प्रभास खण्ड · अध्याय 386
गौतमशिष्य उत्तंक-चरित्र का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.386.1)
वसिष्ठ उवाच । आसीत्पूर्वं मुनिर्नाम्ना गौतमश्च महातपाः । अहिल्या दयिता तस्य धर्मपत्नी यशस्विनी
vasiṣṭha uvāca | āsītpūrvaṁ munirnāmnā gautamaśca mahātapāḥ | ahilyā dayitā tasya dharmapatnī yaśasvinī
वसिष्ठ जी ने कहा - पूर्वकाल में गौतम नामक महान तपस्वी मुनि थे। उनकी प्रिय पत्नी यशस्विनी धर्मपत्नी अहिल्या थीं।
श्लोक 2 (skanda.7.386.2)
शिष्यानध्यापयामास स मुनिः शतशस्तदा । श्रुताध्ययनसंपन्नान्विससर्ज ततो गृहान्
śiṣyānadhyāpayāmāsa sa muniḥ śataśastadā | śrutādhyayanasaṁpannānvisasarja tato gṛhān
उस मुनि ने सैकड़ों शिष्यों को शिक्षा दी। वेद-अध्ययन में पारंगत होने पर उन्हें उन्होंने अपने-अपने घर भेज दिया।
श्लोक 3 (skanda.7.386.3)
तस्यान्योऽपि च यः शिष्यो गुरुभक्तिपरायणः । उत्तंको नाम मेधावी न्यवसत्तस्य मन्दिरे
tasyānyo'pi ca yaḥ śiṣyo gurubhaktiparāyaṇaḥ | uttaṅko nāma medhāvī nyavasattasya mandire
उनका एक और शिष्य, जो गुरु-भक्ति में तत्पर था, उत्तंक नामक बुद्धिमान युवक उनके ही घर में रहता रहा।
श्लोक 4 (skanda.7.386.4)
न तं विसर्जयामास जरयापि परिप्लुतम् । उत्तंकोऽपि सुशिष्यत्वान्नो वेत्ति पलितं शिरः
na taṁ visarjayāmāsa jarayāpi pariplutam | uttaṅko'pi suśiṣyatvānno vetti palitaṁ śiraḥ
बूढ़ा हो जाने पर भी गुरु ने उसे विदा नहीं किया, और उत्तंक भी उत्तम शिष्य होने के नाते अपने बुढ़ापे का भान भी नहीं रखता था।
श्लोक 5 (skanda.7.386.5)
जातकार्यसमायुक्तो विद्यापारंगतोऽपि सः । केनचित्त्वथ कालेन काष्ठार्थं स बहिर्ययौ
jātakāryasamāyukto vidyāpāraṅgato'pi saḥ | kenacittvatha kālena kāṣṭhārthaṁ sa bahiryayau
विद्या में पारंगत होते हुए भी वह गृहकार्यों में लगा रहता था। किसी समय वह लकड़ी लाने के लिए बाहर गया।
श्लोक 6 (skanda.7.386.6)
प्रभूतानि समादाय आश्रमं परमं गतः । अथासौ न्यक्षिपत्तत्र भूतले काष्ठसंचयम्
prabhūtāni samādāya āśramaṁ paramaṁ gataḥ | athāsau nyakṣipattatra bhūtale kāṣṭhasaṁcayam
बहुत-सी लकड़ियाँ लेकर वह आश्रम में लौटा और वहाँ धरती पर लकड़ियों का ढेर रख दिया।
श्लोक 7 (skanda.7.386.7)
काष्ठलग्नां तदा श्वेतां जटामेकां ददर्श सः । स दृष्ट्वा दुःखमापन्नः कृपणं पर्यचिन्तयत्
kāṣṭhalagnāṁ tadā śvetāṁ jaṭāmekāṁ dadarśa saḥ | sa dṛṣṭvā duḥkhamāpannaḥ kṛpaṇaṁ paryacintayat
तभी उसने लकड़ी से चिपकी हुई एक श्वेत जटा देखी। उसे देखकर वह दुःखी हो गया और करुण भाव से सोचने लगा।
श्लोक 8 (skanda.7.386.8)
धिग्धिङ्मे जीवितं नष्टं कुतः कार्यरतस्य च । कलत्रसंग्रहं नैव मया कृतमबुद्धिना
dhigdhiṅme jīvitaṁ naṣṭaṁ kutaḥ kāryaratasya ca | kalatrasaṅgrahaṁ naiva mayā kṛtamabuddhinā
