प्रभास खण्ड · अध्याय 384
बलये वामनकृतवरप्रदानवृत्तान्तवर्णनपूर्वकं वस्त्रापथक्षेत्रयात्रामाहात्म्यसारस्वतभोजसंवादसमाप्तिपुरःसरं वस्त्रापथक्षेत्रमाहात्म्यसमाप्तिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.384.1)
राजोवाच गृहीत्वा दक्षिणां दैत्यान्महाविष्णुर्जनार्दनः ॥ । चकार किं ममाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे
rājovāca gṛhītvā dakṣiṇāṁ daityānmahāviṣṇurjanārdanaḥ | cakāra kiṁ mamācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi me
राजा ने कहा - दैत्यों से दक्षिणा ग्रहण कर महाविष्णु जनार्दन ने फिर क्या किया? मुझे बताइए, मुझे अत्यंत कौतूहल है।
श्लोक 2 (skanda.7.384.2)
सारस्वत उवाच एवं स्तुतः सुरैर्देवो गृहीत्वा मेदिनीं हरिः । बलिं निर्वासयामास संपूर्णे यज्ञकर्मणि । यज्ञांते दक्षिणां लब्ध्वा संपूर्णोऽभूदथाध्वरः
sārasvata uvāca evaṁ stutaḥ surairdevo gṛhītvā medinīṁ hariḥ | baliṁ nirvāsayāmāsa saṁpūrṇe yajñakarmaṇi | yajñāṁte dakṣiṇāṁ labdhvā saṁpūrṇo'bhūdathādhvaraḥ
सारस्वत ने कहा - इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुत होकर, पृथ्वी को ग्रहण कर हरि देव ने बलि को निर्वासित कर दिया, यज्ञ-कर्म के पूर्ण होने पर। यज्ञ के अंत में दक्षिणा प्राप्त कर वह यज्ञ पूर्ण हो गया।
श्लोक 3 (skanda.7.384.3)
भगवानप्यसंपूर्णे तृतीये तु क्रमे विभुः । समभ्येत्य बलिं प्राह ईषत्प्रस्फुरिताधरः
bhagavānapyasaṁpūrṇe tṛtīye tu krame vibhuḥ | samabhyetya baliṁ prāha īṣatprasphuritādharaḥ
परन्तु तीसरा पग अभी अधूरा था, अतः वे प्रभु बलि के पास जाकर, अपने अधर को कुछ काँपते हुए, बोले -
श्लोक 4 (skanda.7.384.4)
ऋणे भवति दैत्येन्द्र बंधनं घोरदर्शनम् । त्वं पूरय पदं तन्मे नोचेद्बन्धं प्रतीच्छ भोः
ṛṇe bhavati daityendra baṁdhanaṁ ghoradarśanam | tvaṁ pūraya padaṁ tanme nocedbandhaṁ pratīccha bhoḥ
'हे दैत्येन्द्र, ऋण रहने पर भयंकर बंधन होता है। तुम मेरा वह पद पूरा करो, अन्यथा बंधन स्वीकार करो, हे महोदय।'
श्लोक 5 (skanda.7.384.5)
तन्मुरारिवचः श्रुत्वा पुरो भूत्वा बलेः सुतः । बाणो वामनमाचष्टे तदा तं विश्वरूपिणम्
tanmurārivacaḥ śrutvā puro bhūtvā baleḥ sutaḥ | bāṇo vāmanamācaṣṭe tadā taṁ viśvarūpiṇam
मुरारि के ये वचन सुनकर बलि का पुत्र बाण सामने आकर उस विश्वरूपधारी वामन से कहने लगा -
श्लोक 6 (skanda.7.384.6)
कृत्वा महीमल्पतरां वपुः कृत्वा तु वामनम् । पदत्रयं याचयित्वा विश्वरूपमगाः कथम्
kṛtvā mahīmalpatarāṁ vapuḥ kṛtvā tu vāmanam | padatrayaṁ yācayitvā viśvarūpamagāḥ katham
'पृथ्वी को अत्यंत छोटा करके, वामन रूप धारण कर, तीन पग माँगकर, आप अब विश्वरूप कैसे बन गए?'
