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प्रभास खण्ड · अध्याय 382

बलियज्ञप्रभाववर्णनम्

अध्याय 381अध्याय-सूचीअध्याय 383

श्लोक 1 (skanda.7.382.1)

राजोवाच विचित्रमिदमाख्यानं त्वत्प्रसादाच्छ्रुतं मया । दृष्ट्वा नारायणं शक्रं नारदो मंदरे गिरौ

rājovāca vicitramidamākhyānaṁ tvatprasādācchrutaṁ mayā | dṛṣṭvā nārāyaṇaṁ śakraṁ nārado maṁdare girau

राजा ने कहा - आपकी कृपा से मैंने यह विचित्र आख्यान सुना - नारद ने मन्दराचल पर्वत पर नारायण और इन्द्र को देखा -

श्लोक 2 (skanda.7.382.2)

किं चकार मुनींद्रोऽथ तन्मे विस्तरतो मुने । वद संसारसरणोद्भूतमायाप्रपीडितम् । कथामृतजलौघेन वितृषं कुरु मां प्रभो

kiṁ cakāra munīṁdro'tha tanme vistarato mune | vada saṁsārasaraṇodbhūtamāyāprapīḍitam | kathāmṛtajalaughena vitṛṣaṁ kuru māṁ prabho

फिर मुनीन्द्र ने क्या किया? हे मुने, वह मुझे विस्तार से बताइए। संसार-मार्ग से उत्पन्न माया से पीड़ित मुझे, हे प्रभो, कथामृत की जलधारा से तृप्त कीजिए।

श्लोक 3 (skanda.7.382.3)

सारस्वत उवाच अथासौ नारदो देवं ज्ञात्वा शप्तं द्विजन्मना । भृगुणा च तथा पूर्वं नान्यथैतद्भविष्यति

sārasvata uvāca athāsau nārado devaṁ jñātvā śaptaṁ dvijanmanā | bhṛguṇā ca tathā pūrvaṁ nānyathaitadbhaviṣyati

सारस्वत ने कहा - तब नारद ने जान लिया कि देव को द्विजन्मा (द्विज) भृगु ने पहले ही शाप दिया था, और यह अन्यथा नहीं होगा -

श्लोक 4 (skanda.7.382.4)

भविष्यं यद्भवं देव वर्तमानं विचिंत्यताम् । अयं च वामनो भूत्वा विष्णुर्यास्यति तां पुरीम्

bhaviṣyaṁ yadbhavaṁ deva vartamānaṁ viciṁtyatām | ayaṁ ca vāmano bhūtvā viṣṇuryāsyati tāṁ purīm

जो भविष्य में होने वाला है, हे देव, उसी को वर्तमान समझिए। यह वामन बनकर विष्णु उस नगरी को जाएँगे,

श्लोक 5 (skanda.7.382.5)

निग्रहं स बलेः पश्चात्करिष्यति मम प्रियम् । युद्धं विना कथं स्थेयं वर्तमानं महोल्बणम्

nigrahaṁ sa baleḥ paścātkariṣyati mama priyam | yuddhaṁ vinā kathaṁ stheyaṁ vartamānaṁ maholbaṇam

और उसके बाद बलि का निग्रह करेंगे, यह मुझे प्रिय है। परन्तु युद्ध के बिना यह विशाल वर्तमान स्थिति कैसे टिकेगी?

श्लोक 6 (skanda.7.382.6)

देवदानवयुद्धानि दैत्यगन्धर्व रक्षसाम् । निवारितानि सर्वाणि सरीसृपपतत्रिणाम्

devadānavayuddhāni daityagandharva rakṣasām | nivāritāni sarvāṇi sarīsṛpapatatriṇām

देवों और दानवों के युद्ध, दैत्यों, गन्धर्वों और राक्षसों के, यहाँ तक कि सरीसृपों और पक्षियों के भी युद्ध सब रुक गए हैं -

श्लोक 7 (skanda.7.382.7)

सापत्नजः कलिर्नास्ति मम भाग्यपरिक्षये । देवेन्द्रो गुरुणा पूर्वं वारितः किं करोम्यहम्

sāpatnajaḥ kalirnāsti mama bhāgyaparikṣaye | devendro guruṇā pūrvaṁ vāritaḥ kiṁ karomyaham

मेरे भाग्य के क्षय में कोई शत्रुता से उत्पन्न कलह नहीं है। देवेन्द्र को पहले ही गुरु ने रोक दिया - मैं क्या करूँ?

श्लोक 8 (skanda.7.382.8)

माननीयो गुरुर्मेऽयमतस्तं न शपाम्यहम् । युद्धार्थं तु ततो यत्नो न सिध्यति करोमि किम्

mānanīyo gururme'yamatastaṁ na śapāmyaham | yuddhārthaṁ tu tato yatno na sidhyati karomi kim

मेरे लिए यह गुरु माननीय है, अतः मैं उसे शाप नहीं दूँगा। युद्ध के लिए किया गया प्रयत्न सिद्ध नहीं होता - मैं क्या करूँ?

श्लोक 9 (skanda.7.382.9)

केनापि दैवयोगेन पुरुषार्थो न सिध्यति । तथापि यत्नः कर्तव्यः पुरुषार्थे विपश्चिता । दैवं पुरुषकारेण विनापि फलति क्वचित्

kenāpi daivayogena puruṣārtho na sidhyati | tathāpi yatnaḥ kartavyaḥ puruṣārthe vipaścitā | daivaṁ puruṣakāreṇa vināpi phalati kvacit

किसी दैव-योग से पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता, फिर भी बुद्धिमान को पुरुषार्थ में प्रयत्न करना चाहिए; दैव भी कभी-कभी बिना पुरुषकार के फल दे देता है।

श्लोक 10 (skanda.7.382.10)

यदुक्तं तद्वचो व्यर्थं यतः सिद्धिः प्रयत्नतः । बलिं गत्वा भणिष्यामि यथा युद्धं करिष्यति

yaduktaṁ tadvaco vyarthaṁ yataḥ siddhiḥ prayatnataḥ | baliṁ gatvā bhaṇiṣyāmi yathā yuddhaṁ kariṣyati

जो कहा गया वह व्यर्थ है, क्योंकि सिद्धि तो प्रयत्न से ही होती है। मैं बलि के पास जाकर ऐसा कहूँगा कि वह युद्ध करे।

श्लोक 11 (skanda.7.382.11)

न श्रोष्यति स चेद्वाक्यं निश्चितं तं शपाम्यहम् । इत्युक्त्वा स ययौ वेगान्नारदो बलिमंदिरे । निमेषांतरमात्रेण शिष्याभ्यां गगने स्थितः

na śroṣyati sa cedvākyaṁ niścitaṁ taṁ śapāmyaham | ityuktvā sa yayau vegānnārado balimaṁdire | nimeṣāṁtaramātreṇa śiṣyābhyāṁ gagane sthitaḥ

यदि वह मेरा वचन नहीं सुनेगा, तो निश्चय ही मैं उसे शाप दूँगा। ऐसा कहकर नारद वेग से बलि के भवन गए; क्षणभर में ही वे दोनों शिष्यों सहित आकाश में स्थित हो गए,

श्लोक 12 (skanda.7.382.12)

प्रासादे शैलसंकाशे सप्तभौमे महोज्ज्वले । तस्योपरि सभा दिव्या निर्मिता विश्वकर्मणा

prāsāde śailasaṁkāśe saptabhaume mahojjvale | tasyopari sabhā divyā nirmitā viśvakarmaṇā

पर्वत के समान सात-मंजिला अत्यंत तेजस्वी भवन के ऊपर, जहाँ विश्वकर्मा द्वारा निर्मित एक दिव्य सभा थी।

श्लोक 13 (skanda.7.382.13)

तस्यां सिंहासनं दिव्यं तत्रासीनो बलिर्नृप । दैत्यैः परिवृतः सर्वैः प्रौढिहास्यकथापरैः

tasyāṁ siṁhāsanaṁ divyaṁ tatrāsīno balirnṛpa | daityaiḥ parivṛtaḥ sarvaiḥ prauḍhihāsyakathāparaiḥ

उसमें एक दिव्य सिंहासन था, जिस पर हे राजन्, बलि विराजमान थे, गम्भीर हास्य-कथाओं में लीन सभी दैत्यों से घिरे हुए,

श्लोक 14 (skanda.7.382.14)

ऋषिभिर्ब्राह्मणैः शांतैस्त थैवोशनसा स्वयम् । पुत्रमित्रकलत्रैश्च संवृतो दिव्यमन्दिरे

ṛṣibhirbrāhmaṇaiḥ śāṁtaista thaivośanasā svayam | putramitrakalatraiśca saṁvṛto divyamandire

शांत ऋषियों और ब्राह्मणों से, तथा स्वयं शुक्राचार्य से, पुत्र-मित्र-पत्नी सहित उस दिव्य भवन में घिरे हुए।

श्लोक 15 (skanda.7.382.15)

देवांगनाकरग्राहगृहीतैर्दिव्यचामरैः । संवीज्यमानो दैत्येन्द्रः स्तूयमानः स चारणैः

devāṁganākaragrāhagṛhītairdivyacāmaraiḥ | saṁvījyamāno daityendraḥ stūyamānaḥ sa cāraṇaiḥ

देवांगनाओं के हाथों से थामे गए दिव्य चामरों से पंखा झला जाता हुआ वह दैत्येन्द्र, चारणों द्वारा स्तुत होता हुआ,

श्लोक 16 (skanda.7.382.16)

यावदास्ते मदोन्मत्ता मन्त्रयंति परस्परम् । दैत्यदानवमुख्या ये ते सर्वे युद्धकांक्षिणः

yāvadāste madonmattā mantrayaṁti parasparam | daityadānavamukhyā ye te sarve yuddhakāṁkṣiṇaḥ

जब तक वे मद-मत्त होकर परस्पर मंत्रणा करते रहे - जो सभी दैत्य-दानवों के मुखिया थे, सब युद्ध की कामना वाले -

श्लोक 17 (skanda.7.382.17)

उत्थायोत्थाय भाषंते प्रगल्भंते सुरैः सह । अस्मदीयमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सांप्रतं गतम्

utthāyotthāya bhāṣaṁte pragalbhaṁte suraiḥ saha | asmadīyamidaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sāṁprataṁ gatam

बार-बार उठकर वे देवताओं के साथ दुस्साहसपूर्वक बोलते थे - यह सम्पूर्ण त्रैलोक्य अब हमारा ही हो गया है।

श्लोक 18 (skanda.7.382.18)

शुक्रबुद्ध्या विना युद्धं प्राप्स्यते किं महोदयः । दैत्येन्द्रो देवराजेन स्नेहं च कुरुतो यदि

śukrabuddhyā vinā yuddhaṁ prāpsyate kiṁ mahodayaḥ | daityendro devarājena snehaṁ ca kuruto yadi

शुक्र की बुद्धि के बिना क्या हमें युद्ध का महान उदय प्राप्त होगा? यदि दैत्येन्द्र देवराज से स्नेह ही रखते हैं -

श्लोक 19 (skanda.7.382.19)

ऐरावणं सदा मत्तं कथं नो याचते बलिः । चतुरं तुरगं कस्मान्नार्पयति दिवाकरः

airāvaṇaṁ sadā mattaṁ kathaṁ no yācate baliḥ | caturaṁ turagaṁ kasmānnārpayati divākaraḥ

तो सदा मत्त रहने वाले ऐरावत को बलि क्यों नहीं माँगते? सूर्य चतुर घोड़ा उन्हें क्यों नहीं अर्पित करते?

श्लोक 20 (skanda.7.382.20)

यावन्नाक्रम्यते लुब्धो धनाध्यक्षो रणाजिरे । तावन्नार्पयते वित्तं यदा तत्संचितं सुरैः

yāvannākramyate lubdho dhanādhyakṣo raṇājire | tāvannārpayate vittaṁ yadā tatsaṁcitaṁ suraiḥ

जब तक लोभी कुबेर को रणभूमि में आक्रांत नहीं किया जाता, तब तक वह अपना संचित धन क्यों देवताओं को अर्पित करेगा?

श्लोक 21 (skanda.7.382.21)

न दर्शयति रत्नानि जलराशी रसातलात् । यावन्न मन्दरं क्षिप्त्वा विमथ्नीमो वयं च तम्

na darśayati ratnāni jalarāśī rasātalāt | yāvanna mandaraṁ kṣiptvā vimathnīmo vayaṁ ca tam

जब तक हम मंदराचल को फेंककर समुद्र को नहीं मथेंगे, तब तक जल-राशि रसातल से रत्न क्यों दिखाएगी?

श्लोक 22 (skanda.7.382.22)

यथामृतकलाश्चन्द्राद्भुज्यन्ते क्रमशः सुरैः । एवं भागं बलेः कस्मान्न ददाति जलात्मकः

yathāmṛtakalāścandrādbhujyante kramaśaḥ suraiḥ | evaṁ bhāgaṁ baleḥ kasmānna dadāti jalātmakaḥ

जैसे चन्द्रमा की कलाएँ क्रमशः देवताओं द्वारा भोगी जाती हैं, वैसे ही जल-देव बलि का भाग क्यों नहीं देता?

श्लोक 23 (skanda.7.382.23)

स्वर्धुनी शीतलो वातः पद्मर्किजल्कवासितः । स्वर्गे वाति शनैर्यद्वत्तथा न बलिमंदिरे

svardhunī śītalo vātaḥ padmarkijalkavāsitaḥ | svarge vāti śanairyadvattathā na balimaṁdire

स्वर्ग की नदी का शीतल, कमल-सूर्यकिरण-सुगन्धित पवन जैसे स्वर्ग में धीरे-धीरे बहता है, वैसे बलि के भवन में क्यों नहीं?

श्लोक 24 (skanda.7.382.24)

इन्द्रचापोद्यता मेघा जलं मुंचंति भूतले । बलिखङ्गोद्धुताः स्वर्गं पुनस्ते यांति भूतलात्

indracāpodyatā meghā jalaṁ muṁcaṁti bhūtale | balikhaṅgoddhutāḥ svargaṁ punaste yāṁti bhūtalāt

इन्द्रधनुष उठाए मेघ पृथ्वी पर जल बरसाते हैं, फिर बलि की तलवार से भगाए जाकर वे पुनः पृथ्वी से स्वर्ग को चले जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.7.382.25)

अस्मदीये धरापृष्ठे यमो मारयते जनम् । नैवं स्वर्गे न पाताले पश्याहो कार्यकारणम्

asmadīye dharāpṛṣṭhe yamo mārayate janam | naivaṁ svarge na pātāle paśyāho kāryakāraṇam

हमारी इस पृथ्वी पर यम मनुष्यों को मारता है, स्वर्ग या पाताल में ऐसा नहीं - इसका कार्य-कारण देखो।

श्लोक 26 (skanda.7.382.26)

आयुर्वृत्तिं सुतान्सौख्यमस्माकं लिखति स्वयम् । ललाटे चित्रगुप्तोऽसौ न देवानां तु तत्समम्

āyurvṛttiṁ sutānsaukhyamasmākaṁ likhati svayam | lalāṭe citragupto'sau na devānāṁ tu tatsamam

हमारी आयु, वृत्ति और पुत्र-सुख को चित्रगुप्त ललाट पर स्वयं लिखता है, देवताओं के लिए वह वैसा नहीं करता।

श्लोक 27 (skanda.7.382.27)

वर्षाशीतातपाः काला वर्तंते भुवि सांप्रतम् । न स्वर्गे नैव पाताले भीता भूमौ भ्रमंति हि

varṣāśītātapāḥ kālā vartaṁte bhuvi sāṁpratam | na svarge naiva pātāle bhītā bhūmau bhramaṁti hi

वर्षा, शीत और आतप के काल अभी पृथ्वी पर ही होते हैं, न स्वर्ग में, न पाताल में - भयभीत होकर वे पृथ्वी पर ही भ्रमण करते हैं।

श्लोक 28 (skanda.7.382.28)

एकवीर्योद्भवा यूयं स्वस्रीया देवदानवाः । भूमौ स्थिता वयं कस्माद्देवाः केनोपरिकृताः ।

ekavīryodbhavā yūyaṁ svasrīyā devadānavāḥ | bhūmau sthitā vayaṁ kasmāddevāḥ kenoparikṛtāḥ |

तुम देव और दानव एक ही शक्ति से उत्पन्न, बहिन के पुत्र हो; हम पृथ्वी पर क्यों स्थित हैं, देवता किसके द्वारा ऊपर किए गए?

श्लोक 29 (skanda.7.382.29)

समुद्रे मथ्यमाने तु दैत्येन्द्रो वंचितः सुरैः । एकतः सर्वदेवाश्च बलिश्चैवैकतः स्थितः

samudre mathyamāne tu daityendro vaṁcitaḥ suraiḥ | ekataḥ sarvadevāśca baliścaivaikataḥ sthitaḥ

समुद्र-मंथन के समय दैत्येन्द्र देवताओं द्वारा छला गया था - एक ओर सभी देवता, और एक ओर बलि स्वयं खड़े थे।

श्लोक 30 (skanda.7.382.30)

उत्पन्नेषु च रत्नेषु भाग्यं वै यस्य यादृशम् । गजाश्वकल्पवृक्षाद्याश्चंद्रगोगणदंतिनः

utpanneṣu ca ratneṣu bhāgyaṁ vai yasya yādṛśam | gajāśvakalpavṛkṣādyāścaṁdragogaṇadaṁtinaḥ

रत्नों के उत्पन्न होने पर, जिसका जैसा भाग्य था वैसा ही मिला - गज, अश्व, कल्पवृक्ष आदि, चन्द्रमा, गौ-समूह, हाथी -

श्लोक 31 (skanda.7.382.31)

गृहीत्वा ह्यमृतं देवैर्वयं पाने नियोजिताः । एतया चूर्णिता यूयं न जानीथातिगर्विताः

gṛhītvā hyamṛtaṁ devairvayaṁ pāne niyojitāḥ | etayā cūrṇitā yūyaṁ na jānīthātigarvitāḥ

अमृत को ग्रहण कर देवताओं ने हमें पान में नियोजित किया, और फिर उसी से हमें चूर्ण कर दिया - तुम अत्यंत गर्वित होकर यह नहीं जानते!

श्लोक 32 (skanda.7.382.32)

पीतावशेषं पीयूषं सत्यलोके धृतं सुरैः । अहोतिकुटिला देवाः कस्माच्छेषं न दीयते

pītāvaśeṣaṁ pīyūṣaṁ satyaloke dhṛtaṁ suraiḥ | ahotikuṭilā devāḥ kasmāccheṣaṁ na dīyate

पीने के बाद बचे हुए अमृत को देवताओं ने सत्यलोक में रख लिया - अरे कुटिल देवताओं, शेष अमृत हमें क्यों नहीं दिया गया?