धिक्कार है, धिक्कार है, मेरा जीवन व्यर्थ गया, क्योंकि कार्यों में लगे रहने के कारण मैं बुद्धिहीन होकर विवाह भी नहीं कर सका।
श्लोक 9 (skanda.7.386.9)
भविष्यति कुलच्छेदः शैथिल्यान्मम दुर्मतेः । गुरुपत्न्या च संदृष्ट उत्तंको दुःखितस्तदा
bhaviṣyati kulacchedaḥ śaithilyānmama durmateḥ | gurupatnyā ca saṁdṛṣṭa uttaṅko duḥkhitastadā
मेरी शिथिलता और दुर्बुद्धि के कारण मेरे कुल का उच्छेद हो जाएगा। तभी गुरुपत्नी ने उस दुःखी उत्तंक को देख लिया।
श्लोक 10 (skanda.7.386.10)
तस्य दुःखं तथा क्षिप्रं गौतमाय निवेदितम् । गौतमेन तथेत्युक्त्वा मृदुवाण्या स भाषितः
tasya duḥkhaṁ tathā kṣipraṁ gautamāya niveditam | gautamena tathetyuktvā mṛduvāṇyā sa bhāṣitaḥ
उसका दुःख शीघ्र ही गौतम जी को बता दिया गया। गौतम जी ने "ऐसा ही हो" कहकर कोमल वाणी में उससे कहा।
श्लोक 11 (skanda.7.386.11)
वत्स गच्छ गृहं त्वं च अग्निहोत्रादिकाः क्रियाः । पालयस्व विधानेन पत्न्या सह न संशयः
vatsa gaccha gṛhaṁ tvaṁ ca agnihotrādikāḥ kriyāḥ | pālayasva vidhānena patnyā saha na saṁśayaḥ
हे वत्स, अब तुम अपने घर जाओ और अग्निहोत्र आदि कर्मों का पालन विधिपूर्वक अपनी पत्नी के साथ करो, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 12 (skanda.7.386.12)
इत्युक्तो गुरुणा सोऽपि प्रत्युवाच गुरुं प्रति । दक्षिणां प्रार्थय स्वामिन्नहं दास्याम्यसंशयम्
ityukto guruṇā so'pi pratyuvāca guruṁ prati | dakṣiṇāṁ prārthaya svāminnahaṁ dāsyāmyasaṁśayam
गुरु के ऐसा कहने पर उसने भी गुरु से कहा - हे स्वामी, गुरुदक्षिणा माँगिए, मैं निश्चित रूप से दूँगा।
श्लोक 13 (skanda.7.386.13)
गौतम उवाच । सेवा कृता त्वया वत्स महती मम सर्वदा । तेनैव परिपूर्णत्वं जातं मे नात्र संशयः
gautama uvāca | sevā kṛtā tvayā vatsa mahatī mama sarvadā | tenaiva paripūrṇatvaṁ jātaṁ me nātra saṁśayaḥ
गौतम जी ने कहा - हे वत्स, तुमने सदा मेरी बड़ी सेवा की है। उसी से मुझे पूर्ण संतोष हो गया है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 14 (skanda.7.386.14)
उत्तंक उवाच । किंचिद्ग्राह्यं त्वया स्वामिन्सन्तोषो जायते मम । त्वत्प्रसादान्मुनिश्रेष्ठ विद्यापारंगतोऽस्म्यहम्
uttaṅka uvāca | kiṁcidgrāhyaṁ tvayā svāminsantoṣo jāyate mama | tvatprasādānmuniśreṣṭha vidyāpāraṅgato'smyaham
उत्तंक ने कहा - हे स्वामी, आप कुछ स्वीकार करें, इसी से मुझे संतोष होगा। हे मुनिश्रेष्ठ, आपकी कृपा से ही मैं विद्या में पारंगत हुआ हूँ।
श्लोक 15 (skanda.7.386.15)
गौतम उवाच । न ग्राह्यं च मया पुत्र सन्तुष्टः सेवयास्म्यहम् । नेच्छाम्यहं धनं त्वत्तः सुखं गच्छ गृहं प्रति
gautama uvāca | na grāhyaṁ ca mayā putra santuṣṭaḥ sevayāsmyaham | necchāmyahaṁ dhanaṁ tvattaḥ sukhaṁ gaccha gṛhaṁ prati
