प्रभास खण्ड · अध्याय 383
बलिनिग्रहवृत्तांतवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.383.1)
राजोवाच वस्त्रापथे महाक्षेत्रे सम्प्राप्तो वामनो यदा । तदाप्रभृति किं चक्रे तन्मे विस्तरतो वद
rājovāca vastrāpathe mahākṣetre samprāpto vāmano yadā | tadāprabhṛti kiṁ cakre tanme vistarato vada
राजा ने कहा - जब वामन वस्त्रापथ महाक्षेत्र में पहुँचे, तब से उन्होंने क्या किया, वह मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 2 (skanda.7.383.2)
सारस्वत उवाच वामनो वसतिं चक्रे भवस्याग्रे नृपोत्तम । स्वर्णरेखाजले स्नात्वा भवं सम्पूज्य भावतः
sārasvata uvāca vāmano vasatiṁ cakre bhavasyāgre nṛpottama | svarṇarekhājale snātvā bhavaṁ sampūjya bhāvataḥ
सारस्वत ने कहा - हे राजोत्तम, वामन ने भव के सम्मुख निवास बनाया। स्वर्णरेखा के जल में स्नान कर, भव की भावपूर्वक पूजा करके -
श्लोक 3 (skanda.7.383.3)
एकांते निर्मले स्थाने कण्टकास्थिविवर्जिते । कृष्णाजिनपरिच्छन्न उपविष्टो वरा सने
ekāṁte nirmale sthāne kaṇṭakāsthivivarjite | kṛṣṇājinaparicchanna upaviṣṭo varā sane
एकांत, निर्मल, काँटों-हड्डियों से रहित स्थान में, कृष्णाजिन से आच्छादित होकर वे श्रेष्ठ आसन पर बैठे।
श्लोक 4 (skanda.7.383.4)
कृत्वा पद्मासनं धीरो निश्चलोऽभूद्द्विजोत्तमः । विधाय कन्धराबंधमृजुनासावलोककः
kṛtvā padmāsanaṁ dhīro niścalo'bhūddvijottamaḥ | vidhāya kandharābaṁdhamṛjunāsāvalokakaḥ
पद्मासन लगाकर वह धीर, श्रेष्ठ ब्राह्मण निश्चल हो गया; गर्दन सीधी रखकर, दृष्टि नासाग्र पर स्थिर करके,
श्लोक 5 (skanda.7.383.5)
गृहक्षेत्रकलत्राणां चिंतां मुक्त्वा धनस्य च । मायां च वैष्णवीं त्यक्त्वा कृतमौनो जितेन्द्रियः
gṛhakṣetrakalatrāṇāṁ ciṁtāṁ muktvā dhanasya ca | māyāṁ ca vaiṣṇavīṁ tyaktvā kṛtamauno jitendriyaḥ
घर, खेत, पत्नी और धन की चिंता त्यागकर, विष्णु की माया को भी त्यागकर, मौन धारण कर इन्द्रियों को वश में करके -
श्लोक 6 (skanda.7.383.6)
निराहारो जितक्रोधो मुक्तसंसारबंधनः । भुजौ पद्मासने कृत्वा किञ्चिन्मीलितलो चनः । मनोतिचंचलं ज्ञात्वा स्थिरं चक्रे हृदि द्विजः
nirāhāro jitakrodho muktasaṁsārabaṁdhanaḥ | bhujau padmāsane kṛtvā kiñcinmīlitalo canaḥ | manoticaṁcalaṁ jñātvā sthiraṁ cakre hṛdi dvijaḥ
निराहार, क्रोध-विजयी, संसार-बंधन से मुक्त, भुजाओं को पद्मासन में रखे, नेत्र कुछ अधमुंदे - अत्यंत चंचल मन को जानकर उस ब्राह्मण ने उसे हृदय में स्थिर कर लिया।
श्लोक 7 (skanda.7.383.7)
क्रमेणाभ्यासयोगेन भिन्नांश्चक्रे स चैकतः । प्राणापानव्यानोदानसमानाख्यांश्च मारुतान्
krameṇābhyāsayogena bhinnāṁścakre sa caikataḥ | prāṇāpānavyānodānasamānākhyāṁśca mārutān
क्रमिक अभ्यास-योग से उसने प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक भिन्न वायुओं को एकत्व में ला दिया।
श्लोक 8 (skanda.7.383.8)
एवं तं हृदये कृत्वा गृहीत्वा सर्वसन्धिषु । आनीय ब्रह्मणः स्थाने दृढं ब्रह्मण्ययोजयत्
evaṁ taṁ hṛdaye kṛtvā gṛhītvā sarvasandhiṣu | ānīya brahmaṇaḥ sthāne dṛḍhaṁ brahmaṇyayojayat
इस प्रकार उसे हृदय में स्थिर कर, समस्त सन्धियों में धारण कर, ब्रह्म के स्थान पर लाकर उसने उसे दृढ़ता से ब्रह्म में योजित कर दिया।
श्लोक 9 (skanda.7.383.9)
गृहीत्वा पवनं बाह्यं यदा पूर यते तनुम् । तदा स पूरको ज्ञेयो रेचकं तु वदाम्यहम्
gṛhītvā pavanaṁ bāhyaṁ yadā pūra yate tanum | tadā sa pūrako jñeyo recakaṁ tu vadāmyaham
जब बाह्य वायु को ग्रहण कर शरीर को भरा जाता है, तब उसे पूरक जानना चाहिए; अब मैं रेचक के विषय में कहता हूँ।
श्लोक 10 (skanda.7.383.10)
यदा चाभ्यन्तरो वायुर्बाह्ये याति क्रमान्नृप । तदा स रेचको ज्ञेयः स्तम्भनात्कुम्भको भवेत्
yadā cābhyantaro vāyurbāhye yāti kramānnṛpa | tadā sa recako jñeyaḥ stambhanātkumbhako bhavet
हे राजन्, जब आंतरिक वायु क्रमशः बाहर जाती है, तब उसे रेचक जानना चाहिए; और उसके स्तंभन से कुम्भक होता है।
श्लोक 11 (skanda.7.383.11)
पञ्चविंशतितत्त्वानि यदा जानंति योगिनः । मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः सप्तजन्मकृतैरपि
pañcaviṁśatitattvāni yadā jānaṁti yoginaḥ | mucyante pātakaiḥ sarvaiḥ saptajanmakṛtairapi
जब योगी पच्चीस तत्त्वों को जान लेते हैं, तब वे सात जन्मों में किए गए समस्त पापों से भी मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.383.12)
राजोवाच कानि तत्त्वानि को देही किं ज्ञेयं योगिनां वद । उत्पन्नज्ञानसद्भावो योगयुक्तः कथं भवेत्
rājovāca kāni tattvāni ko dehī kiṁ jñeyaṁ yogināṁ vada | utpannajñānasadbhāvo yogayuktaḥ kathaṁ bhavet
राजा ने कहा - वे तत्त्व कौन हैं, देही कौन है, योगियों को क्या जानना चाहिए, मुझे बताइए। योग-युक्त व्यक्ति में सच्चा ज्ञान कैसे उत्पन्न होता है?
श्लोक 13 (skanda.7.383.13)
ईश्वर उवाच प्रकृतिश्च ततो बुद्धिरहंकारस्ततोऽभवत् । तन्मात्रपंचकं तस्मादेषा प्रकृतिरष्टधा
īśvara uvāca prakṛtiśca tato buddhirahaṁkārastato'bhavat | tanmātrapaṁcakaṁ tasmādeṣā prakṛtiraṣṭadhā
ईश्वर ने कहा - पहले प्रकृति, फिर बुद्धि, फिर अहंकार उत्पन्न हुआ; उससे पाँच तन्मात्राएँ - यह प्रकृति आठ प्रकार की है।
श्लोक 14 (skanda.7.383.14)
बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्च कर्मेंद्रियाणि च । एकादशं मनो विद्धि महा भूतानि पंच च
buddhīndriyāṇi pañcaiva pañca karmeṁdriyāṇi ca | ekādaśaṁ mano viddhi mahā bhūtāni paṁca ca
पाँच बुद्धि-इन्द्रियाँ, पाँच कर्म-इन्द्रियाँ, और ग्यारहवाँ मन जानो, तथा पाँच महाभूत -
श्लोक 15 (skanda.7.383.15)
गणः षोडशकः सांख्ये विस्तरेण प्रकीर्तितः । चतुर्विंशतितत्त्वानि पुरुषः पंचविंशकः
gaṇaḥ ṣoḍaśakaḥ sāṁkhye vistareṇa prakīrtitaḥ | caturviṁśatitattvāni puruṣaḥ paṁcaviṁśakaḥ
यह सोलह का समूह सांख्य में विस्तार से वर्णित है। चौबीस तत्त्वों के साथ पुरुष पच्चीसवाँ है।
श्लोक 16 (skanda.7.383.16)
देहीति प्रोच्यते देहे स चात्मानं च पश्यति । विंदन्ति परमात्मानं षष्ठं तं विंशतेः परम्
dehīti procyate dehe sa cātmānaṁ ca paśyati | viṁdanti paramātmānaṁ ṣaṣṭhaṁ taṁ viṁśateḥ param
देह में वह 'देही' कहा जाता है, और वह अपने आत्मा को भी देखता है; विद्वान उस बीसी से परे छठे परमात्मा को पाते हैं।
श्लोक 17 (skanda.7.383.17)
आसनादिप्रकारा ये ते ज्ञेयाः प्रथमं सदा । यदा दीपशिखाप्रायं ज्योतिः पश्यंति ते हृदि
āsanādiprakārā ye te jñeyāḥ prathamaṁ sadā | yadā dīpaśikhāprāyaṁ jyotiḥ paśyaṁti te hṛdi
आसन आदि के जो प्रकार हैं, वे सदा पहले जानने चाहिए। जब वे हृदय में दीपशिखा के समान ज्योति देखते हैं -
श्लोक 18 (skanda.7.383.18)
उत्पन्नज्ञानसद्भावा भण्यास्ते योगिनो बुधैः । पूर्वं जरां जरयति रोगा नश्यति दूरतः
utpannajñānasadbhāvā bhaṇyāste yogino budhaiḥ | pūrvaṁ jarāṁ jarayati rogā naśyati dūrataḥ
तब विद्वानों द्वारा वे योगी उत्पन्न-ज्ञान वाले कहे जाते हैं। पहले वृद्धावस्था को वे जीत लेते हैं, रोग दूर भाग जाते हैं।
श्लोक 19 (skanda.7.383.19)
सर्वपापचये क्षीणे पश्चान्मृत्युं स विंदति । मृतो लोके नरो नास्ति योगी जानाति चेत्स्वयम्
sarvapāpacaye kṣīṇe paścānmṛtyuṁ sa viṁdati | mṛto loke naro nāsti yogī jānāti cetsvayam
समस्त पापों का संचय क्षीण होने पर ही उसे मृत्यु मिलती है। यदि योगी स्वयं जानता हो, तो संसार में उसके समान मृत मनुष्य कोई नहीं है।
श्लोक 20 (skanda.7.383.20)
तदा द्वाराणि संरुद्ध्य दश प्राणान्स मुञ्चति । पुण्य पापक्षयं कृत्वा प्राणा गच्छंति योगिनाम् । अणिमादिगुणैश्वर्यं प्राप्नुवंति शिवालये
tadā dvārāṇi saṁruddhya daśa prāṇānsa muñcati | puṇya pāpakṣayaṁ kṛtvā prāṇā gacchaṁti yoginām | aṇimādiguṇaiśvaryaṁ prāpnuvaṁti śivālaye
तब द्वारों को अवरुद्ध कर वह अपने दस प्राणों को छोड़ता है; पुण्य-पाप का क्षय कर योगियों के प्राण चले जाते हैं, और वे शिवालय में अणिमा आदि गुणों के ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 21 (skanda.7.383.21)
अनेन ध्यानयोगेन भवं पश्यति मानवः । मनसा चिंतितं सर्वं सम्प्राप्तं भवदर्शनात्
anena dhyānayogena bhavaṁ paśyati mānavaḥ | manasā ciṁtitaṁ sarvaṁ samprāptaṁ bhavadarśanāt
इस ध्यान-योग से मनुष्य भव को देखता है; भव के दर्शन से मन में चिंतित सब कुछ प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 22 (skanda.7.383.22)
एवमास्ते यदा विप्रो वामनो भवसन्निधौ । गगनादवतीर्णं तं तदा पश्यति नारदम्
evamāste yadā vipro vāmano bhavasannidhau | gaganādavatīrṇaṁ taṁ tadā paśyati nāradam
इस प्रकार जब ब्राह्मण वामन भव के सान्निध्य में बैठे थे, तब उन्होंने आकाश से उतरते हुए नारद को देखा।
श्लोक 23 (skanda.7.383.23)
वामन उवाच महर्षे कुशलं तेऽद्य कस्मादागम्यते त्वया । प्रणमामि महर्षे त्वां ब्रह्मैव त्वं जगत्त्रये
vāmana uvāca maharṣe kuśalaṁ te'dya kasmādāgamyate tvayā | praṇamāmi maharṣe tvāṁ brahmaiva tvaṁ jagattraye
वामन ने कहा - हे महर्षे, आज आपका कुशल है? आप कहाँ से आ रहे हैं? हे महर्षे, मैं आपको प्रणाम करता हूँ - तीनों लोकों में आप स्वयं ब्रह्म हैं।
श्लोक 24 (skanda.7.383.24)
नारद उवाच स्वर्ग लोकादहं प्राप्तः कुशलं किं ब्रवीमि ते
nārada uvāca svarga lokādahaṁ prāptaḥ kuśalaṁ kiṁ bravīmi te
नारद ने कहा - मैं स्वर्गलोक से आया हूँ; मैं तुम्हें अपना कुशल क्या बताऊँ?
श्लोक 25 (skanda.7.383.25)
यातायातैर्दिनेशस्य पूर्य्यते ब्रह्मणो दिनम् । दिनांते जायते रात्री रात्रौ नश्यंति देवताः
yātāyātairdineśasya pūryyate brahmaṇo dinam | dināṁte jāyate rātrī rātrau naśyaṁti devatāḥ
सूर्य के आवागमन से ब्रह्मा का दिन पूरा होता है; दिन के अंत में रात्रि होती है, और रात्रि में देवता भी नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 26 (skanda.7.383.26)
का कथा मृत्युलोकस्य ये म्रियंते दिनेदिने । नभो धूमाकुलं जातं देवा बलिगृहे गताः
kā kathā mṛtyulokasya ye mriyaṁte dinedine | nabho dhūmākulaṁ jātaṁ devā baligṛhe gatāḥ
फिर मृत्युलोक की क्या कथा, जहाँ प्राणी दिन-प्रतिदिन मरते हैं? आकाश धुएँ से भर गया है, देवता बलि के घर गए हैं।
श्लोक 27 (skanda.7.383.27)
सप्तर्षयो गतास्तत्र ब्रह्मणा ब्रह्मचारिणः । हाहाहूहूस्तुंबरुश्च गतौ नारदपर्वतौ
saptarṣayo gatāstatra brahmaṇā brahmacāriṇaḥ | hāhāhūhūstuṁbaruśca gatau nāradaparvatau
सप्तर्षि वहाँ गए हैं, ब्रह्मा के ब्रह्मचारी शिष्यों सहित; हाहा, हूहू और तुम्बुरु भी गए हैं, और नारद-पर्वत भी।
श्लोक 28 (skanda.7.383.28)
अप्सरोगणगन्धर्वाः संप्राप्ता बलिमंदिरे । उत्पातशांतिको यज्ञः क्रियते बलिना स्वयम्
apsarogaṇagandharvāḥ saṁprāptā balimaṁdire | utpātaśāṁtiko yajñaḥ kriyate balinā svayam
अप्सरा-गण और गन्धर्व बलि के भवन में पहुँच गए हैं; उत्पातों की शांति के लिए बलि स्वयं यज्ञ कर रहे हैं।
श्लोक 29 (skanda.7.383.29)
तत्रैव गन्तुमिच्छामि द्रष्टुं यज्ञं बलेर्गृहे । सहस्रमेकं यज्ञानामेकोनं विदधे बलिः
tatraiva gantumicchāmi draṣṭuṁ yajñaṁ balergṛhe | sahasramekaṁ yajñānāmekonaṁ vidadhe baliḥ
मैं भी वहीं जाना चाहता हूँ, बलि के घर उस यज्ञ को देखने। बलि ने निन्यानवे सौ निन्यानवे यज्ञ कर लिए हैं।
श्लोक 30 (skanda.7.383.30)
दैत्यानां भुवनं सर्वं संपूर्णेऽस्मिन्भविष्यति । असावतिशयः कोऽपि प्रारब्धो यज्ञकर्मणि । द्विजातिभ्यो मया देयं येन यद्याच्यते स्वयम्
daityānāṁ bhuvanaṁ sarvaṁ saṁpūrṇe'sminbhaviṣyati | asāvatiśayaḥ ko'pi prārabdho yajñakarmaṇi | dvijātibhyo mayā deyaṁ yena yadyācyate svayam
यह पूर्ण होने पर दैत्यों का सम्पूर्ण भुवन बन जाएगा। यज्ञ-कर्म में एक ऐसा असाधारण संकल्प लिया गया है कि जो भी ब्राह्मण जो कुछ माँगेगा, मैं उसे अवश्य दूँगा -
श्लोक 31 (skanda.7.383.31)
वारितेनापि मे देयं सत्यमस्तु वचो मम । आत्मानमपि दारांश्च राज्यं पुत्रान्प्रियान्मम
vāritenāpi me deyaṁ satyamastu vaco mama | ātmānamapi dārāṁśca rājyaṁ putrānpriyānmama
रोके जाने पर भी दूँगा, मेरा वचन सत्य हो - अपना शरीर, अपनी पत्नियाँ, राज्य, अपने प्रिय पुत्र भी -
श्लोक 32 (skanda.7.383.32)
प्रार्थितश्चेन्न दास्यामि व्यर्थो भवतु मेऽध्वरः । अनेन वचसा जाता महती मे शिरो व्यथा । प्रतिज्ञाय कथं यज्ञः संपूर्णोऽयं भविष्यति
prārthitaścenna dāsyāmi vyartho bhavatu me'dhvaraḥ | anena vacasā jātā mahatī me śiro vyathā | pratijñāya kathaṁ yajñaḥ saṁpūrṇo'yaṁ bhaviṣyati
यदि माँगे जाने पर न दूँ, तो मेरा यज्ञ व्यर्थ हो। इस वचन से मुझे बड़ा सिरदर्द हो गया है - ऐसी प्रतिज्ञा लेकर यह यज्ञ कैसे पूर्ण होगा?