श्लोक 7 (skanda.7.384.7)
यदि तृतीयं क्रमणं याचसे जगदीश्वर । पुनर्वामनतां याहि बलिर्दास्यति तत्पदम्
yadi tṛtīyaṁ kramaṇaṁ yācase jagadīśvara | punarvāmanatāṁ yāhi balirdāsyati tatpadam
'यदि आप तीसरा पग माँगते हैं, हे जगदीश्वर, तो फिर से वामन रूप धारण कीजिए, बलि वह पद देंगे।'
श्लोक 8 (skanda.7.384.8)
यादृग्विधाय बलिना वामनायोदकं कृतम् । तत्तादृशाय दातव्यमथ किं विश्वरूपिणे
yādṛgvidhāya balinā vāmanāyodakaṁ kṛtam | tattādṛśāya dātavyamatha kiṁ viśvarūpiṇe
'जिस रूप में बलि ने वामन को जल दिया था, उसी रूप में देना चाहिए - विश्वरूप का इससे क्या संबंध?'
श्लोक 9 (skanda.7.384.9)
भवत्कृतमिदं विश्वं विश्वस्मिन्वर्तते बलिः । छद्मना नैव गृह्णन्ति साधवो ये महेश्वर
bhavatkṛtamidaṁ viśvaṁ viśvasminvartate baliḥ | chadmanā naiva gṛhṇanti sādhavo ye maheśvara
'यह विश्व आपके ही द्वारा निर्मित है, और बलि उसी विश्व में रहते हैं। हे महेश्वर, साधु-जन कभी छल से कुछ ग्रहण नहीं करते।'
श्लोक 10 (skanda.7.384.10)
जगदेतज्जगन्नाथ तावकं यदि मन्यसे । ज्ञात्वा बलिममर्यादं भवद्भक्तिपराङ्मुखम्
jagadetajjagannātha tāvakaṁ yadi manyase | jñātvā balimamaryādaṁ bhavadbhaktiparāṅmukham
'यदि आप इस जगत् को अपना मानते हैं, हे जगन्नाथ, तो बलि को मर्यादा-रहित, आपकी भक्ति से विमुख कैसे मानते हैं?'
श्लोक 11 (skanda.7.384.11)
कंठपाशेन निष्कास्य केन वै वार्यते भवान् । गोपालमन्यं कुरुते रक्षणाय च गोपतिः । सुतृणं चारयन्पूर्वो गोपः किं कुरुते तदा
kaṁṭhapāśena niṣkāsya kena vai vāryate bhavān | gopālamanyaṁ kurute rakṣaṇāya ca gopatiḥ | sutṛṇaṁ cārayanpūrvo gopaḥ kiṁ kurute tadā
'कंठ-पाश से खींचकर आपको कौन रोक सकता है? परन्तु यदि गोस्वामी किसी अन्य को रक्षा के लिए गोपाल नियुक्त करे, तो जिस पूर्व गोप ने उत्तम तृण चरा-चराकर पाला, वह तब क्या करता है?'