गौतम जी ने कहा - हे पुत्र, मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं तुम्हारी सेवा से संतुष्ट हूँ। मैं तुमसे धन नहीं चाहता, सुखपूर्वक अपने घर जाओ।
श्लोक 16 (skanda.7.386.16)
इत्युक्तो गुरुणा सोऽपि मातरं चाभ्यभाषत । किंचिद्ग्राह्यं मया मातः सन्तोषो दीयतां मम
ityukto guruṇā so'pi mātaraṁ cābhyabhāṣata | kiṁcidgrāhyaṁ mayā mātaḥ santoṣo dīyatāṁ mama
गुरु के ऐसा कहने पर उसने गुरुमाता से कहा - हे माता, आप मुझसे कुछ स्वीकार करें, मुझे संतोष प्रदान करें।
श्लोक 17 (skanda.7.386.17)
गुरुपत्न्युवाच । सौदासं गच्छ पुत्र त्वं ममाज्ञां कुरु सत्वरम् । मदयन्ती प्रिया तस्य धर्मपत्नी यशस्विनी
gurupatnyuvāca | saudāsaṁ gaccha putra tvaṁ mamājñāṁ kuru satvaram | madayantī priyā tasya dharmapatnī yaśasvinī
गुरुपत्नी ने कहा - हे पुत्र, तुम राजा सौदास के पास जाओ और मेरी आज्ञा शीघ्र पूरी करो। उसकी प्रिय धर्मपत्नी यशस्विनी मदयन्ती है।
श्लोक 18 (skanda.7.386.18)
कुण्डलेऽथानय क्षिप्रं मदयन्त्याश्च पुत्रक । नो चेच्छापं प्रदास्यामि पञ्चमेऽह्नि न आगतः
kuṇḍale'thānaya kṣipraṁ madayantyāśca putraka | no cecchāpaṁ pradāsyāmi pañcame'hni na āgataḥ
हे पुत्र, तुरन्त जाकर मदयन्ती के कुण्डल ले आओ। यदि पाँचवें दिन तुम नहीं लौटे, तो मैं तुम्हें शाप दे दूँगी।
श्लोक 19 (skanda.7.386.19)
इत्युक्तो गुरुपत्न्या स प्रस्थितः सत्वरं तदा । सौदासस्य गृहं प्राप व्याघ्रास्यं तं च दृष्टवान्
ityukto gurupatnyā sa prasthitaḥ satvaraṁ tadā | saudāsasya gṛhaṁ prāpa vyāghrāsyaṁ taṁ ca dṛṣṭavān
गुरुपत्नी के ऐसा कहने पर वह तत्काल चल पड़ा। वह सौदास के घर पहुँचा और वहाँ उसने एक व्याघ्रमुख (राक्षस) को देखा।
श्लोक 20 (skanda.7.386.20)
दृष्ट्वा प्राह तदा विप्रं भक्षणार्थमुपस्थितम् । भक्षयिष्यामि वै विप्र त्वामहं नात्र संशयः
dṛṣṭvā prāha tadā vipraṁ bhakṣaṇārthamupasthitam | bhakṣayiṣyāmi vai vipra tvāmahaṁ nātra saṁśayaḥ
उसे देखकर उस राक्षस ने विप्र से भक्षण की इच्छा से कहा - हे विप्र, मैं निश्चय ही तुम्हें खा जाऊँगा।
श्लोक 21 (skanda.7.386.21)
उत्तंक उवाच । अवश्यं भक्षय त्वं मामेकं शृणु नराधिप । देहि मे कुण्डले तात दत्त्वाऽहं गुरवे पुनः । आगमिष्यामि भक्षस्व मा त्वं कार्यविवर्जितम्
uttaṅka uvāca | avaśyaṁ bhakṣaya tvaṁ māmekaṁ śṛṇu narādhipa | dehi me kuṇḍale tāta dattvā'haṁ gurave punaḥ | āgamiṣyāmi bhakṣasva mā tvaṁ kāryavivarjitam
उत्तंक ने कहा - मुझे अवश्य खा लेना, किन्तु हे नराधिप, पहले एक बात सुन लो। मुझे कुण्डल दिला दो, मैं उन्हें गुरु को देकर फिर लौट आऊँगा - तब मुझे खा लेना, मुझे अकार्य से वंचित मत करो।
श्लोक 22 (skanda.7.386.22)
सौदास उवाच । गच्छ त्वं मन्दिरे दुर्गे यत्राऽऽस्ते दयिता मम । तां त्वमासाद्य यत्नेन जीवितव्यभयाद्द्विज
