प्रभास खण्ड · अध्याय 385
वसिष्ठाश्रम के समीप विवर-वृत्तान्त का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.385.1)
व्यास उवाच । ॐ नमोऽनन्ताय सूक्ष्माय ज्ञानगम्याय वेधसे । शुद्धाय विश्वरूपाय देवदेवाय शम्भवे
vyāsa uvāca | oṁ namo'nantāya sūkṣmāya jñānagamyāya vedhase | śuddhāya viśvarūpāya devadevāya śambhave
व्यास जी ने कहा - ॐ, उन अनन्त, सूक्ष्म, ज्ञान से ही जिन तक पहुँचा जा सकता है, उन विधाता को नमस्कार है। शुद्ध, विश्वरूप, देवों के देव शम्भु को नमस्कार है।
श्लोक 2 (skanda.7.385.2)
ऋषय ऊचुः । कथितो वंशविस्तारो भवता सोमसूर्ययोः । मन्वन्तराणि सर्वाणि सृष्टिश्चैव पृथग्विधा
ṛṣaya ūcuḥ | kathito vaṁśavistāro bhavatā somasūryayoḥ | manvantarāṇi sarvāṇi sṛṣṭiścaiva pṛthagvidhā
ऋषियों ने कहा - आपने सोम और सूर्य वंशों का विस्तार बताया, सभी मन्वन्तर और विविध प्रकार की सृष्टि का भी वर्णन किया।
श्लोक 3 (skanda.7.385.3)
अधुना श्रोतुमिच्छामस्तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् । कानि तीर्थानि पुण्यानि भूतलेऽस्मिन्महामते
adhunā śrotumicchāmastīrthamāhātmyamuttamam | kāni tīrthāni puṇyāni bhūtale'sminmahāmate
अब हम इस पृथ्वी पर स्थित पुण्य तीर्थों के उत्तम माहात्म्य को सुनना चाहते हैं। हे महामते, बताइए कि इस भूतल पर कौन-कौन से तीर्थ पवित्र हैं।
श्लोक 4 (skanda.7.385.4)
सूत उवाच । नाना तीर्थानि लोकेऽस्मिन्येषां संख्या न विद्यते । तिस्रः कोट्योऽर्द्धकोटिश्च तेषां संख्या कृता पुरा
sūta uvāca | nānā tīrthāni loke'sminyeṣāṁ saṅkhyā na vidyate | tisraḥ koṭyo'rddhakoṭiśca teṣāṁ saṅkhyā kṛtā purā
सूत जी ने कहा - इस लोक में अनेक तीर्थ हैं, जिनकी गिनती नहीं है। पूर्वकाल में उनकी संख्या साढ़े तीन करोड़ बताई गई है।
श्लोक 5 (skanda.7.385.5)
क्षेत्राणि सरितश्चैव पर्वताश्च नदास्तथा । ऋषीणां तपसो वीर्यान्माहात्म्यं परमं गताः
kṣetrāṇi saritaścaiva parvatāśca nadāstathā | ṛṣīṇāṁ tapaso vīryānmāhātmyaṁ paramaṁ gatāḥ
पवित्र क्षेत्र, नदियाँ, पर्वत तथा नद - ये सब ऋषियों के तप के प्रभाव से परम माहात्म्य को प्राप्त हुए हैं।
श्लोक 6 (skanda.7.385.6)
तेषां मध्येऽर्बुदो नाम सर्वपापहरोऽनघः । अस्पृष्टः कलिदोषेण वसिष्ठस्य प्रभावतः
teṣāṁ madhye'rbudo nāma sarvapāpaharo'naghaḥ | aspṛṣṭaḥ kalidoṣeṇa vasiṣṭhasya prabhāvataḥ
उन सबके बीच अर्बुद नामक पर्वत है, जो सर्वथा निष्पाप और सभी पापों का नाशक है। वसिष्ठ जी के प्रभाव से वह कलियुग के दोष से भी अस्पृष्ट है।
श्लोक 7 (skanda.7.385.7)
पुनन्ति सर्वतीर्थानि स्नानदानादिकैर्यथा । अर्बुदो दर्शनादेव सर्वपापहरो नृणाम्
punanti sarvatīrthāni snānadānādikairyathā | arbudo darśanādeva sarvapāpaharo nṛṇām
जैसे स्नान-दान आदि से सभी तीर्थ मनुष्यों को पवित्र करते हैं, वैसे ही अर्बुद पर्वत केवल दर्शनमात्र से ही मनुष्यों के समस्त पापों को हर लेता है।
श्लोक 8 (skanda.7.385.8)
ऋषय ऊचुः । किं प्रमाणोऽर्बुदो नाम कस्मिन्देशे व्यवस्थितः । कथं वासिष्ठमाहात्म्यात्प्रथितो धरणीतले
ṛṣaya ūcuḥ | kiṁ pramāṇo'rbudo nāma kasmindeśe vyavasthitaḥ | kathaṁ vāsiṣṭhamāhātmyātprathito dharaṇītale
ऋषियों ने कहा - अर्बुद नामक पर्वत कितना विस्तृत है और किस देश में स्थित है? वसिष्ठ जी के माहात्म्य से वह पृथ्वी पर किस प्रकार विख्यात हुआ?