श्लोक 33 (skanda.7.382.33)

सुरामृतमिति ज्ञात्वा पीयूषाद्वंचिता वयम् । तिलतैलमेवमिष्टं यैर्न दृष्टं घृतं क्वचित्

surāmṛtamiti jñātvā pīyūṣādvaṁcitā vayam | tilatailamevamiṣṭaṁ yairna dṛṣṭaṁ ghṛtaṁ kvacit

'यह सुरा-अमृत है' ऐसा जानकर हम असली अमृत से वंचित कर दिए गए। हमें तो तिल का तेल भी प्रिय है, जिन्होंने कभी घृत भी नहीं देखा।

श्लोक 34 (skanda.7.382.34)

विष्णोर्वक्रचरित्राणां संख्या कर्तु न शक्यते । तथापि कथ्यते तुष्टैर्हृष्टैस्तैर्यदनुष्ठितम्

viṣṇorvakracaritrāṇāṁ saṁkhyā kartu na śakyate | tathāpi kathyate tuṣṭairhṛṣṭaistairyadanuṣṭhitam

विष्णु के कुटिल कार्यों की गणना नहीं की जा सकती; फिर भी प्रसन्न और हर्षित लोगों द्वारा जो उन्होंने किया, वह कहा जाता है -

श्लोक 35 (skanda.7.382.35)

गौरांगी सुन्दरी सुभ्रूः पीनोन्नतपयोधरा । सुकेशा चंद्रवदना कर्णासक्तविलोचना

gaurāṁgī sundarī subhrūḥ pīnonnatapayodharā | sukeśā caṁdravadanā karṇāsaktavilocanā

गौरवर्णा, सुंदर, सुंदर भौंहों वाली, पुष्ट-उन्नत वक्षस्थल वाली, सुंदर केशों वाली, चन्द्रमुखी, कानों तक फैले नेत्रों वाली,

श्लोक 36 (skanda.7.382.36)

वलित्रयांकिता मध्ये बाला मुष्ट्यापि गृह्यते । स्थलारविंदचरणा लतेव भुजभूषिता

valitrayāṁkitā madhye bālā muṣṭyāpi gṛhyate | sthalāraviṁdacaraṇā lateva bhujabhūṣitā

मध्य में तीन रेखाओं से अंकित, मुट्ठी में समाने योग्य कमर वाली, कमल-सी चरण वाली, लता के समान भुजाओं से सुशोभित -

श्लोक 37 (skanda.7.382.37)

सा सर्वाभरणोपेता सर्वलक्षणसंयुता । त्रैलोक्यमोहिनी देवी संजाताऽमृतमन्थने

sā sarvābharaṇopetā sarvalakṣaṇasaṁyutā | trailokyamohinī devī saṁjātā'mṛtamanthane

वह सर्व-आभूषणों से युक्त, सर्व-शुभ लक्षणों से संपन्न, त्रैलोक्य-मोहिनी देवी अमृत-मंथन से उत्पन्न हुई।

श्लोक 38 (skanda.7.382.38)

अमृतादुत्थिता पूर्वं यस्य सा तस्य तद्ध्रुवम् । त्रैलोक्यं वशगं तस्य यस्य सा चारुलोचना

amṛtādutthitā pūrvaṁ yasya sā tasya taddhruvam | trailokyaṁ vaśagaṁ tasya yasya sā cārulocanā

अमृत से पहले जो उत्पन्न हुआ था, वह निश्चय ही उसी का होगा - जिसकी वह सुनयना हो, उसी के वश में त्रैलोक्य होगा।

श्लोक 39 (skanda.7.382.39)

तया संमोहिताः सर्वे देवदानवराक्षसाः । विमुच्य मन्थनं सर्वे तां ग्रहीतुं समुद्यताः

tayā saṁmohitāḥ sarve devadānavarākṣasāḥ | vimucya manthanaṁ sarve tāṁ grahītuṁ samudyatāḥ

उससे मोहित होकर सभी देव, दानव और राक्षस मंथन छोड़कर उसे ग्रहण करने के लिए उद्यत हो गए।

श्लोक 40 (skanda.7.382.40)

एका स्त्री बहवो देवा दानवादैत्यराक्षसाः । विवादः सुमहाञ्जातः कथमत्र भविष्यति

ekā strī bahavo devā dānavādaityarākṣasāḥ | vivādaḥ sumahāñjātaḥ kathamatra bhaviṣyati

एक स्त्री और बहुत से देव, दानव, दैत्य और राक्षस - इतना बड़ा विवाद उत्पन्न हुआ कि यह कैसे सुलझेगा?

श्लोक 41 (skanda.7.382.41)

आगत्य विष्णुना सर्वे भुजे धृत्वा निवारिताः । अस्यार्थे किमहो वादः क्रियते भोः परस्परम्

āgatya viṣṇunā sarve bhuje dhṛtvā nivāritāḥ | asyārthe kimaho vādaḥ kriyate bhoḥ parasparam

तब विष्णु ने आकर उन सबको बाँह में पकड़कर रोक दिया - अरे, इसके लिए परस्पर यह वाद-विवाद क्यों किया जा रहा है?

श्लोक 42 (skanda.7.382.42)

अमृतार्थे समारम्भो महिलार्थे विनश्यति । संकेतं प्रथमं कृत्वा विष्णुना चुंबिता पुनः

amṛtārthe samārambho mahilārthe vinaśyati | saṁketaṁ prathamaṁ kṛtvā viṣṇunā cuṁbitā punaḥ

अमृत के लिए किया गया आरंभ एक स्त्री के लिए नष्ट हो रहा है। पहले एक संकेत तय करके, फिर विष्णु ने उसे चूम लिया,

श्लोक 43 (skanda.7.382.43)

दिव्यरूपधरः स्रग्वी वनमालाविभूषितः । कौस्तुभोद्द्योतिततनुः शंखचक्रगदाधरः

divyarūpadharaḥ sragvī vanamālāvibhūṣitaḥ | kaustubhoddyotitatanuḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

दिव्य रूप धारण किए, माला पहने, वनमाला से विभूषित, कौस्तुभ से दीप्त शरीर, शंख-चक्र-गदा धारण करते हुए -

श्लोक 44 (skanda.7.382.44)

तस्या हस्ते शुभां मालां दत्त्वा विष्णुः पुरः स्थितः । उद्धृत्य बाहुं सर्वेषां बभाषे वचनं हरिः

tasyā haste śubhāṁ mālāṁ dattvā viṣṇuḥ puraḥ sthitaḥ | uddhṛtya bāhuṁ sarveṣāṁ babhāṣe vacanaṁ hariḥ

उसके हाथ में शुभ माला देकर विष्णु सामने खड़े हुए, और सबकी बाँहें ऊपर उठाकर हरि ने यह वचन कहा -

श्लोक 45 (skanda.7.382.45)

कुर्वंतु कुण्डलं सर्वे तिष्ठन्तु स्वयमासने । विलोक्य स्वेच्छया लक्ष्मीर्वरमालां प्रयच्छतु

kurvaṁtu kuṇḍalaṁ sarve tiṣṭhantu svayamāsane | vilokya svecchayā lakṣmīrvaramālāṁ prayacchatu

सब लोग गोला बनाकर स्वयं अपने-अपने आसन पर बैठें; लक्ष्मी स्वेच्छा से देखकर श्रेष्ठ वर को माला अर्पित करें।

श्लोक 46 (skanda.7.382.46)

स्वयंवरविभेदं यः करिष्यत्यतिलंपटः । स वध्यः सहितैः सर्वैः परस्त्रीलुब्धको यथा

svayaṁvaravibhedaṁ yaḥ kariṣyatyatilaṁpaṭaḥ | sa vadhyaḥ sahitaiḥ sarvaiḥ parastrīlubdhako yathā

जो कोई अत्यंत लंपट होकर इस स्वयंवर में विघ्न डालेगा, वह उन सब सहित वध्य होगा, जैसे परस्त्री-लोभी होता है।

श्लोक 47 (skanda.7.382.47)

परदारकृतं पापं स्त्रीवध्या तस्य जायताम् । अन्योऽपि यः करोत्येवमेवमस्तु तदुच्यताम्

paradārakṛtaṁ pāpaṁ strīvadhyā tasya jāyatām | anyo'pi yaḥ karotyevamevamastu taducyatām

परस्त्री के प्रति किया गया पाप स्त्री-वध के तुल्य उसके लिए हो; और भी जो कोई ऐसा करे, उसके लिए भी वैसा ही हो - ऐसा कहा गया।

श्लोक 48 (skanda.7.382.48)

साधारणं हरिं ज्ञात्वा तथेत्युक्त्वा तथा कृतम् । देवदानवदैत्यानां गंधर्वोरगरक्षसाम् । मध्ये योऽभिमतो भर्ता स ते सत्यं भवेदिति

sādhāraṇaṁ hariṁ jñātvā tathetyuktvā tathā kṛtam | devadānavadaityānāṁ gaṁdharvoragarakṣasām | madhye yo'bhimato bhartā sa te satyaṁ bhavediti

हरि को सर्वसाधारण जानकर 'ऐसा ही हो' कहकर वैसा ही किया गया। देवों, दानवों, दैत्यों, गन्धर्वों, नागों और राक्षसों के मध्य जो उसे अभिमत पति लगे, वही सत्य होगा - ऐसा कहा गया।

श्लोक 49 (skanda.7.382.49)

तेनासौ मोहिता पूर्वं दृष्टिदानेन कर्षिता । आद्यं संमोहनं स्त्रीणां चक्रे दृष्टिनिरीक्षणम्

tenāsau mohitā pūrvaṁ dṛṣṭidānena karṣitā | ādyaṁ saṁmohanaṁ strīṇāṁ cakre dṛṣṭinirīkṣaṇam

इस प्रकार वह पहले मोहित हुई, दृष्टि-दान से आकर्षित होकर। स्त्रियों का प्रथम मोहन दृष्टि-अवलोकन ही है।

श्लोक 50 (skanda.7.382.50)

एवमेवेति तत्कर्णे हस्तं दत्त्वा यदुच्यते । दधाति हृदि यं नारी कामबाणप्रपीडिता

evameveti tatkarṇe hastaṁ dattvā yaducyate | dadhāti hṛdi yaṁ nārī kāmabāṇaprapīḍitā

'ऐसा ही हो' कहकर जब उसके कान में हाथ रखकर कुछ कहा जाता है, तो काम-बाण से पीड़ित स्त्री जिसे हृदय में धारण करती है -

श्लोक 51 (skanda.7.382.51)

तमेव वरयेदत्र कश्चिन्नास्त्येव संशयः । संजाते कलहे पूर्वं हरिणा तं निवर्तितुम्

tameva varayedatra kaścinnāstyeva saṁśayaḥ | saṁjāte kalahe pūrvaṁ hariṇā taṁ nivartitum

उसी को वहाँ वह वरण करती है, इसमें कोई संदेह नहीं। जब पहले कलह उत्पन्न हुआ था, तब हरि ने उसे [एक ओर] हटाने के लिए -

श्लोक 52 (skanda.7.382.52)

यदा गृहीता सर्वैः सा हरिं नैव विमुंचति । त्वमेव भर्ता साऽऽचष्टे मुंच मां व्रज दूरतः

yadā gṛhītā sarvaiḥ sā hariṁ naiva vimuṁcati | tvameva bhartā sā''caṣṭe muṁca māṁ vraja dūrataḥ

जब वह सबके द्वारा पकड़ी जाती है, तो वह हरि को कभी नहीं छोड़ती; वह कहती है - 'तुम ही मेरे पति हो, मुझे छोड़ो, दूर चले जाओ।'

श्लोक 53 (skanda.7.382.53)

मुक्त्वा दूरं ततो विष्णुः प्रविष्टः सुरमण्डले । तदा सर्वे च मामुक्त्वा यथास्थानं स्वयं गताः

muktvā dūraṁ tato viṣṇuḥ praviṣṭaḥ suramaṇḍale | tadā sarve ca māmuktvā yathāsthānaṁ svayaṁ gatāḥ

'विष्णु मुझे दूर ले जाकर देव-मंडल में प्रविष्ट हुए; तब सब मुझे छोड़कर अपने-अपने स्थान को स्वयं चले गए।'

श्लोक 54 (skanda.7.382.54)

आचष्ट विजया पूर्वं सर्वान्देवान्यथाक्रमम् । सा च निरीक्षते पश्चात्तं विचार्य विमुञ्चति

ācaṣṭa vijayā pūrvaṁ sarvāndevānyathākramam | sā ca nirīkṣate paścāttaṁ vicārya vimuñcati

विजया ने पहले उन्हें सभी देवताओं का क्रमशः परिचय दिया; वह प्रत्येक को देखती, विचार करती, और आगे बढ़ जाती।

श्लोक 55 (skanda.7.382.55)

उदासीनः शिवः शांतो गौरीकांतस्त्रिलोचनः । नान्यां निरीक्षते नित्यं ध्यानासक्तस्त्रिलोचनः

udāsīnaḥ śivaḥ śāṁto gaurīkāṁtastrilocanaḥ | nānyāṁ nirīkṣate nityaṁ dhyānāsaktastrilocanaḥ

'शिव उदासीन हैं, शांत हैं, गौरी के प्रिय हैं, त्रिनेत्र हैं; वे त्रिनेत्र सदा ध्यान में लीन रहकर किसी अन्य स्त्री को नहीं देखते।'

श्लोक 56 (skanda.7.382.56)

पितामहोयमित्युक्तं यदा सख्या तदा तया । नमस्कृत्य गतं दूरे कृत्वा मौनं न पश्यति

pitāmahoyamityuktaṁ yadā sakhyā tadā tayā | namaskṛtya gataṁ dūre kṛtvā maunaṁ na paśyati

जब सखी ने कहा - 'ये पितामह हैं' - तब उसने उन्हें नमस्कार कर दूर जाकर मौन धारण कर उन्हें फिर नहीं देखा।

श्लोक 57 (skanda.7.382.57)

आदित्यं पद्मकं मुञ्च दहनं दहनात्मकम् । वाति वातो गता दूरे वरुणो मे पिता यतः

ādityaṁ padmakaṁ muñca dahanaṁ dahanātmakam | vāti vāto gatā dūre varuṇo me pitā yataḥ

'सूर्य को छोड़ो, वे कमल को जलाने वाले, अग्नि-स्वभाव वाले हैं; वायु दूर चले गए; वरुण तो मेरे पिता ही हैं -'

श्लोक 58 (skanda.7.382.58)

पौलोमीवदनासक्तो देवेन्द्रो मे न रोचते

paulomīvadanāsakto devendro me na rocate

'पौलोमी (शची) के मुख में आसक्त देवेन्द्र मुझे नहीं रुचते।'

श्लोक 59 (skanda.7.382.59)

वधबंधकृतच्छेदभेददण्डविकर्ष णम् । कुर्वन्न कुरुते सौम्यं रूपं वैवस्वतो यमः

vadhabaṁdhakṛtacchedabhedadaṇḍavikarṣa ṇam | kurvanna kurute saumyaṁ rūpaṁ vaivasvato yamaḥ

वध, बंधन, छेदन, भेदन और दण्ड की कठोर क्रियाएँ करते हुए विवस्वत-पुत्र यम सौम्य रूप धारण नहीं करते।

श्लोक 60 (skanda.7.382.60)

देवदानवगंधर्वदैत्यपन्नगराक्षसान्

devadānavagaṁdharvadaityapannagarākṣasān

इस प्रकार देवों, दानवों, गन्धर्वों, दैत्यों, सर्पों और राक्षसों को -

श्लोक 61 (skanda.7.382.61)

दृष्ट्वात्युग्रांस्ततो याति दृष्टोऽसौ पुरुषो त्तमः । कर्णांतलोचनभ्रांतवक्त्रं दृष्ट्यावलोक्य तम्

dṛṣṭvātyugrāṁstato yāti dṛṣṭo'sau puruṣo ttamaḥ | karṇāṁtalocanabhrāṁtavaktraṁ dṛṣṭyāvalokya tam

अत्यंत उग्र देखकर वह आगे बढ़ी; फिर उसने उस पुरुषोत्तम को देखा, कानों तक फैले नेत्रों से उनके मुख को निहारती हुई -

श्लोक 62 (skanda.7.382.62)

सौभाग्यातिशयाक्रांतं रम्यं काममनोहरम् । संजातपुलकोद्भेदस्वेदवारिकणांकितम् ।

saubhāgyātiśayākrāṁtaṁ ramyaṁ kāmamanoharam | saṁjātapulakodbhedasvedavārikaṇāṁkitam |

उनकी अतुलनीय सुंदरता से अभिभूत, मनोहर, काम को मोहने वाले, रोमांच और स्वेद-कणों से अंकित -

श्लोक 63 (skanda.7.382.63)

देवदानवदैत्येन्द्रक्रोधदृष्टिनिरीक्षितम् । रम्यं रामा वरं चक्रे ददौ मालां ततः स्वयम्

devadānavadaityendrakrodhadṛṣṭinirīkṣitam | ramyaṁ rāmā varaṁ cakre dadau mālāṁ tataḥ svayam

देवों, दानवों और दैत्येन्द्रों की क्रोध-भरी दृष्टि से देखी जाती हुई, उस मनोहर देवी ने वर चुना, और स्वयं माला अर्पित की।

श्लोक 64 (skanda.7.382.64)

दैत्याः परस्परं प्रोचुः प्रेक्ष्य तत्सुरचेष्टितम् । विभागं पश्य देवानां स्वर्गे सर्वे स्वयं गताः

daityāḥ parasparaṁ procuḥ prekṣya tatsuraceṣṭitam | vibhāgaṁ paśya devānāṁ svarge sarve svayaṁ gatāḥ

दैत्यों ने देवताओं की उस चतुराई को देखकर परस्पर कहा - देवताओं का यह विभाजन देखो, सब स्वयं स्वर्ग को चले गए -

श्लोक 65 (skanda.7.382.65)

पातालस्य तले यूयं मानवा धरणीतले । देवास्त्रिभुवने यांतु न वयं स्वर्गगामिनः

pātālasya tale yūyaṁ mānavā dharaṇītale | devāstribhuvane yāṁtu na vayaṁ svargagāminaḥ

तुम पाताल के तल में, मनुष्य धरातल पर, और देव तीनों लोकों में विचरते हैं - क्या हम स्वर्गगामी नहीं हैं?