श्लोक 33 (skanda.7.383.33)
भंगोपायं न पश्यामि भ्रमामि भुवनत्रये । विध्वंसकारिणं ज्ञात्वा भवंतं पर्युपस्थितः
bhaṁgopāyaṁ na paśyāmi bhramāmi bhuvanatraye | vidhvaṁsakāriṇaṁ jñātvā bhavaṁtaṁ paryupasthitaḥ
मुझे इसे भंग करने का कोई उपाय नहीं दिखता, मैं तीनों लोकों में भटकता हूँ। तुम्हें विध्वंस करने वाला जानकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ -
श्लोक 34 (skanda.7.383.34)
यथा न पूर्यते यज्ञस्तथेदानीं विधीयताम्
yathā na pūryate yajñastathedānīṁ vidhīyatām
अब ऐसा करो कि यह यज्ञ पूर्ण न हो सके।
श्लोक 35 (skanda.7.383.35)
वामन उवाच महर्षे शृणु मे वाक्यं का शक्तिर्मम विद्यते । कोऽहं कस्मात्करिष्यामि यज्ञे देवाः समागताः
vāmana uvāca maharṣe śṛṇu me vākyaṁ kā śaktirmama vidyate | ko'haṁ kasmātkariṣyāmi yajñe devāḥ samāgatāḥ
वामन ने कहा - हे महर्षे, मेरी बात सुनिए - मुझमें क्या शक्ति है? मैं कौन हूँ, और क्यों करूँ? यज्ञ में तो देवता स्वयं आए हुए हैं -
श्लोक 36 (skanda.7.383.36)
ऋषयो ब्राह्मणाः सर्वे कथं व्यर्थो भविष्यति । अपरं शृणु मे वाक्यं ब्रह्मर्षे ब्रह्मणस्पते
ṛṣayo brāhmaṇāḥ sarve kathaṁ vyartho bhaviṣyati | aparaṁ śṛṇu me vākyaṁ brahmarṣe brahmaṇaspate
तथा सभी ऋषि और ब्राह्मण भी - वह व्यर्थ कैसे होगा? परन्तु मेरी एक और बात सुनिए, हे ब्रह्मर्षि, हे ब्रह्मणस्पते -
श्लोक 37 (skanda.7.383.37)
न कलत्रं न ते पुत्राः कस्मात्प्रकृतिरीदृशी । युद्धं विना न ते सौख्यं न सौख्यं कलहं विना
na kalatraṁ na te putrāḥ kasmātprakṛtirīdṛśī | yuddhaṁ vinā na te saukhyaṁ na saukhyaṁ kalahaṁ vinā
न पत्नी है, न पुत्र, फिर भी आपका ऐसा स्वभाव क्यों है? युद्ध के बिना आपको सुख नहीं, कलह के बिना सुख नहीं।
श्लोक 38 (skanda.7.383.38)
यादृशस्ता दृशो वाऽपि वाग्वादोऽपि सदा प्रियः । स्नानं संध्या जपो होमस्तर्पणं पितृदेवयोः
yādṛśastā dṛśo vā'pi vāgvādo'pi sadā priyaḥ | snānaṁ saṁdhyā japo homastarpaṇaṁ pitṛdevayoḥ
आपका स्वभाव कैसा भी हो, वाद-विवाद आपको सदा प्रिय है। स्नान, संध्या, जप, हवन, पितृ-देवों का तर्पण -
श्लोक 39 (skanda.7.383.39)
नारदः कुरुते चान्यदन्यत्कुर्वंति ब्राह्मणाः । ममापि कौतुकं जातं महर्षे वद सत्वरम्
nāradaḥ kurute cānyadanyatkurvaṁti brāhmaṇāḥ | mamāpi kautukaṁ jātaṁ maharṣe vada satvaram
नारद कुछ और करते हैं, ब्राह्मण कुछ और करते हैं! मुझे भी कौतूहल हुआ है, हे महर्षे, शीघ्र बताइए।
श्लोक 40 (skanda.7.383.40)
नारद उवाच पाद्मकल्पे व्यतिक्रांते रात्र्यंते शृणु वामन । ब्रह्माण्डं वारिणा व्याप्तमन्यत्किं चिन्न विद्यते
nārada uvāca pādmakalpe vyatikrāṁte rātryaṁte śṛṇu vāmana | brahmāṇḍaṁ vāriṇā vyāptamanyatkiṁ cinna vidyate
नारद ने कहा - सुनो वामन, पाद्म कल्प के बीत जाने पर, रात्रि के अंत में, ब्रह्मांड जल से व्याप्त था, और कुछ भी नहीं था।
श्लोक 41 (skanda.7.383.41)
अप्सु शेते देवदेवः स च नारायणः स्मृतः । स ब्रह्मा स शिवो नास्ति भेदस्तेषां परस्परम्
apsu śete devadevaḥ sa ca nārāyaṇaḥ smṛtaḥ | sa brahmā sa śivo nāsti bhedasteṣāṁ parasparam
जल पर देवों के देव शयन करते थे, जो नारायण नाम से स्मृत हैं; वे ही ब्रह्मा हैं, वे ही शिव हैं - उनमें परस्पर कोई भेद नहीं है।
श्लोक 42 (skanda.7.383.42)
यदा भवंति ते भिन्ना स्तदा देवत्रयं च ते । कर्त्तुं वाराहकल्पं तु भिन्ना जातास्त्रयस्तदा
yadā bhavaṁti te bhinnā stadā devatrayaṁ ca te | karttuṁ vārāhakalpaṁ tu bhinnā jātāstrayastadā
जब वे भिन्न होते हैं, तब वे तीन देवता बनते हैं; वाराह-कल्प को करने के लिए वे तीनों तब भिन्न हो गए।
श्लोक 43 (skanda.7.383.43)
ब्रह्मविष्णुहरा देवा रजःसत्त्वतमोमयाः । सृष्टिं ब्रह्मा करोत्येवं तां च पालयते हरिः
brahmaviṣṇuharā devā rajaḥsattvatamomayāḥ | sṛṣṭiṁ brahmā karotyevaṁ tāṁ ca pālayate hariḥ
ब्रह्मा, विष्णु और हर - ये देवगण क्रमशः रजो, सत्त्व और तमो से युक्त हैं। इस प्रकार ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, और हरि उसका पालन करते हैं,
श्लोक 44 (skanda.7.383.44)
हरः संहरते सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । एवं प्रवर्त्य देवेश उपविष्टा वरासने । कैलासशिखरे रम्ये मंत्रयंति परस्परम्
haraḥ saṁharate sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram | evaṁ pravartya deveśa upaviṣṭā varāsane | kailāsaśikhare ramye maṁtrayaṁti parasparam
और हर चराचर सहित सम्पूर्ण त्रैलोक्य का संहार करते हैं। इस प्रकार प्रवृत्त कर, देवेश्वरगण श्रेष्ठ आसनों पर बैठकर, कैलास के रमणीय शिखर पर परस्पर मंत्रणा करने लगे -
श्लोक 45 (skanda.7.383.45)
त्रयाणां को वरो देवः को ज्येष्ठः को गुणाधिकः । चतुर्थो नास्ति यो वेत्ति सहसा ते त्रयः स्थिताः
trayāṇāṁ ko varo devaḥ ko jyeṣṭhaḥ ko guṇādhikaḥ | caturtho nāsti yo vetti sahasā te trayaḥ sthitāḥ
तीनों में कौन श्रेष्ठ देव है, कौन ज्येष्ठ है, कौन गुणाधिक है - चूँकि इसे जानने वाला कोई चौथा नहीं था, वे तीनों यों ही बैठे रहे।
श्लोक 46 (skanda.7.383.46)
तेभ्यः समुत्थितं ज्योतिरेकीभूतं तदंबरे । कालमानेन युक्तं तद्भ्राम्ते रविमंडलम्
tebhyaḥ samutthitaṁ jyotirekībhūtaṁ tadaṁbare | kālamānena yuktaṁ tadbhrāmte ravimaṁḍalam
उनसे एक ज्योति उत्पन्न हुई, जो आकाश में एकीभूत हो गई; काल-मान से युक्त होकर वह घूमता हुआ सूर्य-मण्डल बन गई।
श्लोक 47 (skanda.7.383.47)
अहं ज्येष्ठो ह्यहं ज्येष्ठो वादोऽभूद्धरब्रह्मणोः । द्वयोर्विवदतोः क्रोधात्संजातोऽहं मुखात्प्रभो
ahaṁ jyeṣṭho hyahaṁ jyeṣṭho vādo'bhūddharabrahmaṇoḥ | dvayorvivadatoḥ krodhātsaṁjāto'haṁ mukhātprabho
'मैं ज्येष्ठ हूँ, मैं ज्येष्ठ हूँ' - हर और ब्रह्मा के बीच ऐसा विवाद हुआ; उन दोनों के विवाद के क्रोध से, हे प्रभो, मैं स्वयं उनके मुख से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 48 (skanda.7.383.48)
कथं देव न जानासि यदुक्तं ब्रह्मणा तदा । दशावतारास्ते रंतुं मत्स्यकूर्मादयः पुरा
kathaṁ deva na jānāsi yaduktaṁ brahmaṇā tadā | daśāvatārāste raṁtuṁ matsyakūrmādayaḥ purā
हे देव, आप कैसे नहीं जानते जो ब्रह्मा ने तब कहा था? मत्स्य-कूर्म आदि तुम्हारे दस अवतार पूर्वकाल में क्रीड़ा के लिए हैं -
श्लोक 49 (skanda.7.383.49)
रुद्रेण वारिता गत्वा कलहो वो न युज्यते । तथैव कृतवान्विष्णुरवतारान्दशैव तान्
rudreṇa vāritā gatvā kalaho vo na yujyate | tathaiva kṛtavānviṣṇuravatārāndaśaiva tān
रुद्र द्वारा रोके जाने पर [ब्रह्मा ने कहा:] 'तुम दोनों के बीच कलह उचित नहीं है।' और वैसे ही विष्णु ने वे दस अवतार धारण किए।
श्लोक 50 (skanda.7.383.50)
कल्पादौ ब्रह्मणो वक्त्रात्संजातोऽहं द्विजोत्तम । कलहाजन्म मे यस्मात्तस्मान्मे कलहः प्रियः
kalpādau brahmaṇo vaktrātsaṁjāto'haṁ dvijottama | kalahājanma me yasmāttasmānme kalahaḥ priyaḥ
कल्प के आरंभ में मैं ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न हुआ, हे द्विजोत्तम; चूँकि मेरा जन्म ही कलह से हुआ, इसीलिए मुझे कलह प्रिय है।
श्लोक 51 (skanda.7.383.51)
कल्पादौ सृजता पूर्वं चिन्वितं ब्रह्मणा स्वयम् । वेदान्तिना कथं सृष्टिः कर्त्तव्याऽहो हरे मया
kalpādau sṛjatā pūrvaṁ cinvitaṁ brahmaṇā svayam | vedāntinā kathaṁ sṛṣṭiḥ karttavyā'ho hare mayā
कल्प के आरंभ में, सृष्टि करते हुए, ब्रह्मा ने पहले स्वयं विचार किया - 'हे हरि, वेदांती होकर मैं सृष्टि कैसे करूँ?'
श्लोक 52 (skanda.7.383.52)
नष्टान्वेदान्न जानामि क्व वेदास्ते गता इति । पृथ्वीमपि न जानामि किं स्थाने किमधो गता
naṣṭānvedānna jānāmi kva vedāste gatā iti | pṛthvīmapi na jānāmi kiṁ sthāne kimadho gatā
'मुझे नहीं पता कि नष्ट हुए वेद कहाँ गए हैं; मुझे यह भी नहीं पता कि पृथ्वी अपने स्थान पर है या नीचे चली गई है।'
श्लोक 53 (skanda.7.383.53)
गंतुं न विद्यते शक्तिर्जलमध्ये ममाधुना । अवतारैस्त्वया कार्यं दशभिः सृष्टिरक्षण म्
gaṁtuṁ na vidyate śaktirjalamadhye mamādhunā | avatāraistvayā kāryaṁ daśabhiḥ sṛṣṭirakṣaṇa m
'अभी मुझमें जल के मध्य जाने की शक्ति नहीं है। तुम्हें अपने दस अवतारों द्वारा सृष्टि की रक्षा का कार्य करना होगा।'
श्लोक 54 (skanda.7.383.54)
जले जलेचरो मत्स्यो महानद्यां भविष्यसि । आदाय वेदान्वेगेन मम त्वं दातुमर्हसि
jale jalecaro matsyo mahānadyāṁ bhaviṣyasi | ādāya vedānvegena mama tvaṁ dātumarhasi
'जल में जलचर मत्स्य बनकर तुम महानदी में प्रकट होओगे; वेदों को लेकर वेगपूर्वक तुम मुझे देना।'
श्लोक 55 (skanda.7.383.55)
तथा च कृतवान्देवो मत्स्यरूपं जले महत् । वेदान्समानयामास ददौ च ब्रह्मणे पुरा । कूर्मरूपं पुनः कृत्वा मंदरं धारयिष्यसि
tathā ca kṛtavāndevo matsyarūpaṁ jale mahat | vedānsamānayāmāsa dadau ca brahmaṇe purā | kūrmarūpaṁ punaḥ kṛtvā maṁdaraṁ dhārayiṣyasi
और वैसे ही देव ने जल में विशाल मत्स्य-रूप धारण किया; वेदों को लाकर उन्होंने पूर्वकाल में ब्रह्मा को दिया। 'फिर कूर्म-रूप धारण कर तुम मंदराचल को धारण करोगे -'
श्लोक 56 (skanda.7.383.56)
इत्युक्तो ब्रह्मणा विष्णुर्लक्ष्मीस्त्वां वरयिष्यति । पुरा चित्रं चरित्रं ते मथने दृष्टवानहम्
ityukto brahmaṇā viṣṇurlakṣmīstvāṁ varayiṣyati | purā citraṁ caritraṁ te mathane dṛṣṭavānaham
ब्रह्मा द्वारा ऐसा कहे जाने पर, [भविष्यवाणी हुई:] 'और लक्ष्मी तुम्हें पति के रूप में चुनेगी।' मैंने स्वयं तुम्हारे मंथन के समय के विचित्र चरित को देखा था।
श्लोक 57 (skanda.7.383.57)
यदा रसातलं प्राप्ता पृथिवी नैव दृश्यते । ब्रह्मांडार्थे स्थानकृते तत्र सा नैव दृश्यते ।
yadā rasātalaṁ prāptā pṛthivī naiva dṛśyate | brahmāṁḍārthe sthānakṛte tatra sā naiva dṛśyate |
जब पृथ्वी रसातल को प्राप्त होकर दिखाई नहीं देती थी - ब्रह्मांड के लिए बनाया गया स्थान भी वहाँ दिखाई नहीं देता था -
श्लोक 58 (skanda.7.383.58)
वाराहं क्रियतां रूपं ब्रह्मणा प्रेरितः स्वयम् । महावराहरूपं स कृत्वा भूमेरधो गतः
vārāhaṁ kriyatāṁ rūpaṁ brahmaṇā preritaḥ svayam | mahāvarāharūpaṁ sa kṛtvā bhūmeradho gataḥ
'वाराह रूप धारण करो' - स्वयं ब्रह्मा द्वारा प्रेरित होकर, उन्होंने महावराह रूप धारण कर भूमि के नीचे प्रवेश किया।
श्लोक 59 (skanda.7.383.59)
उद्धृत्य च तदा विष्णुर्दंष्ट्राग्रेण वसुंधराम् । स निनाय यथास्थानं मुस्तां व धरणीतलात्
uddhṛtya ca tadā viṣṇurdaṁṣṭrāgreṇa vasuṁdharām | sa nināya yathāsthānaṁ mustāṁ va dharaṇītalāt
और तब विष्णु ने अपने दाँत के अग्रभाग पर पृथ्वी को उठाकर, उसे यथास्थान वैसे ही ले गए जैसे घास का गुच्छा धरती से उठाया जाता है।
श्लोक 60 (skanda.7.383.60)
अवतारं तृतीयं वै हरस्यापि मनोहरम् । येन सा पृथिवी पृथ्वी पर्वतैः सहिता धृता
avatāraṁ tṛtīyaṁ vai harasyāpi manoharam | yena sā pṛthivī pṛthvī parvataiḥ sahitā dhṛtā
यह तीसरा अवतार था, हर को भी मनोहर लगने वाला, जिससे पर्वतों सहित विशाल पृथ्वी धारण की गई।
श्लोक 61 (skanda.7.383.61)
चतुर्थं नरसिंहं वै कथयामि सुदारुणम् । आदित्या अदितेः पुत्रा दितेः पुत्रौ महावलौ
caturthaṁ narasiṁhaṁ vai kathayāmi sudāruṇam | ādityā aditeḥ putrā diteḥ putrau mahāvalau
अब मैं चौथे, अत्यंत भयंकर नरसिंह की कथा कहता हूँ। अदिति के पुत्र आदित्य थे; दिति के दो महाबली पुत्र थे -
श्लोक 62 (skanda.7.383.62)
हिरण्यकशिपुर्दैत्यो हिरण्याक्षो महाबलः । स्वर्गे देवाः स्थिताः सर्वे पाताले दैत्यदानवाः
hiraṇyakaśipurdaityo hiraṇyākṣo mahābalaḥ | svarge devāḥ sthitāḥ sarve pātāle daityadānavāḥ
दैत्य हिरण्यकशिपु और महाबली हिरण्याक्ष। सभी देवता स्वर्ग में स्थित थे, दैत्य-दानव पाताल में।
श्लोक 63 (skanda.7.383.63)
हिरण्यकशिपुश्चक्रे दैत्यो राज्यं रसातले । मनुपुत्रा धरापृष्ठे स्थापिता देवदानवैः
hiraṇyakaśipuścakre daityo rājyaṁ rasātale | manuputrā dharāpṛṣṭhe sthāpitā devadānavaiḥ
दैत्य हिरण्यकशिपु ने रसातल में राज्य किया; मनु के पुत्र देव-दानवों द्वारा पृथ्वी की सतह पर स्थापित किए गए थे।
श्लोक 64 (skanda.7.383.64)
व्यवस्थां तामतिक्रम्य हिरण्यकशिपुर्द्विज । राज्यं चक्रे धरापृष्ठे सुरेन्द्रं स विजित्य च
vyavasthāṁ tāmatikramya hiraṇyakaśipurdvija | rājyaṁ cakre dharāpṛṣṭhe surendraṁ sa vijitya ca
उस व्यवस्था का उल्लंघन कर, हे द्विज, हिरण्यकशिपु ने देवेन्द्र को जीतकर पृथ्वी की सतह पर भी राज्य कर लिया।
श्लोक 65 (skanda.7.383.65)
सप्तद्वीपवतीं पृथ्वीं गृहीत्वा साऽमरावतीम् । ग्रहीतुकामो बुभुजे पुत्रपौत्रैः कृतादरः
saptadvīpavatīṁ pṛthvīṁ gṛhītvā sā'marāvatīm | grahītukāmo bubhuje putrapautraiḥ kṛtādaraḥ
सात द्वीपों वाली पृथ्वी को ग्रहण कर, और अमरावती को भी ग्रहण करने की इच्छा से, वह पुत्र-पौत्रों से आदृत होकर भोग करता रहा।
श्लोक 66 (skanda.7.383.66)
प्रह्लादप्रमुखान्पुत्रान्स पीडयति मंदधीः । पुत्रेषु पाठ्यमानेषु प्रह्लादोऽपि पपाठ तत्
prahlādapramukhānputrānsa pīḍayati maṁdadhīḥ | putreṣu pāṭhyamāneṣu prahlādo'pi papāṭha tat
वह मंदबुद्धि प्रह्लाद-प्रमुख अपने पुत्रों को पीड़ा देता था। पुत्रों को पढ़ाए जाने पर प्रह्लाद ने भी वही पढ़ा -
श्लोक 67 (skanda.7.383.67)
येन वै पठ्यमानेन जायते तस्य वेदना । भुवनद्वयराज्येन दैत्यो देवान्न मन्यते
yena vai paṭhyamānena jāyate tasya vedanā | bhuvanadvayarājyena daityo devānna manyate
जिसके पढ़े जाने से ही उसकी [पिता की] वेदना उत्पन्न होती थी। दो लोकों का राज्य पाकर वह दैत्य देवताओं को नहीं मानता था।
श्लोक 68 (skanda.7.383.68)
तपसा तोषितो ब्रह्मा ददौ तस्मै वरं प्रभुः । अमरत्वं स देवेभ्यो मनुष्येभ्यः सुरोत्तम
tapasā toṣito brahmā dadau tasmai varaṁ prabhuḥ | amaratvaṁ sa devebhyo manuṣyebhyaḥ surottama
तप से संतुष्ट होकर प्रभु ब्रह्मा ने उसे वर दिया - हे सुरोत्तम, न देवताओं से, न मनुष्यों से मृत्यु हो -
श्लोक 69 (skanda.7.383.69)
कस्मादपि न मे भूयान्मरणं यदि चेद्भवेत् । किंचित्सिंहो नरः किंचिद्यो भवेद्धरणीधरः
kasmādapi na me bhūyānmaraṇaṁ yadi cedbhavet | kiṁcitsiṁho naraḥ kiṁcidyo bhaveddharaṇīdharaḥ
किसी भी कारण से मेरी मृत्यु न हो; यदि हो भी, तो कुछ सिंह जैसा, कुछ मनुष्य जैसा कोई हो, जो पृथ्वी को धारण करने वाला हो -
श्लोक 70 (skanda.7.383.70)
तस्मात्कररुहैभिन्नो मरिष्ये न धरातले । एवं भविष्यतीत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा च विस्मयम्
tasmātkararuhaibhinno mariṣye na dharātale | evaṁ bhaviṣyatītyuktvā gato brahmā ca vismayam
उसी के नखों से विदीर्ण होकर मैं भूमि पर न मरूँ। 'ऐसा ही होगा' कहकर ब्रह्मा आश्चर्यचकित होकर चले गए।
श्लोक 71 (skanda.7.383.71)
कालेन गच्छता तस्य संजातो विग्रहो महान् । देवाः किं मे करिष्यंति विष्णुना किं प्रयोजनम्
kālena gacchatā tasya saṁjāto vigraho mahān | devāḥ kiṁ me kariṣyaṁti viṣṇunā kiṁ prayojanam
समय बीतने पर उसमें महान शत्रुता उत्पन्न हुई - 'देवता मेरा क्या करेंगे? मुझे विष्णु से क्या प्रयोजन?'