saudāsa uvāca | gaccha tvaṁ mandire durge yatrāste dayitā mama | tāṁ tvamāsādya yatnena jīvitavyabhayāddvija
सौदास ने कहा - जाओ, उस दुर्गम भवन में जाओ जहाँ मेरी प्रिया रहती है। हे द्विज, अपने जीवन के भय से यत्नपूर्वक उसके पास पहुँचो।
श्लोक 23 (skanda.7.386.23)
याच्यतां मम वाक्येन सा ते दास्यति कुण्डले । त्वया च नान्यथा कार्यं यत्सत्यं द्विजसत्तम
yācyatāṁ mama vākyena sā te dāsyati kuṇḍale | tvayā ca nānyathā kāryaṁ yatsatyaṁ dvijasattama
मेरे कथन के अनुसार उससे माँगना, वह तुम्हें कुण्डल दे देगी। हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हें अन्यथा कुछ नहीं करना है, यह सत्य है।
श्लोक 24 (skanda.7.386.24)
वसिष्ठ उवाच । मदयन्त्याः समीपं तु गत्वोवाच द्विजोत्तमः । देहि मे कुण्डले देवि सौदासस्त्वां समादिशत्
vasiṣṭha uvāca | madayantyāḥ samīpaṁ tu gatvovāca dvijottamaḥ | dehi me kuṇḍale devi saudāsastvāṁ samādiśat
वसिष्ठ जी ने कहा - मदयन्ती के पास जाकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा - हे देवी, मुझे कुण्डल दो, सौदास ने तुम्हें यह आज्ञा दी है।
श्लोक 25 (skanda.7.386.25)
मदयन्त्युवाच । सन्देहोऽद्यापि मे विप्र कुण्डले द्विजसत्तम । अभिज्ञानं त्वमानीय नृपस्य द्विज दर्शय
madayantyuvāca | sandeho'dyāpi me vipra kuṇḍale dvijasattama | abhijñānaṁ tvamānīya nṛpasya dvija darśaya
मदयन्ती ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ, मुझे कुण्डलों के विषय में अभी भी संदेह है। हे द्विज, राजा से कोई पहचान-चिह्न लाकर दिखाओ।
श्लोक 26 (skanda.7.386.26)
स गत्वा त्वरितं भूपमभिज्ञानमयाचत
sa gatvā tvaritaṁ bhūpamabhijñānamayācata
वह तुरन्त राजा के पास जाकर पहचान-चिह्न माँगने लगा।
श्लोक 27 (skanda.7.386.27)
सौदास उवाच । यैर्विना सुगतिर्नास्ति दुर्गतिं ये नयंति वै । गत्वैवं ब्रूहि तां साध्वीं मम वाक्यं द्विजोत्तम । प्रदास्यति ततो नूनं कुण्डले रत्नमंडिते
saudāsa uvāca | yairvinā sugatirnāsti durgatiṁ ye nayanti vai | gatvaivaṁ brūhi tāṁ sādhvīṁ mama vākyaṁ dvijottama | pradāsyati tato nūnaṁ kuṇḍale ratnamaṇḍite
सौदास ने कहा - जिनके बिना सद्गति नहीं मिलती और जो दुर्गति की ओर ले जाते हैं - हे द्विजश्रेष्ठ, जाकर उस साध्वी को मेरा यह वचन ऐसे ही सुना देना। तब वह निश्चय ही रत्नजड़ित कुण्डल तुम्हें दे देगी।
श्लोक 28 (skanda.7.386.28)
वसिष्ठ उवाच । प्रत्यभिज्ञानमादाय गत्वा तस्यै न्यवेदयत्
vasiṣṭha uvāca | pratyabhijñānamādāya gatvā tasyai nyavedayat
वसिष्ठ जी ने कहा - वह पहचान-वाक्य लेकर उसके पास गया और उसे सुना दिया।
श्लोक 29 (skanda.7.386.29)
ततोऽसौ प्रददौ तस्मै गृह्ण मे कुण्डले द्विज । उवाच यत्नमास्थाय नीयतां द्विजसत्तम