श्लोक 66 (skanda.7.382.66)

मानवाः क्षत्रिया राज्यं कुर्वंतु पृथिवीतले । पातालं तु परित्यज्य धात्री यदि तु रक्ष्यते

mānavāḥ kṣatriyā rājyaṁ kurvaṁtu pṛthivītale | pātālaṁ tu parityajya dhātrī yadi tu rakṣyate

मानव क्षत्रिय पृथ्वी पर राज्य करें; परन्तु यदि पाताल को छोड़कर पृथ्वी की रक्षा करनी है -

श्लोक 67 (skanda.7.382.67)

दैत्यदानवजैः कैश्चिद्राक्षसैस्तन्न शोभनम् । अथ किं बहुनोक्तेन राजा त्रिभुवने बलिः

daityadānavajaiḥ kaiścidrākṣasaistanna śobhanam | atha kiṁ bahunoktena rājā tribhuvane baliḥ

तो किन्हीं दैत्य-दानव-राक्षसों द्वारा यह शोभनीय नहीं होगा। अधिक कहने से क्या - त्रिभुवन का राजा बलि ही हो -

श्लोक 68 (skanda.7.382.68)

संविभज्याथ रत्नानि समं राज्यं विधीयताम् । यावदेवं प्रगल्भंते तावत्पश्यंति नारदम्

saṁvibhajyātha ratnāni samaṁ rājyaṁ vidhīyatām | yāvadevaṁ pragalbhaṁte tāvatpaśyaṁti nāradam

रत्नों को समान बाँटकर राज्य भी समान रूप से विभाजित किया जाए। जब वे इस प्रकार दुस्साहसपूर्वक बोल रहे थे, तभी उन्होंने नारद को देखा,

श्लोक 69 (skanda.7.382.69)

गगनात्समुपायांतं द्वितीयमिव भास्करम् । ब्रह्मदंडकरासक्तयुद्धपुस्तकधारिणम्

gaganātsamupāyāṁtaṁ dvitīyamiva bhāskaram | brahmadaṁḍakarāsaktayuddhapustakadhāriṇam

आकाश से दूसरे सूर्य के समान उतरते हुए, हाथ में ब्रह्मदण्ड और युद्ध संबंधी पुस्तक लिए हुए,

श्लोक 70 (skanda.7.382.70)

कृष्णाजिनधरं शांतं छत्रवीणाकमण्डलून् । मौंजीगुणत्रयासक्तग्रंथिप्रवरमेखलम्

kṛṣṇājinadharaṁ śāṁtaṁ chatravīṇākamaṇḍalūn | mauṁjīguṇatrayāsaktagraṁthipravaramekhalam

कृष्णाजिन धारण किए, शांत, छाता-वीणा-कमण्डलु लिए, मौंज की त्रिगुणी डोरी से बँधी श्रेष्ठ ग्रंथि वाली मेखला पहने,

श्लोक 71 (skanda.7.382.71)

ब्रह्मरूपधरं शांतं दिव्यरुद्राक्षभूषितम् । गत कल्पकृतग्रंथिसूत्रमालावलंबितम्

brahmarūpadharaṁ śāṁtaṁ divyarudrākṣabhūṣitam | gata kalpakṛtagraṁthisūtramālāvalaṁbitam

ब्रह्म-रूप धारण किए, शांत, दिव्य रुद्राक्षों से सुशोभित, पूर्वकल्प में बनी गाँठदार सूत्र-माला लटकाए हुए,

श्लोक 72 (skanda.7.382.72)

विरंचिहरसंवादो जन्माहंकारगर्वितः । संक्रुद्धैः क्रियते कोऽद्य चिंतातत्परमानसम् ।

viraṁciharasaṁvādo janmāhaṁkāragarvitaḥ | saṁkruddhaiḥ kriyate ko'dya ciṁtātatparamānasam |

[दैत्य सोचने लगे:] जन्म के अहंकार से गर्वित होकर कौन आज ब्रह्मा और हर के बीच भी विवाद करा देता है - ऐसा चिंतापूर्ण मन वाला।

श्लोक 73 (skanda.7.382.73)

आयातं नारदं दृष्ट्वा विस्मिताः समुपस्थिताः । प्रभो प्रसादः क्रियतामागंतव्यं गृहे मम

āyātaṁ nāradaṁ dṛṣṭvā vismitāḥ samupasthitāḥ | prabho prasādaḥ kriyatāmāgaṁtavyaṁ gṛhe mama

आए हुए नारद को देखकर वे आश्चर्यचकित होकर उठ खड़े हुए - हे प्रभो, कृपा कीजिए, मेरे घर पधारिए।

श्लोक 74 (skanda.7.382.74)

धन्योऽहं कृतपुण्योऽहं यस्य मे त्वं गृहागतः । इत्युक्तो बलिना विप्रो विवेशासुरमंदिरे । आसनं पाद्यमर्घ्यं च दत्त्वा संपूजितो द्विजः

dhanyo'haṁ kṛtapuṇyo'haṁ yasya me tvaṁ gṛhāgataḥ | ityukto balinā vipro viveśāsuramaṁdire | āsanaṁ pādyamarghyaṁ ca dattvā saṁpūjito dvijaḥ

मैं धन्य हूँ, मैंने पुण्य किया है, कि आप मेरे घर पधारे। ऐसा कहे जाने पर वह ब्राह्मण असुर-भवन में प्रविष्ट हुआ; आसन, पाद्य और अर्घ्य देकर वह द्विज सम्मानित हुआ।

श्लोक 75 (skanda.7.382.75)

प्रविश्य सहिताः सर्वे संविष्टा दैत्यदानवाः । शुक्रेण सहितो दैत्यो बभाषे नारदं बलिः

praviśya sahitāḥ sarve saṁviṣṭā daityadānavāḥ | śukreṇa sahito daityo babhāṣe nāradaṁ baliḥ

प्रविष्ट होकर सभी दैत्य-दानव मिलकर बैठे; शुक्र सहित दैत्य बलि ने नारद से कहा -

श्लोक 76 (skanda.7.382.76)

इदं राज्यमिमे दारा इमे पुत्रा अहं बलिः । ब्रूहि येनात्र ते कार्यं दानं मे प्रथमं व्रतम्

idaṁ rājyamime dārā ime putrā ahaṁ baliḥ | brūhi yenātra te kāryaṁ dānaṁ me prathamaṁ vratam

यह राज्य, ये पत्नियाँ, ये पुत्र, मैं बलि हूँ - बताइए यहाँ आपका क्या कार्य है; दान देना मेरा प्रथम व्रत है।

श्लोक 77 (skanda.7.382.77)

नारद उवाच भक्त्या तुष्यंति ये विप्रास्ते विप्रा भूमिदेवताः । न तु ये पूजिताः शक्त्या पुनर्याचंति तेऽधमाः॥ ।

nārada uvāca bhaktyā tuṣyaṁti ye viprāste viprā bhūmidevatāḥ | na tu ye pūjitāḥ śaktyā punaryācaṁti te'dhamāḥ |

नारद ने कहा - जो ब्राह्मण भक्ति मात्र से संतुष्ट होते हैं, वे ही सच्चे ब्राह्मण, भूमि के देवता हैं; परन्तु जो शक्ति भर पूजित होकर भी पुनः माँगते हैं, वे अधम हैं।

श्लोक 78 (skanda.7.382.78)

त्वयाऽहं पूजितो हृष्टो न वित्तैर्मे प्रयोजनम् । हृष्टोऽहं तव राज्येन यज्ञैर्दानैर्व्रतैस्तथा ॥ ७८. । देवैः कृतं विप्रियं ते किंचित्पश्याम्यहं बले । त्वया संपूज्यमानोऽपि देवराजो न तुष्यति

tvayā'haṁ pūjito hṛṣṭo na vittairme prayojanam | hṛṣṭo'haṁ tava rājyena yajñairdānairvrataistathā 78. | devaiḥ kṛtaṁ vipriyaṁ te kiṁcitpaśyāmyahaṁ bale | tvayā saṁpūjyamāno'pi devarājo na tuṣyati

आपके द्वारा पूजित होकर मैं प्रसन्न हूँ, मुझे धन से कोई प्रयोजन नहीं। आपके राज्य, यज्ञों, दानों और व्रतों से मैं हर्षित हूँ। फिर भी, हे बलि, देवताओं द्वारा आपके प्रति किया गया कुछ अप्रिय व्यवहार मुझे दिखता है - आपके द्वारा पूजित होकर भी देवराज संतुष्ट नहीं हैं।

श्लोक 79 (skanda.7.382.79)

न क्षमंति सुराः सर्वे तव राज्यं धरातले । स्वर्गे मे तापको जातो देवानां तव विग्रहे ।

na kṣamaṁti surāḥ sarve tava rājyaṁ dharātale | svarge me tāpako jāto devānāṁ tava vigrahe |

सभी देवता पृथ्वी पर आपके राज्य को सहन नहीं करते; स्वर्ग में देवताओं की आपके प्रति शत्रुता से मुझे संताप हुआ है।

श्लोक 80 (skanda.7.382.80)

संनह्य प्रथमं याति यः सैन्यं शत्रुभूमिषु । स क्षत्रियो विजयते तस्य राज्यं च वर्धते

saṁnahya prathamaṁ yāti yaḥ sainyaṁ śatrubhūmiṣu | sa kṣatriyo vijayate tasya rājyaṁ ca vardhate

जो क्षत्रिय सन्नद्ध होकर शत्रु की भूमि पर सबसे पहले सेना लेकर जाता है, वही क्षत्रिय विजयी होता है, और उसका राज्य बढ़ता है।

श्लोक 81 (skanda.7.382.81)

उच्छेदस्तव राज्यस्य भविष्यति श्रुतं मया । एवं ज्ञात्वा यथायुक्तं तच्छीघ्रं तु विधीयताम्

ucchedastava rājyasya bhaviṣyati śrutaṁ mayā | evaṁ jñātvā yathāyuktaṁ tacchīghraṁ tu vidhīyatām

आपके राज्य का उच्छेद होने वाला है, यह मैंने सुना है। यह जानकर उचित उपाय शीघ्र ही किया जाए।

श्लोक 82 (skanda.7.382.82)

बलिरुवाच यैर्गुणैः कुरुते राज्यं राजा तान्वद मे विभो । दानं पात्रे प्रदातव्यं मया त्वमपि तं वद

baliruvāca yairguṇaiḥ kurute rājyaṁ rājā tānvada me vibho | dānaṁ pātre pradātavyaṁ mayā tvamapi taṁ vada

बलि ने कहा - हे प्रभो, मुझे बताइए, राजा किन गुणों से राज्य करता है? मुझे उचित पात्र को दान देना है, आप भी वह मुझे बताइए।

श्लोक 83 (skanda.7.382.83)

नारद उवाच षड्विंशद्गुणसंपन्नो राजा राज्यं करोति च । स राज्यफलमाप्नोति शृणु तत्कथयाम्यहम्

nārada uvāca ṣaḍviṁśadguṇasaṁpanno rājā rājyaṁ karoti ca | sa rājyaphalamāpnoti śṛṇu tatkathayāmyaham

नारद ने कहा - छब्बीस गुणों से संपन्न राजा ही राज्य करता है, और वही राज्य के फल को प्राप्त करता है; सुनिए, मैं वे गुण कहता हूँ -

श्लोक 84 (skanda.7.382.84)

चरेद्धर्मानकटुको मुंचेत्स्नेहमनास्तिके । अनृशंसश्चरेदर्थं चरेत्काममनुद्धतः

careddharmānakaṭuko muṁcetsnehamanāstike | anṛśaṁsaścaredarthaṁ caretkāmamanuddhataḥ

वह कटुता रहित होकर धर्म का आचरण करे, नास्तिक से स्नेह त्यागे; निर्दयता रहित होकर अर्थ का, अहंकार रहित होकर काम का आचरण करे।

श्लोक 85 (skanda.7.382.85)

प्रियं ब्रूयादकृपणः शूरः स्यादविकत्थनः । दाता चाऽऽयामवर्जः स्यात्प्रगल्भः स्यादनिष्ठुरः

priyaṁ brūyādakṛpaṇaḥ śūraḥ syādavikatthanaḥ | dātā cā''yāmavarjaḥ syātpragalbhaḥ syādaniṣṭhuraḥ

वह कृपणता रहित प्रिय वचन बोले, अहंकार रहित शूर हो; उदारता में संकोच रहित दाता हो, कठोरता रहित प्रगल्भ हो।

श्लोक 86 (skanda.7.382.86)

संदधीत न चानार्यान्विगृह्णीयान्न बंधुभिः । नानाप्तैश्चारयेच्चारान्कुर्यात्कार्यमपीडयन्

saṁdadhīta na cānāryānvigṛhṇīyānna baṁdhubhiḥ | nānāptaiścārayeccārānkuryātkāryamapīḍayan

वह नीचों से संधि न करे, बंधुओं से विग्रह न करे; अविश्वसनीय लोगों द्वारा गुप्तचर न भेजे, कार्य को पीड़ा दिए बिना सम्पन्न करे।

श्लोक 87 (skanda.7.382.87)

अर्थान्ब्रूयान्न चापत्सु गुणान्ब्रूयान्न चात्मनः । आदद्यान्न च साधुभ्यो नासत्पुरुषमाश्रयेत्

arthānbrūyānna cāpatsu guṇānbrūyānna cātmanaḥ | ādadyānna ca sādhubhyo nāsatpuruṣamāśrayet

वह संकट में भी गोपनीय बातें न कहे, अपने गुणों की प्रशंसा न करे; साधुओं से कुछ न ले, दुष्ट पुरुष का आश्रय न ले।

श्लोक 88 (skanda.7.382.88)

नापरीक्ष्य नयेद्दण्डं न च मंत्रं प्रकाशयेत् । विसृजेन्न च लुब्धेभ्यो विश्वसेन्नापकारिषु

nāparīkṣya nayeddaṇḍaṁ na ca maṁtraṁ prakāśayet | visṛjenna ca lubdhebhyo viśvasennāpakāriṣu

वह बिना परीक्षा किए दण्ड न दे, गुप्त मंत्रणा प्रकट न करे; लोभियों को मुक्त न करे, अपकारियों पर विश्वास न करे।

श्लोक 89 (skanda.7.382.89)

आप्तैः सुगुप्तदारः स्याद्रक्ष्यश्चान्यो घृणी नृपः । स्त्रियं सेवेत नात्यर्थं मृष्टं भुंजीत नाऽहितम्

āptaiḥ suguptadāraḥ syādrakṣyaścānyo ghṛṇī nṛpaḥ | striyaṁ seveta nātyarthaṁ mṛṣṭaṁ bhuṁjīta nā'hitam

विश्वस्त लोगों द्वारा उसकी पत्नियाँ सुरक्षित रहें, और वह दयालु राजा औरों की भी रक्षा करे; वह स्त्री-संग में अति न करे, अहितकर स्वादिष्ट भोजन न करे।

श्लोक 90 (skanda.7.382.90)

अस्तेयः पूजयेन्मान्यान्गुरुं सेवेदमायया । अर्च्यो देवो न दम्भेन श्रियमिच्छेदकुत्सिताम्

asteyaḥ pūjayenmānyānguruṁ sevedamāyayā | arcyo devo na dambhena śriyamicchedakutsitām

चोरी से रहित होकर वह मान्य जनों की पूजा करे, बिना छल के गुरु की सेवा करे; बिना पाखंड के देव की पूजा करे, निंदनीय न हो ऐसी संपत्ति की इच्छा करे।

श्लोक 91 (skanda.7.382.91)

सेवेत प्रणयं कृत्वा दक्षः स्यादथ कालवित् । सांत्ववाक्यं सदा वाच्यमनुगृह्णन्न चाक्षिपेत्

seveta praṇayaṁ kṛtvā dakṣaḥ syādatha kālavit | sāṁtvavākyaṁ sadā vācyamanugṛhṇanna cākṣipet

वह स्नेहपूर्वक सेवा करे, कुशल हो और समय को जानने वाला हो; सदा शांतिपूर्ण वचन बोले, अनुग्रह करते हुए भी आक्षेप न करे।

श्लोक 92 (skanda.7.382.92)

प्रहरेन्न च विप्राय हत्वा शत्रून्न शेषयेत् । क्रोधं कुर्यान्न चाकस्मान्मृदुः स्यान्नापकारिषु

praharenna ca viprāya hatvā śatrūnna śeṣayet | krodhaṁ kuryānna cākasmānmṛduḥ syānnāpakāriṣu

वह ब्राह्मण पर प्रहार न करे, शत्रुओं को मारकर शेष न छोड़े; अकारण क्रोध न करे, अपकारियों के प्रति कोमल न हो।

श्लोक 93 (skanda.7.382.93)

एवं राज्ये चिरं स्थेयं यदि श्रेय इहेच्छसि । तपःस्वाध्यायदानानि तीर्थयात्राऽऽश्रमाणि च

evaṁ rājye ciraṁ stheyaṁ yadi śreya ihecchasi | tapaḥsvādhyāyadānāni tīrthayātrā''śramāṇi ca

इस प्रकार राज्य में दीर्घकाल तक स्थित रहा जा सकता है, यदि आप यहाँ कल्याण चाहते हैं। तप, स्वाध्याय, दान, तीर्थयात्रा और आश्रम-धर्म -

श्लोक 94 (skanda.7.382.94)

योगेनात्मप्रबोधस्य कलां नार्हंति षोडशीम् । त्वया संसारवैराग्यं कर्त्तव्यं विप्रपूजनम्

yogenātmaprabodhasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm | tvayā saṁsāravairāgyaṁ karttavyaṁ viprapūjanam

ये सब योग द्वारा आत्म-बोध की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। आपको संसार से वैराग्य करना चाहिए, और ब्राह्मणों की पूजा।

श्लोक 95 (skanda.7.382.95)

यष्टव्यं विविधैर्यज्ञैर्ध्येयो नारायणो हरिः । प्रसंगेन समायातो यास्ये रैवतके गिरौ

yaṣṭavyaṁ vividhairyajñairdhyeyo nārāyaṇo hariḥ | prasaṁgena samāyāto yāsye raivatake girau

विविध यज्ञों से यजन करना चाहिए, नारायण हरि का ध्यान करना चाहिए। मैं तो यहाँ प्रसंगवश आया हूँ, अब मैं रैवतक पर्वत जाऊँगा।

श्लोक 96 (skanda.7.382.96)

तत्रास्ते भगवान्विष्णुर्नदी त्रैलोक्यपावनी । तत्रास्ते च शिवावृक्षो बहुपुष्पफलान्वितः । तत्र गत्वा करिष्यामि व्रतं तद्विष्णुवल्लभम्

tatrāste bhagavānviṣṇurnadī trailokyapāvanī | tatrāste ca śivāvṛkṣo bahupuṣpaphalānvitaḥ | tatra gatvā kariṣyāmi vrataṁ tadviṣṇuvallabham

वहाँ भगवान् विष्णु विराजते हैं, एक त्रैलोक्य-पावनी नदी है; वहाँ शिवा-वृक्ष भी है, जो अनेक पुष्प-फलों से युक्त है। वहाँ जाकर मैं विष्णु को प्रिय वह व्रत करूँगा।

श्लोक 97 (skanda.7.382.97)

बलिरुवाच कोऽयं रैवतकोनाम व्रतं किं विष्णुवल्लभम् । शिवावृक्षास्तु के प्रोक्तास्तत्कथं कथयस्व मे

baliruvāca ko'yaṁ raivatakonāma vrataṁ kiṁ viṣṇuvallabham | śivāvṛkṣāstu ke proktāstatkathaṁ kathayasva me

बलि ने कहा - यह रैवतक नामक स्थान क्या है? विष्णु को प्रिय वह व्रत क्या है? शिवा-वृक्ष किसे कहा गया है? यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 98 (skanda.7.382.98)

नारद उवाच पुरा युगादौ दैत्येन्द्र सपक्षाः पर्वताः कृताः । संचिंत्य ब्रह्मणा पश्चादचलास्ते कृताः पुनः

nārada uvāca purā yugādau daityendra sapakṣāḥ parvatāḥ kṛtāḥ | saṁciṁtya brahmaṇā paścādacalāste kṛtāḥ punaḥ

नारद ने कहा - हे दैत्येन्द्र, प्राचीन काल में, युगादि में, पर्वत पंखों सहित बनाए गए थे; बाद में ब्रह्मा ने विचारकर उन्हें फिर से अचल बना दिया।

श्लोक 99 (skanda.7.382.99)

उत्पतंति महाकाया निपतंति यदृच्छया । मेरुमंदरकैलासा वचसा संस्थिताः स्थिराः

utpataṁti mahākāyā nipataṁti yadṛcchayā | merumaṁdarakailāsā vacasā saṁsthitāḥ sthirāḥ

