास की चतुर्दशी को इसका आरंभ किया जाता है।

श्लोक 107 (skanda.7.381.107)

प्रतिमासं ततः कार्यं पौषांते तु समाप्यते । विघ्नश्चेज्जायते मध्ये कथं चिद्दैवयोगतः

pratimāsaṁ tataḥ kāryaṁ pauṣāṁte tu samāpyate | vighnaścejjāyate madhye kathaṁ ciddaivayogataḥ

फिर प्रति मास यह करना चाहिए, पौष के अंत में यह पूर्ण होता है। यदि बीच में किसी दैव-योग से कोई विघ्न आ जाए -

श्लोक 108 (skanda.7.381.108)

न भवेद्व्रतभंगस्तु पुनः कार्यमनन्तरम् । द्वादशैव प्रकर्तव्याः कृत्वा संख्या विशेषतः

na bhavedvratabhaṁgastu punaḥ kāryamanantaram | dvādaśaiva prakartavyāḥ kṛtvā saṁkhyā viśeṣataḥ

तो व्रत भंग नहीं होता, बल्कि तुरंत बाद फिर से करना चाहिए। केवल बारह ही करने चाहिए, विशेष रूप से संख्या गिनकर।

श्लोक 109 (skanda.7.381.109)

कृतं न नश्यते लोके शुभं वा यदि वाऽशुभम् । कृष्णायां तु चतुर्दश्यां कृतपूर्वाह्निकक्रियः

kṛtaṁ na naśyate loke śubhaṁ vā yadi vā'śubham | kṛṣṇāyāṁ tu caturdaśyāṁ kṛtapūrvāhnikakriyaḥ

संसार में किया हुआ शुभ या अशुभ कभी नष्ट नहीं होता। कृष्ण चतुर्दशी को पूर्वाह्न की क्रियाएँ करके,

श्लोक 110 (skanda.7.381.110)

उपवासनियमो ग्राह्यो नद्यां स्नानं विधीयते । तदभावे तडागादौ कार्यं स्नानं स्वशक्तितः

upavāsaniyamo grāhyo nadyāṁ snānaṁ vidhīyate | tadabhāve taḍāgādau kāryaṁ snānaṁ svaśaktitaḥ

उपवास का नियम ग्रहण करना चाहिए, नदी में स्नान विहित है; उसके अभाव में तालाब आदि में अपनी शक्ति के अनुसार स्नान करना चाहिए।

श्लोक 111 (skanda.7.381.111)

तैलाभ्यंगो न कर्त्तव्यो न कार्यं गमनं क्वचित् । तीर्थसेवा प्रकर्त्तव्या तस्मिंश्चागमनं शुभम्

tailābhyaṁgo na karttavyo na kāryaṁ gamanaṁ kvacit | tīrthasevā prakarttavyā tasmiṁścāgamanaṁ śubham

तेल का अभ्यंग नहीं करना चाहिए, कहीं यात्रा नहीं करनी चाहिए; तीर्थ-सेवा करनी चाहिए, और वहाँ आना शुभ है।

श्लोक 112 (skanda.7.381.112)

शिवरात्रिः सदा कार्या लिंगे स्वायंभुवे नरैः । तदभावे महापुण्ये लिंगे वर्षशताधिके

śivarātriḥ sadā kāryā liṁge svāyaṁbhuve naraiḥ | tadabhāve mahāpuṇye liṁge varṣaśatādhike

मनुष्यों को शिवरात्रि सदा स्वयंभू लिंग में करनी चाहिए; उसके अभाव में, महापुण्य वाले सौ वर्ष से अधिक पुराने लिंग में,

श्लोक 113 (skanda.7.381.113)

गिरौ वने समुद्रांते नद्यां यच्च शिवालये । तद्वै स्वायंभुवं लिंगं स्वयं तत्रैव संस्थितम्

girau vane samudrāṁte nadyāṁ yacca śivālaye | tadvai svāyaṁbhuvaṁ liṁgaṁ svayaṁ tatraiva saṁsthitam