श्लोक 72 (skanda.7.383.72)
यष्टव्योऽहं सदा यज्ञै रुद्रः किं मे करिष्यति । एवं हि वर्त्तमानस्य प्रह्लादः स्तौति तं हरिम् ।
yaṣṭavyo'haṁ sadā yajñai rudraḥ kiṁ me kariṣyati | evaṁ hi varttamānasya prahlādaḥ stauti taṁ harim |
'मैं ही सदा यज्ञों से पूज्य होना चाहिए, रुद्र मेरा क्या करेगा?' इस प्रकार वह रहता था, जबकि प्रह्लाद उसी हरि की स्तुति करता था।
श्लोक 73 (skanda.7.383.73)
येनास्य जायते मृत्युस्तमेव स्मरते हरिम् । यदासौ वार्यमाणोऽपि विरौति च हरिं हरिम्
yenāsya jāyate mṛtyustameva smarate harim | yadāsau vāryamāṇo'pi virauti ca hariṁ harim
जिस हरि से उसके [पिता के] मृत्यु का कारण बनना था, उसी हरि को वह स्मरण करता था; रोके जाने पर भी वह 'हरि, हरि' पुकारता था -
श्लोक 74 (skanda.7.383.74)
चतुर्भुजं शंखगदासिधारिणं पीतांबरं कौस्तुभ लाञ्छितं सदा । स्मरामि विष्णुं जगदेकनायकं ददाति मुक्तिं स्मृतमात्र एव यः
caturbhujaṁ śaṁkhagadāsidhāriṇaṁ pītāṁbaraṁ kaustubha lāñchitaṁ sadā | smarāmi viṣṇuṁ jagadekanāyakaṁ dadāti muktiṁ smṛtamātra eva yaḥ
'मैं चतुर्भुज विष्णु का स्मरण करता हूँ, जो शंख-गदा-खड्ग धारण करते हैं, पीतांबरधारी हैं, सदा कौस्तुभ-मणि से सुशोभित हैं, जगत् के एकमात्र स्वामी हैं, जो केवल स्मरण करने मात्र से मुक्ति देते हैं।'
श्लोक 75 (skanda.7.383.75)
अनेन वचसा क्षुब्धो दैत्यो देत्यान्दि देश ह । मारयध्वं तु तं दुष्टं गज सर्पजलाग्नितः
anena vacasā kṣubdho daityo detyāndi deśa ha | mārayadhvaṁ tu taṁ duṣṭaṁ gaja sarpajalāgnitaḥ
इन वचनों से क्षुब्ध होकर दैत्य ने दैत्यों को आदेश दिया - इस दुष्ट को हाथी, सर्प, जल या अग्नि से मार डालो!
श्लोक 76 (skanda.7.383.76)
प्रह्लाद उवाच गजेपि विष्णुर्भुजगेऽपि विष्णुर्जलेऽपि विष्णुर्ज्वलनेऽपि विष्णुः । त्वयि स्थितो दैत्य मयि स्थितश्च विष्णुं विना दैत्यगणाऽपि नास्ति
prahlāda uvāca gajepi viṣṇurbhujage'pi viṣṇurjale'pi viṣṇurjvalane'pi viṣṇuḥ | tvayi sthito daitya mayi sthitaśca viṣṇuṁ vinā daityagaṇā'pi nāsti
प्रह्लाद ने कहा - हाथी में भी विष्णु हैं, सर्प में भी विष्णु हैं, जल में भी विष्णु हैं, अग्नि में भी विष्णु हैं; हे दैत्य, वे तुझमें भी स्थित हैं और मुझमें भी - विष्णु के बिना दैत्य-गण भी नहीं हैं।
श्लोक 77 (skanda.7.383.77)
यदा स मार्यमाणोऽपि मृत्युं प्राप्नोति न क्वचित् । हिरण्यकशिपोर्वक्षो दह्यते क्रोधवह्निना । तदा शिक्षयितुं पुत्रं मुखाग्रे संनिवेश्य च
yadā sa māryamāṇo'pi mṛtyuṁ prāpnoti na kvacit | hiraṇyakaśiporvakṣo dahyate krodhavahninā | tadā śikṣayituṁ putraṁ mukhāgre saṁniveśya ca
जब वह मारे जाने पर भी कहीं मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ, तो हिरण्यकशिपु का वक्षस्थल क्रोध की अग्नि से जलने लगा; तब पुत्र को शिक्षा देने के लिए उसे अपने सामने बिठाकर -
श्लोक 78 (skanda.7.383.78)
वचोभिः कठिनैः पुत्रं स्वयं हन्तुं समुद्यतः ॥ । धिक्त्वा नारायणं स्तौषि ममारिं स्तौषि चेत्पुनः
vacobhiḥ kaṭhinaiḥ putraṁ svayaṁ hantuṁ samudyataḥ | dhiktvā nārāyaṇaṁ stauṣi mamāriṁ stauṣi cetpunaḥ
कठोर वचनों से वह स्वयं पुत्र को मारने के लिए उठ खड़ा हुआ - धिक्कार है, तू नारायण की स्तुति करता है, मेरे शत्रु की! यदि फिर से स्तुति करेगा -
श्लोक 79 (skanda.7.383.79)
पुष्पलावं लविष्यामि शिरस्तेऽहं वरासिना । अहं विष्णुरहं ब्रह्मा रुद्र इन्द्रो वरं वद
puṣpalāvaṁ laviṣyāmi śiraste'haṁ varāsinā | ahaṁ viṣṇurahaṁ brahmā rudra indro varaṁ vada
तो मैं फूल तोड़ने की भाँति अपनी श्रेष्ठ तलवार से तेरा सिर काट दूँगा। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र हूँ - मुझे ही सर्वोच्च कहो।
श्लोक 80 (skanda.7.383.80)
आत्मीयं पितरं मुक्त्वा कमन्यं स्तौषि बालक
ātmīyaṁ pitaraṁ muktvā kamanyaṁ stauṣi bālaka
अपने ही पिता को छोड़कर, हे बालक, तू और किसकी स्तुति करता है?
श्लोक 81 (skanda.7.383.81)
यदा न पठते बालः स्तौति नो पितरं स्वकम् । दण्डेनाहत्य गुरुणा प्रह्लादः प्रेरितः पुनः । वदैकं वचनं शिष्य देहि मे गुरुदक्षिणाम्
yadā na paṭhate bālaḥ stauti no pitaraṁ svakam | daṇḍenāhatya guruṇā prahlādaḥ preritaḥ punaḥ | vadaikaṁ vacanaṁ śiṣya dehi me gurudakṣiṇām
जब बालक ने नहीं पढ़ा और अपने पिता की स्तुति नहीं की, तो गुरु ने दण्ड से मारकर प्रह्लाद को फिर प्रेरित किया - हे शिष्य, एक वचन बोलो, मुझे गुरु-दक्षिणा दो -
श्लोक 82 (skanda.7.383.82)
यथा मे तुष्यते स्वामी ददाति विपुलं धनम्
yathā me tuṣyate svāmī dadāti vipulaṁ dhanam
जिससे मेरे स्वामी प्रसन्न होकर मुझे प्रचुर धन दें।
श्लोक 83 (skanda.7.383.83)
प्रह्लाद उवाच प्रहरस्व प्रथमं मां करिष्ये वचनं गुरो । स्तौमि विष्णुमहं येन त्रैलोक्यं सचराचरम्
prahlāda uvāca praharasva prathamaṁ māṁ kariṣye vacanaṁ guro | staumi viṣṇumahaṁ yena trailokyaṁ sacarācaram
प्रह्लाद ने कहा - पहले मुझे मारिए, फिर मैं आपकी बात मानूँगा, हे गुरु। मैं उस विष्णु की स्तुति करता हूँ, जिनसे चराचर सहित त्रैलोक्य -
श्लोक 84 (skanda.7.383.84)
कृतं संवर्द्धितं शांतं स मे विष्णुः प्रसीदतु । ब्रह्मा विष्णुर्हरो विष्णु रिन्द्रो वायुर्यमोऽनलः
kṛtaṁ saṁvarddhitaṁ śāṁtaṁ sa me viṣṇuḥ prasīdatu | brahmā viṣṇurharo viṣṇu rindro vāyuryamo'nalaḥ
निर्मित, पालित और शांत किया गया - वह विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों। ब्रह्मा विष्णु हैं, हर विष्णु हैं, तथा इन्द्र, वायु, यम, अग्नि भी -
श्लोक 85 (skanda.7.383.85)
प्रकृत्यादीनि तत्त्वानि पुरुषं पंचविंशकम् । पितृदेहे गुरोर्देहे मम देहेऽपि संस्थितः
prakṛtyādīni tattvāni puruṣaṁ paṁcaviṁśakam | pitṛdehe gurordehe mama dehe'pi saṁsthitaḥ
प्रकृति आदि तत्त्व, और पच्चीसवें पुरुष - वे मेरे पिता के शरीर में, गुरु के शरीर में, और मेरे शरीर में भी स्थित हैं।
श्लोक 86 (skanda.7.383.86)
एवं जानन्कथं स्तौमि म्रियमाणं नराधमम्
evaṁ jānankathaṁ staumi mriyamāṇaṁ narādhamam
यह जानते हुए मैं किसी मरणशील नराधम की स्तुति कैसे करूँ?
श्लोक 87 (skanda.7.383.87)
गुरुरुवाच नरेषु कोऽधमः शिष्य जन्मादिमरणेऽधम । कथं न पितरं स्तौषि म्रियमाणो हरिं हरिम् ॥ ।
gururuvāca nareṣu ko'dhamaḥ śiṣya janmādimaraṇe'dhama | kathaṁ na pitaraṁ stauṣi mriyamāṇo hariṁ harim |
गुरु ने कहा - हे शिष्य, मनुष्यों में अधम कौन है, जो जन्म से मृत्यु तक अधम है वही तो! मरते समय तू पिता की स्तुति क्यों नहीं करता, बल्कि 'हरि, हरि' क्यों पुकारता है?
श्लोक 88 (skanda.7.383.88)
प्रह्लाद उवाच भोजने शयने याने ज्वरे निष्ठीवने रणे । हरिरित्यक्षरं नास्ति मरणेऽसौ नराधमः । भये राजकुले युद्धे व्याधौ स्त्रीसंगमे वने । अशक्तौ वाऽथ संन्यासे मरणे भूमिसंस्थिताः । स्मरंति मातरं मूर्खाः पितरं च नराधमाः
prahlāda uvāca bhojane śayane yāne jvare niṣṭhīvane raṇe | harirityakṣaraṁ nāsti maraṇe'sau narādhamaḥ | bhaye rājakule yuddhe vyādhau strīsaṁgame vane | aśaktau vā'tha saṁnyāse maraṇe bhūmisaṁsthitāḥ | smaraṁti mātaraṁ mūrkhāḥ pitaraṁ ca narādhamāḥ
प्रह्लाद ने कहा - भोजन में, शयन में, यात्रा में, ज्वर में, थूकने में, युद्ध में - जिसमें 'हरि' अक्षर नहीं है, मृत्यु के समय वही नराधम है। भय में, राजदरबार में, युद्ध में, रोग में, स्त्री-संगम में, वन में, असमर्थता में, संन्यास में, मृत्यु में, भूमि पर पड़े रहते - मूर्ख माता को स्मरण करते हैं, और नराधम पिता को।
श्लोक 89 (skanda.7.383.89)
माता नास्ति पिता नास्ति नास्ति मे स्वजनो जनः । हरिं विना न कोऽप्यस्ति यद्युक्तं तद्विधीयताम्
mātā nāsti pitā nāsti nāsti me svajano janaḥ | hariṁ vinā na ko'pyasti yadyuktaṁ tadvidhīyatām
मेरी न माता है, न पिता, न कोई मेरा स्वजन है; हरि के बिना कोई नहीं है। जो उचित लगे वह करो।
श्लोक 90 (skanda.7.383.90)
इत्यादिवचनैः क्रुद्धो हन्तुं दैत्यः समुत्थितः । तदा माता समागत्य पुत्रस्य पुरतः स्थिता
ityādivacanaiḥ kruddho hantuṁ daityaḥ samutthitaḥ | tadā mātā samāgatya putrasya purataḥ sthitā
इन आदि वचनों से क्रुद्ध होकर दैत्य उसे मारने के लिए उठ खड़ा हुआ; तब माता आकर पुत्र के सामने खड़ी हो गई।
श्लोक 91 (skanda.7.383.91)
भ्रातरः स्वजनो भगिनी भाषते मा हरिं वद । अहं माता स्वसा चेयं भ्रातरः स्वजनो जनः । यथा संमिलितैर्वत्स स्थीयते वहुवासरम्
bhrātaraḥ svajano bhaginī bhāṣate mā hariṁ vada | ahaṁ mātā svasā ceyaṁ bhrātaraḥ svajano janaḥ | yathā saṁmilitairvatsa sthīyate vahuvāsaram
भाई, स्वजन और बहिन ने कहा - हरि का नाम मत लो! मैं तुम्हारी माता हूँ, यह तुम्हारी बहिन है, ये भाई हैं, स्वजन हैं - हे वत्स, जैसे मिलकर बहुत दिन साथ रहा जाता है -
श्लोक 92 (skanda.7.383.92)
प्रह्लाद उवाच माता मे का स्वसा मे का भ्रातरः के पिता च कः । स्वजनं शृणु मे मातः सहितैः स्थीयते सदा
prahlāda uvāca mātā me kā svasā me kā bhrātaraḥ ke pitā ca kaḥ | svajanaṁ śṛṇu me mātaḥ sahitaiḥ sthīyate sadā
प्रह्लाद ने कहा - मेरी माता कौन है, बहिन कौन, भाई कौन, पिता कौन? हे माता, मेरे सच्चे स्वजन को सुनो, जिनके साथ सदा रहा जाता है।
श्लोक 93 (skanda.7.383.93)
यस्याः पीतं मया मूत्रं पुरीषमुदरे बहु । सा माता नरकोऽस्माकमग्रे वक्तुं न शक्यते
yasyāḥ pītaṁ mayā mūtraṁ purīṣamudare bahu | sā mātā narako'smākamagre vaktuṁ na śakyate
जिसका मूत्र मैंने पिया, जिसके उदर में बहुत मल के बीच रहा - ऐसी माता हमारे लिए नरक है, यह आगे कहा नहीं जा सकता।
श्लोक 94 (skanda.7.383.94)
निर्मितो न द्वितीयस्तु निर्मितो विश्वकर्मणा । त्वादृशस्तु पुमान्कश्चिद्यस्य नो हदये हरिः
nirmito na dvitīyastu nirmito viśvakarmaṇā | tvādṛśastu pumānkaścidyasya no hadaye hariḥ
विश्वकर्मा द्वारा बनाया गया तुम्हारे जैसा दूसरा कोई नहीं है - जिसके हृदय में हरि नहीं हैं।
श्लोक 95 (skanda.7.383.95)
दशमासं ध्रुवं मन्ये मूत्रं पास्यति तर्पितः । भ्रातरो भ्रातरः सत्यं गर्भेऽपि स्युः कथं यदि
daśamāsaṁ dhruvaṁ manye mūtraṁ pāsyati tarpitaḥ | bhrātaro bhrātaraḥ satyaṁ garbhe'pi syuḥ kathaṁ yadi
दस मास तक वह निश्चय ही तृप्त होकर मूत्र पीता रहा होगा। 'भाई, सच्चे भाई' - गर्भ में भी यह कैसे संभव है?
श्लोक 96 (skanda.7.383.96)
युध्यतस्तान्कथं माता वराकी वारयिष्यति । स्वजनो दृश्यते वृद्धः परेषु पण्डितायते
yudhyatastānkathaṁ mātā varākī vārayiṣyati | svajano dṛśyate vṛddhaḥ pareṣu paṇḍitāyate
उनके लड़ते समय बेचारी माता उन्हें कैसे रोक पाएगी? वृद्ध स्वजन भी दूसरों के सामने पंडित बनते दिखते हैं।
श्लोक 97 (skanda.7.383.97)
कुटुंबं भण्यते कस्माद्यश्च नायाति याति च । बंधनं च कुटुम्बस्य जायते नरकाय नः
kuṭuṁbaṁ bhaṇyate kasmādyaśca nāyāti yāti ca | baṁdhanaṁ ca kuṭumbasya jāyate narakāya naḥ
परिवार क्यों कहा जाता है, जो न साथ आता है, न साथ जाता है? परिवार का बंधन हमारे लिए नरक का कारण बनता है।
श्लोक 98 (skanda.7.383.98)
माता मे विद्यते चान्या पितान्यो भ्रातरश्च ये । स्वसा स्वजनसम्वन्धं ज्ञात्वा मुक्तिमवाप्नुयात्
mātā me vidyate cānyā pitānyo bhrātaraśca ye | svasā svajanasamvandhaṁ jñātvā muktimavāpnuyāt
मेरी और ही माता है, और ही पिता, और ही भाई हैं। बहिन और स्वजन का सच्चा संबंध जानकर ही मुक्ति प्राप्त होती है।
श्लोक 99 (skanda.7.383.99)
माता प्रकृतिरस्माकं स्वसा बुद्धिर्निगद्यते । अहंकारस्ततो जातो योऽहमित्यनुमीयते ।
mātā prakṛtirasmākaṁ svasā buddhirnigadyate | ahaṁkārastato jāto yo'hamityanumīyate |
प्रकृति हमारी माता है, बुद्धि हमारी बहिन कही जाती है; उससे अहंकार उत्पन्न हुआ, जिसे 'मैं' के रूप में अनुमान किया जाता है।
श्लोक 100 (skanda.7.383.100)
तन्मात्राः सोदराः पञ्च ये गच्छन्ति सहैव मे । एषा प्रकृतिरस्माकं विकारः स्वजनो मम
tanmātrāḥ sodarāḥ pañca ye gacchanti sahaiva me | eṣā prakṛtirasmākaṁ vikāraḥ svajano mama
पाँच तन्मात्राएँ मेरे सच्चे भाई हैं, जो मेरे साथ ही चलती हैं। यह प्रकृति हमारी माता है, उसके विकार ही मेरे स्वजन हैं।
श्लोक 101 (skanda.7.383.101)
एतेषां वाहको यस्तु पुरुषः पञ्च विंशकः । स मे पिता शरीरेऽस्मिन्परमात्मा हरिः स्थितः
eteṣāṁ vāhako yastu puruṣaḥ pañca viṁśakaḥ | sa me pitā śarīre'sminparamātmā hariḥ sthitaḥ
इन सबका वाहक जो पुरुष, पच्चीसवाँ तत्त्व है - वही मेरे पिता हैं, इस शरीर में स्थित परमात्मा हरि।
श्लोक 102 (skanda.7.383.102)
यद्यसौ चित्यन्ते चित्ते दृश्यते हृदये हरिः । अणिमादिगुणैश्वर्यं पदं तस्यैव जायते
yadyasau cityante citte dṛśyate hṛdaye hariḥ | aṇimādiguṇaiśvaryaṁ padaṁ tasyaiva jāyate
यदि मन के शांत होने पर हृदय में हरि दिखाई दें, तो अणिमा आदि गुणों के ऐश्वर्य का पद उसी को प्राप्त होता है।
श्लोक 103 (skanda.7.383.103)
भवता सम्मतं राज्यं तन्मे नित्यं तृणैः समम् । यत्र नो पूज्यते विष्णुर्ब्रह्मा रुद्रोऽनिलोऽनलः
bhavatā sammataṁ rājyaṁ tanme nityaṁ tṛṇaiḥ samam | yatra no pūjyate viṣṇurbrahmā rudro'nilo'nalaḥ
आपको प्रिय राज्य मेरे लिए सदा तृण के समान है, जहाँ विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, वायु और अग्नि पूजित नहीं होते।
श्लोक 104 (skanda.7.383.104)
प्रत्यक्षो दृश्यते यस्तु निरालम्बो भ्रमत्यसौ । स एव भगवान्विष्णुर्य एते गगने स्थिताः
pratyakṣo dṛśyate yastu nirālambo bhramatyasau | sa eva bhagavānviṣṇurya ete gagane sthitāḥ
जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है, बिना किसी आधार के भ्रमण करता है - वही भगवान् विष्णु हैं, और ये भी जो आकाश में स्थित हैं -
श्लोक 105 (skanda.7.383.105)
ध्रुवे बद्धा ग्रहाः सर्वे य एतेऽप्युडवः स्थिताः । ते सर्वे विष्णुवचसा न पतंति धरातले
dhruve baddhā grahāḥ sarve ya ete'pyuḍavaḥ sthitāḥ | te sarve viṣṇuvacasā na pataṁti dharātale
ध्रुव से बंधे सभी ग्रह, और ये नक्षत्र भी जो स्थित हैं - ये सब विष्णु के वचन से धरती पर नहीं गिरते।
श्लोक 106 (skanda.7.383.106)
काले विनाशः सर्वेषां तेनैव विहितः स्वयम् । इति संचिंत्य मे नास्ति भवद्भ्यो मरणाद्भयम्
kāle vināśaḥ sarveṣāṁ tenaiva vihitaḥ svayam | iti saṁciṁtya me nāsti bhavadbhyo maraṇādbhayam
काल में सबका विनाश उसी के द्वारा स्वयं विहित है। ऐसा विचार कर मुझे आपसे मृत्यु का भय नहीं है।
श्लोक 107 (skanda.7.383.107)
इति तद्वचनस्यांते पदा हत्वा पिताऽब्रवीत् । कुत्राऽसौ हन्मि तत्पूर्वं पश्चात्त्वां हरिभाषिणम्
iti tadvacanasyāṁte padā hatvā pitā'bravīt | kutrā'sau hanmi tatpūrvaṁ paścāttvāṁ haribhāṣiṇam
इस वचन के अंत में पिता ने पैर से मारकर कहा - कहाँ है वह? पहले उसे मार डालूँ, फिर तुझे, हरि की बात करने वाले को।
श्लोक 108 (skanda.7.383.108)
प्रह्लाद उवाच पृथिव्यादीनि भूतानि तान्येव भगवान्हरिः । स्थले जले किं बहुना सर्वं विष्णुमयं जगत्
prahlāda uvāca pṛthivyādīni bhūtāni tānyeva bhagavānhariḥ | sthale jale kiṁ bahunā sarvaṁ viṣṇumayaṁ jagat
प्रह्लाद ने कहा - पृथ्वी आदि भूत ही भगवान् हरि हैं; स्थल में, जल में - अधिक क्या कहूँ, सम्पूर्ण जगत् विष्णुमय है।
श्लोक 109 (skanda.7.383.109)
तृणे काष्ठे गृहे क्षेत्रे द्रव्ये देहे स्थितो हरिः । ज्ञायते ज्ञानयोगेन दृश्यते किं नु चक्षुषा
tṛṇe kāṣṭhe gṛhe kṣetre dravye dehe sthito hariḥ | jñāyate jñānayogena dṛśyate kiṁ nu cakṣuṣā
तृण में, काठ में, घर में, खेत में, वस्तु में, शरीर में हरि स्थित हैं; वे ज्ञान-योग से जाने जाते हैं, क्या वे नेत्रों से देखे जा सकते हैं?