उनके विशाल शरीर उड़ते और यहाँ-वहाँ गिरते रहते थे; मेरु, मंदर और कैलास को वचन-मात्र से स्थिर कर दिया गया।

श्लोक 100 (skanda.7.382.100)

वारिता न स्थिता ये तु त इंद्रेण स्थिरीकृताः । मेरोर्दक्षिण शृंगे तु कुमुदेति स पर्वतः

vāritā na sthitā ye tu ta iṁdreṇa sthirīkṛtāḥ | merordakṣiṇa śṛṁge tu kumudeti sa parvataḥ

जो रोकने पर भी स्थिर नहीं हुए, उन्हें इन्द्र ने स्थिर किया। मेरु के दक्षिण शिखर पर 'कुमुद' नामक एक पर्वत था,

श्लोक 101 (skanda.7.382.101)

दिव्यः सपक्षः सौवर्णो दिव्यवृक्षैः समावृतः । तस्योपरि पुरी दिव्या वैष्णवी विष्णुना कृता

divyaḥ sapakṣaḥ sauvarṇo divyavṛkṣaiḥ samāvṛtaḥ | tasyopari purī divyā vaiṣṇavī viṣṇunā kṛtā

दिव्य, पंखों वाला, स्वर्णमय, दिव्य वृक्षों से घिरा हुआ; उसके ऊपर विष्णु द्वारा एक दिव्य वैष्णवी नगरी बनाई गई।

श्लोक 102 (skanda.7.382.102)

तस्या मध्ये गृहं दिव्यं यस्मिल्लँक्ष्मीः सदा स्थिता । मेरोः शृंगे पुरी रम्या गृहं तत्र मनोरमम्

tasyā madhye gṛhaṁ divyaṁ yasmillaṃkṣmīḥ sadā sthitā | meroḥ śṛṁge purī ramyā gṛhaṁ tatra manoramam

उसके मध्य में एक दिव्य भवन था, जिसमें लक्ष्मी सदा निवास करती थीं; मेरु के शिखर पर वह रमणीय नगरी, और वहाँ वह मनोरम भवन था।

श्लोक 103 (skanda.7.382.103)

तत्रास्ते स भवो देवो भवानी यत्र संस्थिता । सभा माहेश्वरी रम्या सौवर्णी रत्नमंडिता

tatrāste sa bhavo devo bhavānī yatra saṁsthitā | sabhā māheśvarī ramyā sauvarṇī ratnamaṁḍitā

वहाँ भव देव विराजते थे, जहाँ भवानी भी स्थित थीं; वहाँ रत्नों से सुशोभित स्वर्णमय, रमणीय माहेश्वरी सभा थी।

श्लोक 104 (skanda.7.382.104)

तत्रास्ते भगवान्विष्णुर्देवैर्ब्रह्मादिभिर्वृतः । तस्यां विष्णुः सदा याति देवं द्रष्टुं महेश्वरम्

tatrāste bhagavānviṣṇurdevairbrahmādibhirvṛtaḥ | tasyāṁ viṣṇuḥ sadā yāti devaṁ draṣṭuṁ maheśvaram

वहाँ भगवान् विष्णु, ब्रह्मा आदि देवताओं से घिरे हुए विराजते थे; उसी सभा में विष्णु सदा महेश्वर देव के दर्शन के लिए जाते थे।

श्लोक 105 (skanda.7.382.105)

सौवर्णैः कुमुदैर्यस्मादसौ सर्वत्र मंडितः । कुमुदेति कृतं नाम देवैस्तत्र समागतैः

sauvarṇaiḥ kumudairyasmādasau sarvatra maṁḍitaḥ | kumudeti kṛtaṁ nāma devaistatra samāgataiḥ

चूँकि वह सर्वत्र स्वर्णमय कुमुदों (कमलों) से सुशोभित था, इसलिए वहाँ एकत्र देवताओं ने उसका नाम 'कुमुद' रख दिया।

श्लोक 106 (skanda.7.382.106)

एकदा भगवान्रुद्रो गिरौ तस्मिन्समागतः । द्रष्टुं तच्छिखरे रम्ये तां पुरीं विष्णुपालिताम्

ekadā bhagavānrudro girau tasminsamāgataḥ | draṣṭuṁ tacchikhare ramye tāṁ purīṁ viṣṇupālitām

एक बार भगवान् रुद्र उस पर्वत पर आए, उस शिखर पर विष्णु द्वारा रक्षित उस रमणीय नगरी के दर्शन के लिए।

श्लोक 107 (skanda.7.382.107)

गृहागतं हरं दृष्ट्वा हरिणा स तु पूजितः । लक्ष्म्या संपूजिता गौरी हर्षिता तत्र संस्थिता

gṛhāgataṁ haraṁ dṛṣṭvā hariṇā sa tu pūjitaḥ | lakṣmyā saṁpūjitā gaurī harṣitā tatra saṁsthitā

घर आए हुए हर को देखकर हरि ने उनकी पूजा की; गौरी लक्ष्मी द्वारा पूजित हुईं, और हर्षित होकर वहाँ विराजमान हुईं।

श्लोक 108 (skanda.7.382.108)

एकासनोपविष्टौ तौ मंत्रयंतौ परस्परम् । हरेण कारणं ज्ञात्वा तत्सर्वं कथितं हरेः

ekāsanopaviṣṭau tau maṁtrayaṁtau parasparam | hareṇa kāraṇaṁ jñātvā tatsarvaṁ kathitaṁ hareḥ

दोनों एक ही आसन पर बैठकर परस्पर वार्ता करने लगे; हर के कारण पूछने पर हरि ने उन्हें सब कुछ बताया।

श्लोक 109 (skanda.7.382.109)

त्वयेयं नगरी कार्या मंदरे पर्वतोत्तमे । प्रष्टव्यः कारणं नाहमवश्यं तद्भविष्यति

tvayeyaṁ nagarī kāryā maṁdare parvatottame | praṣṭavyaḥ kāraṇaṁ nāhamavaśyaṁ tadbhaviṣyati

[हर ने कहा:] तुम्हें भी श्रेष्ठ पर्वत मंदर पर ऐसी ही नगरी बनानी चाहिए। [विष्णु ने कहा:] मुझसे कारण मत पूछिए, वह अवश्य ही होगा।

श्लोक 110 (skanda.7.382.110)

हर एव विजानाति कारणं कतमोऽपि न । एवं तथेति तौ प्रोक्त्वा संस्थितौ पर्वतोऽपि सः

hara eva vijānāti kāraṇaṁ katamo'pi na | evaṁ tatheti tau proktvā saṁsthitau parvato'pi saḥ

हर ही कारण जानते हैं, कोई और नहीं। 'ऐसा ही हो' कहकर दोनों वहीं ठहरे, और वह पर्वत भी वहीं स्थित रहा।

श्लोक 111 (skanda.7.382.111)

तं दृष्ट्वा संगतं रुद्रं कुमुदः स्वयमाययौ । धन्योऽहं कृतपुण्योऽहं यस्य मे गृहमागतौ

taṁ dṛṣṭvā saṁgataṁ rudraṁ kumudaḥ svayamāyayau | dhanyo'haṁ kṛtapuṇyo'haṁ yasya me gṛhamāgatau

रुद्र को वहाँ आया देखकर कुमुद स्वयं आगे आया - मैं धन्य हूँ, मैंने पुण्य किया है, कि आप दोनों मेरे घर पधारे।

श्लोक 112 (skanda.7.382.112)

द्वाभ्यामुक्तो गिरिवरो ददाव किं वरं तव । इत्युक्तः पर्वतस्ताभ्यां वरं वव्रे स मूढधीः

dvābhyāmukto girivaro dadāva kiṁ varaṁ tava | ityuktaḥ parvatastābhyāṁ varaṁ vavre sa mūḍhadhīḥ

दोनों द्वारा पूछे जाने पर उस श्रेष्ठ पर्वत ने कहा - तुम्हें क्या वर दूँ? इस प्रकार दोनों द्वारा पूछे जाने पर उस मन्दबुद्धि पर्वत ने अपने लिए वर माँगा।

श्लोक 113 (skanda.7.382.113)

भविष्यत्कार्यहेतुत्वाद्भविष्यति न तद्वृथा । यत्राहं तत्र वस्तव्यं भवद्भ्यामस्तु मे वरः

bhaviṣyatkāryahetutvādbhaviṣyati na tadvṛthā | yatrāhaṁ tatra vastavyaṁ bhavadbhyāmastu me varaḥ

'चूँकि यह भविष्य के किसी कार्य का हेतु बनेगा, यह व्यर्थ नहीं जाएगा - जहाँ मैं रहूँ, वहाँ आप दोनों निवास करें, यही मेरा वर हो।'

श्लोक 114 (skanda.7.382.114)

मत्सन्निधौ समागत्य स्थातव्यं ब्रह्मवासरम् । तथेत्युक्त्वा सपत्नीकौ गतौ हरिहरावुभौ

matsannidhau samāgatya sthātavyaṁ brahmavāsaram | tathetyuktvā sapatnīkau gatau hariharāvubhau

'मेरे समीप आकर आपको एक ब्रह्म-दिवस तक ठहरना होगा।' 'ऐसा ही हो' कहकर हरि और हर दोनों अपनी-अपनी पत्नियों सहित चले गए।

श्लोक 115 (skanda.7.382.115)

पञ्चमो यो मनुः पूर्वं रैवतो नाम विश्रुतः । तस्योत्पत्तौ तु यद्वृत्तं कुमुदाग्रे शृणुष्व तत्

pañcamo yo manuḥ pūrvaṁ raivato nāma viśrutaḥ | tasyotpattau tu yadvṛttaṁ kumudāgre śṛṇuṣva tat

पूर्वकाल में पाँचवें मनु, जो रैवत नाम से विख्यात थे, उनकी उत्पत्ति में जो घटना घटी, वह कुमुद के संदर्भ में सुनिए।

श्लोक 116 (skanda.7.382.116)

ऋषिरासीन्महाभाग ऋतवागिति विश्रुतः । तस्यापुत्रस्य पुत्रोऽभूद्रेवत्यन्ते महात्मनः

ṛṣirāsīnmahābhāga ṛtavāgiti viśrutaḥ | tasyāputrasya putro'bhūdrevatyante mahātmanaḥ

ऋतवाक् नामक एक महाभाग्यशाली ऋषि थे; पुत्रहीन होते हुए भी उस महात्मा को रेवती-संधि में एक पुत्र प्राप्त हुआ।

श्लोक 117 (skanda.7.382.117)

स तस्य विधिवच्चक्रे जातकर्मादिकाः क्रियाः । तथोपनयनाद्याश्च स चाशीलोऽभवन्नृप

sa tasya vidhivaccakre jātakarmādikāḥ kriyāḥ | tathopanayanādyāśca sa cāśīlo'bhavannṛpa

उसने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार किए, तथा उपनयन आदि भी; परन्तु हे राजन्, वह पुत्र दुराचारी हो गया।

श्लोक 118 (skanda.7.382.118)

यतः प्रभृति जातोऽसौ ततः प्रभृत्यसावृषिः । दीर्घरोगपरामर्शमवापातीव दुर्द्धरम्

yataḥ prabhṛti jāto'sau tataḥ prabhṛtyasāvṛṣiḥ | dīrgharogaparāmarśamavāpātīva durddharam

जबसे वह उत्पन्न हुआ, तबसे उस ऋषि को दीर्घकालिक, अत्यंत असाध्य रोग लग गया।

श्लोक 119 (skanda.7.382.119)

माता चास्य परामार्तिं कुष्ठरोगाभिपीडिता । जगाम चिन्तां स ऋषिः किमेतदिति दुःखितः

mātā cāsya parāmārtiṁ kuṣṭharogābhipīḍitā | jagāma cintāṁ sa ṛṣiḥ kimetaditi duḥkhitaḥ

और उसकी माता भी कुष्ठ रोग से पीड़ित होकर अत्यंत कष्ट में पड़ गई। ऋषि चिंतित होकर सोचने लगा - यह क्या हुआ?

श्लोक 120 (skanda.7.382.120)

मूर्खस्तु मंदधीः पुत्रो दुःखं जनयते पितुः । अमार्गगो विशेषेण दुःखाद्दुःखतरं हि तत्

mūrkhastu maṁdadhīḥ putro duḥkhaṁ janayate pituḥ | amārgago viśeṣeṇa duḥkhādduḥkhataraṁ hi tat

मूर्ख, मंदबुद्धि पुत्र पिता को दुःख देता है; विशेषतः कुमार्गगामी पुत्र दुःख से भी बढ़कर दुःख देता है।

श्लोक 121 (skanda.7.382.121)

अपुत्रता मनुष्याणां श्रेयसे न कुपुत्रता । सुहृदां नोपकाराय पितॄणां नापि तृप्तये

aputratā manuṣyāṇāṁ śreyase na kuputratā | suhṛdāṁ nopakārāya pitṝṇāṁ nāpi tṛptaye

मनुष्यों के लिए पुत्रहीनता कुपुत्रता से अच्छी है, क्योंकि कुपुत्र न मित्रों के काम आता है, न पितरों को तृप्त करता है।

श्लोक 122 (skanda.7.382.122)

सुपुत्रो हृदयेऽभ्येति मातापित्रोर्दिनेदिने । पित्रोर्दुःखाय धिग्जन्म तस्य दुष्कृतकर्मणः

suputro hṛdaye'bhyeti mātāpitrordinedine | pitrorduḥkhāya dhigjanma tasya duṣkṛtakarmaṇaḥ

सुपुत्र माता-पिता के हृदय के निकट दिन-प्रतिदिन आता है; उस दुष्कर्मी का जन्म धिक्कारने योग्य है, जो माता-पिता को दुःख देता है।

श्लोक 123 (skanda.7.382.123)

धन्यास्ते तनया ये स्युः सवर्लोकाभिसंमताः । परोपकारिणः शांताः साधुकर्मण्यनुव्रताः

dhanyāste tanayā ye syuḥ savarlokābhisaṁmatāḥ | paropakāriṇaḥ śāṁtāḥ sādhukarmaṇyanuvratāḥ

धन्य हैं वे पुत्र, जो सारे संसार द्वारा सम्मानित हों, परोपकारी हों, शांत हों, सत्कर्मों में अनुरक्त हों।

श्लोक 124 (skanda.7.382.124)

अनिर्वृतं निरानंदं दुःखशोकपरिप्लुतम् । नरकाय न स्वर्गाय कुपुत्रत्वं हि जन्मिनः

anirvṛtaṁ nirānaṁdaṁ duḥkhaśokapariplutam | narakāya na svargāya kuputratvaṁ hi janminaḥ

असंतुष्ट, आनंदरहित, दुःख-शोक में डूबा हुआ - कुपुत्र होना प्राणी को नरक की ओर ले जाता है, स्वर्ग की ओर नहीं।

श्लोक 125 (skanda.7.382.125)

करोति सुहृदां दैन्यमहितानां तथा मुदम् । अकाले तु जरां पित्रोः कुपुत्रः कुरुते किल

karoti suhṛdāṁ dainyamahitānāṁ tathā mudam | akāle tu jarāṁ pitroḥ kuputraḥ kurute kila

यह मित्रों को दैन्य और शत्रुओं को हर्ष देता है; कुपुत्र निश्चय ही माता-पिता को असमय ही वृद्ध बना देता है।

श्लोक 126 (skanda.7.382.126)

नारद उवाच एवं सोऽत्यन्तदुष्टस्य पुत्रस्य चरितैर्मुनिः । दह्यमानमनोवृत्तिर्वृद्धगर्गमपृच्छत

nārada uvāca evaṁ so'tyantaduṣṭasya putrasya caritairmuniḥ | dahyamānamanovṛttirvṛddhagargamapṛcchata

नारद ने कहा - इस प्रकार अपने अत्यंत दुष्ट पुत्र के आचरण से मन में जलते हुए उस मुनि ने वृद्ध गर्ग से पूछा -

श्लोक 127 (skanda.7.382.127)

ऋतवागुवाच सुव्रतेन पुरा वेदा अधीता विधिना मया । समाप्य विद्या विधवत्कृतो दारपरिग्रहः

ṛtavāguvāca suvratena purā vedā adhītā vidhinā mayā | samāpya vidyā vidhavatkṛto dāraparigrahaḥ

ऋतवाक् ने कहा - सुव्रत होकर मैंने पूर्वकाल में विधिपूर्वक वेदों का अध्ययन किया; विद्या पूर्ण कर विधिवत् विवाह किया।

श्लोक 128 (skanda.7.382.128)

सदारेण हि याः कार्याः श्रौतस्मार्त्तादिकाः क्रियाः । ताः कृताश्च विधानेन कामं समनुरुध्य च

sadāreṇa hi yāḥ kāryāḥ śrautasmārttādikāḥ kriyāḥ | tāḥ kṛtāśca vidhānena kāmaṁ samanurudhya ca

पत्नी सहित जो श्रौत-स्मार्त आदि क्रियाएँ करनी थीं, वे सब विधानपूर्वक और इच्छापूर्वक की गईं।

श्लोक 129 (skanda.7.382.129)

पुत्रार्थं जनितश्चायं पुंनाम्नो विच्युतौ मुने । सोऽयं किमात्मदोषेण मातुर्दोषेण किं मम । अस्मद्दुःखावहो जातो दौःशील्याद्वद कोविद

putrārthaṁ janitaścāyaṁ puṁnāmno vicyutau mune | so'yaṁ kimātmadoṣeṇa māturdoṣeṇa kiṁ mama | asmadduḥkhāvaho jāto dauḥśīlyādvada kovida

यह पुत्र वंश-रक्षा के लिए उत्पन्न किया गया था, हे मुने, फिर भी वह उससे च्युत हो गया। क्या यह मेरे ही दोष से है, या माता के दोष से? हे विद्वन्, यह हमें दुःख देने वाला दुःशीलता से क्यों उत्पन्न हुआ, यह बताइए।

श्लोक 130 (skanda.7.382.130)

गर्ग उवाच रेवत्यन्ते मुनिश्रेष्ठ जातोऽयं तनयस्तव । तेन दुःखाय ते दुष्टे काले यस्मादजायत

garga uvāca revatyante muniśreṣṭha jāto'yaṁ tanayastava | tena duḥkhāya te duṣṭe kāle yasmādajāyata

गर्ग ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ, यह आपका पुत्र रेवती-संधि में उत्पन्न हुआ है; इसीलिए वह अशुभ काल में जन्म लेने के कारण आपको दुःख देता है।

श्लोक 131 (skanda.7.382.131)

तवापचारो नैवास्य मातुर्नापि कुलस्य च । अन्यद्दौःशील्यहेतुत्वं रेवत्यंत उपागतम्

tavāpacāro naivāsya māturnāpi kulasya ca | anyaddauḥśīlyahetutvaṁ revatyaṁta upāgatam

इसमें न आपका दोष है, न उसकी माता का, न ही कुल का। इसकी दुष्टता का कारण कुछ और है - वह रेवती-संधि में निहित है।

श्लोक 132 (skanda.7.382.132)

रेवती अश्विनोर्मध्यमाश्लेषामघयोस्तथा । ज्येष्ठामूलर्क्षयोः प्रोक्तं गंडांतं तु भयावहम्

revatī aśvinormadhyamāśleṣāmaghayostathā | jyeṣṭhāmūlarkṣayoḥ proktaṁ gaṁḍāṁtaṁ tu bhayāvaham

रेवती-अश्विनी के मध्य, आश्लेषा-मघा के मध्य, तथा ज्येष्ठा-मूल के मध्य के संधि-काल को 'गंडांत' कहा गया है, जो अत्यंत भयावह है।

श्लोक 133 (skanda.7.382.133)

गंडत्रये तु ये जाता नरनारीतुरंगमाः । तिष्ठंति न चिरं गेहे तिष्ठन्तोऽपि भयंकराः । एवमुक्तोऽथ गर्गेण चुक्रोधातीव कोपनः

gaṁḍatraye tu ye jātā naranārīturaṁgamāḥ | tiṣṭhaṁti na ciraṁ gehe tiṣṭhanto'pi bhayaṁkarāḥ | evamukto'tha gargeṇa cukrodhātīva kopanaḥ

इन तीनों गंडांतों में जो नर, नारी या घोड़े जन्म लेते हैं, वे घर में लंबे समय तक नहीं टिकते, और टिकने पर भी भयंकर होते हैं। गर्ग द्वारा ऐसा कहे जाने पर वह अत्यंत क्रोधी ऋषि अत्यंत कुपित हो गया।

श्लोक 134 (skanda.7.382.134)

ऋतवागुवाच यस्मान्ममैक पुत्रस्य रेवत्यन्ते समुद्भवः

ṛtavāguvāca yasmānmamaika putrasya revatyante samudbhavaḥ

ऋतवाक् ने कहा - चूँकि मेरे एकमात्र पुत्र का जन्म रेवती-संधि में हुआ है -

श्लोक 135 (skanda.7.382.135)

रेवती किं न जानाति मां विप्रः शापयिष्यति । जाज्वल्यमाना गगनात्तस्मात्पततु रेवती

revatī kiṁ na jānāti māṁ vipraḥ śāpayiṣyati | jājvalyamānā gaganāttasmātpatatu revatī

क्या रेवती नहीं जानती कि मैं ब्राह्मण उसे शाप दे दूँगा? अतः धधकती हुई रेवती आकाश से गिर जाए!