पर्वत में, वन में, समुद्र-तट पर, नदी में, या शिवालय में - वह स्वयंभू लिंग वहीं स्वयं स्थित होता है।

श्लोक 114 (skanda.7.381.114)

वालुलिंगादिकं लिंगं पूजितं फलदं स्मृतम् । दिवा संपूज्य यत्नेन पुष्पधूपादिना नरः

vāluliṁgādikaṁ liṁgaṁ pūjitaṁ phaladaṁ smṛtam | divā saṁpūjya yatnena puṣpadhūpādinā naraḥ

बालू आदि से बना लिंग भी, पूजित होने पर फलदायी माना गया है। दिन में यत्नपूर्वक पुष्प-धूप आदि से पूजा कर मनुष्य को -

श्लोक 115 (skanda.7.381.115)

वर्जयेन्मदिरां द्यूतं नारीं नखनिकृन्तनम् । ब्रह्मचर्यपरैः शांतैः कर्त्तव्यं समुपोषणम्

varjayenmadirāṁ dyūtaṁ nārīṁ nakhanikṛntanam | brahmacaryaparaiḥ śāṁtaiḥ karttavyaṁ samupoṣaṇam

मदिरा, जुआ, स्त्री-संग और नख काटने से बचना चाहिए। ब्रह्मचर्य और शांति में लीन रहकर पूर्ण उपवास करना चाहिए।

श्लोक 116 (skanda.7.381.116)

रात्रौ देवाग्रतो गत्वा कर्त्तव्याः सप्त पर्वताः । पक्वान्नफलतांबूलपुष्पधूपादिचर्चिताः

rātrau devāgrato gatvā karttavyāḥ sapta parvatāḥ | pakvānnaphalatāṁbūlapuṣpadhūpādicarcitāḥ

रात्रि में देव के सम्मुख जाकर सात पर्वत बनाने चाहिए, जो पके अन्न, फल, तांबूल, पुष्प और धूप आदि से सजाए हों।

श्लोक 117 (skanda.7.381.117)

घृतेन दीपः कर्त्तव्यः पापनाशनहेतवे । यतो दीपस्य माहात्म्यं विज्ञेयं मुक्तिदायकम्

ghṛtena dīpaḥ karttavyaḥ pāpanāśanahetave | yato dīpasya māhātmyaṁ vijñeyaṁ muktidāyakam

पाप के नाश हेतु घृत से दीप जलाना चाहिए; क्योंकि दीप की महिमा मुक्ति देने वाली जाननी चाहिए।

श्लोक 118 (skanda.7.381.118)

दीपः सदैव कर्त्तव्यो गृहे देवालये नरैः । दिवा निशि च संध्यायां दीपः कार्यः स्वशक्तितः

dīpaḥ sadaiva karttavyo gṛhe devālaye naraiḥ | divā niśi ca saṁdhyāyāṁ dīpaḥ kāryaḥ svaśaktitaḥ

मनुष्यों को घर में और देवालय में सदा दीप रखना चाहिए; दिन में, रात्रि में और संध्या में अपनी शक्ति के अनुसार दीप जलाना चाहिए।

श्लोक 119 (skanda.7.381.119)

किञ्चिदुद्द्योतमात्रेण देवास्तुष्यंति भूतले । पितॄणां प्रथमं दीपः कर्त्तव्यः श्राद्धकर्मणि

kiñciduddyotamātreṇa devāstuṣyaṁti bhūtale | pitṝṇāṁ prathamaṁ dīpaḥ karttavyaḥ śrāddhakarmaṇi

थोड़े से प्रकाश मात्र से ही देवता पृथ्वी पर प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध-कर्म में सर्वप्रथम पितरों के लिए दीप जलाना चाहिए।

श्लोक 120 (skanda.7.381.120)