श्लोक 110 (skanda.7.383.110)
ब्रह्मालये याति रसातले वा धरातलेऽसौ भ्रमति क्षणेन । आघ्राति गन्धं विदधाति सर्वं शृणोति जानाति स चात्र विष्णुः
brahmālaye yāti rasātale vā dharātale'sau bhramati kṣaṇena | āghrāti gandhaṁ vidadhāti sarvaṁ śṛṇoti jānāti sa cātra viṣṇuḥ
वे ब्रह्मलोक जाते हैं, या रसातल, या पृथ्वी की सतह पर क्षणभर में भ्रमण करते हैं; वे सुगंध सूँघते हैं, सब कुछ करते हैं, सुनते हैं, जानते हैं - वे ही यहाँ विष्णु हैं।
श्लोक 111 (skanda.7.383.111)
इत्युक्तः सहजां मायां त्यक्त्वा सिंहासनोत्थितः । दृढं परिकरं बद्ध्वा खङ्गं चाकृष्य चोज्ज्वलम्
ityuktaḥ sahajāṁ māyāṁ tyaktvā siṁhāsanotthitaḥ | dṛḍhaṁ parikaraṁ baddhvā khaṅgaṁ cākṛṣya cojjvalam
ऐसा कहे जाने पर, अपनी सहज माया त्यागकर वह सिंहासन से उठ खड़ा हुआ; कमर को दृढ़ता से बाँधकर, चमकती तलवार खींचकर,
श्लोक 112 (skanda.7.383.112)
हत्वा तं फलकाग्रेण बभाषे दुस्सहं वचः । इदानीं स्मर रे विष्णुं नो चेज्जवलितकु ण्डलम् । पतिष्यति शिरो भूमौ फलं पक्वं यथा नगात्
hatvā taṁ phalakāgreṇa babhāṣe dussahaṁ vacaḥ | idānīṁ smara re viṣṇuṁ no cejjavalitaku ṇḍalam | patiṣyati śiro bhūmau phalaṁ pakvaṁ yathā nagāt
उसे तलवार की सपाट से मारकर उसने असहनीय वचन कहे - अब अपने विष्णु का स्मरण कर! अन्यथा तेरा जगमगाते कुण्डलों वाला सिर पके फल के समान वृक्ष से गिरकर भूमि पर गिर जाएगा।
श्लोक 113 (skanda.7.383.113)
नो चेद्दर्शय तं विष्णुमस्मात्स्तंभाद्विनिर्गतम् । प्रह्लादस्तु भयं त्यक्त्वा चक्रे पद्मासनं भुवि
no ceddarśaya taṁ viṣṇumasmātstaṁbhādvinirgatam | prahlādastu bhayaṁ tyaktvā cakre padmāsanaṁ bhuvi
अन्यथा उस विष्णु को दिखा, जो इस खंभे से निकले! प्रह्लाद ने भय त्यागकर भूमि पर पद्मासन लगा लिया।
श्लोक 114 (skanda.7.383.114)
विधाय कंधरां नेतुमुच्चैः श्वासं निरुध्य च । हृदि ध्यात्वा हरिं देवं मरणायोन्मुखः स्थितः
vidhāya kaṁdharāṁ netumuccaiḥ śvāsaṁ nirudhya ca | hṛdi dhyātvā hariṁ devaṁ maraṇāyonmukhaḥ sthitaḥ
गर्दन झुकाकर, ऊँची साँस को रोककर, हृदय में हरि देव का ध्यान करते हुए वह मृत्यु के लिए तैयार होकर बैठ गया।
श्लोक 115 (skanda.7.383.115)
प्रभो मया तदा दृष्टमाश्चर्यं गगनाद्भुवि । पुष्पमाला स्थिता कण्ठे प्रह्लादस्य स्वयं गता
prabho mayā tadā dṛṣṭamāścaryaṁ gaganādbhuvi | puṣpamālā sthitā kaṇṭhe prahlādasya svayaṁ gatā
[नारद अपनी कथा जारी रखते हुए:] हे प्रभो, तब मैंने आकाश से भूतल तक एक आश्चर्य देखा - एक पुष्पमाला स्वयं आकर प्रह्लाद के कंठ में स्थित हो गई।
श्लोक 116 (skanda.7.383.116)
गगनं व्याप्यमानं च किंकिमेवं कृतं जनैः । झटिति त्रुट्यति स्तम्भाच्छब्देन क्षुभितो जनः
gaganaṁ vyāpyamānaṁ ca kiṁkimevaṁ kṛtaṁ janaiḥ | jhaṭiti truṭyati stambhācchabdena kṣubhito janaḥ
आकाश मानो भर गया, और लोग पूछने लगे - यह क्या हो रहा है? अचानक खंभे से चटकने की आवाज आई, और लोग उस आवाज से व्याकुल हो गए।
श्लोक 117 (skanda.7.383.117)
धरणी याति पातालं द्यौर्वा भूमिं समेष्यति । पतिष्यति शिरो भूमौ खड्गघाताहतं नु किम्
dharaṇī yāti pātālaṁ dyaurvā bhūmiṁ sameṣyati | patiṣyati śiro bhūmau khaḍgaghātāhataṁ nu kim
क्या पृथ्वी पाताल में जा रही है? या आकाश धरती से मिलने वाला है? या तलवार के प्रहार से आहत सिर भूमि पर गिरने वाला है?
श्लोक 118 (skanda.7.383.118)
तावत्स्तंभाद्विनिष्क्रान्तः सिंहनादो भयंकरः । भूमौ निपतिताः सर्वे दैत्याः शब्देन मूर्च्छिताः
tāvatstaṁbhādviniṣkrāntaḥ siṁhanādo bhayaṁkaraḥ | bhūmau nipatitāḥ sarve daityāḥ śabdena mūrcchitāḥ
उसी क्षण खंभे से एक भयंकर सिंह-गर्जना निकली; उस ध्वनि से मूर्च्छित होकर सभी दैत्य भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 119 (skanda.7.383.119)
हिरण्यकशिपोर्हस्तात्खड्गचर्म पपात च । न स जानाति किं किमेतदिति पुनःपुनः
hiraṇyakaśiporhastātkhaḍgacarma papāta ca | na sa jānāti kiṁ kimetaditi punaḥpunaḥ
हिरण्यकशिपु के हाथ से तलवार और ढाल गिर पड़े; उसे कुछ समझ नहीं आया, वह बार-बार पूछने लगा - यह क्या है, यह क्या है?
श्लोक 120 (skanda.7.383.120)
उत्थितो वीक्षते यावत्तावत्पश्यति तं हरिम् । अधो नरं स्थितं सिंहमुपरिष्टाद्विभी षणम्
utthito vīkṣate yāvattāvatpaśyati taṁ harim | adho naraṁ sthitaṁ siṁhamupariṣṭādvibhī ṣaṇam
जैसे ही वह उठकर देखने लगा, उसने उस हरि को देखा - नीचे मनुष्य के रूप में, ऊपर भयंकर सिंह के रूप में,
श्लोक 121 (skanda.7.383.121)
दंष्ट्रा करालवदनं लेलिहानमिवांबरम् । जाज्वल्यमानवपुषं पुच्छाच्छोटितमस्तकम्
daṁṣṭrā karālavadanaṁ lelihānamivāṁbaram | jājvalyamānavapuṣaṁ pucchācchoṭitamastakam
दाढ़ों वाला, विकराल मुख वाला, मानो आकाश को चाटता हुआ, प्रज्वलित शरीर वाला, पूँछ के पटकने से उठती हुई अयाल वाला,
श्लोक 122 (skanda.7.383.122)
महाकण्ठकृतारावं सशब्द मिव तोयदम् । समुच्छ्वसितकेशांतं दुर्निरीक्ष्यं सुरासुरैः
mahākaṇṭhakṛtārāvaṁ saśabda miva toyadam | samucchvasitakeśāṁtaṁ durnirīkṣyaṁ surāsuraiḥ
विशाल कंठ से गर्जना करते हुए, मानो गरजते हुए मेघ के समान, उठे हुए केशों वाला, देव-असुरों के लिए भी देख पाना कठिन।
श्लोक 123 (skanda.7.383.123)
नरसिंहमथो दृष्ट्वा निपपात पुनः क्षितौ । विगृह्य केशपाशे तं भ्रामयामास चांबरम्
narasiṁhamatho dṛṣṭvā nipapāta punaḥ kṣitau | vigṛhya keśapāśe taṁ bhrāmayāmāsa cāṁbaram
नरसिंह को देखकर वह पुनः भूमि पर गिर पड़ा; उसके केशों को पकड़कर नरसिंह ने उसे आकाश में घुमाया।
श्लोक 124 (skanda.7.383.124)
भ्रामयित्वा शतगुणं पृथिव्यां समपोथयत् । न ममार स दैत्येन्द्रो ब्रह्मणो वरकारणात्
bhrāmayitvā śataguṇaṁ pṛthivyāṁ samapothayat | na mamāra sa daityendro brahmaṇo varakāraṇāt
सौ बार घुमाकर उन्होंने उसे पृथ्वी पर पटक दिया; फिर भी वह दैत्येन्द्र ब्रह्मा के वर के कारण नहीं मरा।
श्लोक 125 (skanda.7.383.125)
गगनस्थैस्तदा देवै रुच्चैः संस्मारितो हरिः । दैत्यं जानुनि चानीय वक्षो हृष्टो निरीक्ष्य च
gaganasthaistadā devai ruccaiḥ saṁsmārito hariḥ | daityaṁ jānuni cānīya vakṣo hṛṣṭo nirīkṣya ca
तब आकाश में स्थित देवताओं द्वारा ऊँचे स्वर में स्मरण दिलाए जाने पर, हरि ने दैत्य को अपने घुटने पर लाकर, प्रसन्न होकर उसके वक्षस्थल को देखा,
श्लोक 126 (skanda.7.383.126)
जयजयेति यक्षानां सुराणां सोऽवधारयत् । शब्दं कर्णे भुजौ सज्जौ कृत्वा तौ पद्मलांछितौ
jayajayeti yakṣānāṁ surāṇāṁ so'vadhārayat | śabdaṁ karṇe bhujau sajjau kṛtvā tau padmalāṁchitau
यक्षों और देवताओं की 'जय-जय' ध्वनि को कान में सुनते हुए, अपनी कमल-चिह्नित दोनों भुजाओं को तैयार करके,
श्लोक 127 (skanda.7.383.127)
बिभेद वक्षो दैत्यस्य वज्रघातकिणांकितम् । नखैः कुन्दसुमप्रख्यैरस्थिसंघातकर्शितम्
bibheda vakṣo daityasya vajraghātakiṇāṁkitam | nakhaiḥ kundasumaprakhyairasthisaṁghātakarśitam
वज्र-प्रहारों के चिह्नों वाले, कुंद-पुष्प जैसे नखों से, हड्डियों के भार से क्षीण उस दैत्य के वक्षस्थल को विदीर्ण कर दिया।
श्लोक 128 (skanda.7.383.128)
भिन्ने वक्षसि दैत्येन्द्रो ममारच पपात च । तदा सहर्षमभवत्त्रैलोक्यं सचराचरम्
bhinne vakṣasi daityendro mamāraca papāta ca | tadā saharṣamabhavattrailokyaṁ sacarācaram
वक्षस्थल विदीर्ण होने पर दैत्येन्द्र मरकर गिर पड़ा; तब चराचर सहित त्रैलोक्य हर्ष से भर गया।
श्लोक 129 (skanda.7.383.129)
ममापि तृप्तिः सञ्जाता प्रसादात्तव केशव । यदा पुरत्रये दग्धे प्रसादाच्छंकरस्य च
mamāpi tṛptiḥ sañjātā prasādāttava keśava | yadā puratraye dagdhe prasādācchaṁkarasya ca
हे केशव, आपकी कृपा से मुझे भी तृप्ति प्राप्त हुई - जैसे त्रिपुर दहन के समय शंकर की कृपा से हुई थी,
श्लोक 130 (skanda.7.383.130)
हिण्याक्षे पुनर्जाता सा काले विनिपातिते । इदानीं नास्ति मे तृप्तिः कुत्र यामि करोमि किम्
hiṇyākṣe punarjātā sā kāle vinipātite | idānīṁ nāsti me tṛptiḥ kutra yāmi karomi kim
और फिर समय आने पर हिरण्याक्ष के मारे जाने पर। परन्तु अब मुझे तृप्ति नहीं है - मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ?
श्लोक 131 (skanda.7.383.131)
पृथिव्यां क्षत्रियाः सन्ति न युध्यंते परस्परम् । देवानां दानवैः सार्द्धं नास्ति युद्धं कथं प्रभो
pṛthivyāṁ kṣatriyāḥ santi na yudhyaṁte parasparam | devānāṁ dānavaiḥ sārddhaṁ nāsti yuddhaṁ kathaṁ prabho
पृथ्वी पर क्षत्रिय हैं, पर वे परस्पर लड़ते नहीं; देवताओं और दानवों के बीच युद्ध नहीं है - क्यों, हे प्रभो?
श्लोक 132 (skanda.7.383.132)
इदानीं बलिना व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम् । पञ्चमो योऽवतारस्ते न जाने किं करिष्यति । वलिनिग्रहकालोऽयं तद्दर्शय जनार्दन
idānīṁ balinā vyāptaṁ trailokyaṁ sacarācaram | pañcamo yo'vatāraste na jāne kiṁ kariṣyati | valinigrahakālo'yaṁ taddarśaya janārdana
अब चराचर सहित त्रैलोक्य बलि से व्याप्त है। मुझे नहीं पता आपका पाँचवाँ अवतार क्या करेगा - यही बलि-निग्रह का समय है, हे जनार्दन, वह दिखाइए।
श्लोक 133 (skanda.7.383.133)
सारस्वत उवाच तदेतत्सकलं श्रुत्वा बभाषे वामनो मुनिम्
sārasvata uvāca tadetatsakalaṁ śrutvā babhāṣe vāmano munim
सारस्वत ने कहा - यह सब सुनकर वामन ने मुनि से कहा -
श्लोक 134 (skanda.7.383.134)
वामन उवाच शृणु नारद यद्वृत्तं हिण्यकशिपौ हते । दैत्यराजः कृतो राजा प्रह्लादोऽतीव वैष्णवः
vāmana uvāca śṛṇu nārada yadvṛttaṁ hiṇyakaśipau hate | daityarājaḥ kṛto rājā prahlādo'tīva vaiṣṇavaḥ
वामन ने कहा - सुनो नारद, हिरण्यकशिपु के मारे जाने के बाद जो हुआ - अत्यंत वैष्णव प्रह्लाद को दैत्यों का राजा बनाया गया।
श्लोक 135 (skanda.7.383.135)
तेन राज्यं धरापृष्ठे कृतं संवत्सरान्बहून् । तस्यापि कुर्वतो राज्यं विग्रहो हि सुरैः समम्
tena rājyaṁ dharāpṛṣṭhe kṛtaṁ saṁvatsarānbahūn | tasyāpi kurvato rājyaṁ vigraho hi suraiḥ samam
उसने पृथ्वी पर अनेक वर्षों तक राज्य किया; उसके राज्य करते समय भी देवताओं से कोई विग्रह नहीं हुआ।
श्लोक 136 (skanda.7.383.136)
नो पश्याम्यपि दैत्यानां पूर्ववैरमनुस्मरन् । उत्पाद्य पुत्रान्सबहून्राज्यं चक्रे स पुष्कलम्
no paśyāmyapi daityānāṁ pūrvavairamanusmaran | utpādya putrānsabahūnrājyaṁ cakre sa puṣkalam
मुझे कोई दैत्य पूर्व वैर का स्मरण करता हुआ नहीं दिखा; अनेक पुत्रों को जन्म देकर उसने अत्यंत समृद्ध राज्य किया।
श्लोक 137 (skanda.7.383.137)
विरोचनाद्बलिर्जातो बाल एव यदाऽभवत् । एकान्ते स हरिं ज्ञात्वा तदा योगेन केनचित्
virocanādbalirjāto bāla eva yadā'bhavat | ekānte sa hariṁ jñātvā tadā yogena kenacit
विरोचन से बलि उत्पन्न हुआ; बालक रहते हुए ही, किसी योग से, एकांत में उसने हरि को जान लिया।
श्लोक 138 (skanda.7.383.138)
मुक्त्वा राज्यं प्रियान्पुत्रान्गतोऽसौ गिरिसानुषु । कल्पान्तस्थायिनं देहं तस्य चक्रे जनार्द्दनः
muktvā rājyaṁ priyānputrāngato'sau girisānuṣu | kalpāntasthāyinaṁ dehaṁ tasya cakre janārddanaḥ
राज्य और प्रिय पुत्रों को त्यागकर वह [विरोचन] पर्वत-श्रेणियों को चला गया; जनार्दन ने उसे कल्प के अंत तक रहने वाला शरीर दे दिया।
श्लोक 139 (skanda.7.383.139)
दैत्यानां दानवानां च बहूनां राज्यकारणे । विवादोतीव संजातः को नो राजा भवेदिति
daityānāṁ dānavānāṁ ca bahūnāṁ rājyakāraṇe | vivādotīva saṁjātaḥ ko no rājā bhavediti
तब राज्य के कारण अनेक दैत्यों और दानवों में अत्यंत विवाद उत्पन्न हुआ - हमारा राजा कौन बने?