श्लोक 136 (skanda.7.382.136)

नारद उवाच तेनैवं व्याहृते वाक्ये रेवत्यृक्षं पपात ह । पश्यतः सर्वलोकस्य विस्मयाविष्टचेतसः

nārada uvāca tenaivaṁ vyāhṛte vākye revatyṛkṣaṁ papāta ha | paśyataḥ sarvalokasya vismayāviṣṭacetasaḥ

नारद ने कहा - उसके ऐसा वचन कहते ही रेवती नक्षत्र सचमुच गिर पड़ा, सम्पूर्ण जगत् के देखते-देखते, सब आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 137 (skanda.7.382.137)

ईश्वरेच्छाप्रभावेन पतिता गिरिमूर्द्धनि । रेवत्यृक्षं निपतितं कुमुदाद्रौ समन्ततः

īśvarecchāprabhāvena patitā girimūrddhani | revatyṛkṣaṁ nipatitaṁ kumudādrau samantataḥ

ईश्वर की इच्छा के प्रभाव से वह पर्वत की चोटी पर गिरा; रेवती नक्षत्र कुमुद पर्वत पर सर्वत्र गिर पड़ा।

श्लोक 138 (skanda.7.382.138)

सुराष्ट्रदेशे स प्राप्तः पतितो भूतले शुभे । हिमाचलस्य पुत्रो य उज्जयंतो गिरिर्महान्

surāṣṭradeśe sa prāptaḥ patito bhūtale śubhe | himācalasya putro ya ujjayaṁto girirmahān

वह सुराष्ट्र देश में पहुँचकर उस शुभ भूतल पर गिरा - वहाँ जहाँ हिमाचल-पुत्र उज्जयंत नामक महान् पर्वत था।

श्लोक 139 (skanda.7.382.139)

कुमुदेन समं मैत्री कृता पूर्वं परस्परम् । यत्र त्वं स्थास्यसे स्थाता तत्राहमपि निश्चितम्

kumudena samaṁ maitrī kṛtā pūrvaṁ parasparam | yatra tvaṁ sthāsyase sthātā tatrāhamapi niścitam

कुमुद के साथ उज्जयंत की पहले से ही मित्रता थी - 'जहाँ तुम रहोगे, वहाँ मैं भी अवश्य रहूँगा' - ऐसा वचन था।

श्लोक 140 (skanda.7.382.140)

इति कृत्वा गृहीत्वाथ गंगावारि सयामुनम् । सारस्वतं तथा पुण्यं सिंचितुं तं समागतः

iti kṛtvā gṛhītvātha gaṁgāvāri sayāmunam | sārasvataṁ tathā puṇyaṁ siṁcituṁ taṁ samāgataḥ

यह कहकर उज्जयंत गंगा, यमुना और पवित्र सरस्वती का जल लेकर उसे सींचने के लिए वहाँ आया।

श्लोक 141 (skanda.7.382.141)

आहूतसंप्लवं यावत्संस्थितौ तौ परस्परम् । कुमुदाद्रिश्च तत्पातात्ख्यातो रैवतकोऽभवत्

āhūtasaṁplavaṁ yāvatsaṁsthitau tau parasparam | kumudādriśca tatpātātkhyāto raivatako'bhavat

वे दोनों अगली प्रलय तक वहीं परस्पर स्थित रहे; और कुमुद पर्वत उस गिरने के कारण ही 'रैवतक' नाम से विख्यात हुआ।

श्लोक 142 (skanda.7.382.142)

अतीव रम्यः सर्वस्यां पृथिव्यां पृथिवीपते । कुमुदाद्रिश्च सौवर्णो रेवतीच्यवनात्पुनः

atīva ramyaḥ sarvasyāṁ pṛthivyāṁ pṛthivīpate | kumudādriśca sauvarṇo revatīcyavanātpunaḥ

हे पृथ्वीपते, वह सम्पूर्ण पृथ्वी पर अत्यंत रमणीय था - स्वर्णमय कुमुद पर्वत, और फिर रेवती के गिरने से -

श्लोक 143 (skanda.7.382.143)

पंकजाभः स बाह्येन जातो वर्णेन भूपते । मेरुवर्णः स मध्ये तु सौवर्णः पर्वतोत्तमः

paṁkajābhaḥ sa bāhyena jāto varṇena bhūpate | meruvarṇaḥ sa madhye tu sauvarṇaḥ parvatottamaḥ

हे भूपते, वह बाहर से कमल के समान वर्ण का हो गया, जबकि भीतर से वह श्रेष्ठ पर्वत मेरु के समान स्वर्ण-वर्ण ही रहा।

श्लोक 144 (skanda.7.382.144)

ततः सञ्जनयामास कन्यां रैवतको गिरिः । रेवतीकांति संभूतां रेवतीसदृशाननाम्

tataḥ sañjanayāmāsa kanyāṁ raivatako giriḥ | revatīkāṁti saṁbhūtāṁ revatīsadṛśānanām

फिर रैवतक पर्वत ने एक कन्या को जन्म दिया, जो रेवती की ही कांति से उत्पन्न हुई, और रेवती के समान ही मुखाकृति वाली थी।

श्लोक 145 (skanda.7.382.145)

प्रमुचो नाम राजर्षिस्तेन दृष्टा वरांगना । पितृवद्रेवतीनाम कृतं तस्या नृपोत्तम

pramuco nāma rājarṣistena dṛṣṭā varāṁganā | pitṛvadrevatīnāma kṛtaṁ tasyā nṛpottama

प्रमुच नामक राजर्षि ने उस सुंदर कन्या को देखा; हे राजोत्तम, पिता के समान उन्होंने उसका नाम 'रेवती' रखा।

श्लोक 146 (skanda.7.382.146)

रेवतीति च विख्याता सा सर्वत्र वरांगना । सर्वतेजोमयं स्थानं सर्वतीर्थजलाश्रयम्

revatīti ca vikhyātā sā sarvatra varāṁganā | sarvatejomayaṁ sthānaṁ sarvatīrthajalāśrayam

वह सुंदरी सर्वत्र रेवती के नाम से विख्यात हुई। वहाँ एक ऐसा स्थान है, जो सम्पूर्ण तेज से युक्त है, समस्त तीर्थों के जल का आश्रय है,

श्लोक 147 (skanda.7.382.147)

गंगाजलप्रवाहैश्च संयुक्तं यामुनैस्तथा । स्थितं सारस्वतं तोयं तत्र गर्तेषु तत्त्रयम्

gaṁgājalapravāhaiśca saṁyuktaṁ yāmunaistathā | sthitaṁ sārasvataṁ toyaṁ tatra garteṣu tattrayam

गंगा और यमुना की जलधाराओं से युक्त, तथा वहीं सरस्वती का जल भी स्थित है - उन गर्तों में वे तीनों जल एकत्र हैं।

श्लोक 148 (skanda.7.382.148)

विख्यातं रेवतीकुंडं यत्र जाता च रेवती । स्मरणाद्दर्शनात्स्नानात्सर्वपापक्षयो भवेत्

vikhyātaṁ revatīkuṁḍaṁ yatra jātā ca revatī | smaraṇāddarśanātsnānātsarvapāpakṣayo bhavet

यह विख्यात रेवती-कुंड है, जहाँ रेवती उत्पन्न हुई थी; इसके स्मरण, दर्शन और स्नान से समस्त पापों का नाश होता है।

श्लोक 149 (skanda.7.382.149)

सा बाला वर्द्धिता तेन प्रमुंचेन महात्मना । यौवनं तु तया प्राप्तं तस्मिन्रैवतके गिरौ

sā bālā varddhitā tena pramuṁcena mahātmanā | yauvanaṁ tu tayā prāptaṁ tasminraivatake girau

उस बालिका को महात्मा प्रमुच ने पाला-पोसा; और उसने उसी रैवतक पर्वत पर यौवन प्राप्त किया।

श्लोक 150 (skanda.7.382.150)

तां तु यौवनसंपन्नां दृष्ट्वाऽथ प्रमुचो मुनि । एकांते चिन्तयामास कोऽस्या भर्ता भविष्यति

tāṁ tu yauvanasaṁpannāṁ dṛṣṭvā'tha pramuco muni | ekāṁte cintayāmāsa ko'syā bhartā bhaviṣyati

उसे यौवन-संपन्न देखकर प्रमुच मुनि ने एकांत में विचार किया - इसका पति कौन होगा?

श्लोक 151 (skanda.7.382.151)

हूत्वाहूत्वा स पप्रच्छ गुरुं वह्निं द्विजोत्तमः । प्रसादं कुरु मे ब्रूहि कोऽस्या भर्ता भविष्यति

hūtvāhūtvā sa papraccha guruṁ vahniṁ dvijottamaḥ | prasādaṁ kuru me brūhi ko'syā bhartā bhaviṣyati

उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने बार-बार अपने गुरु अग्नि का आवाहन कर पूछा - मुझ पर कृपा कीजिए, बताइए, इसका पति कौन होगा?

श्लोक 152 (skanda.7.382.152)

अन्योऽस्याः सदृशः कोऽपि वंशे नास्ति करोमि किम् । वह्निकुण्डात्समुत्थाय प्रोक्तवान्हव्यवाहनः

anyo'syāḥ sadṛśaḥ ko'pi vaṁśe nāsti karomi kim | vahnikuṇḍātsamutthāya proktavānhavyavāhanaḥ

मेरे वंश में इसके योग्य और कोई नहीं है, मैं क्या करूँ? तब अग्निकुंड से उठकर हव्यवाहन (अग्नि) ने कहा -

श्लोक 153 (skanda.7.382.153)

शृणु मे वचनं विप्र योऽस्या भर्ता भविष्यति । प्रियव्रतान्वयभवो महाबलपराक्रमः

śṛṇu me vacanaṁ vipra yo'syā bhartā bhaviṣyati | priyavratānvayabhavo mahābalaparākramaḥ

मेरी बात सुनो, विप्र - इसका पति वह होगा जो प्रियव्रत के वंश में उत्पन्न, महान बल-पराक्रम वाला होगा,

श्लोक 154 (skanda.7.382.154)

पुत्रो विक्रमशीलस्य कालिंदीजठरोद्भवः । दुर्दमो नाम भविता भर्ता ह्यस्या महीपतिः

putro vikramaśīlasya kāliṁdījaṭharodbhavaḥ | durdamo nāma bhavitā bhartā hyasyā mahīpatiḥ

विक्रमशील का पुत्र, कालिंदी के गर्भ से उत्पन्न, 'दुर्दम' नामक वह राजा ही इसका पति होगा।

श्लोक 155 (skanda.7.382.155)

अत्रांतरे समायातो दुर्दमः स महीपतिः । गिरौ मृगवधाकांक्षी मुनिं गेहे न पश्यति । प्रियेऽयि तातः क्व गत एहि सत्यं ब्रवीहि मे

atrāṁtare samāyāto durdamaḥ sa mahīpatiḥ | girau mṛgavadhākāṁkṣī muniṁ gehe na paśyati | priye'yi tātaḥ kva gata ehi satyaṁ bravīhi me

इसी बीच वह राजा दुर्दम मृगया की इच्छा से पर्वत पर आया; घर में मुनि को न देखकर उसने कहा - प्रिये, पिताजी कहाँ गए, आओ, मुझे सच बताओ।

श्लोक 156 (skanda.7.382.156)

नारद उवाच अग्निशालास्थितेनैव तच्छ्रुतं वचनं प्रियम् । प्रियेत्यामन्त्रणं कोऽयं करोति मम वेश्मनि ।

nārada uvāca agniśālāsthitenaiva tacchrutaṁ vacanaṁ priyam | priyetyāmantraṇaṁ ko'yaṁ karoti mama veśmani |

नारद ने कहा - अग्निशाला में स्थित मुनि ने वह प्रिय वचन सुना - 'यह कौन मेरे घर में प्रिये कहकर पुकार रहा है?'

श्लोक 157 (skanda.7.382.157)

स ददर्श महात्मानं राजानं दुर्दमं मुनिः । जहर्ष दुर्दमं दृष्ट्वा मुनिः प्राह स गौतमम्

sa dadarśa mahātmānaṁ rājānaṁ durdamaṁ muniḥ | jaharṣa durdamaṁ dṛṣṭvā muniḥ prāha sa gautamam

उस मुनि ने महात्मा राजा दुर्दम को देखा; दुर्दम को देखकर मुनि हर्षित हुए और गौतम से कहा -

श्लोक 158 (skanda.7.382.158)

शिष्यं विनयसम्पन्नमर्घ्यं पाद्यं समानय । एकं तावदयं भूपश्चिरकालादुपागतः

śiṣyaṁ vinayasampannamarghyaṁ pādyaṁ samānaya | ekaṁ tāvadayaṁ bhūpaścirakālādupāgataḥ

हे विनम्र शिष्य, अर्घ्य-पाद्य ले आओ; यह राजा बहुत समय बाद आया है।

श्लोक 159 (skanda.7.382.159)

जामाता सांप्रतं राजा योग्यास्य च सुता मम । ततः स चिंतयामास राजा जामातृ कारणम्

jāmātā sāṁprataṁ rājā yogyāsya ca sutā mama | tataḥ sa ciṁtayāmāsa rājā jāmātṛ kāraṇam

अब यह राजा मेरी पुत्री के योग्य जामाता है। तब वह राजा जामाता के इस प्रसंग पर विचार करने लगा।

श्लोक 160 (skanda.7.382.160)

मौनेन विधिना राजा जगृहेऽर्घ्यं द्विजाज्ञया । तमासनगतं विप्रो गृहीतार्घ्यं महामुनिः

maunena vidhinā rājā jagṛhe'rghyaṁ dvijājñayā | tamāsanagataṁ vipro gṛhītārghyaṁ mahāmuniḥ

मौन विधि से राजा ने ब्राह्मण की आज्ञा से अर्घ्य ग्रहण किया। आसन पर बैठे उस राजा से अर्घ्य लेकर महामुनि ने -

श्लोक 161 (skanda.7.382.161)

प्रस्तुतं प्राह राजेन्द्रं नृपते कुशलं पुरे । कोशे बले च मित्रे च भृत्यामात्य प्रजासु च । तथात्मनि महाबाहो यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्

prastutaṁ prāha rājendraṁ nṛpate kuśalaṁ pure | kośe bale ca mitre ca bhṛtyāmātya prajāsu ca | tathātmani mahābāho yatra sarvaṁ pratiṣṭhitam

राजा से पूछा - हे राजन्, नगर में कुशल तो है? कोष, सेना, मित्र, सेवक, अमात्य और प्रजा में, तथा हे महाबाहो, स्वयं में भी, जहाँ सब कुछ निर्भर है?

श्लोक 162 (skanda.7.382.162)

पत्नी च ते कुशलिनी याऽत्र स्थाने हि तिष्ठति । अन्यासां कुशलं ब्रूहि याः संति तव मंदिरे

patnī ca te kuśalinī yā'tra sthāne hi tiṣṭhati | anyāsāṁ kuśalaṁ brūhi yāḥ saṁti tava maṁdire

और तुम्हारी पत्नी कुशल है, जो यहीं इस स्थान पर है? अन्य जो तुम्हारे महल में हैं, उनका भी कुशल बताओ।

श्लोक 163 (skanda.7.382.163)

राजोवाच त्वत्प्रसादादकुशलं नास्ति राज्ये क्वचिन्मम । जातकौतूहलोऽस्म्यस्मि मम भार्याऽत्र का मुने

rājovāca tvatprasādādakuśalaṁ nāsti rājye kvacinmama | jātakautūhalo'smyasmi mama bhāryā'tra kā mune

राजा ने कहा - आपकी कृपा से मेरे राज्य में कहीं कोई अकुशल नहीं है। परन्तु मुझे कौतूहल हुआ - हे मुने, यहाँ मेरी कौन-सी पत्नी है?

श्लोक 164 (skanda.7.382.164)

प्रमुच उवाच रेवती ते वरा भार्या किं न वेत्सि नृपोत्तम । त्रैलोक्यसुन्दरी या तु कथं सा विस्मृता तव

pramuca uvāca revatī te varā bhāryā kiṁ na vetsi nṛpottama | trailokyasundarī yā tu kathaṁ sā vismṛtā tava

प्रमुच ने कहा - रेवती तुम्हारी श्रेष्ठ पत्नी है, क्या तुम नहीं जानते, हे राजोत्तम? त्रैलोक्य-सुंदरी को तुम कैसे भूल गए?