tato'sau pradadau tasmai gṛhṇa me kuṇḍale dvija | uvāca yatnamāsthāya nīyatāṁ dvijasattama
तब उसने उसे कुण्डल दे दिए और कहा - हे द्विज, मेरे ये कुण्डल ग्रहण करो। हे द्विजश्रेष्ठ, यत्नपूर्वक इन्हें ले जाओ।
श्लोक 30 (skanda.7.386.30)
एते च वांछते नित्यं तक्षको द्विज कुण्डले । स तथेति समादाय विस्मयोत्फुल्ललोचनः । कौतुकात्पुनरागत्य राजानं वाक्यमब्रवीत्
ete ca vāñchate nityaṁ takṣako dvija kuṇḍale | sa tatheti samādāya vismayotphullalocanaḥ | kautukātpunarāgatya rājānaṁ vākyamabravīt
हे द्विज, ये कुण्डल तक्षक (नाग) सदा चाहता रहता है। "ऐसा ही हो" कहकर उसने उन्हें ग्रहण किया, और आश्चर्य से उसकी आँखें फैल गईं। कुतूहलवश वह पुनः राजा के पास लौटकर बोला।
श्लोक 31 (skanda.7.386.31)
अभिज्ञानान्मया भूप सम्प्राप्ते दीप्तकुण्डले । वाक्यार्थस्तु न विज्ञातस्ततोऽहं पुनरागतः
abhijñānānmayā bhūpa samprāpte dīptakuṇḍale | vākyārthastu na vijñātastato'haṁ punarāgataḥ
हे राजन, आपके पहचान-वाक्य से मुझे चमकते हुए कुण्डल प्राप्त हो गए हैं। परन्तु आपके वाक्य का अर्थ मुझे समझ नहीं आया, इसलिए मैं फिर लौट आया हूँ।
श्लोक 32 (skanda.7.386.32)
कौतुकाद्वद मे राजन्स्वकार्ये च यथास्थितम् । कैर्विना सुगतिर्नास्ति दुर्गतिं के नयंति च
kautukādvada me rājansvakārye ca yathāsthitam | kairvinā sugatirnāsti durgatiṁ ke nayanti ca
हे राजन, कुतूहलवश मुझे बताइए कि आपके वचन में क्या भाव निहित था - बिना किनके सद्गति नहीं होती, और कौन दुर्गति की ओर ले जाते हैं?
श्लोक 33 (skanda.7.386.33)
सौदास उवाच । आराधिता द्विजा विप्र भवंति सुगतिप्रदाः । असन्तुष्टा दुर्गतिदाः सद्यो मम यथा पुरा
saudāsa uvāca | ārādhitā dvijā vipra bhavanti sugatipradāḥ | asantuṣṭā durgatidāḥ sadyo mama yathā purā
सौदास ने कहा - हे विप्र, प्रसन्न किए गए ब्राह्मण सद्गति देने वाले होते हैं, और अप्रसन्न होने पर वे तुरन्त दुर्गति देने वाले हो जाते हैं, जैसा पूर्वकाल में मेरे साथ हुआ था।
श्लोक 34 (skanda.7.386.34)
एतावान्मम शापोऽयं वसिष्ठस्य महात्मनः । तेनोक्तं त्वां यदा कश्चित्प्रश्नं विख्यापयिष्यति
etāvānmama śāpo'yaṁ vasiṣṭhasya mahātmanaḥ | tenoktaṁ tvāṁ yadā kaścitpraśnaṁ vikhyāpayiṣyati
यह मेरे ऊपर महात्मा वसिष्ठ का शाप था। उन्होंने यह भी कहा था कि जब कोई तुमसे यह प्रश्न पूछकर उत्तर प्रकट करेगा।
श्लोक 35 (skanda.7.386.35)
तदा दोषविनिर्मुक्तो भविष्यसि न संशयः । त्वत्प्रसादाद्विनिर्मुक्तो ह्यहं शापाद्द्विजोत्तम । सात्त्विकं धाम चापन्नो गच्छ विप्र नमोऽस्तु ते
tadā doṣavinirmukto bhaviṣyasi na saṁśayaḥ | tvatprasādādvinirmukto hyahaṁ śāpāddvijottama | sāttvikaṁ dhāma cāpanno gaccha vipra namo'stu te