श्लोक 140 (skanda.7.383.140)
नारद उवाच हिण्याक्षस्य ये पुत्राः पौत्राश्च बलवत्तराः । विरोचनप्रभृतयः सन्ति ये बलवत्तराः
nārada uvāca hiṇyākṣasya ye putrāḥ pautrāśca balavattarāḥ | virocanaprabhṛtayaḥ santi ye balavattarāḥ
नारद ने कहा - हिरण्याक्ष के महाबली पुत्र और पौत्र, तथा विरोचन आदि जो महाबली थे,
श्लोक 141 (skanda.7.383.141)
वृषपर्वापि बलवान्राज्यार्थे समुपस्थितः । इन्द्रवित्तेशवरुणा वायुः सूर्योनलो यमः
vṛṣaparvāpi balavānrājyārthe samupasthitaḥ | indravitteśavaruṇā vāyuḥ sūryonalo yamaḥ
महाबली वृषपर्वा भी राज्य के लिए उपस्थित हुआ; इन्द्र, कुबेर, वरुण, वायु, सूर्य, अग्नि और यम भी।
श्लोक 142 (skanda.7.383.142)
दैत्येन सदृशा न स्युर्बलरूपक्षमादिभिः । औदार्यादिगुणैः कृत्वा सन्तत्या चासुराधिकः
daityena sadṛśā na syurbalarūpakṣamādibhiḥ | audāryādiguṇaiḥ kṛtvā santatyā cāsurādhikaḥ
बल, रूप, सहनशीलता आदि में उस दैत्य [बलि] के समान कोई नहीं था; उदारता आदि गुणों और वंश में भी वह अन्य असुरों से बढ़कर था।
श्लोक 143 (skanda.7.383.143)
शुक्रेणा चार्यमाणास्ते युद्ध्यंते च परस्परम् । अमृताहरणे दौष्ट्यं यदा दैत्याः स्मरन्ति तत्
śukreṇā cāryamāṇāste yuddhyaṁte ca parasparam | amṛtāharaṇe dauṣṭyaṁ yadā daityāḥ smaranti tat
शुक्र द्वारा समझाए जाने पर भी वे परस्पर युद्ध करते थे, जब भी दैत्य अमृत के अपहरण में हुई कुटिलता का स्मरण करते थे।
श्लोक 144 (skanda.7.383.144)
पीतावशेषममृतं कस्माद्यच्छंति देवताः । नास्माकमिति संनह्य युध्यन्ते च परस्परम्
pītāvaśeṣamamṛtaṁ kasmādyacchaṁti devatāḥ | nāsmākamiti saṁnahya yudhyante ca parasparam
'देवता पीने के बाद बचे अमृत को हमें क्यों नहीं देते? यह हमारा नहीं है' - ऐसा सोचकर वे सन्नद्ध होकर परस्पर लड़ते थे।
श्लोक 145 (skanda.7.383.145)
कदाचिदपि नो युद्धं विश्रांतिमुपगच्छति । एककार्योद्यता यस्माद्बहवो दैत्यदानवाः
kadācidapi no yuddhaṁ viśrāṁtimupagacchati | ekakāryodyatā yasmādbahavo daityadānavāḥ
उनका युद्ध कभी विश्राम को प्राप्त नहीं होता था, क्योंकि बहुत से दैत्य-दानव एक ही लक्ष्य [राज्य] के लिए उद्यत थे।
श्लोक 146 (skanda.7.383.146)
पीत्वाऽमृतं सुरा जाता अमरास्ते जयन्ति च । देवदानवदैत्यानां गन्धर्वोरगरक्षसाम् । विष्णुर्बलाधिको युद्धे तदेतत्कारणं वद
pītvā'mṛtaṁ surā jātā amarāste jayanti ca | devadānavadaityānāṁ gandharvoragarakṣasām | viṣṇurbalādhiko yuddhe tadetatkāraṇaṁ vada
अमृत पीकर देवता अमर हो गए, और वे विजयी हुए। देव, दानव, दैत्य, गन्धर्व, नाग और राक्षसों में विष्णु युद्ध में सर्वाधिक बलवान हैं - इसका कारण बताइए।
श्लोक 147 (skanda.7.383.147)
वामन उवाच अनादिनिधनः कर्त्ता पाता हर्त्ता जनार्दनः । एकोऽयं स शिवो देवः स चायं ब्रह्मसंज्ञितः । एकस्य तु यदा कार्यं जायते भुवने नृप
vāmana uvāca anādinidhanaḥ karttā pātā harttā janārdanaḥ | eko'yaṁ sa śivo devaḥ sa cāyaṁ brahmasaṁjñitaḥ | ekasya tu yadā kāryaṁ jāyate bhuvane nṛpa
वामन ने कहा - अनादि-अनंत, कर्ता, पालक, संहारक जनार्दन ही एक हैं, वे ही शिव देव हैं, और वे ही ब्रह्मा कहलाते हैं। परन्तु जब किसी एक का ही कार्य संसार में उत्पन्न होता है, हे राजन् -
श्लोक 148 (skanda.7.383.148)
तस्य देहं समाश्रित्य मृत्युकार्यं कुर्वंति ते । ब्रह्मांडं सकलं विष्णोः करदं वरदो यतः । तस्माद्बलाधिको विष्णुर्न तथान्योऽस्ति कश्चन
tasya dehaṁ samāśritya mṛtyukāryaṁ kurvaṁti te | brahmāṁḍaṁ sakalaṁ viṣṇoḥ karadaṁ varado yataḥ | tasmādbalādhiko viṣṇurna tathānyo'sti kaścana
तो वे उसी के शरीर का आश्रय लेकर मृत्यु का कार्य करते हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांड विष्णु का ऋणी है, क्योंकि वे ही वरदाता हैं; अतः विष्णु सर्वाधिक बलवान हैं, उनके समान अन्य कोई नहीं है।
श्लोक 149 (skanda.7.383.149)
पालनायोद्यतो विष्णुः किमन्यैश्चर्मचक्षुभिः । इन्द्राद्याश्च सुराः सर्वे विष्णोर्व्यापारकारिणः
pālanāyodyato viṣṇuḥ kimanyaiścarmacakṣubhiḥ | indrādyāśca surāḥ sarve viṣṇorvyāpārakāriṇaḥ
विष्णु ही रक्षा में तत्पर हैं, अन्य चर्म-नेत्रों वाले [साधारण देवताओं] से क्या प्रयोजन? इन्द्र आदि समस्त देवता विष्णु के ही कार्य करने वाले हैं।
श्लोक 150 (skanda.7.383.150)
सृष्टिं कृत्वा ततो ब्रह्मा कैलासे संस्थितो हरः । न शक्यते सुरैर्विष्णुर्भ्राम्यन्ते भुवनत्रये
sṛṣṭiṁ kṛtvā tato brahmā kailāse saṁsthito haraḥ | na śakyate surairviṣṇurbhrāmyante bhuvanatraye
सृष्टि करके ब्रह्मा [विश्राम करते हैं], हर कैलास पर स्थित रहते हैं; परन्तु विष्णु देवताओं द्वारा भी सीमित नहीं किए जा सकते - वे तीनों लोकों में विचरण करते हैं।
श्लोक 151 (skanda.7.383.151)
जगत्यस्मिन्यदा कश्चिद्वैपरीत्येन वर्तते । तस्योच्छेदं समागत्य करोत्येव जनार्दनः
jagatyasminyadā kaścidvaiparītyena vartate | tasyocchedaṁ samāgatya karotyeva janārdanaḥ
इस संसार में जब कभी कुछ विपरीत होता है, तो जनार्दन स्वयं आकर उसका उच्छेद करते हैं।
श्लोक 152 (skanda.7.383.152)
त्वमेजय महाबाहो न मनो नारदाऽदयम् । सर्वपापहरां दिव्यां तां कथां कथयाम्यहम्
tvamejaya mahābāho na mano nāradā'dayam | sarvapāpaharāṁ divyāṁ tāṁ kathāṁ kathayāmyaham
हे महाबाहो, शांत रहो; हे नारद, मन को व्याकुल मत करो - मैं वह सर्वपाप-हारी दिव्य कथा तुम्हें सुनाता हूँ।
श्लोक 153 (skanda.7.383.153)
पुरा विवदतां तेषां दैत्यानां राज्यहेतवे । प्रह्लादेन समागत्य व्यवस्था विहिता स्वयम्
purā vivadatāṁ teṣāṁ daityānāṁ rājyahetave | prahlādena samāgatya vyavasthā vihitā svayam
पूर्वकाल में जब वे दैत्य राज्य के कारण विवाद कर रहे थे, तब प्रह्लाद ने स्वयं आकर व्यवस्था बनाई -
श्लोक 154 (skanda.7.383.154)
सर्वलक्षणसं पन्नो दीर्घायुर्बलवत्तरः । यज्ञशीलः सदानंदो बहुपुत्रोतिदुर्जयः
sarvalakṣaṇasaṁ panno dīrghāyurbalavattaraḥ | yajñaśīlaḥ sadānaṁdo bahuputrotidurjayaḥ
'जो सर्व-लक्षणों से संपन्न, दीर्घायु, अत्यंत बलवान, यज्ञशील, सदा आनंदित, बहुपुत्र और अजेय हो -'
श्लोक 155 (skanda.7.383.155)
न युध्यते सुरैः साकं विष्णुं यो वेत्ति दुर्जयम् । संग्रामे मरणं नास्ति यस्य यः सर्वदक्षिणः
na yudhyate suraiḥ sākaṁ viṣṇuṁ yo vetti durjayam | saṁgrāme maraṇaṁ nāsti yasya yaḥ sarvadakṣiṇaḥ
'जो देवताओं से युद्ध नहीं करता, जो अजेय विष्णु को जानता है, जिसकी युद्ध में मृत्यु नहीं होती, जो सर्वस्व-दक्षिणा देने वाला हो -'
श्लोक 156 (skanda.7.383.156)
आत्मनो वचनं व्यर्थं न करोति कथंचन । सर्वेषां पुत्रपौत्राणां मध्ये यो राजते श्रिया
ātmano vacanaṁ vyarthaṁ na karoti kathaṁcana | sarveṣāṁ putrapautrāṇāṁ madhye yo rājate śriyā
'जो अपने वचन को कभी व्यर्थ नहीं करता, और जो सभी पुत्र-पौत्रों के मध्य श्री से सुशोभित हो -'
श्लोक 157 (skanda.7.383.157)
अभिषिक्तस्तु शुक्रेण स वो राजा भवेदिति । गुरुप्रमाणमित्युक्त्वा ययौ यत्रागतः पुनः
abhiṣiktastu śukreṇa sa vo rājā bhavediti | gurupramāṇamityuktvā yayau yatrāgataḥ punaḥ
'वही शुक्र द्वारा अभिषिक्त होकर तुम्हारा राजा बने।' 'गुरु का निर्णय ही प्रमाण है' कहकर वे जहाँ से आए थे, वहीं चले गए।
श्लोक 158 (skanda.7.383.158)
तथा च कृतवंतस्ते सहिता दैत्यदानवाः । विरोचनप्रभृतयः पुत्राः पौत्राः स्वयंगताः
tathā ca kṛtavaṁtaste sahitā daityadānavāḥ | virocanaprabhṛtayaḥ putrāḥ pautrāḥ svayaṁgatāḥ
और वैसा ही किया गया; दैत्य-दानव एकत्र हुए, विरोचन आदि पुत्र-पौत्र सभी स्वयं वहाँ गए।
श्लोक 159 (skanda.7.383.159)
प्रत्येकं वीक्षिताः सर्वे गुरुणा ज्ञानपूर्वकम् । प्रह्लादेन गुणाः प्रोक्ता न ते संति विरोचने
pratyekaṁ vīkṣitāḥ sarve guruṇā jñānapūrvakam | prahlādena guṇāḥ proktā na te saṁti virocane
गुरु द्वारा सभी को ज्ञानपूर्वक एक-एक करके परखा गया; प्रह्लाद द्वारा बताए गए गुण विरोचन में नहीं पाए गए।
श्लोक 160 (skanda.7.383.160)
अन्येषामपि दैत्यानां वृषपर्वापि नेदृशः । यथा निरीक्षिताः पुत्रा बलिप्रभृतयो मुने । सर्वान्संवीक्ष्य शुक्रेण बलौ दृष्टा गुणास्तथा
anyeṣāmapi daityānāṁ vṛṣaparvāpi nedṛśaḥ | yathā nirīkṣitāḥ putrā baliprabhṛtayo mune | sarvānsaṁvīkṣya śukreṇa balau dṛṣṭā guṇāstathā
वृषपर्वा और अन्य दैत्यों में भी वैसे नहीं थे, जैसे बलि आदि पुत्रों में देखे गए, हे मुने; सभी को देखकर शुक्र ने वे गुण बलि में पाए।
श्लोक 161 (skanda.7.383.161)
बलिदेहेऽधिकान्दृष्ट्वा दैत्येभ्यो विनिवेदिताः । बलिर्गुणाधिको दैत्याः कथं कार्यं भवेन्मया
balidehe'dhikāndṛṣṭvā daityebhyo viniveditāḥ | balirguṇādhiko daityāḥ kathaṁ kāryaṁ bhavenmayā
बलि के शरीर में उन्हें अधिक मात्रा में पाकर उन्होंने दैत्यों को बताया - बलि गुणों में श्रेष्ठ है, हे दैत्यो, अब मुझे और क्या करना है?
श्लोक 162 (skanda.7.383.162)
केनापि दैवयोगेन बलिरिंद्रो भविष्यति । यादृशस्तु पिता लोके तादृशस्तु सुतो भवेत्
kenāpi daivayogena baliriṁdro bhaviṣyati | yādṛśastu pitā loke tādṛśastu suto bhavet
किसी दैव-योग से बलि इन्द्र बन सकता है। लोक में जैसा पिता होता है, वैसा ही पुत्र होता है -
श्लोक 163 (skanda.7.383.163)
पौत्रश्च निश्चितं तादृग्भवतीति न चेत्सुतः । प्रह्लादस्तु महायोगी वैष्णवो विष्णुवल्लभः
pautraśca niścitaṁ tādṛgbhavatīti na cetsutaḥ | prahlādastu mahāyogī vaiṣṇavo viṣṇuvallabhaḥ
और निश्चय ही वैसा ही पौत्र होता है, भले ही पुत्र वैसा न हो। प्रह्लाद महायोगी, विष्णु-भक्त, विष्णु के प्रिय थे।
श्लोक 164 (skanda.7.383.164)
तस्माद्विरोचने केचिद्धिरण्यकशिपोर्गुणाः । ज्येष्ठो विरोचनो राज्ये यदि चेत्क्रियतेऽसुराः । नरसिंहः समागत्य निश्चितं मारयिष्यति
tasmādvirocane keciddhiraṇyakaśiporguṇāḥ | jyeṣṭho virocano rājye yadi cetkriyate'surāḥ | narasiṁhaḥ samāgatya niścitaṁ mārayiṣyati
अतः विरोचन में हिरण्यकशिपु के कुछ गुण भी थे। [शुक्र ने चेताया:] यदि विरोचन को, ज्येष्ठ होने के कारण, असुरों द्वारा राजा बनाया गया, तो नरसिंह अवश्य आकर उसे मार डालेंगे।
श्लोक 165 (skanda.7.383.165)
मुक्तं विरोचनेनापि राज्यं मरणभीरुणा । प्रह्लादस्य गुणाः सर्वे बलिदेहे व्यवस्थिताः
muktaṁ virocanenāpi rājyaṁ maraṇabhīruṇā | prahlādasya guṇāḥ sarve balidehe vyavasthitāḥ
मृत्यु से भयभीत होकर विरोचन ने भी राज्य त्याग दिया। प्रह्लाद के समस्त गुण बलि के शरीर में स्थापित थे।
श्लोक 166 (skanda.7.383.166)
एवं ते समयं कृत्वा बलिं राज्येऽभ्यषिंचय न् । यः प्रह्लादः स वै विष्णुर्यो विष्णुः स बलिः स्वयम्
evaṁ te samayaṁ kṛtvā baliṁ rājye'bhyaṣiṁcaya n | yaḥ prahlādaḥ sa vai viṣṇuryo viṣṇuḥ sa baliḥ svayam
इस प्रकार समझौता कर उन्होंने बलि को राज्य पर अभिषिक्त किया। जो प्रह्लाद थे, वे ही निश्चय ही विष्णु हैं; और जो विष्णु हैं, वे ही स्वयं बलि हैं।
श्लोक 167 (skanda.7.383.167)
अतो मित्रीकृतो देवैर्विग्रहैस्तु विवर्जितः । एकीभावं कृतं सर्वं बलिराज्ये सुरासुरैः
ato mitrīkṛto devairvigrahaistu vivarjitaḥ | ekībhāvaṁ kṛtaṁ sarvaṁ balirājye surāsuraiḥ
अतः देवताओं ने उससे मित्रता कर ली, और विग्रह त्याग दिया; देव-असुर दोनों द्वारा बलि के राज्य में पूर्ण एकता स्थापित की गई।
श्लोक 168 (skanda.7.383.168)
तस्यापि भाषितं श्रुत्वा देवेंद्रो मम मंदिरे । समागता वालखिल्याः शप्तोहं वामनः कृतः
tasyāpi bhāṣitaṁ śrutvā deveṁdro mama maṁdire | samāgatā vālakhilyāḥ śaptohaṁ vāmanaḥ kṛtaḥ
उसकी भी बात सुनकर, मेरे ही भवन में देवेन्द्र [की असावधानी से] वालखिल्य एकत्र हुए, और मैं शापित होकर वामन बना दिया गया।
श्लोक 169 (skanda.7.383.169)
प्रसाद्य ते मया प्रोक्ताः शापमुक्तिप्रदा मम । भविष्यतीति तैरुक्तं बलिनिग्रहणादनु
prasādya te mayā proktāḥ śāpamuktipradā mama | bhaviṣyatīti tairuktaṁ balinigrahaṇādanu
उन्हें प्रसन्न करने पर मुझे उन्होंने बताया कि मेरी शाप-मुक्ति बलि के निग्रह के बाद होगी।
श्लोक 170 (skanda.7.383.170)
तवापि कौतुकं युद्धे बलिर्यज्ञं करोति च । देवानां निग्रहो नास्ति सर्वे यज्ञे समागताः
tavāpi kautukaṁ yuddhe baliryajñaṁ karoti ca | devānāṁ nigraho nāsti sarve yajñe samāgatāḥ
तुम्हारा भी कौतूहल युद्ध को लेकर है, परन्तु बलि तो यज्ञ कर रहा है - देवताओं का कोई निग्रह नहीं हो रहा, सब यज्ञ में ही एकत्र हैं।
श्लोक 171 (skanda.7.383.171)
स मां यजति यज्ञेन वधं तस्य करोतु कः । अहं च वामनो जातो नारदः कौतुकान्वितः
sa māṁ yajati yajñena vadhaṁ tasya karotu kaḥ | ahaṁ ca vāmano jāto nāradaḥ kautukānvitaḥ
वह मुझी को यज्ञ से पूजता है - उसका वध कौन करे? और मैं वामन बन गया हूँ, नारद भी कौतूहल से भरे हैं।
श्लोक 172 (skanda.7.383.172)
विपरीतमिदं सर्वं वर्त्तते मम चेतसि । तथाऽपि क्रमयोगेन सर्वं भव्यं करोम्यहम्
viparītamidaṁ sarvaṁ varttate mama cetasi | tathā'pi kramayogena sarvaṁ bhavyaṁ karomyaham