श्लोक 12 (skanda.7.384.12)
इत्येवमुक्ते तेनाथ वचने बलिसूनुना । प्रोवाच भगवान्वाक्यमादिकर्ता जनार्दनः
ityevamukte tenātha vacane balisūnunā | provāca bhagavānvākyamādikartā janārdanaḥ
इस प्रकार बलि-पुत्र द्वारा वचन कहे जाने पर, आदिकर्ता भगवान् जनार्दन ने कहा -
श्लोक 13 (skanda.7.384.13)
यान्युक्तानि वचांसीत्थं त्वया बालेन सांप्रतम् । तेषां त्वं हेतुसंयुक्तं शृणु प्रत्युत्तरं मम
yānyuktāni vacāṁsītthaṁ tvayā bālena sāṁpratam | teṣāṁ tvaṁ hetusaṁyuktaṁ śṛṇu pratyuttaraṁ mama
'तुमने बालक होते हुए अभी जो वचन कहे, उनका मेरा हेतु-सहित उत्तर सुनो।'
श्लोक 14 (skanda.7.384.14)
पूर्वमुक्तस्तव पिता मया बाण पदत्रयम् । देहि मह्यं प्रमाणेन तदेतत्समनुष्ठितम्
pūrvamuktastava pitā mayā bāṇa padatrayam | dehi mahyaṁ pramāṇena tadetatsamanuṣṭhitam
'हे बाण, पहले मैंने तुम्हारे पिता से एक निश्चित माप के तीन पग माँगे थे - वह माप अब पूरा हो चुका है।'
श्लोक 15 (skanda.7.384.15)
किं न वेत्ति प्रमाणं मे बलिस्तव पिता सुत । बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत्पदत्रयम्
kiṁ na vetti pramāṇaṁ me balistava pitā suta | balerapi hitārthāya kṛtametatpadatrayam
'हे पुत्र, क्या तुम्हारे पिता बलि मेरे माप को नहीं जानते? यह तीन पग लेना बलि के ही हित के लिए किया गया था।'
श्लोक 16 (skanda.7.384.16)
तस्माद्यन्मम बालेय त्वत्पित्रांऽबु करे महत् । दत्तं तेनास्य सुतले कल्पं यावद्वसिष्यति
tasmādyanmama bāleya tvatpitrāṁ'bu kare mahat | dattaṁ tenāsya sutale kalpaṁ yāvadvasiṣyati
'अतः, हे बालक, तुम्हारे पिता के हाथ से जो महान जल मुझे दिया गया, उसी के कारण वे कल्प-पर्यंत सुतल में निवास करेंगे।'
श्लोक 17 (skanda.7.384.17)
गते मन्वन्तरे बाण श्राद्धदेवस्य साम्प्रतम् । सावर्णिके त्वागते च बलिरिन्द्रो भविष्यति
gate manvantare bāṇa śrāddhadevasya sāmpratam | sāvarṇike tvāgate ca balirindro bhaviṣyati
'हे बाण, श्राद्धदेव के इस वर्तमान मन्वंतर के बीत जाने पर, सावर्णि मन्वंतर आने पर बलि इन्द्र बनेंगे।'
श्लोक 18 (skanda.7.384.18)
इति प्रोक्त्वा बलिसुतं बाणं देवस्त्रिविक्रमः । प्रोवाच बलिमभ्येत्य वचनं मधुराक्षरम्
iti proktvā balisutaṁ bāṇaṁ devastrivikramaḥ | provāca balimabhyetya vacanaṁ madhurākṣaram
ऐसा बलि-पुत्र बाण से कहकर, त्रिविक्रम देव फिर बलि के पास जाकर मधुर वचन बोले -
श्लोक 19 (skanda.7.384.19)
श्रीभगवानुवाच अपूर्णदक्षिणे यागे गच्छ राजन्महातलम् । सुतलंनाम पातालं वस तत्र निरामयः
śrībhagavānuvāca apūrṇadakṣiṇe yāge gaccha rājanmahātalam | sutalaṁnāma pātālaṁ vasa tatra nirāmayaḥ
श्री भगवान् ने कहा - चूँकि यज्ञ में दक्षिणा अपूर्ण रह गई, हे राजन्, महातल को जाओ; सुतल नामक पाताल में निरोग होकर निवास करो।
श्लोक 20 (skanda.7.384.20)