तभी तुम इस दोष से मुक्त हो जाओगे, इसमें कोई संदेह नहीं। हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारी कृपा से ही मैं इस शाप से मुक्त हुआ हूँ और सात्त्विक पद को प्राप्त हुआ हूँ। हे विप्र, जाओ, तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 36 (skanda.7.386.36)
वसिष्ठ उवाच । उत्तंकस्तेन निर्मुक्तः सत्वरं पथमाश्रितः । गच्छंश्चातिक्षुधाविष्टोऽपश्यद्बिल्वफलानि सः
vasiṣṭha uvāca | uttaṅkastena nirmuktaḥ satvaraṁ pathamāśritaḥ | gacchaṁścātikṣudhāviṣṭo'paśyadbilvaphalāni saḥ
वसिष्ठ जी ने कहा - उससे मुक्त होकर उत्तंक तुरन्त मार्ग पर चल पड़ा। चलते-चलते वह अत्यन्त भूख से व्याकुल हो गया और उसे बिल्व के फल दिखाई दिए।
श्लोक 37 (skanda.7.386.37)
ततः कृष्णाजिने बद्ध्वा कुण्डले न्यस्य भूतले । आरुरोह फलाकांक्षी स मुनिः क्षुधयाऽन्वितः
tataḥ kṛṣṇājine baddhvā kuṇḍale nyasya bhūtale | āruroha phalākāṅkṣī sa muniḥ kṣudhayā'nvitaḥ
तब उसने कुण्डलों को काले मृगचर्म में बाँधकर भूमि पर रख दिया और फल पाने की इच्छा से भूख से व्याकुल वह मुनि वृक्ष पर चढ़ गया।
श्लोक 38 (skanda.7.386.38)
एतस्मिन्नेव काले तु तक्षकः पन्नगोत्तमः । गृहीत्वा कुण्डले तूर्णमगमद्दक्षिणामुखः
etasminneva kāle tu takṣakaḥ pannagottamaḥ | gṛhītvā kuṇḍale tūrṇamagamaddakṣiṇāmukhaḥ
उसी समय सर्पश्रेष्ठ तक्षक ने कुण्डलों को उठाकर तुरन्त दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके प्रस्थान किया।
श्लोक 39 (skanda.7.386.39)
अथोत्तंकः फलाहारी अवतीर्य धरातले । सर्वतोऽन्वेषयामास वेगेन महता वृतः
athottaṅkaḥ phalāhārī avatīrya dharātale | sarvato'nveṣayāmāsa vegena mahatā vṛtaḥ
फल खाकर उत्तंक धरती पर उतरा और अत्यन्त वेग से सब ओर उन कुण्डलों को खोजने लगा।
श्लोक 40 (skanda.7.386.40)
स दृष्ट्वा सम्मुखं प्राप्तं समीपं पन्नगोत्तमः । प्रविवेश बिलं रौद्रमन्धकारेण संवृतम्
sa dṛṣṭvā sammukhaṁ prāptaṁ samīpaṁ pannagottamaḥ | praviveśa bilaṁ raudramandhakāreṇa saṁvṛtam
उसने देखा कि सर्पश्रेष्ठ तक्षक निकट ही सामने से जाता हुआ एक भयानक अंधकारपूर्ण बिल में प्रवेश कर गया।
श्लोक 41 (skanda.7.386.41)
उत्तंकोऽपि बिलं प्राप्तः प्रविश्य तमसावृतम् । दण्डकाष्ठं समादाय कुपितोह्यखनत्तदा
uttaṅko'pi bilaṁ prāptaḥ praviśya tamasāvṛtam | daṇḍakāṣṭhaṁ samādāya kupito'hyakhanattadā
उत्तंक भी उस अंधकार से ढके बिल तक पहुँचकर उसमें घुस गया, और क्रोधित होकर लाठी लेकर खोदने लगा।
श्लोक 42 (skanda.7.386.42)
तं तथा दुःखितं दृष्ट्वा सक्लेशं गुरुकार्यतः । वज्रमारोपयामास दण्डान्ते पाकशासनः
taṁ tathā duḥkhitaṁ dṛṣṭvā sakleśaṁ gurukāryataḥ | vajramāropayāmāsa daṇḍānte pākaśāsanaḥ
गुरु-कार्य के लिए क्लेश उठाते हुए उस दुःखी उत्तंक को देखकर इन्द्र ने उसके दण्ड के अग्रभाग पर वज्र चढ़ा दिया।