यह सब मेरे मन में विपरीत ही लगता है। फिर भी क्रमिक योग से मैं सब कुछ शुभ करूँगा।
श्लोक 173 (skanda.7.383.173)
नारद उवाच प्रसादं कुरु देवेश युद्धार्थं कौतुकं मम । एकेन ब्राह्मणेनाजौ हन्यंते क्षत्रिया यदा । पित्रा प्रोक्तं च मे पूर्वं तदा युद्धं भविष्यति
nārada uvāca prasādaṁ kuru deveśa yuddhārthaṁ kautukaṁ mama | ekena brāhmaṇenājau hanyaṁte kṣatriyā yadā | pitrā proktaṁ ca me pūrvaṁ tadā yuddhaṁ bhaviṣyati
नारद ने कहा - हे देवेश, मुझ पर कृपा कीजिए, युद्ध के लिए मुझे कौतूहल है। मेरे पिता [ब्रह्मा] ने पहले मुझसे कहा था - जब एक ब्राह्मण द्वारा युद्ध में क्षत्रिय मारे जाएँगे, तभी युद्ध होगा।
श्लोक 174 (skanda.7.383.174)
ब्राह्मणोसि भवाञ्जातः कदा युद्धं करिष्यसि । विहस्य वामनो ब्रूते सत्यं तव भविष्यति
brāhmaṇosi bhavāñjātaḥ kadā yuddhaṁ kariṣyasi | vihasya vāmano brūte satyaṁ tava bhaviṣyati
'आप ब्राह्मण के रूप में जन्मे हैं - कब युद्ध करेंगे?' वामन ने हँसकर कहा - तुम्हारी बात सत्य होगी।
श्लोक 175 (skanda.7.383.175)
जमदग्निसुतो भूत्वा गुरुं कृत्वा महेश्वरम् । कार्त्तवीर्यं वधिष्यामि बहुभिः क्षत्रियैः सह
jamadagnisuto bhūtvā guruṁ kṛtvā maheśvaram | kārttavīryaṁ vadhiṣyāmi bahubhiḥ kṣatriyaiḥ saha
जमदग्नि का पुत्र बनकर, महेश्वर को गुरु बनाकर, मैं कार्त्तवीर्य को अनेक क्षत्रियों सहित मार डालूँगा।
श्लोक 176 (skanda.7.383.176)
समंतपंचके पंच करिष्ये रुधिरह्रदान् । तत्राहं तर्पयिष्यामि पितॄनथ पितामहान्
samaṁtapaṁcake paṁca kariṣye rudhirahradān | tatrāhaṁ tarpayiṣyāmi pitṝnatha pitāmahān
समन्तपंचक में मैं रक्त के पाँच सरोवर बनाऊँगा; वहाँ मैं अपने पितरों और पितामहों को तर्पण दूँगा।
श्लोक 177 (skanda.7.383.177)
पुण्यक्षेत्रं करिष्यामि भवांस्तत्रागमिष्य ति । परं च कौतुकं युद्धे भविष्यति तव प्रियम्
puṇyakṣetraṁ kariṣyāmi bhavāṁstatrāgamiṣya ti | paraṁ ca kautukaṁ yuddhe bhaviṣyati tava priyam
मैं उसे पुण्य-क्षेत्र बनाऊँगा, और आप वहाँ आएँगे। और भी युद्ध में तुम्हें प्रिय कौतूहल की बातें होंगी।
श्लोक 178 (skanda.7.383.178)
ब्राह्मणेभ्यो ग्रहीष्यंति यदा कुं क्षत्रियाः पुनः । तदैव तान्हनिष्यामि पुनर्दा स्यामि मेदिनीम्
brāhmaṇebhyo grahīṣyaṁti yadā kuṁ kṣatriyāḥ punaḥ | tadaiva tānhaniṣyāmi punardā syāmi medinīm
जब क्षत्रिय फिर से ब्राह्मणों से पृथ्वी छीन लेंगे, तभी मैं उन्हें फिर मार डालूँगा, और पृथ्वी फिर से दान कर दूँगा।
श्लोक 179 (skanda.7.383.179)
त्रिसप्तवारं दास्यामि जित्वा जित्वा वसुंधराम् । शस्त्रन्यासं करिष्यामि निर्विण्णो युद्धकर्मणि । विहरिष्यामि रम्येषु वनेषु गिरिसानुषु
trisaptavāraṁ dāsyāmi jitvā jitvā vasuṁdharām | śastranyāsaṁ kariṣyāmi nirviṇṇo yuddhakarmaṇi | vihariṣyāmi ramyeṣu vaneṣu girisānuṣu
इक्कीस बार मैं पृथ्वी को जीत-जीतकर दान करूँगा; फिर युद्ध-कर्म से विरक्त होकर मैं अपने शस्त्र त्याग दूँगा, और रमणीय वनों तथा पर्वत-श्रेणियों में विहार करूँगा।
श्लोक 180 (skanda.7.383.180)
लंकायां रावणो राज्यं करिष्यति महाबलः । त्रैलोक्यकंटकं नाम यदासौ धारयिष्यति
laṁkāyāṁ rāvaṇo rājyaṁ kariṣyati mahābalaḥ | trailokyakaṁṭakaṁ nāma yadāsau dhārayiṣyati
लंका में महाबली रावण राज्य करेगा; जब वह 'त्रैलोक्य-कंटक' नाम धारण करेगा -
श्लोक 181 (skanda.7.383.181)
तदा दाशरथी रामः कौसल्यानंदवर्द्धनः । भविष्ये भ्रातृभिः सार्द्धं गमिष्ये यज्ञमंडपे
tadā dāśarathī rāmaḥ kausalyānaṁdavarddhanaḥ | bhaviṣye bhrātṛbhiḥ sārddhaṁ gamiṣye yajñamaṁḍape
तब मैं कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाला दशरथ-पुत्र राम बनूँगा; भाइयों सहित मैं एक यज्ञ-मंडप में जाऊँगा।
श्लोक 182 (skanda.7.383.182)
ताडकां ताडयित्वाहं सुबाहुं यज्ञमंदिरे । नीत्वा यज्ञाद्गमिष्यामि सीतायास्तु स्वयंवरे
tāḍakāṁ tāḍayitvāhaṁ subāhuṁ yajñamaṁdire | nītvā yajñādgamiṣyāmi sītāyāstu svayaṁvare
ताड़का को मारकर और सुबाहु को यज्ञ-स्थल में वध कर, यज्ञ से निकलकर मैं सीता के स्वयंवर में जाऊँगा।
श्लोक 183 (skanda.7.383.183)
परिणेष्याभि तां सीतां भंक्त्वा माहेश्वरं धनुः । त्यक्त्वा राज्यं गमिष्यामि वने वर्षांश्चतुर्दश
pariṇeṣyābhi tāṁ sītāṁ bhaṁktvā māheśvaraṁ dhanuḥ | tyaktvā rājyaṁ gamiṣyāmi vane varṣāṁścaturdaśa
महेश्वर के धनुष को तोड़कर मैं उस सीता से विवाह करूँगा; राज्य त्यागकर मैं चौदह वर्ष वन में जाऊँगा।
श्लोक 184 (skanda.7.383.184)
सीताहरणजं दुःखं प्रथमं मे भविष्यति । नासाकर्णविहीनां तां करिष्ये राक्षसीं वने
sītāharaṇajaṁ duḥkhaṁ prathamaṁ me bhaviṣyati | nāsākarṇavihīnāṁ tāṁ kariṣye rākṣasīṁ vane
सीता-हरण से उत्पन्न दुःख सबसे पहले मुझे होगा; वन में उस राक्षसी [शूर्पणखा] को नाक-कान से रहित कर दूँगा।
श्लोक 185 (skanda.7.383.185)
चतुर्द्दशसहस्राणि त्रिशिरःखरदूषणान् । द्हत्वा हनिष्ये मारीचं राक्षसं मृगरूपिणम्
caturddaśasahasrāṇi triśiraḥkharadūṣaṇān | dhatvā haniṣye mārīcaṁ rākṣasaṁ mṛgarūpiṇam
चौदह हजार राक्षसों को, त्रिशिरा, खर और दूषण को मारकर, मृगरूपधारी राक्षस मारीच को मार डालूँगा।
श्लोक 186 (skanda.7.383.186)
हृतदारो गमिष्यामि दग्ध्वा गृध्रं जटायुषम् । सुग्रीवेण समं मैत्रीं कृत्वा हत्वाऽथ वालिनम्
hṛtadāro gamiṣyāmi dagdhvā gṛdhraṁ jaṭāyuṣam | sugrīveṇa samaṁ maitrīṁ kṛtvā hatvā'tha vālinam
पत्नी के हरे जाने पर, गिद्ध जटायु का दाह-संस्कार कर, मैं आगे बढ़ूँगा; सुग्रीव से मित्रता कर, फिर वालि को मारकर,
श्लोक 187 (skanda.7.383.187)
समुद्रं बंधयिष्यामि नलप्रमुखवानरैः । लंकां संवेष्टयिष्यामि मारयिष्यामि राक्षसान्
samudraṁ baṁdhayiṣyāmi nalapramukhavānaraiḥ | laṁkāṁ saṁveṣṭayiṣyāmi mārayiṣyāmi rākṣasān
नल आदि वानरों द्वारा समुद्र पर सेतु बनवाऊँगा; लंका को घेर लूँगा, राक्षसों का वध करूँगा।
श्लोक 188 (skanda.7.383.188)
कुम्भकर्णं निहत्याजौ मेघनादं ततो रणे । निहत्य रावणं रक्षः पश्यतां सर्वरक्षसाम्
kumbhakarṇaṁ nihatyājau meghanādaṁ tato raṇe | nihatya rāvaṇaṁ rakṣaḥ paśyatāṁ sarvarakṣasām
युद्ध में कुम्भकर्ण को मारकर, फिर रण में मेघनाद को, समस्त राक्षसों के देखते-देखते राक्षस रावण को मार डालूँगा।
श्लोक 189 (skanda.7.383.189)
विभीषणाय दास्यामि लंकां देवविनिर्मिताम् । अयोध्यां पुनरागत्य कृत्वा राज्यमकंटकम्
vibhīṣaṇāya dāsyāmi laṁkāṁ devavinirmitām | ayodhyāṁ punarāgatya kṛtvā rājyamakaṁṭakam
देवताओं द्वारा निर्मित लंका मैं विभीषण को दूँगा; अयोध्या लौटकर, कंटक-रहित राज्य कर -
श्लोक 190 (skanda.7.383.190)
कालदुर्वाससोश्चित्रचरित्रेणामरावतीम् । यास्येहं भ्रातृभिः सार्द्धं राज्यं पुत्रे निवेद्य च
kāladurvāsasościtracaritreṇāmarāvatīm | yāsyehaṁ bhrātṛbhiḥ sārddhaṁ rājyaṁ putre nivedya ca
काल और दुर्वासा के विचित्र चरित्र के माध्यम से मैं भाइयों सहित अमरावती को जाऊँगा, राज्य पुत्र को सौंपकर।
श्लोक 191 (skanda.7.383.191)
द्वापरे समनुप्राप्ते क्षत्रियैर्बहुभिर्मही । भाराक्रांता न शक्नोति पातालं गंतुमुद्यता
dvāpare samanuprāpte kṣatriyairbahubhirmahī | bhārākrāṁtā na śaknoti pātālaṁ gaṁtumudyatā
द्वापर युग आने पर, अनेक क्षत्रियों से भार से दबी हुई पृथ्वी, असमर्थ होकर पाताल में जाने को उद्यत होगी।
श्लोक 192 (skanda.7.383.192)
मथुरायां तदा कर्त्ता कंसो राज्यं महासुरः । शिशुपालजरासंधौ कालनेमिर्महासुरः
mathurāyāṁ tadā karttā kaṁso rājyaṁ mahāsuraḥ | śiśupālajarāsaṁdhau kālanemirmahāsuraḥ
तब मथुरा में महासुर कंस राज्य करेगा; शिशुपाल, जरासंध, और महासुर कालनेमि -
श्लोक 193 (skanda.7.383.193)
पौंड्रको वासुदेवश्च बाणो राजा महासुरः । गजवाजितुरंगाढ्या वध्यंते मे तदा मुने
pauṁḍrako vāsudevaśca bāṇo rājā mahāsuraḥ | gajavājituraṁgāḍhyā vadhyaṁte me tadā mune
पौंड्रक-वासुदेव और महासुर राजा बाण, गज-अश्व-रथों से समृद्ध - इन सबका वध मैं तब करूँगा, हे मुने।
श्लोक 194 (skanda.7.383.194)
कलौ स्वल्पोदका मेघा अल्पदुग्धाश्च धेनवः । दुग्धे घृतं न चैवास्ति नास्ति सत्यं जनेषु च
kalau svalpodakā meghā alpadugdhāśca dhenavaḥ | dugdhe ghṛtaṁ na caivāsti nāsti satyaṁ janeṣu ca
कलियुग में मेघों में जल अल्प होगा, गौओं का दूध कम होगा; दूध में घी नहीं होगा, और लोगों में सत्य नहीं होगा।
श्लोक 195 (skanda.7.383.195)
चोरैरुपहता लोका व्याधिभिः परिपीडिताः । त्रातारं नाभि गच्छंति युद्धावस्थां गता अपि
corairupahatā lokā vyādhibhiḥ paripīḍitāḥ | trātāraṁ nābhi gacchaṁti yuddhāvasthāṁ gatā api
लोग चोरों से पीड़ित होंगे, रोगों से त्रस्त होंगे; युद्ध की स्थिति में पड़ने पर भी उन्हें कोई रक्षक नहीं मिलेगा।
श्लोक 196 (skanda.7.383.196)
क्षुद्राः पश्चिमवाहिन्यो नद्यः शुष्यंति कार्त्तिके । एकादशीव्रतं नास्ति कृष्णा या च चतुर्द्दशी
kṣudrāḥ paścimavāhinyo nadyaḥ śuṣyaṁti kārttike | ekādaśīvrataṁ nāsti kṛṣṇā yā ca caturddaśī
छोटी पश्चिम-वाहिनी नदियाँ कार्तिक में भी सूख जाएँगी; एकादशी का व्रत नहीं रहेगा, न ही कृष्ण चतुर्दशी का।
श्लोक 197 (skanda.7.383.197)
न जानाति जनः कश्चिद्विक्रांतमपि स्वे गृहे । दरिद्रोपहतं सर्वं संध्यास्नानविवर्जितम् । भविष्यति कलौ सर्वं न तत्पूर्वयुगत्रये
na jānāti janaḥ kaścidvikrāṁtamapi sve gṛhe | daridropahataṁ sarvaṁ saṁdhyāsnānavivarjitam | bhaviṣyati kalau sarvaṁ na tatpūrvayugatraye
कोई मनुष्य अपने ही घर में क्या हो रहा है, यह भी नहीं जान पाएगा। सब कुछ दरिद्रता से पीड़ित होगा, संध्या-स्नान से रहित होगा। यह सब कलियुग में होगा, पूर्व के तीन युगों में नहीं।
श्लोक 198 (skanda.7.383.198)
पितरं मातरं पुत्रस्त्यक्त्वा भार्यां निषेवते । न गुरुः स्वजनः कश्चित्कोऽपि कं नानुसेवते
pitaraṁ mātaraṁ putrastyaktvā bhāryāṁ niṣevate | na guruḥ svajanaḥ kaścitko'pi kaṁ nānusevate
पुत्र माता-पिता को त्यागकर पत्नी की सेवा करेगा; कोई सच्चा गुरु या स्वजन नहीं रहेगा - कोई किसी की सेवा नहीं करेगा।
श्लोक 199 (skanda.7.383.199)
यथायथा कलिर्व्याप्तिं करोति धरणीतले । तथातथा जनः सर्व एकाकारो भविष्यति
yathāyathā kalirvyāptiṁ karoti dharaṇītale | tathātathā janaḥ sarva ekākāro bhaviṣyati
जैसे-जैसे कलियुग पृथ्वी पर व्याप्त होता जाएगा, वैसे-वैसे सभी लोग एक ही प्रकार के [पतित] हो जाएँगे।
श्लोक 200 (skanda.7.383.200)
म्लेच्छैरुपहतं सर्वं संध्यास्नानविवर्जितम् । कल्किरित्यभिविख्यातो भविष्ये ब्राह्मणो ह्यहम्
mlecchairupahataṁ sarvaṁ saṁdhyāsnānavivarjitam | kalkirityabhivikhyāto bhaviṣye brāhmaṇo hyaham
जब सब कुछ म्लेच्छों से पीड़ित और संध्या-स्नान से रहित हो जाएगा, तब मैं 'कल्कि' नाम से विख्यात ब्राह्मण बनूँगा।
श्लोक 201 (skanda.7.383.201)
म्लेच्छानां छेदनं कृत्वा याज्ञवल्यपुरोहितः । बहुस्वर्णेन यज्ञेन यक्ष्ये निष्कृतिकारणात्
mlecchānāṁ chedanaṁ kṛtvā yājñavalyapurohitaḥ | bahusvarṇena yajñena yakṣye niṣkṛtikāraṇāt
म्लेच्छों का विनाश कर, याज्ञवल्क्य को पुरोहित बनाकर, संसार के उद्धार के लिए मैं प्रचुर स्वर्ण से यज्ञ करूँगा।
श्लोक 202 (skanda.7.383.202)
भविष्यंत्यवतारा मे युद्धं तेषु भविष्यति । इदानीं बलिना युद्धं करिष्यंति न देवताः
bhaviṣyaṁtyavatārā me yuddhaṁ teṣu bhaviṣyati | idānīṁ balinā yuddhaṁ kariṣyaṁti na devatāḥ
ये मेरे भावी अवतार होंगे, और उन्हीं में युद्ध होगा। परन्तु अभी, बलि के साथ देवता युद्ध नहीं करेंगे।
श्लोक 203 (skanda.7.383.203)
स मां यजति दैत्येन्द्रो न मे वध्यो बलिर्भवेत् । सर्वस्वदाननियमं करोति स महाध्वरे ।
sa māṁ yajati daityendro na me vadhyo balirbhavet | sarvasvadānaniyamaṁ karoti sa mahādhvare |
वह दैत्येन्द्र मुझी को यज्ञ द्वारा पूजता है; बलि मेरे द्वारा वध्य नहीं होगा। वह अपने महायज्ञ में सर्वस्व-दान का नियम पालन कर रहा है।
श्लोक 204 (skanda.7.383.204)
सारस्वत उवाच इत्युक्त्वा नारदं देवो विसृज्य तमथाभ्यगात् । द्रष्टुं बलिकृतं यज्ञं देवकार्यप्रसिद्धये
sārasvata uvāca ityuktvā nāradaṁ devo visṛjya tamathābhyagāt | draṣṭuṁ balikṛtaṁ yajñaṁ devakāryaprasiddhaye
सारस्वत ने कहा - ऐसा कहकर देव ने नारद को विदा कर दिया, और फिर देव-कार्य की सिद्धि के लिए बलि द्वारा किए गए यज्ञ को देखने चल पड़े।
श्लोक 205 (skanda.7.383.205)
वामनो नगरं गत्वा वीक्षमाणो गृहाद्गृहम् । ब्राह्मणानां गृहं गत्वा भोजनं स तु याचते
vāmano nagaraṁ gatvā vīkṣamāṇo gṛhādgṛham | brāhmaṇānāṁ gṛhaṁ gatvā bhojanaṁ sa tu yācate
वामन नगर में जाकर घर-घर देखते हुए, ब्राह्मणों के घर जाकर भोजन की याचना करने लगे।
श्लोक 206 (skanda.7.383.206)
नित्यं स्नानपरो विप्रो वेदाध्ययनतत्परः । वामनो लभते भिक्षां भोजनं द्विजमंदिरे
nityaṁ snānaparo vipro vedādhyayanatatparaḥ | vāmano labhate bhikṣāṁ bhojanaṁ dvijamaṁdire