श्लोक 9 (skanda.7.385.9)
कानि तीर्थानि मुख्यानि ह्यर्बुदे सन्ति पर्वते । सर्वं विस्तरतो ब्रूहि परं कौतूहलं हि नः
kāni tīrthāni mukhyāni hyarbude santi parvate | sarvaṁ vistarato brūhi paraṁ kautūhalaṁ hi naḥ
अर्बुद पर्वत पर कौन-कौन से मुख्य तीर्थ हैं? हमें विस्तार से सब कुछ बताइए, हमें बड़ी उत्सुकता है।
श्लोक 10 (skanda.7.385.10)
सूत उवाच । अहं च सम्प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् । अर्बुदस्य द्विजश्रेष्ठा माहात्म्यं च यथा श्रुतम्
sūta uvāca | ahaṁ ca sampravakṣyāmi kathāṁ pāpapraṇāśinīm | arbudasya dvijaśreṣṭhā māhātmyaṁ ca yathā śrutam
सूत जी ने कहा - हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, मैं पाप का नाश करने वाली उस कथा को कहूँगा, अर्बुद के जिस माहात्म्य को जैसा सुना है।
श्लोक 11 (skanda.7.385.11)
वसिष्ठो नाम देवर्षिः पितामहसमुद्भवः । स पूर्वं भूतलं प्राप्तस्तपस्तेपे सुदारुणम्
vasiṣṭho nāma devarṣiḥ pitāmahasamudbhavaḥ | sa pūrvaṁ bhūtalaṁ prāptastapastepe sudāruṇam
वसिष्ठ नामक देवर्षि पितामह ब्रह्मा से उत्पन्न हुए थे। वे पूर्वकाल में पृथ्वीतल पर आकर अत्यन्त कठोर तप करने लगे।
श्लोक 12 (skanda.7.385.12)
नियतो नियताहारः सर्वभूतहिते रतः । वर्षास्वाकाशवासी च हेमन्ते सलिलाशयः
niyato niyatāhāraḥ sarvabhūtahite rataḥ | varṣāsvākāśavāsī ca hemante salilāśayaḥ
वे संयमित और नियमित आहार वाले थे, सब प्राणियों के हित में रत रहते थे। वर्षा ऋतु में आकाश के नीचे और हेमन्त ऋतु में जल में निवास करते थे।
श्लोक 13 (skanda.7.385.13)
पञ्चाग्निसाधको ग्रीष्मे जपहोमपरायणः । केनचित्त्वथ कालेन तस्य धेनुः पयस्विनी । नन्दिनीति सुविख्याता सा वै कामदुघा शुभा
pañcāgnisādhako grīṣme japahomaparāyaṇaḥ | kenacittvatha kālena tasya dhenuḥ payasvinī | nandinīti suvikhyātā sā vai kāmadughā śubhā
वे ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि साधना करते और जप-हवन में तत्पर रहते थे। किसी समय उनकी एक दुधारू गौ थी, जो नन्दिनी नाम से सुविख्यात, कामधेनु के समान कल्याणकारी थी।
श्लोक 14 (skanda.7.385.14)
सा कदाचिद्धरापृष्ठे भ्रममाणा तृणाशया । पतिता दारुणे श्वभ्रे अगाधे तिमिरावृते
sā kadācidharāpṛṣṭhe bhramamāṇā tṛṇāśayā | patitā dāruṇe śvabhre agādhe timirāvṛte
एक बार वह घास चरने की इच्छा से पृथ्वी पर घूमती हुई एक भयानक, अगाध और अंधकार से ढके गड्ढे में गिर पड़ी।
श्लोक 15 (skanda.7.385.15)
एतस्मिन्नेव काले तु भगवांस्तीक्ष्णदीधितिः । अस्तं गतो न सम्प्राप्ता नन्दिनी मुनिसत्तमाः
etasminneva kāle tu bhagavāṁstīkṣṇadīdhitiḥ | astaṁ gato na samprāptā nandinī munisattamāḥ