बलिरुवाच सुतलस्थस्य मे नाथ कथं चरणयोस्तव । दर्शनं पूजनं भोगो निवसामि यथासुखम् श्रीभगवानुवाच दैत्येन्द्र हदये नित्यं तावके निवसाम्यहम् । अतस्ते दर्शनं प्राप्तः पुनः स्थास्ये तवान्तिकम्
baliruvāca sutalasthasya me nātha kathaṁ caraṇayostava | darśanaṁ pūjanaṁ bhogo nivasāmi yathāsukham śrībhagavānuvāca daityendra hadaye nityaṁ tāvake nivasāmyaham | ataste darśanaṁ prāptaḥ punaḥ sthāsye tavāntikam
बलि ने कहा - हे नाथ, सुतल में रहते हुए मुझे आपके चरणों का दर्शन, पूजन और भोग कैसे प्राप्त होगा, मैं सुखपूर्वक कैसे रहूँगा? श्री भगवान् ने कहा - हे दैत्येन्द्र, मैं सदा तुम्हारे हृदय में निवास करता हूँ; अतः तुम्हें मेरा दर्शन प्राप्त है ही, और मैं पुनः तुम्हारे समीप रहूँगा -
श्लोक 21 (skanda.7.384.21)
तथान्यमुत्सवं पुण्यं वृत्ते शक्रमहोत्सवे । दीपप्रतिपन्नामाऽसौ तत्र भावी महोत्सवः
tathānyamutsavaṁ puṇyaṁ vṛtte śakramahotsave | dīpapratipannāmā'sau tatra bhāvī mahotsavaḥ
और साथ ही एक और पुण्य उत्सव होगा - इन्द्र-महोत्सव बीतने पर, 'दीप-प्रतिपदा' नामक एक महोत्सव वहाँ होने वाला है।
श्लोक 22 (skanda.7.384.22)
तत्र त्वां नरशार्दूला हृष्टाः पुष्टाः स्वलंकृताः । पुष्पदीपप्रदानेन अर्चयिष्यंति यत्नतः ।
tatra tvāṁ naraśārdūlā hṛṣṭāḥ puṣṭāḥ svalaṁkṛtāḥ | puṣpadīpapradānena arcayiṣyaṁti yatnataḥ |
हे नरश्रेष्ठ, वहाँ हर्षित, समृद्ध, सुसज्जित लोग तुम्हें पुष्प-दीप अर्पण से यत्नपूर्वक पूजेंगे।
श्लोक 23 (skanda.7.384.23)
तत्रोत्सवः पुण्यतमो भविष्यति धरातले । तव नामांकितो दैत्य तेन त्वं वत्सरं सुखी
tatrotsavaḥ puṇyatamo bhaviṣyati dharātale | tava nāmāṁkito daitya tena tvaṁ vatsaraṁ sukhī
हे दैत्य, वहाँ वह उत्सव पृथ्वी पर सबसे पवित्र होगा, तुम्हारे ही नाम से चिह्नित; उससे तुम वर्षभर सुखी रहोगे -
श्लोक 24 (skanda.7.384.24)
भविष्यसि नरा ये तु दृढभक्तिसहा न्विताः । त्वामर्चयन्ति विधिवत्तेऽपि स्युः सुखभागिनः
bhaviṣyasi narā ye tu dṛḍhabhaktisahā nvitāḥ | tvāmarcayanti vidhivatte'pi syuḥ sukhabhāginaḥ
और जो मनुष्य दृढ़ भक्ति से युक्त होकर विधिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे, वे भी सुख के भागी होंगे।
श्लोक 25 (skanda.7.384.25)
यथैव राज्यं भवतस्तु सांप्रतं तथैव सा भाव्यथ कौमुदीति । इत्येवमुक्त्वा मधुमदितीश्वरं निवासयित्वा सुतलं सभार्यकम्
yathaiva rājyaṁ bhavatastu sāṁprataṁ tathaiva sā bhāvyatha kaumudīti | ityevamuktvā madhumaditīśvaraṁ nivāsayitvā sutalaṁ sabhāryakam
जैसा तुम्हारा राज्य अभी है, वैसा ही वह तब होगा - और उस उत्सव का नाम 'कौमुदी' होगा। ऐसा कहकर मधु के हंता ने, दैत्येन्द्र को पत्नी सहित सुतल में बसाकर -
श्लोक 26 (skanda.7.384.26)
उर्वी समादाय जगाम तूर्णं स शक्रसद्मामरसंघजुष्टम् । दत्त्वा मघोने मधुजित्त्रिविष्टपं कृत्वा तु देवान्मखभागभोगिनः