रात्रौ जागरणं कार्यं यथा निद्रा न जा यते । शिवरात्रिप्रभावोऽयं श्रोतव्यः शिवसंनिधौ

rātrau jāgaraṇaṁ kāryaṁ yathā nidrā na jā yate | śivarātriprabhāvo'yaṁ śrotavyaḥ śivasaṁnidhau

रात्रि में इस प्रकार जागरण करना चाहिए कि नींद न आए। शिव की उपस्थिति में यह शिवरात्रि-प्रभाव सुनना चाहिए।

श्लोक 121 (skanda.7.381.121)

शिवस्य चरितं रात्रौ श्रोतव्यं बहुविस्तरम् । गीतं नृत्यं तथा वाद्यं कर्तव्यं शिवसंनिधौ

śivasya caritaṁ rātrau śrotavyaṁ bahuvistaram | gītaṁ nṛtyaṁ tathā vādyaṁ kartavyaṁ śivasaṁnidhau

रात्रि में शिव का चरित विस्तार से सुनना चाहिए; शिव के समक्ष गीत, नृत्य और वाद्य भी करने चाहिए।

श्लोक 122 (skanda.7.381.122)

एवं सा नीयते रात्रिर्मुख्यं जागरणं यतः । रात्रौ देयानि दानानि शक्त्या वै तत्र जागरे

evaṁ sā nīyate rātrirmukhyaṁ jāgaraṇaṁ yataḥ | rātrau deyāni dānāni śaktyā vai tatra jāgare

इस प्रकार वह रात्रि बिताई जाती है, क्योंकि जागरण ही मुख्य है। उस जागरण में रात्रि में अपनी शक्ति के अनुसार दान देने चाहिए।

श्लोक 123 (skanda.7.381.123)

पुनः स्नात्वा प्रभाते तु कर्त्तव्यं शिवपूजनम् । पूजनीयाश्च यतयो भोजनाच्छादनादिभिः

punaḥ snātvā prabhāte tu karttavyaṁ śivapūjanam | pūjanīyāśca yatayo bhojanācchādanādibhiḥ

प्रातः पुनः स्नान कर शिव-पूजन करना चाहिए; संन्यासियों की भोजन-वस्त्र आदि से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 124 (skanda.7.381.124)

तपस्विनां प्रदातव्यं भोजनं गृहमेधिभिः । द्वादशाष्टौ च चत्वारो भोक्तव्या एक एव वा

tapasvināṁ pradātavyaṁ bhojanaṁ gṛhamedhibhiḥ | dvādaśāṣṭau ca catvāro bhoktavyā eka eva vā

गृहस्थों द्वारा तपस्वियों को भोजन कराना चाहिए - बारह, आठ, चार, या केवल एक को ही भोजन कराना चाहिए।

श्लोक 125 (skanda.7.381.125)

एकोऽपि ब्रह्मचारी यो ब्रह्मविच्छिवपूजकः । सहस्राणां समो भक्त्या गृहे संभोजितो भवेत्

eko'pi brahmacārī yo brahmavicchivapūjakaḥ | sahasrāṇāṁ samo bhaktyā gṛhe saṁbhojito bhavet

एक भी ब्रह्मचारी, जो ब्रह्मज्ञानी और शिव-पूजक हो, यदि भक्तिपूर्वक घर में भोजन कराया जाए, तो वह हजारों के समान है।

श्लोक 126 (skanda.7.381.126)

अक्षारालवणं पत्रे भोक्तव्यं वाग्यतैः स्वयम् । पुत्रमित्रकलत्राणां दातव्यं भोजनं पुरः

akṣārālavaṇaṁ patre bhoktavyaṁ vāgyataiḥ svayam | putramitrakalatrāṇāṁ dātavyaṁ bhojanaṁ puraḥ

स्वयं क्षार-लवण रहित भोजन पत्ते पर मौन रहकर करना चाहिए; पहले पुत्र, मित्र और पत्नी को भोजन देना चाहिए।

श्लोक 127 (skanda.7.381.127)