श्लोक 165 (skanda.7.382.165)

राजोवाच सुभद्रां शांतपापां च कावेरीतनयां तथा । सूरात्मजानुजातां च कदंबां च वरप्रजाम्

rājovāca subhadrāṁ śāṁtapāpāṁ ca kāverītanayāṁ tathā | sūrātmajānujātāṁ ca kadaṁbāṁ ca varaprajām

राजा ने कहा - सुभद्रा, शांतपापा, तथा कावेरी-पुत्री, सूर्य-पुत्री के बाद जन्मी, तथा श्रेष्ठ संतति वाली कदंबा -

श्लोक 166 (skanda.7.382.166)

विपाठां नंदिनीं चैव वेद्मि भार्यां गृहे मम । तिष्ठन्ति नैव जानामि भार्या मे रेवती कुतः ॥।३६७ । ऋषिरुवाच ॥ । प्रियेति सांप्रतं प्रोक्ता रेवती सा प्रिया तव । तदन्यथा न भविता वचनं नृपसत्तम

vipāṭhāṁ naṁdinīṁ caiva vedmi bhāryāṁ gṛhe mama | tiṣṭhanti naiva jānāmi bhāryā me revatī kutaḥ |367 | ṛṣiruvāca | priyeti sāṁprataṁ proktā revatī sā priyā tava | tadanyathā na bhavitā vacanaṁ nṛpasattama

तथा विपाठा और नंदिनी को ही मैं अपने घर में पत्नी के रूप में जानता हूँ। मुझे नहीं पता कि रेवती नामक मेरी पत्नी कहाँ से आई। ऋषि ने कहा - अभी-अभी जिसे तुमने 'प्रिये' कहकर पुकारा, वही रेवती तुम्हारी प्रिया है। हे राजसत्तम, यह वचन अन्यथा नहीं होगा।

श्लोक 167 (skanda.7.382.167)

राजोवाच नास्ति भावकृतो दोषः क्षम्यतां तद्वचो मम । विनिर्गतं वचोवक्त्रान्नाहं जाने द्विजोत्तम

rājovāca nāsti bhāvakṛto doṣaḥ kṣamyatāṁ tadvaco mama | vinirgataṁ vacovaktrānnāhaṁ jāne dvijottama

राजा ने कहा - इसमें कोई जानबूझकर किया गया दोष नहीं है, मेरा वह वचन क्षमा किया जाए। वह मुख से निकल गया, मुझे नहीं पता था, हे द्विजोत्तम।

श्लोक 168 (skanda.7.382.168)

ऋषिरुवाच नास्ति भावकृतो दोषः परिवेद्मि कुरुष्व तत् । वह्निना कथितस्त्वं मे जामाताद्य भविष्यसि

ṛṣiruvāca nāsti bhāvakṛto doṣaḥ parivedmi kuruṣva tat | vahninā kathitastvaṁ me jāmātādya bhaviṣyasi

ऋषि ने कहा - इसमें जानबूझकर किया गया दोष नहीं है, मैं यह समझता हूँ - वैसा ही करो। अग्नि ने मुझे बताया है कि तुम आज ही मेरे जामाता बनोगे।

श्लोक 169 (skanda.7.382.169)

इत्यादिवचनै राजा भार्या मेने स रेवतीम् । ऋषिस्तथोद्यतः कर्तुं विवाहं विधि पूर्वकम् । उवाच कन्या पितरं किञ्चिन्मे श्रूयतां पितः

ityādivacanai rājā bhāryā mene sa revatīm | ṛṣistathodyataḥ kartuṁ vivāhaṁ vidhi pūrvakam | uvāca kanyā pitaraṁ kiñcinme śrūyatāṁ pitaḥ

ऐसे वचनों से राजा ने रेवती को अपनी पत्नी मान लिया। ऋषि विधिपूर्वक विवाह करने के लिए तत्पर हुए। तब कन्या ने पिता से कहा - हे पिता, मेरी कुछ बात सुनिए।

श्लोक 170 (skanda.7.382.170)

यदि मे पतिना तात विवाहं कर्तुमिच्छसि । रेवत्यृक्षं विवाहं मे तत्करोतु प्रसादतः

yadi me patinā tāta vivāhaṁ kartumicchasi | revatyṛkṣaṁ vivāhaṁ me tatkarotu prasādataḥ

हे तात, यदि आप मेरे पति के साथ मेरा विवाह करना चाहते हैं, तो कृपा करके रेवती-नक्षत्र ही मेरा विवाह संपन्न करे।

श्लोक 171 (skanda.7.382.171)

ऋषिरुवाच रेवत्यृक्षश्च न वै भद्रे चन्द्रयोगे दिवि स्थितम् । ऋक्षाण्यन्यान्यपि संति सुभ्रूर्वैवाहकानि च

ṛṣiruvāca revatyṛkṣaśca na vai bhadre candrayoge divi sthitam | ṛkṣāṇyanyānyapi saṁti subhrūrvaivāhakāni ca

ऋषि ने कहा - हे भद्रे, रेवती नक्षत्र अभी आकाश में चन्द्र-योग में स्थित नहीं है। अन्य भी विवाह के योग्य नक्षत्र हैं, हे सुभ्रु।

श्लोक 172 (skanda.7.382.172)

कन्योवाच तात तेन विना कालो विकलः प्रतिभाति मे । विवाहो विकले तात मद्विधायाः कथं भवेत् ॥ १७४ । प्रमुञ्च उवाच ऋतवागिति विख्यातस्तपस्वी रेवतीं प्रति । चकार कोपं क्रुद्धेन तेनर्क्षं तन्निपातितम्

kanyovāca tāta tena vinā kālo vikalaḥ pratibhāti me | vivāho vikale tāta madvidhāyāḥ kathaṁ bhavet 174 | pramuñca uvāca ṛtavāgiti vikhyātastapasvī revatīṁ prati | cakāra kopaṁ kruddhena tenarkṣaṁ tannipātitam

कन्या ने कहा - हे तात, उसके बिना यह समय मुझे अधूरा प्रतीत होता है। हे तात, अधूरे समय में मेरे जैसी की विवाह कैसे हो सकती है? प्रमुच ने कहा - ऋतवाक् नामक विख्यात तपस्वी ने रेवती पर क्रोधित होकर उसे गिरा दिया था।

श्लोक 173 (skanda.7.382.173)

मया चास्मै प्रतिज्ञाता भार्येति विदितं तव । न चेच्छसि विवाहं त्वं संकटं नः समागतम्

mayā cāsmai pratijñātā bhāryeti viditaṁ tava | na cecchasi vivāhaṁ tvaṁ saṁkaṭaṁ naḥ samāgatam

और मैंने उससे तुम्हें पत्नी के रूप में देने की प्रतिज्ञा की थी, यह तुम्हें ज्ञात है। यदि तुम विवाह नहीं चाहती, तो हम पर संकट आ जाएगा।

श्लोक 174 (skanda.7.382.174)

कन्योवाच ऋतवागेव स मुनिः किमेतत्तप्तवान्स्वयम् । न त्वया मम तातेन ब्रह्मबन्धोः सुताऽस्मि किम्

kanyovāca ṛtavāgeva sa muniḥ kimetattaptavānsvayam | na tvayā mama tātena brahmabandhoḥ sutā'smi kim

कन्या ने कहा - क्या यह स्वयं उस ऋतवाक् मुनि ने ही किया था? क्या मैं आपके द्वारा, पिता के द्वारा, किसी सच्चे ब्राह्मण-बंधु की पुत्री नहीं हूँ?

श्लोक 175 (skanda.7.382.175)

ऋषिरुवाच ब्रह्मबन्धोः सुता न त्वं तपस्वी नास्ति मेऽधिकः । सुता त्वं च मया देया नान्यत्कर्तुं समुत्सहे

ṛṣiruvāca brahmabandhoḥ sutā na tvaṁ tapasvī nāsti me'dhikaḥ | sutā tvaṁ ca mayā deyā nānyatkartuṁ samutsahe

ऋषि ने कहा - तुम किसी साधारण की पुत्री नहीं हो - कोई तपस्वी मुझसे बढ़कर नहीं है। तुम मेरी पुत्री हो, और मुझे ही तुम्हें देना है - मैं अन्यथा करने का साहस नहीं करता।

श्लोक 176 (skanda.7.382.176)

कन्योवाच तपस्वी यदि मे तातस्तत्किमृक्षमिदं दिवि । समारोप्य विवाहो मे कस्मान्न क्रियते पुनः

kanyovāca tapasvī yadi me tātastatkimṛkṣamidaṁ divi | samāropya vivāho me kasmānna kriyate punaḥ

कन्या ने कहा - यदि मेरे पिता ऐसे तपस्वी हैं, तो आकाश में उस नक्षत्र को पुनः क्यों नहीं स्थापित कर देते, और फिर विवाह क्यों नहीं करते?

श्लोक 177 (skanda.7.382.177)

ऋषिरुवाच एवं भवतु भद्रं ते भद्रे प्रीतिमती भव । आरोपयामीन्दुमार्गे रेवत्यृक्षं कृते तव

ṛṣiruvāca evaṁ bhavatu bhadraṁ te bhadre prītimatī bhava | āropayāmīndumārge revatyṛkṣaṁ kṛte tava

ऋषि ने कहा - ऐसा ही हो, तुम्हारा कल्याण हो, हे भद्रे, प्रसन्न रहो। तुम्हारे लिए मैं रेवती-नक्षत्र को चन्द्र-मार्ग में पुनः स्थापित करता हूँ।

श्लोक 178 (skanda.7.382.178)

ततस्तपःप्रभावेन रेवत्यृक्षं महामुनिः । यथा पूर्वं तथा चक्रे सोमयोगि द्विजोत्तमः । विवाहं दुहितुः कृत्वा जामातरमुवाच ह

tatastapaḥprabhāvena revatyṛkṣaṁ mahāmuniḥ | yathā pūrvaṁ tathā cakre somayogi dvijottamaḥ | vivāhaṁ duhituḥ kṛtvā jāmātaramuvāca ha

तब तप के प्रभाव से उस महामुनि ने रेवती-नक्षत्र को पहले की भाँति चन्द्रमा से युक्त कर दिया, हे द्विजोत्तम। पुत्री का विवाह संपन्न कर उन्होंने जामाता से कहा -

श्लोक 179 (skanda.7.382.179)

औद्वाहिकं ते भूपाल कथ्यतां किं ददाम्यहम् । दुष्प्रापमपि दास्यामि विद्यते मे महत्तपः

audvāhikaṁ te bhūpāla kathyatāṁ kiṁ dadāmyaham | duṣprāpamapi dāsyāmi vidyate me mahattapaḥ

हे राजन्, बताओ, विवाह के उपलक्ष्य में मैं तुम्हें क्या दूँ? दुष्प्राप्य वस्तु भी दूँगा, मेरे पास महान् तप की शक्ति है।

श्लोक 180 (skanda.7.382.180)

राजोवाच मनोः स्वायंभुवस्याहमुत्पन्नः संततौ मुने । मन्वंतराधिपं पुत्रं त्वत्प्रसादाद्वृणोम्यहम्

rājovāca manoḥ svāyaṁbhuvasyāhamutpannaḥ saṁtatau mune | manvaṁtarādhipaṁ putraṁ tvatprasādādvṛṇomyaham

राजा ने कहा - हे मुने, मैं स्वायंभुव मनु के वंश में उत्पन्न हुआ हूँ। आपकी कृपा से मैं एक ऐसा पुत्र माँगता हूँ जो मन्वंतर का अधिपति हो।

श्लोक 181 (skanda.7.382.181)

ऋषिरुवाच भविष्यति महीपालो महाबलपराक्रमः । रेवती रेवतीकुण्डे स्नात्वा पुत्रं जनिष्यति

ṛṣiruvāca bhaviṣyati mahīpālo mahābalaparākramaḥ | revatī revatīkuṇḍe snātvā putraṁ janiṣyati

ऋषि ने कहा - एक महान् बल-पराक्रम वाला राजा उत्पन्न होगा; रेवती, रेवती-कुंड में स्नान कर उस पुत्र को जन्म देगी।

श्लोक 182 (skanda.7.382.182)

एवं कृत्वा गतो राजा सा च पुत्रमजीजनत् । रैवतेति कृतं नाम बभूव स मनुर्नृपः

evaṁ kṛtvā gato rājā sā ca putramajījanat | raivateti kṛtaṁ nāma babhūva sa manurnṛpaḥ

ऐसा कहकर राजा वहाँ से गया, और रेवती ने पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम 'रैवत' रखा गया, और वह राजा मनु बना।

श्लोक 183 (skanda.7.382.183)

अमुना च तदा प्रोक्तमस्मिन्रैवतके गिरौ । स्त्रियः स्नानं करिष्यंति तासां पुत्रा महाबलाः । दीर्घायुषो भविष्यंति दुःखदारिद्र्यवर्जिताः

amunā ca tadā proktamasminraivatake girau | striyaḥ snānaṁ kariṣyaṁti tāsāṁ putrā mahābalāḥ | dīrghāyuṣo bhaviṣyaṁti duḥkhadāridryavarjitāḥ

और उसी ने तब घोषणा की - इस रैवतक पर्वत पर जो स्त्रियाँ स्नान करेंगी, उनके पुत्र महाबली, दीर्घायु और दुःख-दरिद्रता से रहित होंगे।

श्लोक 184 (skanda.7.382.184)

नारद उवाच इत्युक्ते पर्वतो राजन्दीर्घो भूत्वा पपात सः । एतौ तौ संस्मृतौ देवौ सभार्यौ हरिशंकरौ

nārada uvāca ityukte parvato rājandīrgho bhūtvā papāta saḥ | etau tau saṁsmṛtau devau sabhāryau hariśaṁkarau

नारद ने कहा - ऐसा कहे जाने पर, हे राजन्, वह पर्वत लंबा होकर स्थिर हो गया। तब हरि और शंकर, वे दोनों देव, अपनी-अपनी पत्नियों सहित स्मरण किए गए।

श्लोक 185 (skanda.7.382.185)

स्मृतमात्रौ तदाऽऽयातौ तेन बद्धौ पुरा यतः । यत्राहं तत्र स्थातव्यं भवद्भ्यामिति निश्चितम्

smṛtamātrau tadā''yātau tena baddhau purā yataḥ | yatrāhaṁ tatra sthātavyaṁ bhavadbhyāmiti niścitam

स्मरण करते ही वे वहाँ आ पहुँचे, क्योंकि वे पहले ही उस वचन से बँधे थे - 'जहाँ मैं रहूँ, वहाँ आप दोनों रहें' - यह निश्चित था।

श्लोक 186 (skanda.7.382.186)

अतो विष्णुहरौ देवौ स्थितौ तौ पर्वतोत्तमे । गिरौ रैवतके रम्ये स्वर्णरेखानदीजले । आराधयद्धरिं देवं रेवती तां च सोब्रवीत्

ato viṣṇuharau devau sthitau tau parvatottame | girau raivatake ramye svarṇarekhānadījale | ārādhayaddhariṁ devaṁ revatī tāṁ ca sobravīt

अतः विष्णु और हर दोनों देव उस श्रेष्ठ, रमणीय रैवतक पर्वत पर, स्वर्णरेखा नदी के जल में स्थित हुए। रेवती ने हरि देव की आराधना की, और उन्होंने उससे कहा -

श्लोक 187 (skanda.7.382.187)

भवताच्चंद्रयोगस्ते गगने ब्राह्मणाज्ञया । अन्यद्वृणीष्व तुष्टोऽहं वरं मनसि यत्स्थितम्

bhavatāccaṁdrayogaste gagane brāhmaṇājñayā | anyadvṛṇīṣva tuṣṭo'haṁ varaṁ manasi yatsthitam

ब्राह्मण की आज्ञा से आकाश में तुम्हारा चन्द्र-योग हो गया है। अब और वर माँगो, मैं प्रसन्न हूँ, जो तुम्हारे मन में है।

श्लोक 188 (skanda.7.382.188)

रेवत्युवाच गिरौ रैवतके देव स्थातव्यं भवता सदा । मया स्नानं कृतं यत्र तत्र स्नास्यंति ये जनाः

revatyuvāca girau raivatake deva sthātavyaṁ bhavatā sadā | mayā snānaṁ kṛtaṁ yatra tatra snāsyaṁti ye janāḥ

रेवती ने कहा - हे देव, आप सदा रैवतक पर्वत पर स्थित रहें। जिस स्थान पर मैंने स्नान किया, वहाँ जो लोग स्नान करेंगे -

श्लोक 189 (skanda.7.382.189)

तेषां विष्णुपुरे वासो भवत्विति वृतं मया । एवमस्तु तदा प्रोच्य गिरौ रैवतके स्थितः । दामोदरश्चतुर्बाहुः स्वयं रुद्रोपि संस्थितः

teṣāṁ viṣṇupure vāso bhavatviti vṛtaṁ mayā | evamastu tadā procya girau raivatake sthitaḥ | dāmodaraścaturbāhuḥ svayaṁ rudropi saṁsthitaḥ

उन्हें विष्णुपुर में निवास प्राप्त हो - यही मैंने वर चुना है। 'ऐसा ही हो' कहकर, तब रैवतक पर्वत पर चतुर्भुज दामोदर स्वयं स्थित हुए, और रुद्र भी वहीं स्थापित हुए।

श्लोक 190 (skanda.7.382.190)

गंगाद्याः सरितः सर्वाः संस्थिता विष्णुना सह । क्षीरोदे मथ्यमाने तु यदा वृक्षः समुत्थितः

gaṁgādyāḥ saritaḥ sarvāḥ saṁsthitā viṣṇunā saha | kṣīrode mathyamāne tu yadā vṛkṣaḥ samutthitaḥ

गंगा आदि समस्त नदियाँ विष्णु के साथ वहीं स्थित हुईं। और क्षीर-सागर के मंथन के समय जब एक वृक्ष उत्पन्न हुआ था -

श्लोक 191 (skanda.7.382.191)

आमर्द्दे देवदैत्यानां तेन सामर्दकी स्मृता ॥ । अस्मिन्वृक्षे स्थिता लक्ष्मीः सदा पितृगृहे नृप

āmardde devadaityānāṁ tena sāmardakī smṛtā | asminvṛkṣe sthitā lakṣmīḥ sadā pitṛgṛhe nṛpa

देवों और दैत्यों के उस संघर्ष के कारण वह 'सामर्दकी' नाम से स्मृत हुआ। हे राजन्, इसी वृक्ष में लक्ष्मी सदा अपने पितृ-गृह में निवास करती हैं।

श्लोक 192 (skanda.7.382.192)

शिवालक्ष्मीः स्मृतो वृक्षः सेव्यते सुरसत्तमैः । देवैर्ब्रह्मादिभिः सर्वैर्वृक्षोऽसौ वैष्णवः स्मृतः

śivālakṣmīḥ smṛto vṛkṣaḥ sevyate surasattamaiḥ | devairbrahmādibhiḥ sarvairvṛkṣo'sau vaiṣṇavaḥ smṛtaḥ

यह वृक्ष 'शिवा-लक्ष्मी' नाम से स्मृत है, और श्रेष्ठ देवगणों द्वारा सेवित होता है; ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं द्वारा यह वृक्ष विष्णु का माना जाता है।

श्लोक 193 (skanda.7.382.193)

सर्वैः संचिंत्य मुक्तोऽसौ गिरौ रैवतके पुरा । अस्य वृक्षस्य यात्रां ये करिष्यंति हरेर्दिने

sarvaiḥ saṁciṁtya mukto'sau girau raivatake purā | asya vṛkṣasya yātrāṁ ye kariṣyaṁti harerdine

सबकी सम्मति से इसे पूर्वकाल में रैवतक पर्वत पर स्थापित किया गया। जो लोग हरि के प्रिय दिन इस वृक्ष की यात्रा करेंगे -

श्लोक 194 (skanda.7.382.194)