urvī samādāya jagāma tūrṇaṁ sa śakrasadmāmarasaṁghajuṣṭam | dattvā maghone madhujittriviṣṭapaṁ kṛtvā tu devānmakhabhāgabhoginaḥ
पृथ्वी को लेकर वे शीघ्रता से अमर-गणों से भरे इन्द्र के भवन को गए; मघवान को त्रिलोक देकर और देवताओं को यज्ञ-भाग का भोगी बनाकर,
श्लोक 27 (skanda.7.384.27)
अन्तर्दधे विश्वपतिर्महेशः संपश्यतां वै वसुधाधिपानाम्
antardadhe viśvapatirmaheśaḥ saṁpaśyatāṁ vai vasudhādhipānām
विश्वपति महेश अंतर्धान हो गए, पृथ्वी के अधिपतियों के देखते-देखते।
श्लोक 28 (skanda.7.384.28)
गृहीत्वेति बले राज्यं मनुपुत्रे नियोजितम् । द्वीपांतरे च ते दैत्याः प्रेषिताश्चाज्ञया स्वयम्
gṛhītveti bale rājyaṁ manuputre niyojitam | dvīpāṁtare ca te daityāḥ preṣitāścājñayā svayam
इस प्रकार राज्य को ग्रहण कर मनु-पुत्र को सौंप दिया गया; और वे दैत्य अपनी आज्ञा से द्वीपांतरों में भेज दिए गए -
श्लोक 29 (skanda.7.384.29)
पातालनिलया ये तु ते तत्रैव निवेशिताः । देवानां परमो हर्षः संजातो बलिनिग्रहे
pātālanilayā ye tu te tatraiva niveśitāḥ | devānāṁ paramo harṣaḥ saṁjāto balinigrahe
जबकि पाताल-निवासी दैत्य वहीं स्थापित किए गए। बलि के निग्रह से देवताओं को परम हर्ष हुआ।
श्लोक 30 (skanda.7.384.30)
निवासाय पुनश्चक्रे वामनो वामनो मनः । तत्र क्षेत्रे स्वनगरे वामनः स न्युवास ह
nivāsāya punaścakre vāmano vāmano manaḥ | tatra kṣetre svanagare vāmanaḥ sa nyuvāsa ha
वामन ने फिर अपने निवास के लिए मन बनाया; और वामन उसी क्षेत्र में, अपने ही नगर में बस गए।
श्लोक 31 (skanda.7.384.31)
सारस्वत उवाच प्रादुर्भावस्ते कथितो नरेन्द्र पुण्यः शुचिर्वामनस्याघहारी । स्मृते यस्मिन्संश्रुते कीर्तिते च पापं यायात्संक्षयं पुण्यमेति
sārasvata uvāca prādurbhāvaste kathito narendra puṇyaḥ śucirvāmanasyāghahārī | smṛte yasminsaṁśrute kīrtite ca pāpaṁ yāyātsaṁkṣayaṁ puṇyameti
सारस्वत ने कहा - हे नरेन्द्र, इस प्रकार वामन का पुण्य, पवित्र, पाप-हारी प्राकट्य कहा गया; जिसका स्मरण, श्रवण और कीर्तन करने से पाप का पूर्ण नाश और पुण्य की प्राप्ति होती है।
श्लोक 32 (skanda.7.384.32)
ईश्वर उवाच इति सारस्वतवचः श्रुत्वा भोजः स भूपतिः । नमस्कृत्य मुनिश्रेष्ठं पूजयामास भक्तितः
īśvara uvāca iti sārasvatavacaḥ śrutvā bhojaḥ sa bhūpatiḥ | namaskṛtya muniśreṣṭhaṁ pūjayāmāsa bhaktitaḥ
ईश्वर ने कहा - सारस्वत के ये वचन सुनकर राजा भोज ने उस श्रेष्ठ मुनि को नमस्कार कर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की।
श्लोक 33 (skanda.7.384.33)
ततो यथोक्तविधिना स भोजो नृपसत्तमः । वस्त्रापथक्षेत्र यात्रां परिवारजनैः सह । कृत्वा कृतार्थतां प्राप्तो जगामान्ते परं पदम्