उसी समय तेजस्वी भगवान सूर्य अस्ताचल को चले गए, किन्तु, हे मुनिश्रेष्ठो, नन्दिनी नहीं लौटी।
श्लोक 16 (skanda.7.385.16)
तस्याः क्षीरेण नित्यं स सायं प्रातर्द्विजो मुनिः । करोति होममग्नौ हि सुसमिद्धे जितव्रतः
tasyāḥ kṣīreṇa nityaṁ sa sāyaṁ prātardvijo muniḥ | karoti homamagnau hi susamiddhe jitavrataḥ
वह व्रतनिष्ठ ब्राह्मण मुनि प्रतिदिन उसके दूध से सायं और प्रातःकाल भली-भाँति प्रज्वलित अग्नि में हवन किया करते थे।
श्लोक 17 (skanda.7.385.17)
अथ चिन्तापरो विप्रः प्रायश्चित्तभयाद्ध्रुवम् । वीक्षांचक्रे वने तस्मिन्समेषु विषमेषु च
atha cintāparo vipraḥ prāyaścittabhayāddhruvam | vīkṣāṁcakre vane tasminsameṣu viṣameṣu ca
तब प्रायश्चित्त के भय से चिन्तित होकर उस ब्राह्मण ने उस वन में समतल और ऊँची-नीची सब जगह ढूँढा।
श्लोक 18 (skanda.7.385.18)
स तच्छ्वभ्रमथासाद्य भूम्भारावमथाशृणोत् । तां प्रोवाच मुनिश्रेष्ठः कथं त्वं पतिता शुभे
sa tacchvabhramathāsādya bhūmbhārāvamathāśṛṇot | tāṁ provāca muniśreṣṭhaḥ kathaṁ tvaṁ patitā śubhe
वहाँ पहुँचकर उसने उस गड्ढे से भूमि को भेदने वाली-सी आर्तनाद सुनी। तब उस श्रेष्ठ मुनि ने उससे कहा - हे कल्याणी, तू कैसे गिर पड़ी?
श्लोक 19 (skanda.7.385.19)
अहं होमस्य चोद्वेगान्निःसृतस्त्वामवेक्षितुम् । साऽब्रवीद्भक्षमाणाहं विप्रर्षे तृणवाञ्छया
ahaṁ homasya codvegānniḥsṛtastvāmavekṣitum | sā'bravīdbhakṣamāṇāhaṁ viprarṣe tṛṇavāñchayā
मैं होम के लिए व्याकुल होकर तुम्हें देखने के लिए यहाँ आया हूँ। उसने कहा - हे विप्रर्षे, मैं घास खाने की इच्छा से यहाँ आई थी।
श्लोक 20 (skanda.7.385.20)
पतितात्र विभो त्राहि कृच्छ्रादस्मात्सुदुःसहात् । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स मुनिर्ध्यानमास्थितः
patitātra vibho trāhi kṛcchrādasmātsuduḥsahāt | tasyāstadvacanaṁ śrutvā sa munirdhyānamāsthitaḥ
हे प्रभो, मैं यहाँ गिर गई हूँ, इस दुःसह संकट से मेरी रक्षा कीजिए। उसका वह वचन सुनकर मुनि ध्यान में स्थित हो गए।
श्लोक 21 (skanda.7.385.21)
सरस्वतीं समादध्यौ नदीं त्रैलोक्यपावनीम् । सा ध्याता मनसा तेन मुनिना तत्र तत्क्षणात्
sarasvatīṁ samādadhyau nadīṁ trailokyapāvanīm | sā dhyātā manasā tena muninā tatra tatkṣaṇāt
उन्होंने त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली सरस्वती नदी का ध्यान किया। मुनि द्वारा मन से ध्यान की गई वह नदी उसी क्षण वहाँ प्रकट हो गई।
श्लोक 22 (skanda.7.385.22)
श्वभ्रं तत्पूरयामास समन्ताद्विमलैर्जलैः । परिपूर्णं ततः श्वभ्रे निष्क्रान्ता नन्दिनी तदा