सदा स्नानपरायण, वेदाध्ययन में तत्पर वह ब्राह्मण वामन, द्विजों के घरों में भिक्षा और भोजन प्राप्त करते थे।
श्लोक 207 (skanda.7.383.207)
चतुष्पथेषु रम्येषु देवतायतनेषु च । आस्ते परिवृतो लोकैश्चालयन्विपुलां कटिम्
catuṣpatheṣu ramyeṣu devatāyataneṣu ca | āste parivṛto lokaiścālayanvipulāṁ kaṭim
रमणीय चौराहों पर और देवालयों में, लोगों से घिरे हुए, अपनी विशाल कमर हिलाते हुए बैठते थे,
श्लोक 208 (skanda.7.383.208)
शिरो विधूनते स्थूलं स्थूलस्कन्धो महाहनुः । नृत्यते तालमानेन गायत्यतिमनोहरम्
śiro vidhūnate sthūlaṁ sthūlaskandho mahāhanuḥ | nṛtyate tālamānena gāyatyatimanoharam
अपना बड़ा सिर हिलाते, चौड़े कंधों और बड़ी ठुड्डी वाले, वे ताल के अनुसार नृत्य करते, अत्यंत मनोहर गीत गाते।
श्लोक 209 (skanda.7.383.209)
वेदानधीते चतुरो वामनो द्विजसंसदि । दैत्यानां तनयाः सर्वे ब्राह्मणानां तथैव च
vedānadhīte caturo vāmano dvijasaṁsadi | daityānāṁ tanayāḥ sarve brāhmaṇānāṁ tathaiva ca
वामन ब्राह्मणों की सभा में चारों वेदों का पाठ करते थे; दैत्यों के तथा ब्राह्मणों के सभी पुत्र -
श्लोक 210 (skanda.7.383.210)
वामनं पर्युपासंते दिवारात्रं मनोरमम् । अथ तैः सकलैर्नीतो वामनो यज्ञमंडपे
vāmanaṁ paryupāsaṁte divārātraṁ manoramam | atha taiḥ sakalairnīto vāmano yajñamaṁḍape
दिन-रात मनोहर वामन की सेवा में रहते थे। फिर उन सबके द्वारा वामन यज्ञ-मंडप में ले जाए गए।
श्लोक 211 (skanda.7.383.211)
निश्चितं मठिकास्थानं याचितव्यो बलिस्त्वया । तदास्माकं महच्छ्रेयो देशस्य नगरस्य च
niścitaṁ maṭhikāsthānaṁ yācitavyo balistvayā | tadāsmākaṁ mahacchreyo deśasya nagarasya ca
[बालकों ने कहा:] आपको बलि से एक निश्चित मठ-स्थान माँगना चाहिए - इससे हमारा, देश का और नगर का बड़ा कल्याण होगा।
श्लोक 212 (skanda.7.383.212)
विज्ञप्तो वामनः सर्वैर्दैत्यद्विजकुमारकैः । वामन वस्तव्यं दैत्येंद्रनगरे सदा
vijñapto vāmanaḥ sarvairdaityadvijakumārakaiḥ | vāmana vastavyaṁ daityeṁdranagare sadā
वामन से सभी दैत्य और ब्राह्मण बालकों ने विनती की - हे वामन, आप दैत्येन्द्र के नगर में सदा निवास करें।
श्लोक 213 (skanda.7.383.213)
सारस्वत उवाच प्रविवेश तथेत्युक्त्वा वामनो यज्ञमंडपे । ततः कोलाहलो जातो द्वाःस्थैर्द्वारि कृतो महान्
sārasvata uvāca praviveśa tathetyuktvā vāmano yajñamaṁḍape | tataḥ kolāhalo jāto dvāḥsthairdvāri kṛto mahān
सारस्वत ने कहा - 'ऐसा ही हो' कहकर वामन यज्ञ-मंडप में प्रविष्ट हुए; तब द्वारपालों द्वारा द्वार पर बड़ा कोलाहल मचाया गया।
श्लोक 214 (skanda.7.383.214)
ब्राह्मणैर्बहुभिः सार्द्धं वेदानुच्चारयन्स्थितः । ततो वेदध्वनिर्जातो महान्वै यज्ञमंडप्रे
brāhmaṇairbahubhiḥ sārddhaṁ vedānuccārayansthitaḥ | tato vedadhvanirjāto mahānvai yajñamaṁḍapre
अनेक ब्राह्मणों के साथ वेदों का उच्चारण करते हुए वे खड़े थे; तब यज्ञ-मंडप में वेद-ध्वनि की महान गूँज उठी।
श्लोक 215 (skanda.7.383.215)
प्रविष्टौ प्रथमं दैत्यौ दैत्याय विनिवेदितः । द्रष्टुं समागतो देव ब्राह्मणो वामनोऽध्वरे
praviṣṭau prathamaṁ daityau daityāya viniveditaḥ | draṣṭuṁ samāgato deva brāhmaṇo vāmano'dhvare
दो दैत्य पहले प्रविष्ट होकर दैत्य-राजा को सूचित करने लगे - हे देव, वामन नामक एक ब्राह्मण यज्ञ देखने आया है।
श्लोक 216 (skanda.7.383.216)
भवंतं कौतुकात्तावद्द्वारदेशे समाविशत् । एक एव यथायाति वामनस्तव सन्निधौ
bhavaṁtaṁ kautukāttāvaddvāradeśe samāviśat | eka eva yathāyāti vāmanastava sannidhau
कौतूहलवश वह द्वार-देश तक आपको देखने आ गया है; वह अकेला ही, जैसा वामन होता है, आपके सान्निध्य में आता है।
श्लोक 217 (skanda.7.383.217)
निरीहो वामनो देव यावत्तत्रैव किंचन । वेदानां तु ध्वनिं कृत्वा चतुर्णामेकवक्त्रतः
nirīho vāmano deva yāvattatraiva kiṁcana | vedānāṁ tu dhvaniṁ kṛtvā caturṇāmekavaktrataḥ
हे देव, वामन निरीह है, जहाँ भी रहे वहीं संतुष्ट है; वह एक ही मुख से चारों वेदों की ध्वनि करता है।
श्लोक 218 (skanda.7.383.218)
बलिर्हृष्टोऽब्रवीद्वाक्यं द्वाःस्थमेनं प्रवेशय । पूजयिष्यामि विप्रेद्रं दास्ये चास्य यदीप्सितम्
balirhṛṣṭo'bravīdvākyaṁ dvāḥsthamenaṁ praveśaya | pūjayiṣyāmi vipredraṁ dāsye cāsya yadīpsitam
बलि ने प्रसन्न होकर द्वारपाल से कहा - इसे प्रवेश दो! मैं इस श्रेष्ठ ब्राह्मण की पूजा करूँगा, और जो यह चाहे वह दूँगा।
श्लोक 219 (skanda.7.383.219)
स्मरामि स्मृतिवाक्यानि यानि प्राह गुरुर्मम । किंचिद्वेदमयं पात्रं किंचित्पात्रं तपोमयम्
smarāmi smṛtivākyāni yāni prāha gururmama | kiṁcidvedamayaṁ pātraṁ kiṁcitpātraṁ tapomayam
मुझे मेरे गुरु द्वारा कही गई स्मृति-वचन याद हैं - कुछ पात्र वेदमय होते हैं, कुछ पात्र तपोमय होते हैं;
श्लोक 220 (skanda.7.383.220)
आगमिष्यति यत्पात्रं तत्पात्रं तारयिष्यति । यज्ञे प्रवर्त्तमाने तु दातव्या दक्षिणा मया
āgamiṣyati yatpātraṁ tatpātraṁ tārayiṣyati | yajñe pravarttamāne tu dātavyā dakṣiṇā mayā
जो भी पात्र आएगा, वह पात्र [दाता को] तार देगा। चूँकि यज्ञ चल रहा है, मुझे दक्षिणा अवश्य देनी है।
श्लोक 221 (skanda.7.383.221)
वामनो न विचार्यस्तु सत्यमस्तु वचो मम । इति श्रुत्वा गुरुः शुक्रो वारयामास तं बलिम्
vāmano na vicāryastu satyamastu vaco mama | iti śrutvā guruḥ śukro vārayāmāsa taṁ balim
वामन की जाँच करने की आवश्यकता नहीं, मेरा वचन सत्य हो। यह सुनकर गुरु शुक्र ने उस बलि को रोकने का प्रयास किया।
श्लोक 222 (skanda.7.383.222)
शुक्र उवाच ॥ । द्वारि पूज्या द्विजाः सवें दीनांध कृपणादयः । बधिरा वामनाः कुब्जा रोगिणो ये तु निष्ठुराः
śukra uvāca | dvāri pūjyā dvijāḥ saveṁ dīnāṁdha kṛpaṇādayaḥ | badhirā vāmanāḥ kubjā rogiṇo ye tu niṣṭhurāḥ
शुक्र ने कहा - द्वार पर सभी ब्राह्मण, दीन, अंध, दरिद्र आदि पूजनीय हैं - बधिर, बौने, कुबड़े, रोगी, चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों -
श्लोक 223 (skanda.7.383.223)
सुवर्णरजतैर्वस्त्रैर्वामनो द्वारि पूज्यताम् । चतुर्णां तु वृथा जन्म वृथा दानानि षोडश
suvarṇarajatairvastrairvāmano dvāri pūjyatām | caturṇāṁ tu vṛthā janma vṛthā dānāni ṣoḍaśa
वामन को स्वर्ण, चाँदी और वस्त्रों से द्वार पर ही पूजित किया जाए। चार प्रकार के लोगों का जन्म व्यर्थ होता है, और सोलह प्रकार के दान व्यर्थ होते हैं -
श्लोक 224 (skanda.7.383.224)
अपुत्राणां वृथा जन्म ये च धर्मबहिष्कृताः । परपाकं च येश्नंति परदाररताश्च ये
aputrāṇāṁ vṛthā janma ye ca dharmabahiṣkṛtāḥ | parapākaṁ ca yeśnaṁti paradāraratāśca ye
निपुत्रों का जन्म व्यर्थ है, जो धर्म से बहिष्कृत हैं उनका भी, जो दूसरों के बनाए भोजन से जीते हैं और जो परस्त्री में लिप्त हैं उनका भी।
श्लोक 225 (skanda.7.383.225)
अन्यायेनार्जितं वित्तं न देयं श्रेय इच्छता । व्यर्थमब्राह्मणे दानमारूढपतिते तथा
anyāyenārjitaṁ vittaṁ na deyaṁ śreya icchatā | vyarthamabrāhmaṇe dānamārūḍhapatite tathā
कल्याण चाहने वाले को अन्याय से कमाया धन नहीं देना चाहिए; अब्राह्मण को, पद से गिरे हुए को दिया दान व्यर्थ है -
श्लोक 226 (skanda.7.383.226)
संध्याहीने द्विजे नष्टे पतिते तस्करे तथा । गुरोश्चाप्रीतिजनके पितृमातृपराङ्मुखे ।
saṁdhyāhīne dvije naṣṭe patite taskare tathā | guroścāprītijanake pitṛmātṛparāṅmukhe |
संध्या-हीन ब्राह्मण को, नष्ट-पतित को, चोर को, गुरु को अप्रसन्न करने वाले को, माता-पिता से विमुख को दिया दान भी -
श्लोक 227 (skanda.7.383.227)
ब्रह्मबन्धौ च यद्दतं यद्दत्तं वृषलीपतौ । वेदविक्रयके चैव कृतघ्ने ग्रामयाजके
brahmabandhau ca yaddataṁ yaddattaṁ vṛṣalīpatau | vedavikrayake caiva kṛtaghne grāmayājake
नाम-मात्र के ब्राह्मण को, शूद्रा-पति को, वेद बेचने वाले को, कृतघ्न को, ग्राम-याजक को दिया दान -
श्लोक 228 (skanda.7.383.228)
स्त्रीनिर्जिते च यद्दत्तं व्यालग्राहे तथैव च । परिवारेषु यद्दत्तं वृथा दानानि षोडश
strīnirjite ca yaddattaṁ vyālagrāhe tathaiva ca | parivāreṣu yaddattaṁ vṛthā dānāni ṣoḍaśa
स्त्री-वश में रहने वाले को, सर्प पकड़ने वाले को दिया दान, तथा दिखावे के लिए सेवकों को दिया दान - ये सोलह व्यर्थ दान हैं।
श्लोक 229 (skanda.7.383.229)
सारस्वत उवाच अत्रांतरे बलिर्ब्रूते नैवं वाच्यं त्वया गुरो । वेदानधीते यः कश्चित्स मे विष्णुः समागतः
sārasvata uvāca atrāṁtare balirbrūte naivaṁ vācyaṁ tvayā guro | vedānadhīte yaḥ kaścitsa me viṣṇuḥ samāgataḥ
सारस्वत ने कहा - इस बीच बलि ने कहा - हे गुरु, आपको ऐसा नहीं कहना चाहिए। जो भी वेद पढ़ता है, वह मेरे लिए स्वयं विष्णु है, जो [मेरे द्वार पर] आया है।
श्लोक 230 (skanda.7.383.230)
न विलंबस्तु कर्त्तव्यः श्रोत्रिये गृहमागते । अभ्युत्थानेन वचसा पादप्रक्षालनेन च
na vilaṁbastu karttavyaḥ śrotriye gṛhamāgate | abhyutthānena vacasā pādaprakṣālanena ca
घर आए श्रोत्रिय ब्राह्मण के लिए विलंब नहीं करना चाहिए - खड़े होकर, मधुर वचनों से, और पैर धोकर उसका स्वागत करना चाहिए।
श्लोक 231 (skanda.7.383.231)
यथा शक्त्या प्रदातव्यं भोजनं गृहमेधिना । अपूजितो यदा याति वामनो मंडपाद्बहिः
yathā śaktyā pradātavyaṁ bhojanaṁ gṛhamedhinā | apūjito yadā yāti vāmano maṁḍapādbahiḥ
गृहस्थ को अपनी शक्ति के अनुसार भोजन देना चाहिए। यदि वामन बिना पूजित हुए मंडप से बाहर चले गए -
श्लोक 232 (skanda.7.383.232)
तदायं व्यर्थतां याति यज्ञः सर्वस्वदक्षिणः । अत्रांतरे समानीतो वामनो बलिसंनिधौ
tadāyaṁ vyarthatāṁ yāti yajñaḥ sarvasvadakṣiṇaḥ | atrāṁtare samānīto vāmano balisaṁnidhau
तो मेरा यह सर्वस्व-दक्षिणा वाला यज्ञ व्यर्थ हो जाएगा। इसी बीच वामन को बलि के सम्मुख लाया गया।
श्लोक 233 (skanda.7.383.233)
आयांतं ददृशे दैत्यो वामनं विष्णुरूपिणम् । जाज्वल्यमानं वपुषा पिंगलं सूर्यसंनिभम्
āyāṁtaṁ dadṛśe daityo vāmanaṁ viṣṇurūpiṇam | jājvalyamānaṁ vapuṣā piṁgalaṁ sūryasaṁnibham
दैत्य ने आते हुए वामन को विष्णु-रूप में देखा - शरीर से जगमगाते, पिंगल वर्ण वाले, सूर्य के समान तेजस्वी।
श्लोक 234 (skanda.7.383.234)
उत्थायाभिमुखः प्रायान्नमस्कृत्याग्रतः स्थितः । धन्योऽहं यस्य मे यज्ञे प्राप्तो विष्णुसमो द्विजः
utthāyābhimukhaḥ prāyānnamaskṛtyāgrataḥ sthitaḥ | dhanyo'haṁ yasya me yajñe prāpto viṣṇusamo dvijaḥ
उठकर वे उनके सम्मुख गए, नमस्कार कर सामने खड़े हुए - मैं धन्य हूँ, जिसके यज्ञ में विष्णु के समान ब्राह्मण प्राप्त हुआ।
श्लोक 235 (skanda.7.383.235)
वेदिमध्ये समानीतो ददौ तस्यासनं बलिः । पाद्यमाचमनीयं च दत्त्वार्घ्यं विष्टरं बलिः । श्रीखंडगंधपुष्पाद्यैः पूजयित्वाग्रतः स्थितः
vedimadhye samānīto dadau tasyāsanaṁ baliḥ | pādyamācamanīyaṁ ca dattvārghyaṁ viṣṭaraṁ baliḥ | śrīkhaṁḍagaṁdhapuṣpādyaiḥ pūjayitvāgrataḥ sthitaḥ
वेदी के मध्य लाकर बलि ने उन्हें आसन दिया; पाद्य, आचमनीय, अर्घ्य और आसन देकर, चन्दन-सुगंध-पुष्प आदि से पूजा कर बलि उनके सामने खड़े हुए।
श्लोक 236 (skanda.7.383.236)
मधुपर्कं च गां तस्मै सत्वरं स निवेद्य च । आघ्राते मधुपर्के च वामनेन ततः परम्
madhuparkaṁ ca gāṁ tasmai satvaraṁ sa nivedya ca | āghrāte madhuparke ca vāmanena tataḥ param
उन्हें तुरंत मधुपर्क और गौ अर्पित कर, वामन द्वारा मधुपर्क ग्रहण किए जाने पर -
श्लोक 237 (skanda.7.383.237)
स्वागतं बलिना प्रोक्तं स्वस्तीत्युक्तं द्विजन्मना । अहमर्थी समायातो दीयतां वद किं विभो
svāgataṁ balinā proktaṁ svastītyuktaṁ dvijanmanā | ahamarthī samāyāto dīyatāṁ vada kiṁ vibho
बलि ने स्वागत के वचन कहे, ब्राह्मण ने कल्याण-वचन कहा - मैं याचक बनकर आया हूँ, मुझे कुछ दीजिए, बताइए क्या दूँ, हे प्रभो?
श्लोक 238 (skanda.7.383.238)
मेदिनीं देहि मे दैत्य कियन्मात्रां द्विजोत्तम । वासार्थं मम दैत्येन्द्र दीयतां मे क्रम त्रयम्
medinīṁ dehi me daitya kiyanmātrāṁ dvijottama | vāsārthaṁ mama daityendra dīyatāṁ me krama trayam
'मुझे पृथ्वी दीजिए, हे दैत्य।' 'कितनी, हे द्विजोत्तम?' 'अपने निवास के लिए, हे दैत्येन्द्र, मुझे तीन पग भूमि दे दीजिए।'
श्लोक 239 (skanda.7.383.239)
विधाय मठिकां दिव्यां शिष्यानध्यापयाम्यहम् । दत्तं क्रमत्रयं तुभ्यं गृहीतं वामनोऽब्रवीत्
vidhāya maṭhikāṁ divyāṁ śiṣyānadhyāpayāmyaham | dattaṁ kramatrayaṁ tubhyaṁ gṛhītaṁ vāmano'bravīt
'वहाँ मैं एक दिव्य मठ बनाकर अपने शिष्यों को पढ़ाऊँगा।' 'तुम्हें तीन पग दिया गया।' 'स्वीकार किया' - वामन ने कहा।
श्लोक 240 (skanda.7.383.240)
मा देहीत्यवदच्छुक्रो विष्णुरेव सनातनः । हृष्टो ब्रूते बलिः शुक्रं पात्रं स्यात्किमतः परम्
mā dehītyavadacchukro viṣṇureva sanātanaḥ | hṛṣṭo brūte baliḥ śukraṁ pātraṁ syātkimataḥ param
शुक्र ने कहा - 'मत दो!' यह तो स्वयं सनातन विष्णु है। प्रसन्न होकर बलि ने शुक्र से कहा - इससे बड़ा पात्र और क्या होगा?