tato yathoktavidhinā sa bhojo nṛpasattamaḥ | vastrāpathakṣetra yātrāṁ parivārajanaiḥ saha | kṛtvā kṛtārthatāṁ prāpto jagāmānte paraṁ padam
फिर यथोक्त विधि से उस श्रेष्ठ राजा भोज ने परिवार-जनों सहित वस्त्रापथ क्षेत्र की यात्रा कर, कृतार्थता प्राप्त कर, अंत में परम पद को प्राप्त किया।
श्लोक 34 (skanda.7.384.34)
एतन्मया पुण्यतमं प्रभासक्षेत्रे च वस्रापथमीरितं ते । श्रुत्वा पठित्वा परया समेतो भक्त्या तु विष्णोः पदमभ्युपैति
etanmayā puṇyatamaṁ prabhāsakṣetre ca vasrāpathamīritaṁ te | śrutvā paṭhitvā parayā sameto bhaktyā tu viṣṇoḥ padamabhyupaiti
प्रभास क्षेत्र में स्थित इस परम पुण्यमय वस्त्रापथ का वर्णन मैंने तुम्हें किया है; जो इसे सुनकर या पढ़कर परम भक्ति से युक्त होता है, वह विष्णु के पद को प्राप्त करता है।
श्लोक 35 (skanda.7.384.35)
यथा पापानि धूयंते गंगावारिविगाहनात् । तथा पुराणश्रवणाद्दुरितानां विना शनम्
yathā pāpāni dhūyaṁte gaṁgāvārivigāhanāt | tathā purāṇaśravaṇādduritānāṁ vinā śanam
जैसे गंगा के जल में स्नान से पाप धुल जाते हैं, वैसे ही इस पुराण-श्रवण से बिना विलंब के दुरितों का नाश होता है।
श्लोक 36 (skanda.7.384.36)
इदं रहस्यं परमं तवोक्तं न वाच्यमेतद्धरिभक्तिवर्जिते । द्विजस्य निन्दानिरतेऽतिपापे गुरावभक्ते कृतपापबुद्धौ
idaṁ rahasyaṁ paramaṁ tavoktaṁ na vācyametaddharibhaktivarjite | dvijasya nindānirate'tipāpe gurāvabhakte kṛtapāpabuddhau
यह परम रहस्य तुम्हें बताया गया है; इसे हरि-भक्ति से रहित, ब्राह्मण-निंदा में लीन, अत्यंत पापी, गुरु के प्रति अभक्त, पाप-बुद्धि वाले को नहीं कहना चाहिए।
श्लोक 37 (skanda.7.384.37)
इदं पठेद्यो नियतं मनुष्यः कृतभावनः । तस्य भक्तिः शिवे कृष्णे निश्चला जायते धुवम्
idaṁ paṭhedyo niyataṁ manuṣyaḥ kṛtabhāvanaḥ | tasya bhaktiḥ śive kṛṣṇe niścalā jāyate dhuvam
जो मनुष्य नियमपूर्वक श्रद्धा से इसे पढ़ता है, उसकी शिव और कृष्ण में भक्ति निश्चय ही अटल हो जाती है।
श्लोक 38 (skanda.7.384.38)
तद्भक्त्या सकलानर्थान्प्राप्नोति पुरुषोत्तमः ॥ । पुराणवाचिने दद्याद्गोभूस्वर्णविभूषणम्
tadbhaktyā sakalānarthānprāpnoti puruṣottamaḥ | purāṇavācine dadyādgobhūsvarṇavibhūṣaṇam
उस भक्ति से पुरुषोत्तम समस्त प्रयोजनों को प्राप्त करता है। पुराण-वाचक को गौ, भूमि, स्वर्ण और आभूषण देने चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.7.384.39)
वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं कुर्वन्दारिद्र्यमाप्नुयात् । त्रिःकृत्वा प्रपठञ्छृण्वंन्सर्वान्कामानवाप्नुयात्
vittaśāṭhyaṁ na kartavyaṁ kurvandāridryamāpnuyāt | triḥkṛtvā prapaṭhañchṛṇvaṁnsarvānkāmānavāpnuyāt
धन के विषय में कंजूसी नहीं करनी चाहिए; करने वाला दरिद्रता को प्राप्त होता है। जो इसे तीन बार पढ़ता या सुनता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।