śvabhraṁ tatpūrayāmāsa samantādvimalairjalaiḥ | paripūrṇaṁ tataḥ śvabhre niṣkrāntā nandinī tadā
उसने उस गड्ढे को चारों ओर से निर्मल जल से भर दिया। गड्ढा पूरी तरह भर जाने पर नन्दिनी उससे बाहर निकल आई।
श्लोक 23 (skanda.7.385.23)
संहृष्टा मुनिना सार्द्धं ययावाश्रमसम्मुखम्
saṁhṛṣṭā muninā sārddhaṁ yayāvāśramasammukham
प्रसन्न होकर वह मुनि के साथ आश्रम की ओर चल पड़ी।
श्लोक 24 (skanda.7.385.24)
स दृष्ट्वा श्वभ्रमध्यं तं गम्भीरं च महामुनिः । चिन्तयामास मेधावी श्वभ्रस्यैव प्रपूरणे
sa dṛṣṭvā śvabhramadhyaṁ taṁ gambhīraṁ ca mahāmuniḥ | cintayāmāsa medhāvī śvabhrasyaiva prapūraṇe
उस गहरे गड्ढे को देखकर बुद्धिमान महामुनि उस गड्ढे को पूरी तरह भर देने के विषय में विचार करने लगे।
श्लोक 25 (skanda.7.385.25)
तस्य चिन्तयतो विप्रा बुद्धिरेषोदपद्यत । आनीय पर्वतं मुक्त्वा श्वभ्रमेतत्प्रपूर्यते । तस्माद्गच्छाम्यहं शीघ्रं हिमवन्तं नगोत्तमम्
tasya cintayato viprā buddhireṣodapadyata | ānīya parvataṁ muktvā śvabhrametatprapūryate | tasmādgacchāmyahaṁ śīghraṁ himavantaṁ nagottamam
विचार करते हुए उसके मन में यह विचार उदित हुआ - किसी पर्वत को लाकर छोड़ देने से यह गड्ढा भर जाएगा। इसलिए मैं शीघ्र ही पर्वतश्रेष्ठ हिमवान के पास जाता हूँ।
श्लोक 26 (skanda.7.385.26)
स एव पर्वतं चात्र प्रेषयिष्यति भूधरः । येन स्यात्परिपूर्णं च श्वभ्रमेतन्महात्मना
sa eva parvataṁ cātra preṣayiṣyati bhūdharaḥ | yena syātparipūrṇaṁ ca śvabhrametanmahātmanā
वह महान पर्वतधारी ही यहाँ किसी पर्वत को भेज सकता है, जिससे यह गड्ढा पूर्णतः भर जाए।
श्लोक 27 (skanda.7.385.27)
ततो जगाम स मुनिर्हिमवन्तं नगोत्तमम् । दृष्ट्वा वसिष्ठमायान्तं हिमवान्हृष्टमानसः । अर्घ्यपाद्यादिसंस्कारैः संपूज्य इदमब्रवीत्
tato jagāma sa muniḥ himavantaṁ nagottamam | dṛṣṭvā vasiṣṭhamāyāntaṁ himavānhṛṣṭamānasaḥ | arghyapādyādisaṁskāraiḥ saṁpūjya idamabravīt
तब वह मुनि पर्वतश्रेष्ठ हिमवान के पास गए। वसिष्ठ जी को आते देखकर हिमवान प्रसन्नचित्त हुए और अर्घ्य-पाद्य आदि उपचारों से पूजा करके यह बोले।
श्लोक 28 (skanda.7.385.28)
स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ सफलं मेऽद्य जीवितम् । यद्भवान्मे गृहे प्राप्तः पूज्यः सर्वदिवौकसाम्
svāgataṁ te muniśreṣṭha saphalaṁ me'dya jīvitam | yadbhavānme gṛhe prāptaḥ pūjyaḥ sarvadivaukasām
हे मुनिश्रेष्ठ, आपका स्वागत है। आज मेरा जीवन सफल हुआ, क्योंकि सभी देवताओं के लिए पूज्य आप मेरे घर पधारे हैं।
श्लोक 29 (skanda.7.385.29)
ब्रूहि कार्यं मुनिश्रेष्ठ अपि जीवितमात्मनः । नूनं तुभ्यं प्रदास्यामि नियोगो दीयतां मम