फाल्गुने च सिते पक्ष एकादश्यां नृपोत्तम । तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च भविष्यंति गुणाधिकाः । प्रांते विष्णुपुरे वासो जायतेनात्र संशयः

phālgune ca site pakṣa ekādaśyāṁ nṛpottama | teṣāṁ putrāśca pautrāśca bhaviṣyaṁti guṇādhikāḥ | prāṁte viṣṇupure vāso jāyatenātra saṁśayaḥ

हे राजोत्तम, फाल्गुन शुक्ल एकादशी को - उनके पुत्र और पौत्र अत्यंत गुणवान होंगे; अंत में विष्णुपुर में निवास होगा, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 195 (skanda.7.382.195)

बलिरुवाच कथमेतद्व्रतं कार्यं वैष्णवं विष्णुवल्लभम् । रात्रौ जागरणं कार्यं विधिना केन तद्वद

baliruvāca kathametadvrataṁ kāryaṁ vaiṣṇavaṁ viṣṇuvallabham | rātrau jāgaraṇaṁ kāryaṁ vidhinā kena tadvada

बलि ने कहा - विष्णु को प्रिय यह वैष्णव व्रत कैसे करना चाहिए? रात्रि में जागरण किस विधि से करना चाहिए, वह बताइए।

श्लोक 196 (skanda.7.382.196)

नारद उवाच फाल्गुनस्य सिते पक्ष एकादश्यामुपोषितः । स्नात्वा नद्यां तडागे वा वाप्यां कूपे गृहेऽपि वा

nārada uvāca phālgunasya site pakṣa ekādaśyāmupoṣitaḥ | snātvā nadyāṁ taḍāge vā vāpyāṁ kūpe gṛhe'pi vā

नारद ने कहा - फाल्गुन शुक्ल एकादशी को उपवास कर, नदी, तालाब, बावड़ी, कुएँ या घर में ही स्नान करके -

श्लोक 197 (skanda.7.382.197)

गत्वा गिरौ वने वाऽपि यत्र सा प्राप्यते शिवा । पूज्या पुष्पैः शुभै रात्रौ कार्यं जागरणं नरैः

gatvā girau vane vā'pi yatra sā prāpyate śivā | pūjyā puṣpaiḥ śubhai rātrau kāryaṁ jāgaraṇaṁ naraiḥ

पर्वत या वन में जाकर, जहाँ भी वह शिवा (वृक्ष) प्राप्त हो, उसकी शुभ पुष्पों से पूजा कर, मनुष्यों को रात्रि में जागरण करना चाहिए।

श्लोक 198 (skanda.7.382.198)

अष्टाधिकशतैः कार्या फलैस्तस्याः प्रदक्षिणा । प्रदक्षिणीकृत्य नगं भोक्तव्यं तु फलं नरैः

aṣṭādhikaśataiḥ kāryā phalaistasyāḥ pradakṣiṇā | pradakṣiṇīkṛtya nagaṁ bhoktavyaṁ tu phalaṁ naraiḥ

एक सौ आठ फलों से उसकी प्रदक्षिणा करनी चाहिए; वृक्ष की प्रदक्षिणा कर मनुष्यों को उसका फल खाना चाहिए।

श्लोक 199 (skanda.7.382.199)

करकं जलपूर्णं तु कर्त्तव्यं पात्रसंयुतम् । हविष्यान्नं तु कर्त्तव्यं दीपः कार्यो विधानतः

karakaṁ jalapūrṇaṁ tu karttavyaṁ pātrasaṁyutam | haviṣyānnaṁ tu karttavyaṁ dīpaḥ kāryo vidhānataḥ

जल से भरा करक, पात्र सहित तैयार करना चाहिए; हविष्यान्न बनाना चाहिए, और विधिपूर्वक दीप जलाना चाहिए।

श्लोक 200 (skanda.7.382.200)

एवं जागरणं कार्यं कथाश्रवणतत्परैः । मुच्यंते देहिनः पापैः कलिजैः कायसंभवैः

evaṁ jāgaraṇaṁ kāryaṁ kathāśravaṇatatparaiḥ | mucyaṁte dehinaḥ pāpaiḥ kalijaiḥ kāyasaṁbhavaiḥ

इस प्रकार कथा-श्रवण में तत्पर होकर जागरण करना चाहिए। इससे देहधारी कलियुग-जनित और शरीर-जनित पापों से मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 201 (skanda.7.382.201)

देहांते ते नराः सर्वे पूज्यंते हरिमंदिरे

dehāṁte te narāḥ sarve pūjyaṁte harimaṁdire

शरीरांत होने पर वे सभी मनुष्य हरि के मंदिर में पूजित होते हैं।

श्लोक 202 (skanda.7.382.202)

सारस्वत उवाच इत्युक्त्वा नारदो दैत्यं ययौ रैवतकं गिरिम् । दैत्येन्द्रो मंत्रयामास किंकार्यं सांप्रतं मया

sārasvata uvāca ityuktvā nārado daityaṁ yayau raivatakaṁ girim | daityendro maṁtrayāmāsa kiṁkāryaṁ sāṁprataṁ mayā

सारस्वत ने कहा - ऐसा कहकर नारद दैत्य से विदा लेकर रैवतक पर्वत को चले गए। दैत्येन्द्र ने विचार किया - अब मुझे क्या करना चाहिए?

श्लोक 203 (skanda.7.382.203)

न रोचते सुरैः सार्द्धं विग्रहो मे सुरोत्तमाः

na rocate suraiḥ sārddhaṁ vigraho me surottamāḥ

हे श्रेष्ठ दैत्यो, मुझे देवताओं के साथ विग्रह अच्छा नहीं लगता।

श्लोक 204 (skanda.7.382.204)

मंत्रिण ऊचुः नास्ति क्षमा भृशं तेषां क्षत्रियाणां गृहे सताम् । अशक्तमपि मंस्यंते स्वयमायांति ते यतः । तस्मात्स्वयं प्रयास्यामो देवेन्द्रं सहिता वयम्

maṁtriṇa ūcuḥ nāsti kṣamā bhṛśaṁ teṣāṁ kṣatriyāṇāṁ gṛhe satām | aśaktamapi maṁsyaṁte svayamāyāṁti te yataḥ | tasmātsvayaṁ prayāsyāmo devendraṁ sahitā vayam

मंत्रियों ने कहा - घर में सुखपूर्वक बैठे क्षत्रियों में सहनशीलता नहीं होती; वे आपको अशक्त समझकर स्वयं ही आ धमकेंगे। अतः हम स्वयं ही मिलकर देवेन्द्र पर चढ़ाई करें।

श्लोक 205 (skanda.7.382.205)

इति श्रुत्वा ददौ ढक्कां प्रथमं सुरविग्रहे । गृहीत्वा वाहिनीं दैत्याः प्रस्थिता मेरु पर्वते

iti śrutvā dadau ḍhakkāṁ prathamaṁ suravigrahe | gṛhītvā vāhinīṁ daityāḥ prasthitā meru parvate

यह सुनकर उसने देवताओं के विरुद्ध युद्ध के लिए सबसे पहले नगाड़ा बजवाया। सेना लेकर दैत्य मेरु पर्वत की ओर प्रस्थान कर गए,

श्लोक 206 (skanda.7.382.206)

यत्र सा नगरी रम्या देवराजस्य पूर्वतः । आगच्छमानां तां ज्ञात्वा वाहिनीं मेरुपर्वते

yatra sā nagarī ramyā devarājasya pūrvataḥ | āgacchamānāṁ tāṁ jñātvā vāhinīṁ meruparvate

जहाँ पूर्व दिशा में देवराज की रमणीय नगरी थी। मेरु पर्वत की ओर उस आती हुई सेना को जानकर -

श्लोक 207 (skanda.7.382.207)

देवराजसमादेशाच्चलिता देव वाहिनी । सुमेरोः पूर्वदिग्भागे युद्धमासीत्परस्परम्

devarājasamādeśāccalitā deva vāhinī | sumeroḥ pūrvadigbhāge yuddhamāsītparasparam

देवराज की आज्ञा से देवसेना चल पड़ी; सुमेरु के पूर्वी भाग में दोनों के बीच युद्ध छिड़ गया,

श्लोक 208 (skanda.7.382.208)

देवसैन्यं यदा सर्वं दैत्यसैन्येनसंयुतम् । महाप्रलयसादृश्यं युद्धं वृत्तं तदा तयोः ।

devasainyaṁ yadā sarvaṁ daityasainyenasaṁyutam | mahāpralayasādṛśyaṁ yuddhaṁ vṛttaṁ tadā tayoḥ |

और जब समस्त देवसेना दैत्यसेना से जा भिड़ी, तब उन दोनों के बीच महाप्रलय जैसा युद्ध हुआ।

श्लोक 209 (skanda.7.382.209)

ऐरावणं समारुह्य देवराजः समागतः । रथमारुह्य दैत्येन्द्रो युद्धायान्ये समागताः

airāvaṇaṁ samāruhya devarājaḥ samāgataḥ | rathamāruhya daityendro yuddhāyānye samāgatāḥ

ऐरावत पर आरूढ़ होकर देवराज आगे आए; रथ पर आरूढ़ होकर दैत्येन्द्र आगे आए, और अन्य भी युद्ध के लिए आए।

श्लोक 210 (skanda.7.382.210)

देवा यज्ञभुजो यस्मात्तस्मान्न युद्ध कांक्षिणः । ऐरावणो बलिं दृष्ट्वा न चचालाग्रतो मृधे

devā yajñabhujo yasmāttasmānna yuddha kāṁkṣiṇaḥ | airāvaṇo baliṁ dṛṣṭvā na cacālāgrato mṛdhe

चूँकि देवता यज्ञ-भोजी होते हैं, वे युद्ध की कामना नहीं रखते थे; बलि को देखकर ऐरावत युद्ध में आगे नहीं बढ़ा।

श्लोक 211 (skanda.7.382.211)

संग्रामे विमुखो याति दिग्गजैः परिवेष्टितः । अध्वरे बाहुना येन संकल्पं कृतवान्बलिः

saṁgrāme vimukho yāti diggajaiḥ pariveṣṭitaḥ | adhvare bāhunā yena saṁkalpaṁ kṛtavānbaliḥ

वह दिग्गजों से घिरा हुआ रणभूमि से मुख मोड़कर चला गया - क्योंकि बलि ने यज्ञ में स्वयं अपनी भुजा से एक संकल्प लिया था।

श्लोक 212 (skanda.7.382.212)

तेन वै स सुरान्सर्वान्वारयामास संयुगे । वारिता विमुखा यांति देवराजः करोतु किम्

tena vai sa surānsarvānvārayāmāsa saṁyuge | vāritā vimukhā yāṁti devarājaḥ karotu kim

उसी संकल्प से उसने युद्ध में समस्त देवताओं को रोक दिया; रुके हुए वे मुख मोड़कर लौट गए - देवराज क्या कर सकते थे?

श्लोक 213 (skanda.7.382.213)

कुलिशं न कुरुते कर्म भुजमुक्तं न गच्छति

kuliśaṁ na kurute karma bhujamuktaṁ na gacchati

उनका वज्र भी कार्य नहीं करता था; भुजा से छोड़ा जाने पर भी वह आगे नहीं बढ़ता था।

श्लोक 214 (skanda.7.382.214)

एवं बहूनि युद्धानि निवृत्तानि तदा तयोः । न हंतुं शक्यंते युद्धे देवैर्दैत्या महाबलाः

evaṁ bahūni yuddhāni nivṛttāni tadā tayoḥ | na haṁtuṁ śakyaṁte yuddhe devairdaityā mahābalāḥ

इस प्रकार उन दोनों के अनेक युद्ध बिना निर्णय के समाप्त हो गए; देवताओं द्वारा युद्ध में महाबली दैत्यों को मारा नहीं जा सका।

श्लोक 215 (skanda.7.382.215)

बलाकांक्षाः स्थिता देवा गुरुणा ते प्रबोधिताः । अमरा देवताः सर्व इति शुक्रेण वारिताः

balākāṁkṣāḥ sthitā devā guruṇā te prabodhitāḥ | amarā devatāḥ sarva iti śukreṇa vāritāḥ

बल की कामना रखने वाले देवताओं को गुरु ने समझाया; और शुक्र ने भी सब देवताओं को 'वे तो अमर हैं' कहकर [दैत्यों को अनावश्यक टकराव से] रोका।

श्लोक 216 (skanda.7.382.216)

अवतारं हरेर्ज्ञात्वा पञ्चमं वामनं स्थितम् । अतिहृष्टोऽमरावत्यां राज्यं चक्रे सुरेश्वरः

avatāraṁ harerjñātvā pañcamaṁ vāmanaṁ sthitam | atihṛṣṭo'marāvatyāṁ rājyaṁ cakre sureśvaraḥ

हरि के पाँचवें अवतार को वामन के रूप में स्थापित जानकर, देवेश्वर अत्यंत प्रसन्न होकर अमरावती में राज्य करने लगे।

श्लोक 217 (skanda.7.382.217)

ननर्त्त युद्धे दैत्येन्द्रः स्वगृहे यजते सुरान् । पातालाभिसृता दैत्या राज्यं कुर्वंति मानवाः

nanartta yuddhe daityendraḥ svagṛhe yajate surān | pātālābhisṛtā daityā rājyaṁ kurvaṁti mānavāḥ

युद्ध में दैत्येन्द्र विजयी हुआ और अपने घर में देवताओं को यज्ञ द्वारा पूजित करता रहा; दैत्य पाताल की ओर भी बसे रहे, और मनुष्य [पृथ्वी पर] राज्य करते रहे।

श्लोक 218 (skanda.7.382.218)

तदा देवगणाः सर्वे मन्त्रयन्ति सुरैः सह । दैत्यो लोकद्वयं शास्ति स्वर्गं शास्ति सुरेश्वरः

tadā devagaṇāḥ sarve mantrayanti suraiḥ saha | daityo lokadvayaṁ śāsti svargaṁ śāsti sureśvaraḥ

तब देवगण सब मिलकर परस्पर मंत्रणा करने लगे - दैत्य दो लोकों पर शासन करता है, देवेश्वर केवल स्वर्ग पर शासन करते हैं।

श्लोक 219 (skanda.7.382.219)

क्षंतव्यं तावदेवास्य वामनो रैवतं गिरिम् । यावद्याति सुरैः कार्यं मौनं दैत्यजितैरपि

kṣaṁtavyaṁ tāvadevāsya vāmano raivataṁ girim | yāvadyāti suraiḥ kāryaṁ maunaṁ daityajitairapi

तब तक यह सहन करना चाहिए, जब तक वामन रैवतक पर्वत न पहुँच जाएँ; देवताओं को, दैत्यों से पराजित होकर भी, मौन रहना चाहिए।

श्लोक 220 (skanda.7.382.220)

यदाप्रभृति सञ्जातो वामनो धरणीतले । तदाप्रभृति दैत्यानां दुनिर्मित्तानि जज्ञिरे

yadāprabhṛti sañjāto vāmano dharaṇītale | tadāprabhṛti daityānāṁ dunirmittāni jajñire

जब से वामन पृथ्वी पर उत्पन्न हुए, तभी से दैत्यों के लिए अशुभ लक्षण उत्पन्न होने लगे।

श्लोक 221 (skanda.7.382.221)

शिवा प्रविश्य नगरे रौति सा विस्वरं निशि । भ्रमन्ति नगरे काका दिवारात्रं विराविणः

śivā praviśya nagare rauti sā visvaraṁ niśi | bhramanti nagare kākā divārātraṁ virāviṇaḥ

सियारिनें नगर में प्रवेश कर रात्रि में बेसुरा रोना रोने लगीं; कौवे नगर में दिन-रात कर्कश स्वर से भटकने लगे।

श्लोक 222 (skanda.7.382.222)

सर्प्पाः सर्प्पंति गेहेषु कृष्णा रौद्रा विषोल्बणाः । कंका गृध्रा बका भ्रांता भ्रमन्ति नगरोपरि

sarppāḥ sarppaṁti geheṣu kṛṣṇā raudrā viṣolbaṇāḥ | kaṁkā gṛdhrā bakā bhrāṁtā bhramanti nagaropari

काले, भयंकर, अत्यंत विषैले सर्प घरों में रेंगने लगे; बगुले, गिद्ध और सारस भ्रमित होकर नगर के ऊपर मंडराने लगे।

श्लोक 223 (skanda.7.382.223)

जायन्ते विमुखा गर्भाः स्त्रीषु गोषु मृगीषु वा । घृतं दुग्धं च नैवास्ति तिले तैलं न विद्यते

jāyante vimukhā garbhāḥ strīṣu goṣu mṛgīṣu vā | ghṛtaṁ dugdhaṁ ca naivāsti tile tailaṁ na vidyate

स्त्रियों, गायों और मृगियों के गर्भ विकृत उत्पन्न होने लगे; न घी रहा, न दूध, न तिल में तेल शेष रहा।

श्लोक 224 (skanda.7.382.224)

जने जानपदो नित्यं युध्यते च परस्परम् । काली करालवदना दीर्घकेशी विलोचना

jane jānapado nityaṁ yudhyate ca parasparam | kālī karālavadanā dīrghakeśī vilocanā

जनपद के लोग नित्य आपस में लड़ने लगे; एक भयंकर मुख वाली, लंबे केशों वाली, बड़ी आँखों वाली काली आकृति -

श्लोक 225 (skanda.7.382.225)

अज्ञाता रुदती याति नगरे सा गृहं प्रति । कोऽयं न ज्ञायते कस्मात्तपस्वी भस्मगुंठितः

ajñātā rudatī yāti nagare sā gṛhaṁ prati | ko'yaṁ na jñāyate kasmāttapasvī bhasmaguṁṭhitaḥ

अज्ञात होकर रोती हुई नगर में घर-घर घूमने लगी। यह कौन है, कहाँ से आया है, यह कोई नहीं जानता था - भस्म से लिपटा एक तपस्वी -

श्लोक 226 (skanda.7.382.226)

यतिर्मौनव्रती नग्न पुरो याति गृहेगृहे । डमरूड्डामरुं पश्चाद्धुंकारं विदधाति च

yatirmaunavratī nagna puro yāti gṛhegṛhe | ḍamarūḍḍāmaruṁ paścāddhuṁkāraṁ vidadhāti ca

मौन-व्रती नग्न संन्यासी घर-घर आगे-आगे जाने लगा, और उसके पीछे डमरू तुमुल गर्जना करने लगा।

श्लोक 227 (skanda.7.382.227)

अकाले कुपिता मेघा जलं मुञ्चंति पुष्कलम् । करकैः पूरिता गर्भा गर्जंति गिरयो बहु

akāle kupitā meghā jalaṁ muñcaṁti puṣkalam | karakaiḥ pūritā garbhā garjaṁti girayo bahu

असमय ही कुपित मेघ प्रचुर जल बरसाने लगे; ओलों से भरे बादल गरजने लगे, पर्वत भी बहुत गरजने लगे।

श्लोक 228 (skanda.7.382.228)

समजायत भूकंपो दिग्दाहश्चाप्यजायत । मिलित्वा श्वगणः सर्वो मुखमुच्चैर्विधाय च

samajāyata bhūkaṁpo digdāhaścāpyajāyata | militvā śvagaṇaḥ sarvo mukhamuccairvidhāya ca

भूकंप हुआ, दिशाओं में अग्नि-सी आभा भी दिखाई देने लगी; सभी कुत्ते मिलकर मुख ऊँचा उठाए -