अनेन विधिना कार्या शिवरात्रिः शिवव्रतैः । द्वादशैता यदा पूर्णास्तिलपात्राणि वै तदा

anena vidhinā kāryā śivarātriḥ śivavrataiḥ | dvādaśaitā yadā pūrṇāstilapātrāṇi vai tadā

इस विधि से शिव-व्रतियों को शिवरात्रि करनी चाहिए। जब ये बारह पूर्ण हो जाएँ, तब तिल से भरे पात्र -

श्लोक 128 (skanda.7.381.128)

द्वादशैव प्रदेयानिगुरुब्राह्मणज्ञातिषु । व्रतांते गौः प्रदातव्या कृष्णा वत्सयुता दृढा

dvādaśaiva pradeyānigurubrāhmaṇajñātiṣu | vratāṁte gauḥ pradātavyā kṛṣṇā vatsayutā dṛḍhā

बारह ही गुरु, ब्राह्मण और ज्ञातिजनों को देने चाहिए। व्रत के अंत में एक बछड़े सहित दृढ़ काली गाय देनी चाहिए,

श्लोक 129 (skanda.7.381.129)

सवस्त्राभरणा देया घंटाभरणभूषिता । अंगुलीयकवासांसि च्छत्रोपानत्कमण्डलु

savastrābharaṇā deyā ghaṁṭābharaṇabhūṣitā | aṁgulīyakavāsāṁsi cchatropānatkamaṇḍalu

वस्त्र और आभूषणों सहित, घंटी और आभूषणों से सुसज्जित; अंगूठी, वस्त्र, छाता, जूते और कमण्डलु -

श्लोक 130 (skanda.7.381.130)

गुरवे दक्षिणा देयाब्राह्मणेभ्यः स्वशक्तितः । एवं कृत्वा ततो देयं तपस्विभ्योऽथ भोजनम् । मिष्टान्नं विविधं दत्त्वा क्षमाप्य च विसर्जयेत्

gurave dakṣiṇā deyābrāhmaṇebhyaḥ svaśaktitaḥ | evaṁ kṛtvā tato deyaṁ tapasvibhyo'tha bhojanam | miṣṭānnaṁ vividhaṁ dattvā kṣamāpya ca visarjayet

गुरु को दक्षिणा और ब्राह्मणों को अपनी शक्ति के अनुसार देनी चाहिए। ऐसा करके तपस्वियों को भोजन देना चाहिए। विविध मिष्टान्न देकर क्षमा माँगकर विदा करना चाहिए।

श्लोक 131 (skanda.7.381.131)

एवं यः कुरुते सत्यं तस्य पापं न विद्यते । संतानमुत्तमं लब्ध्वा भुक्त्वा भोगाननुत्तमान्

evaṁ yaḥ kurute satyaṁ tasya pāpaṁ na vidyate | saṁtānamuttamaṁ labdhvā bhuktvā bhogānanuttamān

जो सत्यनिष्ठा से ऐसा करता है, उसके लिए पाप शेष नहीं रहता। उत्तम संतान पाकर, अनुपम भोगों को भोगकर,

श्लोक 132 (skanda.7.381.132)

दिव्यविमानमारूढो दिव्यस्त्रीपरिवेष्टितः । गतिवादित्रनिर्घोषैर्नीयते शिवमन्दिरे

divyavimānamārūḍho divyastrīpariveṣṭitaḥ | gativāditranirghoṣairnīyate śivamandire

दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, दिव्य स्त्रियों से घिरा हुआ, वाद्यों की गूँज के साथ वह शिव के मंदिर को ले जाया जाता है।

श्लोक 133 (skanda.7.381.133)

तदेतत्कथितं पुण्यं शिवरात्रिव्रतं मया । कृतेन येन लोकानां सर्वपापक्षयो भवेत्

tadetatkathitaṁ puṇyaṁ śivarātrivrataṁ mayā | kṛtena yena lokānāṁ sarvapāpakṣayo bhavet

इस प्रकार मैंने यह पुण्यमय शिवरात्रि-व्रत कहा, जिसे करने से लोकों के समस्त पापों का नाश होता है।

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