श्लोक 241 (skanda.7.383.241)
सव्यं कृत्वा बलिर्दर्भान्साक्षतान्दक्षिणे करे । प्रयोगं न गुरुश्चक्रे न मुंचति जलं करे
savyaṁ kṛtvā balirdarbhānsākṣatāndakṣiṇe kare | prayogaṁ na guruścakre na muṁcati jalaṁ kare
बलि ने दाहिने हाथ में कुश और अक्षत लेकर हाथ ऊपर किया, पर गुरु ने विधि नहीं की, और हाथ से जल नहीं छोड़ा।
श्लोक 242 (skanda.7.383.242)
विस्मिता ऋषयः सर्वे होतारो ये सभासदः । ब्राह्मणा बटवो दैत्या भार्यापुत्राश्च बांधवाः
vismitā ṛṣayaḥ sarve hotāro ye sabhāsadaḥ | brāhmaṇā baṭavo daityā bhāryāputrāśca bāṁdhavāḥ
सभी ऋषि, होता, सभासद, ब्राह्मण, बटुक, दैत्य, पत्नियाँ, पुत्र और बांधव सभी आश्चर्यचकित हो गए।
श्लोक 243 (skanda.7.383.243)
दत्तं गृहीतमित्युक्ते कस्मात्तोयं न मुञ्चति । वामनाय करे तोयं विवेकाय प्रदीयते
dattaṁ gṛhītamityukte kasmāttoyaṁ na muñcati | vāmanāya kare toyaṁ vivekāya pradīyate
'दिया और लिया' कहे जाने पर भी वह जल क्यों नहीं छोड़ रहा? वामन के लिए हाथ में रखा जल विवेक के लिए रोका गया था।
श्लोक 244 (skanda.7.383.244)
यद्दानं वचसा दत्तं कर्मणा नोपपाद्यते । विधाय नरके पूये यजमानं न निष्कृतिः
yaddānaṁ vacasā dattaṁ karmaṇā nopapādyate | vidhāya narake pūye yajamānaṁ na niṣkṛtiḥ
जो दान केवल वचन से दिया जाता है, कर्म से पूर्ण नहीं होता, वह दाता को नरक में डालकर भी उसे उससे मुक्ति नहीं देता।
श्लोक 245 (skanda.7.383.245)
उशना प्राह दैत्येन्द्र वामनो हरिरित्ययम् । केनापि दैवयोगेन त्वां द्रष्टुं समुपागतः
uśanā prāha daityendra vāmano harirityayam | kenāpi daivayogena tvāṁ draṣṭuṁ samupāgataḥ
उशना ने कहा - हे दैत्येन्द्र, यह वामन साक्षात् हरि है; किसी दैव-योग से तुम्हें देखने के लिए आया है।
श्लोक 246 (skanda.7.383.246)
अप्रियं वा प्रियं वापि न जाने किं करिष्यति । बभाषे भार्गवं यष्टा श्रूयतां वचनं गुरो
apriyaṁ vā priyaṁ vāpi na jāne kiṁ kariṣyati | babhāṣe bhārgavaṁ yaṣṭā śrūyatāṁ vacanaṁ guro
मुझे नहीं पता कि यह तुम्हारा अच्छा करेगा या बुरा। तब यजमान [बलि] ने भार्गव से कहा - हे गुरु, मेरी बात सुनिए।
श्लोक 247 (skanda.7.383.247)
प्रोच्यते दानकालेषु यजमानैर्द्विजैरपि । अहमिन्द्रो द्विजो विष्णुर्द्रव्यमादित्यदेवता । तत्कथं न मया देयं विष्णवे प्रीयतामिति
procyate dānakāleṣu yajamānairdvijairapi | ahamindro dvijo viṣṇurdravyamādityadevatā | tatkathaṁ na mayā deyaṁ viṣṇave prīyatāmiti
दान के समय यजमानों और ब्राह्मणों द्वारा भी कहा जाता है - मैं इन्द्र हूँ, ब्राह्मण विष्णु है, दिया जाने वाला द्रव्य सूर्य-देवता है। तो मैं विष्णु को क्यों न दूँ? वे प्रसन्न हों।
श्लोक 248 (skanda.7.383.248)
इत्युक्त्वा स ददौ तोयं वामनाय करे बलिः । ततः किमिदमित्युक्त्वा संस्थितो मण्डपाद्बहिः
ityuktvā sa dadau toyaṁ vāmanāya kare baliḥ | tataḥ kimidamityuktvā saṁsthito maṇḍapādbahiḥ
ऐसा कहकर बलि ने वामन के हाथ में जल डाल दिया; तब 'यह क्या हुआ' कहकर शुक्र मंडप से बाहर जाकर खड़े हो गए।
श्लोक 249 (skanda.7.383.249)
मध्येऽपि वामनो विप्रो बलिमात्रो वभूव सः । दत्तहस्तोऽसुरेन्द्रेण ग्रहीतुं तु पदत्रयम्
madhye'pi vāmano vipro balimātro vabhūva saḥ | dattahasto'surendreṇa grahītuṁ tu padatrayam
मध्य में भी वह ब्राह्मण वामन क्षणभर के लिए अपने वामन-आकार में ही रहा, असुरेन्द्र द्वारा हाथ में जल दिए जाने पर, तीन पग लेने के लिए।
श्लोक 250 (skanda.7.383.250)
यजमानद्विजौ हष्टौ दृष्टौ यज्ञे सुरादिभिः । ववृधे वामनोतीव कृत्वा रूपं चतुर्भुजम्
yajamānadvijau haṣṭau dṛṣṭau yajñe surādibhiḥ | vavṛdhe vāmanotīva kṛtvā rūpaṁ caturbhujam
यजमान और ब्राह्मण दोनों प्रसन्नचित्त होकर देवताओं आदि द्वारा यज्ञ में देखे गए; तब वामन चतुर्भुज रूप धारण कर अत्यंत बढ़ने लगे।
श्लोक 251 (skanda.7.383.251)
नारदोऽपि समायातो बभाषे कि कृतं बले । शिष्याभ्यां सहितो हृष्टो नरीनर्ति पुरः स्थितः
nārado'pi samāyāto babhāṣe ki kṛtaṁ bale | śiṣyābhyāṁ sahito hṛṣṭo narīnarti puraḥ sthitaḥ
नारद भी वहाँ आ पहुँचे और बोले - बलि, यह तुमने क्या किया? अपने दोनों शिष्यों सहित प्रसन्न होकर वे सामने खड़े होकर नाचने लगे।
श्लोक 252 (skanda.7.383.252)
गृहाण दक्षिणां देव सभार्यो भाषते बलिः । अद्य किं न मया प्राप्तं यद्गृह्णाति जनार्द्दनः ।
gṛhāṇa dakṣiṇāṁ deva sabhāryo bhāṣate baliḥ | adya kiṁ na mayā prāptaṁ yadgṛhṇāti janārddanaḥ |
'हे देव, दक्षिणा ग्रहण कीजिए' - पत्नी सहित बलि ने कहा। 'आज मुझे क्या प्राप्त नहीं हुआ, कि जनार्दन मुझसे कुछ ग्रहण कर रहे हैं!'
श्लोक 253 (skanda.7.383.253)
सार्द्धक्रमक्षयं कृत्वा धरणीं याचते त्रयम् । यदस्ति तेन कर्तव्यः सन्तोषो मधुसूदन
sārddhakramakṣayaṁ kṛtvā dharaṇīṁ yācate trayam | yadasti tena kartavyaḥ santoṣo madhusūdana
ढाई पग की सीमा को पूर्ण कर वे तीसरा पग माँगते हैं - 'जो कुछ शेष है, हे मधुसूदन, उसी में संतोष कीजिए।'
श्लोक 254 (skanda.7.383.254)
वर्द्धमानं हरिं दृष्ट्वा ब्राह्मणा ऋषयः सुराः । तुष्टुवुर्गगने यांतं भगवंतं जनार्द्दनम्
varddhamānaṁ hariṁ dṛṣṭvā brāhmaṇā ṛṣayaḥ surāḥ | tuṣṭuvurgagane yāṁtaṁ bhagavaṁtaṁ janārddanam
बढ़ते हुए हरि को देखकर ब्राह्मण, ऋषि और देवता, आकाश में जाते हुए भगवान् जनार्दन की स्तुति करने लगे।
श्लोक 255 (skanda.7.383.255)
देवर्षय ऊचुः जय देव जयानन्त जय विष्णो जयाऽच्युत । जय मत्स्य नमस्तुभ्यं जय कूर्म धराधर
devarṣaya ūcuḥ jaya deva jayānanta jaya viṣṇo jayā'cyuta | jaya matsya namastubhyaṁ jaya kūrma dharādhara
देवर्षियों ने कहा - जय देव, जय अनंत, जय विष्णु, जय अच्युत! जय मत्स्य, तुम्हें नमस्कार! जय कूर्म, धरा को धारण करने वाले!
श्लोक 256 (skanda.7.383.256)
वराहाय नमस्तुभ्यं नरसिंह नमोनमः । जामदग्न्य नमस्तुभ्यं जय राम सलक्ष्मण
varāhāya namastubhyaṁ narasiṁha namonamaḥ | jāmadagnya namastubhyaṁ jaya rāma salakṣmaṇa
वराह को नमस्कार, नरसिंह को बार-बार नमस्कार! जामदग्न्य को नमस्कार! जय राम, लक्ष्मण सहित!
श्लोक 257 (skanda.7.383.257)
जय कृष्ण जगन्नाथ जय देवकिनन्दन । नमामि बुद्धं कृष्णं च कल्किनं प्रणमाम्यहम्
jaya kṛṣṇa jagannātha jaya devakinandana | namāmi buddhaṁ kṛṣṇaṁ ca kalkinaṁ praṇamāmyaham
जय कृष्ण, जगन्नाथ! जय देवकी-नंदन! मैं बुद्ध को नमन करता हूँ, और कल्कि को भी प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 258 (skanda.7.383.258)
सारस्वत उवाच नरीनर्ति तथा स्तौति नारदो गगनं गतः । योगिनः सनकाद्या ये स्तुवंति च जनार्दनम्
sārasvata uvāca narīnarti tathā stauti nārado gaganaṁ gataḥ | yoginaḥ sanakādyā ye stuvaṁti ca janārdanam
सारस्वत ने कहा - इस प्रकार नाचते और स्तुति करते हुए नारद आकाश में चले गए; सनक आदि योगीजन भी जनार्दन की स्तुति करने लगे।
श्लोक 259 (skanda.7.383.259)
अन्तरिक्षे गते कृष्णे वर्द्धमाने बलेः पुरः । ऊर्ध्ववक्त्राः स्थिताः सर्वे निरी क्षन्ते दिवाकरम्
antarikṣe gate kṛṣṇe varddhamāne baleḥ puraḥ | ūrdhvavaktrāḥ sthitāḥ sarve nirī kṣante divākaram
कृष्ण के आकाश में जाने पर, बलि के नगर के सामने बढ़ते हुए, सब लोग मुख ऊपर उठाए हुए सूर्य की ओर निहारने लगे।
श्लोक 260 (skanda.7.383.260)
दृष्टच्छत्राकृतिस्तावत्पश्चादूर्ध्वं गतो हरिः । चूडामणिरिवाभाति भास्करो हरिमस्तके
dṛṣṭacchatrākṛtistāvatpaścādūrdhvaṁ gato hariḥ | cūḍāmaṇirivābhāti bhāskaro harimastake
पहले छाते के आकार में दिखे, फिर हरि ऊपर उठते चले गए; सूर्य मानो हरि के मस्तक पर चूड़ामणि के समान शोभित हुआ।
श्लोक 261 (skanda.7.383.261)
दैत्यैर्निरीक्षितः सम्यग्ललाटे तिलकायते । हरिः संवर्द्धते यावत्कर्णेऽसौ कुण्डलायते
daityairnirīkṣitaḥ samyaglalāṭe tilakāyate | hariḥ saṁvarddhate yāvatkarṇe'sau kuṇḍalāyate
दैत्यों द्वारा ध्यान से देखे जाने पर वह ललाट पर तिलक-सा दिखने लगा; हरि के बढ़ते-बढ़ते वह कान में कुंडल-सा दिखने लगा।
श्लोक 262 (skanda.7.383.262)
वर्द्धमानस्य च हरेर्हृदये कौस्तुभायते । इंद्राद्या देवता रुद्रा वसवो गगने स्थिताः
varddhamānasya ca harerhṛdaye kaustubhāyate | iṁdrādyā devatā rudrā vasavo gagane sthitāḥ
बढ़ते हुए हरि के हृदय पर वह कौस्तुभ-मणि के समान दिखने लगा; इन्द्र आदि देवता, रुद्रगण और वसुगण आकाश में स्थित थे।
श्लोक 263 (skanda.7.383.263)
ऊर्ध्वं पुनर्यत्र हरिर्न तत्र गगनं मतम् । वनमाला तदा कण्ठे वासवेन निवेशिता
ūrdhvaṁ punaryatra harirna tatra gaganaṁ matam | vanamālā tadā kaṇṭhe vāsavena niveśitā
हरि इतने ऊपर उठते गए कि वहाँ आगे आकाश ही नहीं रहा; तब इन्द्र ने उनके कंठ में वनमाला पहना दी।
श्लोक 264 (skanda.7.383.264)
पृथिवी कम्पते सर्वा दिविस्थं सूर्यमण्डलम् । किं भविष्यति दैत्यास्ते भीताः पश्यंति भास्करम्
pṛthivī kampate sarvā divisthaṁ sūryamaṇḍalam | kiṁ bhaviṣyati daityāste bhītāḥ paśyaṁti bhāskaram
सम्पूर्ण पृथ्वी काँपने लगी, सूर्य-मंडल आकाश में स्थिर हो गया। 'हमारा क्या होगा?' - भयभीत दैत्य सूर्य की ओर देखने लगे।
श्लोक 265 (skanda.7.383.265)
नाभौ पद्मायते सूर्यः कटौ च रशनायते । एवं संवर्द्धितो विष्णुर्जगृहे च पदद्वयम्
nābhau padmāyate sūryaḥ kaṭau ca raśanāyate | evaṁ saṁvarddhito viṣṇurjagṛhe ca padadvayam
सूर्य उनकी नाभि पर कमल-सा, कमर पर करधनी-सा दिखने लगा; इस प्रकार विशाल हुए विष्णु ने अपने दो पग रख दिए।
श्लोक 266 (skanda.7.383.266)
स्थानं नास्ति तृतीयस्य ब्रह्मांडं सकलं कृतम् । अहर्दण्डो जगत्स्रष्टा ब्रह्मदंडायते तदा
sthānaṁ nāsti tṛtīyasya brahmāṁḍaṁ sakalaṁ kṛtam | ahardaṇḍo jagatsraṣṭā brahmadaṁḍāyate tadā
तीसरे के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा, सम्पूर्ण ब्रह्मांड घिर चुका था। तब जगत् के स्रष्टा, दिनों के दण्डधारी ब्रह्मा, मानो विष्णु के ही ब्रह्म-दण्ड बन गए।
श्लोक 267 (skanda.7.383.267)
देवदानव गंधर्वमनुष्योरगपन्नगैः । पूज्यते चरणो विष्णोः स्तूयते चानुमीयते
devadānava gaṁdharvamanuṣyoragapannagaiḥ | pūjyate caraṇo viṣṇoḥ stūyate cānumīyate
विष्णु का चरण देव, दानव, गन्धर्व, मनुष्य और नागों द्वारा पूजा गया; उसकी स्तुति की गई, और उसकी महिमा का अनुमान लगाया गया।
श्लोक 268 (skanda.7.383.268)
धर्मात्मा यतदण्डो हि गंधर्वैर्गीयते मुहुः । ज्योतिश्चक्राक्षदंडः किं हरिणा निर्मितः स्वयम्
dharmātmā yatadaṇḍo hi gaṁdharvairgīyate muhuḥ | jyotiścakrākṣadaṁḍaḥ kiṁ hariṇā nirmitaḥ svayam
उस धर्मात्मा का विशाल दण्ड गन्धर्वों द्वारा बार-बार गाया गया - 'क्या तारों के चक्र की यह धुरी स्वयं हरि द्वारा बनाई गई है?'
श्लोक 269 (skanda.7.383.269)
जित्वेदं भुवनं गंगा ध्वजदंडोऽमरैः कृतः । त्रिविक्रमांघ्रिदण्डोऽयं कीर्तिदंडायते ध्रुवम्
jitvedaṁ bhuvanaṁ gaṁgā dhvajadaṁḍo'maraiḥ kṛtaḥ | trivikramāṁghridaṇḍo'yaṁ kīrtidaṁḍāyate dhruvam
'इस लोक को जीतकर, गंगा को देवताओं ने उनकी ध्वज-दंड बना दिया; त्रिविक्रम का यह चरण-दंड निश्चय ही कीर्ति-दंड बन गया है।'
श्लोक 270 (skanda.7.383.270)
वेगेनाक्षिप्य हरिणा नीतो ब्रह्मांडमस्तके । पादस्तन्मस्तकं भित्त्वा बहिर्यास्यति वेगतः
vegenākṣipya hariṇā nīto brahmāṁḍamastake | pādastanmastakaṁ bhittvā bahiryāsyati vegataḥ
वेगपूर्वक फेंककर हरि ने अपना चरण ब्रह्मांड की चोटी तक पहुँचा दिया; वह चरण उस चोटी को भेदकर वेगपूर्वक बाहर निकलने ही वाला था।
श्लोक 271 (skanda.7.383.271)
तावद्ब्रह्मांडवेगोऽयं विराडिति हि संज्ञितः । स सर्व बीजरूपो हि परमात्मेति गद्यते
tāvadbrahmāṁḍavego'yaṁ virāḍiti hi saṁjñitaḥ | sa sarva bījarūpo hi paramātmeti gadyate
यही ब्रह्मांड का वेग 'विराट' कहलाता है; वह सर्व-बीज-रूप ही परमात्मा कहा जाता है।
श्लोक 272 (skanda.7.383.272)
तेनेदं सकलं जातं पादस्याग्रे व्यवस्थितम् । ब्रह्मांडभेदनं कृत्वा न गन्तव्यं बहिस्त्वया
tenedaṁ sakalaṁ jātaṁ pādasyāgre vyavasthitam | brahmāṁḍabhedanaṁ kṛtvā na gantavyaṁ bahistvayā
उन्हीं से यह सब कुछ उत्पन्न हुआ, जो उनके चरण के अग्रभाग में स्थित है। [देवताओं ने प्रार्थना की:] ब्रह्मांड को भेदकर आपको बाहर नहीं जाना चाहिए।
श्लोक 273 (skanda.7.383.273)
तेनैव सह ब्रह्मांडे पफाल चरणो हरेः । ब्रह्मांडं जर्जरं जातं पादसंकोचनादपि
tenaiva saha brahmāṁḍe paphāla caraṇo hareḥ | brahmāṁḍaṁ jarjaraṁ jātaṁ pādasaṁkocanādapi
फिर भी उसी के साथ हरि का चरण ब्रह्मांड में टकरा गया; उस चरण के संकोच मात्र से ही ब्रह्मांड जर्जर हो गया।
श्लोक 274 (skanda.7.383.274)
भिन्ने तस्मिन्समायातं ब्राह्मं तोयं जगत्त्रये । विष्णुपादोद्भवा गंगा मस्तकान्निःसृता तदा
bhinne tasminsamāyātaṁ brāhmaṁ toyaṁ jagattraye | viṣṇupādodbhavā gaṁgā mastakānniḥsṛtā tadā
वह भिन्न होने पर उसमें ब्रह्म-जल तीनों लोकों में आ गया; विष्णु के चरण से उत्पन्न गंगा तब उस शिखर से निकल पड़ी।
श्लोक 275 (skanda.7.383.275)
त्रैलोक्यप्लाविनी देवी या रुद्रेण स्वयं धृता । स्वर्धुनी पूज्यते स्वर्गे गंगेति गां गता सती ।
trailokyaplāvinī devī yā rudreṇa svayaṁ dhṛtā | svardhunī pūjyate svarge gaṁgeti gāṁ gatā satī |
त्रैलोक्य को जलमग्न करने वाली वह देवी, जिसे रुद्र ने स्वयं धारण किया, स्वर्ग में स्वर्धुनी के रूप में पूजी जाती है, और सती होकर गंगा के रूप में पृथ्वी पर आई।
श्लोक 276 (skanda.7.383.276)
पाताले सा यदा प्राप्ता ख्याता त्रिपथगैव सा । यस्याः स्मरणमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्
pātāle sā yadā prāptā khyātā tripathagaiva sā | yasyāḥ smaraṇamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet
पाताल में पहुँचने पर वह त्रिपथगा नाम से विख्यात हुई; उसके स्मरण मात्र से ही समस्त पापों का नाश होता है।
श्लोक 277 (skanda.7.383.277)
दर्शनादश्वमेधस्य संपूर्णस्य फलं लभेत् । स्नानमात्रेण नश्येत सप्तजन्मकृतं त्वघम्
darśanādaśvamedhasya saṁpūrṇasya phalaṁ labhet | snānamātreṇa naśyeta saptajanmakṛtaṁ tvagham
उसके दर्शन से सम्पूर्ण अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है; उसमें स्नान मात्र से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 278 (skanda.7.383.278)
स्नात्वा संपूजयेद्यस्तु देवौ हरिहरौ नरः । इन्द्रलोकमतिक्रम्य विष्णुलोके महीयते ।
snātvā saṁpūjayedyastu devau hariharau naraḥ | indralokamatikramya viṣṇuloke mahīyate |
जो मनुष्य स्नान कर हरि और हर दोनों देवों की पूजा करता है, वह इन्द्रलोक को भी लाँघकर विष्णुलोक में महिमामंडित होता है।
श्लोक 279 (skanda.7.383.279)
विष्णुपादोदकं पीत्वा ज्ञात्वा तत्त्वानि संयमी । उपोष्य दिवसं विष्णोर्मुक्तिं गच्छति देहवान्
viṣṇupādodakaṁ pītvā jñātvā tattvāni saṁyamī | upoṣya divasaṁ viṣṇormuktiṁ gacchati dehavān
विष्णु के चरणों का जल पीकर, तत्त्वों को जानकर, संयमी मनुष्य विष्णु के दिन उपवास कर, देहधारी होते हुए भी मुक्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक 280 (skanda.7.383.280)
शुद्धस्वभावसत्त्वस्था विरक्ता जन्मभूमिषु । संसारबंधनं छित्त्वा याति ते परमां गतिम्
śuddhasvabhāvasattvasthā viraktā janmabhūmiṣu | saṁsārabaṁdhanaṁ chittvā yāti te paramāṁ gatim
शुद्ध सात्त्विक स्वभाव में स्थित, जन्म-भूमियों से विरक्त लोग संसार-बंधन को काटकर परम गति को प्राप्त होते हैं।