श्लोक 229 (skanda.7.382.229)

रौति रात्रौ पुरे नित्यं घूकः शब्दं विशब्दते । बलिराज्यक्षयो जातो दिवि केतूदयो निशि ।

rauti rātrau pure nityaṁ ghūkaḥ śabdaṁ viśabdate | balirājyakṣayo jāto divi ketūdayo niśi |

नगर में रात्रि में नित्य चिल्लाने लगे; उल्लू विकट स्वर में बोलने लगा। बलि के राज्य का क्षय आरंभ हो गया - रात्रि में आकाश में धूमकेतु का उदय हुआ।

श्लोक 230 (skanda.7.382.230)

आदित्यमण्डले वेधः कीलकैर्दृश्यते कृतः । कबन्धसंकुले व्योम्नि चन्द्रमा न प्रकाशते

ādityamaṇḍale vedhaḥ kīlakairdṛśyate kṛtaḥ | kabandhasaṁkule vyomni candramā na prakāśate

सूर्य-मंडल में मानो कीलों से किया गया छिद्र दिखाई देने लगा; धड़ों से भरे आकाश में चन्द्रमा प्रकाशित नहीं होता था।

श्लोक 231 (skanda.7.382.231)

स जातो रोहिणीवेधो यो जातो युगव्यत्यये । नक्षत्राणि दिवा लोकैर्गण्यन्ते गुणवत्तरैः

sa jāto rohiṇīvedho yo jāto yugavyatyaye | nakṣatrāṇi divā lokairgaṇyante guṇavattaraiḥ

वह रोहिणी-वेध उत्पन्न हुआ, जो केवल युग-परिवर्तन के समय होता है; दिन में भी नक्षत्र गुणी विद्वानों द्वारा गिने जाने लगे।

श्लोक 232 (skanda.7.382.232)

बीजानां व्यत्ययो जज्ञे भूमिस्त्रीगोमृगीषु च । अश्वा ह्रेषंति सहसा मदं कुर्वंति नो गजाः

bījānāṁ vyatyayo jajñe bhūmistrīgomṛgīṣu ca | aśvā hreṣaṁti sahasā madaṁ kurvaṁti no gajāḥ

बीज पृथ्वी, स्त्री, गौ और मृगी में विपरीत होने लगे; घोड़े अचानक हिनहिनाने लगे, हाथी मद नहीं दिखाते थे।

श्लोक 233 (skanda.7.382.233)

मन्त्रिणां मंत्रितो मन्त्रो भिद्यते राज्यसंक्षये । घृताहुत्या हुतो वह्निर्ज्वलति न तदा द्विजैः

mantriṇāṁ maṁtrito mantro bhidyate rājyasaṁkṣaye | ghṛtāhutyā huto vahnirjvalati na tadā dvijaiḥ

राज्य के क्षय के समय मंत्रियों द्वारा किया गया मंत्रणा-विचार भी भ्रमित हो जाता था; ब्राह्मणों द्वारा घृत-आहुति से हवन की गई अग्नि भी प्रज्वलित नहीं होती थी।

श्लोक 234 (skanda.7.382.234)

प्रचण्डः पावनो वाति वात्यया घूर्णितद्रुमः । ध्वजा ज्वलन्ति चैत्येषु नभो भवति धूसरम्

pracaṇḍaḥ pāvano vāti vātyayā ghūrṇitadrumaḥ | dhvajā jvalanti caityeṣu nabho bhavati dhūsaram

प्रचण्ड शुद्ध वायु चलने लगी, वृक्ष आँधी से हिलने लगे; मंदिरों में ध्वजाएँ स्वयं जलने लगीं, आकाश धूसर हो गया।

श्लोक 235 (skanda.7.382.235)

एते चान्ये च बहव उत्पाता बलिनो गृहे । संजाता वामने जाते नारदागमनादनु

ete cānye ca bahava utpātā balino gṛhe | saṁjātā vāmane jāte nāradāgamanādanu

ये और अन्य भी अनेक उत्पात बलि के घर में उत्पन्न हुए, वामन के जन्म और नारद के आगमन के बाद।

श्लोक 236 (skanda.7.382.236)

अन्यच्च जायते रौद्रं यद्दिवा स्वप्नदर्शनम् । संनह्यंते यदा दैत्याः पतिता निपतंति च

anyacca jāyate raudraṁ yaddivā svapnadarśanam | saṁnahyaṁte yadā daityāḥ patitā nipataṁti ca

एक और भयंकर बात हुई - दिन में भी स्वप्न दिखाई देने लगे; जब दैत्य शस्त्र धारण करते, तो वे लड़खड़ाकर गिर जाते।

श्लोक 237 (skanda.7.382.237)

निमित्तानि स सैन्यस्य दृष्ट्वैवं न प्रवर्त्तते । सदा संतिष्ठते गेहे राज्यं च कुरुते बलिः

nimittāni sa sainyasya dṛṣṭvaivaṁ na pravarttate | sadā saṁtiṣṭhate gehe rājyaṁ ca kurute baliḥ

अपनी सेना के लिए इन लक्षणों को देखकर बलि युद्ध में नहीं उतरा; वह सदा घर में ही रहकर राज्य करता रहा।

श्लोक 238 (skanda.7.382.238)

शरीरे न सुखं तस्य गात्रभंगः शिरोव्यथा । ज्वरितो न सुखं शेते न भुंक्ते न पिबत्यसौ । न भुक्तं जीर्यते लोकः सर्वोपि व्याकुलीकृतः

śarīre na sukhaṁ tasya gātrabhaṁgaḥ śirovyathā | jvarito na sukhaṁ śete na bhuṁkte na pibatyasau | na bhuktaṁ jīryate lokaḥ sarvopi vyākulīkṛtaḥ

उसके शरीर में सुख नहीं था, अंगों में टूटन थी, सिर में पीड़ा थी; ज्वरग्रस्त होने से न वह सुखपूर्वक सो पाता था, न खा पाता था, न पी पाता था। खाया हुआ पचता नहीं था, समस्त प्रजा व्याकुल हो गई थी।

श्लोक 239 (skanda.7.382.239)

विपरीतं जगद्दृष्ट्वा बलिर्व्याकुलमानसः । मन्त्रयामास किमिदं ब्राह्मणैः सह दुःखितः

viparītaṁ jagaddṛṣṭvā balirvyākulamānasaḥ | mantrayāmāsa kimidaṁ brāhmaṇaiḥ saha duḥkhitaḥ

विपरीत हो गए संसार को देखकर व्याकुल-चित्त बलि ने दुःखी होकर ब्राह्मणों के साथ मंत्रणा की - यह क्या हो रहा है?

श्लोक 240 (skanda.7.382.240)

शुक्रं गुरुं समानीय सभायां संनिवेश्य च । पप्रच्छ कुशलं दैत्यो भक्त्या परमया युतः । विपरीतमिदं सर्वं वर्त्तते तद्वदस्व मे

śukraṁ guruṁ samānīya sabhāyāṁ saṁniveśya ca | papraccha kuśalaṁ daityo bhaktyā paramayā yutaḥ | viparītamidaṁ sarvaṁ varttate tadvadasva me

गुरु शुक्र को बुलाकर, सभा में बिठाकर, परम भक्तिपूर्वक दैत्य ने उनका कुशल पूछा - यह सब विपरीत हो रहा है, मुझे बताइए।

श्लोक 241 (skanda.7.382.241)

नारदेन यदुक्तं मे गुरो सत्यं भविष्यति । उत्पातशांतिकं ब्रूहि ब्राह्मणैः सहितो मम

nāradena yaduktaṁ me guro satyaṁ bhaviṣyati | utpātaśāṁtikaṁ brūhi brāhmaṇaiḥ sahito mama

हे गुरो, नारद ने मुझसे जो कहा था, वह सत्य होगा। ब्राह्मणों सहित मुझे उत्पातों की शांति के उपाय बताइए।

श्लोक 242 (skanda.7.382.242)

शुक्र उवाच उत्पातशांतये कार्यो यज्ञः सर्वस्वदक्षिणः । ब्राह्मणैः क्षत्रियैः सार्द्धं द्वादशाब्दो विधीयताम्

śukra uvāca utpātaśāṁtaye kāryo yajñaḥ sarvasvadakṣiṇaḥ | brāhmaṇaiḥ kṣatriyaiḥ sārddhaṁ dvādaśābdo vidhīyatām

शुक्र ने कहा - उत्पातों की शांति के लिए सर्वस्व-दक्षिणा वाला यज्ञ करना चाहिए; ब्राह्मणों और क्षत्रियों सहित बारह वर्षों का यज्ञ विधिवत् किया जाए।

श्लोक 243 (skanda.7.382.243)

ऋषयो ब्राह्मणा ये च मुनयो ब्रह्मचारिणः । आगच्छन्तु महायज्ञे ये च दूरेऽपि संस्थिताः

ṛṣayo brāhmaṇā ye ca munayo brahmacāriṇaḥ | āgacchantu mahāyajñe ye ca dūre'pi saṁsthitāḥ

ऋषि, ब्राह्मण, मुनि और ब्रह्मचारी, जो भी दूर स्थित हों, वे सब इस महायज्ञ में आएँ।

श्लोक 244 (skanda.7.382.244)

नगरात्पूर्वदिग्भागे कर्त्तव्यो यज्ञमण्डपः । यस्य यस्याभिरुचितं देयं दानं त्वया नृप । तथा करिष्य इत्युक्त्वा यज्ञार्थं तत्परोभवत्

nagarātpūrvadigbhāge karttavyo yajñamaṇḍapaḥ | yasya yasyābhirucitaṁ deyaṁ dānaṁ tvayā nṛpa | tathā kariṣya ityuktvā yajñārthaṁ tatparobhavat

नगर के पूर्व दिशा में यज्ञ-मण्डप बनाया जाए; हे राजन्, जिसे जो अभिरुचित हो, वह दान आपको देना चाहिए। 'ऐसा ही करूँगा' कहकर वह यज्ञ की तैयारी में तत्पर हो गया।

श्लोक 245 (skanda.7.382.245)

आनाय्य ब्राह्मणान्सर्वान्कुशलान्यज्ञकर्मणि । गृहीता यज्ञदीक्षा तैर्यज्ञे वै सर्व दक्षिणे

ānāyya brāhmaṇānsarvānkuśalānyajñakarmaṇi | gṛhītā yajñadīkṣā tairyajñe vai sarva dakṣiṇe

यज्ञ-कर्म में कुशल सभी ब्राह्मणों को बुलाकर, सर्व-दक्षिणा वाले उस यज्ञ के लिए उनसे यज्ञ-दीक्षा ग्रहण की गई।

श्लोक 246 (skanda.7.382.246)

ब्राह्मणाय मया देयं सर्वस्वमिह याचिते । शरीरपुत्रमित्राणि दारान्दास्यामि याचितः

brāhmaṇāya mayā deyaṁ sarvasvamiha yācite | śarīraputramitrāṇi dārāndāsyāmi yācitaḥ

जो भी यहाँ माँगेगा, उसे मैं अपना सर्वस्व दूँगा; माँगे जाने पर मैं शरीर, पुत्र, मित्र और पत्नी तक दे दूँगा।

श्लोक 247 (skanda.7.382.247)

दातव्यं सततं दानं ब्राह्मणेभ्यो मयाध्वरे । वारितेनापि न स्थेयं दातव्यं निश्चितं मया । याचितश्चेन्न दास्यामि तदा व्यर्थो ममाऽध्वरः

dātavyaṁ satataṁ dānaṁ brāhmaṇebhyo mayādhvare | vāritenāpi na stheyaṁ dātavyaṁ niścitaṁ mayā | yācitaścenna dāsyāmi tadā vyartho mamā'dhvaraḥ

इस यज्ञ में मैं ब्राह्मणों को सतत दान देता रहूँगा; रोके जाने पर भी नहीं रुकूँगा, मैंने दान देने का निश्चय कर लिया है। यदि माँगे जाने पर न दूँ, तो मेरा यज्ञ व्यर्थ होगा।

श्लोक 248 (skanda.7.382.248)

विधाय मण्डपं दिव्यं बहुयोजनविस्तरम् । तत्र दानानि दीयन्ते भोजनाच्छादनानि च

vidhāya maṇḍapaṁ divyaṁ bahuyojanavistaram | tatra dānāni dīyante bhojanācchādanāni ca

अनेक योजन विस्तार वाला एक दिव्य मण्डप बनाकर, वहाँ भोजन और वस्त्र सहित दान दिए जाने लगे।

श्लोक 249 (skanda.7.382.249)

सप्तर्षयः समायाता गगनाद्धरणीतले । दिग्भ्यः समागताः सर्वे ब्राह्मणाः संति ये भुवि

saptarṣayaḥ samāyātā gaganāddharaṇītale | digbhyaḥ samāgatāḥ sarve brāhmaṇāḥ saṁti ye bhuvi

सप्तर्षि आकाश से पृथ्वी पर उतर आए; पृथ्वी पर जितने भी ब्राह्मण थे, वे सभी सब दिशाओं से एकत्र हुए।

श्लोक 250 (skanda.7.382.250)

क्षत्रियाश्च समायाता विगृह्य विविधं वसु । निवेदयन्ति ते राज्ञे प्रारब्धे यज्ञकर्मणि

kṣatriyāśca samāyātā vigṛhya vividhaṁ vasu | nivedayanti te rājñe prārabdhe yajñakarmaṇi

क्षत्रिय भी विविध धन लेकर आए; यज्ञ-कर्म आरंभ होने पर वे राजा को उन्हें अर्पित करने लगे।

श्लोक 251 (skanda.7.382.251)

आसमुद्रात्समायाता नटनर्त्तकयाचकाः । गीतवादित्रनिर्घोषो वेदध्वनिविमिश्रितः

āsamudrātsamāyātā naṭanarttakayācakāḥ | gītavāditranirghoṣo vedadhvanivimiśritaḥ

समुद्र-तट तक से नट, नर्तक और याचक आ पहुँचे; गीत-वाद्यों का घोष वेद-ध्वनि से मिश्रित हो गया।

श्लोक 252 (skanda.7.382.252)

त्रैलोक्यं बधिरीचक्रे देहिदेहीति याचितम् । मा देहीति वचो नास्ति स्तोकं देहीति चैव न

trailokyaṁ badhirīcakre dehidehīti yācitam | mā dehīti vaco nāsti stokaṁ dehīti caiva na

'दो, दो' की पुकार से तीनों लोक बधिर हो गए; 'मत दो' यह वचन कहीं नहीं था, और न ही 'थोड़ा दो' कहीं सुना जाता था।

श्लोक 253 (skanda.7.382.253)

यद्यद्यो याचते वस्तु तत्तस्मै तत्र दीयते । ब्राह्मणो हि न सोऽप्यस्ति यो हि तं बहु याचते

yadyadyo yācate vastu tattasmai tatra dīyate | brāhmaṇo hi na so'pyasti yo hi taṁ bahu yācate

जो भी जो कुछ माँगता, वह उसे वहीं दे दिया जाता; कोई ऐसा ब्राह्मण शेष नहीं रहा जो उससे और अधिक माँग सके।

श्लोक 254 (skanda.7.382.254)

भोजनाच्छादनार्थं च न गृह्णंति द्विजातयः । सुवर्णरत्नरौप्याणि तथाश्वरथकुंजरान्

bhojanācchādanārthaṁ ca na gṛhṇaṁti dvijātayaḥ | suvarṇaratnaraupyāṇi tathāśvarathakuṁjarān

ब्राह्मण भोजन और वस्त्र के अतिरिक्त कुछ ग्रहण नहीं करते थे; स्वर्ण, रत्न, चाँदी, तथा अश्व, रथ और हाथी भी नहीं लेते थे।

श्लोक 255 (skanda.7.382.255)

गृहगोभूमिग्रामांश्च न गृह्णंति द्विजातयः । बलिराज्येन संतुष्टाः किं कुर्वति धनेन ते

gṛhagobhūmigrāmāṁśca na gṛhṇaṁti dvijātayaḥ | balirājyena saṁtuṣṭāḥ kiṁ kurvati dhanena te

ब्राह्मण घर, गौ, भूमि और गाँव भी नहीं लेते थे; बलि के राज्य में संतुष्ट होकर उन्हें धन से क्या प्रयोजन था?

श्लोक 256 (skanda.7.382.256)

एवं प्रवर्तते यज्ञो महान्सर्वस्वदक्षिणः

evaṁ pravartate yajño mahānsarvasvadakṣiṇaḥ

इस प्रकार सर्वस्व-दक्षिणा वाला वह महान् यज्ञ चलता रहा।

श्लोक 257 (skanda.7.382.257)

नृत्यंति गायंति पठंति चान्ये स्तुवंति यज्ञं बहुदानयुक्तम् । ब्रह्मेन्द्र रुद्रग्रहसूर्यचंद्राः प्रसादिता आहुतिभिश्च मन्त्रैः

nṛtyaṁti gāyaṁti paṭhaṁti cānye stuvaṁti yajñaṁ bahudānayuktam | brahmendra rudragrahasūryacaṁdrāḥ prasāditā āhutibhiśca mantraiḥ

कुछ नृत्य करते, कुछ गाते, कुछ पाठ करते, और अन्य लोग बहु-दानयुक्त उस यज्ञ की स्तुति करते; मंत्रों और आहुतियों से ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, ग्रह, सूर्य और चन्द्र प्रसन्न किए गए।

श्लोक 258 (skanda.7.382.258)

बलिं प्रशंसंति गुरुं तथान्ये होतारमेके परिवारमेके । प्रजापतेर्नापि सुराधिपस्य समाप्यते चेदथ यास्यति धुवम् । प्रदाय राज्यं द्विजपुंगवेभ्यः सपुत्रमित्रैः सहितो रसातलम्

baliṁ praśaṁsaṁti guruṁ tathānye hotārameke parivārameke | prajāpaternāpi surādhipasya samāpyate cedatha yāsyati dhuvam | pradāya rājyaṁ dvijapuṁgavebhyaḥ saputramitraiḥ sahito rasātalam

कुछ बलि की प्रशंसा करते, कुछ उनके गुरु की, कुछ होता की, कुछ उनके परिवार की। न प्रजापति का, न देवाधिप का यज्ञ इसकी बराबरी करता - यदि यह पूर्ण हुआ तो वे निश्चय ही [उच्च गति को] जाएँगे; परन्तु यदि उन्होंने राज्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दे दिया, तो पुत्र-मित्रों सहित वे रसातल को चले जाएँगे।

श्लोक 259 (skanda.7.382.259)

इतीति वाचः प्रवदंति वाडवाः शृण्वंति दैत्याः किमिदं वदंति । बलेः पुरःस्थाः कथयंति संगता बलिः प्रहृष्टः प्रददाति याचितम्

itīti vācaḥ pravadaṁti vāḍavāḥ śṛṇvaṁti daityāḥ kimidaṁ vadaṁti | baleḥ puraḥsthāḥ kathayaṁti saṁgatā baliḥ prahṛṣṭaḥ pradadāti yācitam

ऐसी बातें ब्राह्मण आपस में कहते थे; दैत्य सुनते थे कि वे क्या कह रहे हैं। बलि के सामने एकत्र होकर वे यह सब कहते, और बलि प्रसन्न होकर जो भी माँगा जाता, वह देता रहता।

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