brūhi kāryaṁ muniśreṣṭha api jīvitamātmanaḥ | nūnaṁ tubhyaṁ pradāsyāmi niyogo dīyatāṁ mama
हे मुनिश्रेष्ठ, अपना प्रयोजन बताइए, यहाँ तक कि अपना जीवन भी माँगें तो मैं आपको अवश्य दे दूँगा। मुझे आज्ञा दीजिए।
श्लोक 30 (skanda.7.385.30)
वसिष्ठ उवाच । ममाश्रमस्य सांनिध्ये श्वभ्रमस्ति सुदारुणम् । अगाधं नन्दिनी तत्र पतिता धेनुरुत्तमा
vasiṣṭha uvāca | mamāśramasya sāṁnidhye śvabhramasti sudāruṇam | agādhaṁ nandinī tatra patitā dhenuruttamā
वसिष्ठ जी ने कहा - मेरे आश्रम के निकट एक भयानक अगाध गड्ढा है, जिसमें मेरी उत्तम गाय नन्दिनी गिर पड़ी थी।
श्लोक 31 (skanda.7.385.31)
यत्नादाकर्षिता तस्माद्भूयः पतनजाद्भयात् । तवान्तिकमनुप्राप्तो नान्यो योग्यो महीपतिः
yatnādākarṣitā tasmādbhūyaḥ patanajādbhayāt | tavāntikamanuprāpto nānyo yogyo mahīpatiḥ
बड़े यत्न से उसे उस गड्ढे से निकाला गया। पुनः गिरने के भय से मैं तुम्हारे पास आया हूँ, क्योंकि इसके लिए कोई अन्य पर्वतराज योग्य नहीं है।
श्लोक 32 (skanda.7.385.32)
तस्मात्कञ्चिन्नगश्रेष्ठं तत्र प्रेषय भूधरम् । येन तत्पूर्यते श्वभ्रं भृशं प्रेषय तादृशम्
tasmātkañcinnagaśreṣṭhaṁ tatra preṣaya bhūdharam | yena tatpūryate śvabhraṁ bhṛśaṁ preṣaya tādṛśam
इसलिए किसी श्रेष्ठ पर्वत को वहाँ भेजिए, जिससे वह गड्ढा भर जाए। ऐसे ही किसी पर्वत को शीघ्र भेजिए।
श्लोक 33 (skanda.7.385.33)
हिमवानुवाच । किं प्रमाणं मुने श्वभ्रं विस्तारायामतो वद । तत्प्रमाणं नगं कञ्चित्प्रेषयामि विचिन्त्य च
himavānuvāca | kiṁ pramāṇaṁ mune śvabhraṁ vistārāyāmato vada | tatpramāṇaṁ nagaṁ kañcitpreṣayāmi vicintya ca
हिमवान ने कहा - हे मुने, वह गड्ढा चौड़ाई और लंबाई में कितना बड़ा है, बताइए। तदनुसार विचार करके मैं किसी उपयुक्त पर्वत को भेजूँगा।
श्लोक 34 (skanda.7.385.34)
वसिष्ठ उवाच । द्विसहस्रं तु दैर्घ्येण विस्तरेण त्रिसहस्रकम् । न संख्या विद्यतेऽधस्तात्तस्य पर्वतसत्तम
vasiṣṭha uvāca | dvisahasraṁ tu dairghyeṇa vistareṇa trisahasrakam | na saṅkhyā vidyate'dhastāttasya parvatasattama
वसिष्ठ जी ने कहा - हे पर्वतश्रेष्ठ, वह गड्ढा लंबाई में दो हजार और चौड़ाई में तीन हजार (योजन) है, तथा उसकी गहराई की कोई गणना ही नहीं है।
श्लोक 35 (skanda.7.385.35)
हिमवानुवाच । कथं तेन प्रमाणेन सञ्जातो विवरो महान् । अभूत्कौतूहलं तेन सर्वं विस्तरतो वद
himavānuvāca | kathaṁ tena pramāṇena sañjāto vivaro mahān | abhūtkautūhalaṁ tena sarvaṁ vistarato vada
हिमवान ने कहा - इतने बड़े प्रमाण वाला यह विशाल विवर कैसे बना? मुझे इसकी बड़ी उत्सुकता है, कृपया सब कुछ विस्तार से बताइए।