श्लोक 43 (skanda.7.386.43)
ततो विदारयामास स शीघ्रं धरणीतलम् । प्रविष्टश्चैव पातालं कुण्डलार्थं परिभ्रमन्
tato vidārayāmāsa sa śīghraṁ dharaṇītalam | praviṣṭaścaiva pātālaṁ kuṇḍalārthaṁ paribhraman
तब उसने शीघ्र ही धरती को विदीर्ण कर दिया और कुण्डलों की खोज में घूमता हुआ पाताल में प्रवेश कर गया।
श्लोक 44 (skanda.7.386.44)
सोऽपश्यद्वाजिनं तत्र सर्वश्वेतं गुणान्वितम् । तेनोक्तः स्पृश मे गुह्यं ततः कार्यं भविष्यति
so'paśyadvājinaṁ tatra sarvaśvetaṁ guṇānvitam | tenoktaḥ spṛśa me guhyaṁ tataḥ kāryaṁ bhaviṣyati
वहाँ उसने एक सर्वथा श्वेत, गुणसंपन्न घोड़ा देखा, जिसने उससे कहा - मेरे गुप्तांग को स्पर्श करो, तब तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा।
श्लोक 45 (skanda.7.386.45)
स चकार तथा शीघ्रं ततो धूमो व्यजायत । पातालं तेन सर्वत्र व्याप्तं भूधरवह्निना
sa cakāra tathā śīghraṁ tato dhūmo vyajāyata | pātālaṁ tena sarvatra vyāptaṁ bhūdharavahninā
उसने वैसा ही किया, जिससे तुरन्त धुआँ उठने लगा और उस अग्नि-समान तेज से पूरा पाताल व्याप्त हो गया।
श्लोक 46 (skanda.7.386.46)
ततश्च व्याकुलाः सर्वे पन्नगाः समुपाद्रवन् । तक्षकं पुरतः कृत्वा संप्राप्ताः कुण्डलान्विताः । उत्तंकाय ततो दत्त्वा प्रणिपत्य ययुर्गृहम्
tataśca vyākulāḥ sarve pannagāḥ samupādravan | takṣakaṁ purataḥ kṛtvā samprāptāḥ kuṇḍalānvitāḥ | uttaṅkāya tato dattvā praṇipatya yayurgṛham
तब घबराए हुए सभी सर्प तक्षक को आगे करके, कुण्डलों सहित वहाँ आ पहुँचे। फिर उन्हें उत्तंक को देकर प्रणाम करके अपने घर लौट गए।
श्लोक 47 (skanda.7.386.47)
वसिष्ठ उवाच । अथाश्वस्तमुवाचेदमहमग्निर्द्विजोत्तम । यस्त्वयाऽऽराधितः पूर्वमुपाध्यायनिदेशतः
vasiṣṭha uvāca | athāśvastamuvācedamahamagnirdvijottama | yastvayārādhitaḥ pūrvamupādhyāyanideśataḥ
वसिष्ठ जी ने कहा - तब उस श्वेत घोड़े ने आश्वस्त उत्तंक से कहा - हे द्विजश्रेष्ठ, मैं वही अग्निदेव हूँ जिनकी तुमने पहले गुरु के आदेश से आराधना की थी।
श्लोक 48 (skanda.7.386.48)
ज्ञात्वा त्वां दुःखितं प्राप्तमिह प्राप्तः कृपापरः । सर्वथा त्वं च मे पृष्ठं भगवञ्छीघ्रमारुह
jñātvā tvāṁ duḥkhitaṁ prāptamiha prāptaḥ kṛpāparaḥ | sarvathā tvaṁ ca me pṛṣṭhaṁ bhagavañchīghramāruha
तुम्हें यहाँ इस प्रकार दुःखी जानकर मैं करुणावश यहाँ आया हूँ। हे भगवन्, तुम शीघ्र ही मेरी पीठ पर सवार हो जाओ।
श्लोक 49 (skanda.7.386.49)
नयामि तत्र यत्रास्ते गुरुः सर्वगुणालयः । आरूढस्तस्य पृष्ठे स प्रतस्थे ह्याश्रमं प्रति
nayāmi tatra yatrāste guruḥ sarvaguṇālayaḥ | ārūḍhastasya pṛṣṭhe sa pratasthe hyāśramaṁ prati
मैं तुम्हें वहाँ ले चलता हूँ, जहाँ सर्वगुणसंपन्न गुरु रहते हैं। उसकी पीठ पर बैठकर वह आश्रम की ओर चल पड़ा।
श्लोक 50 (skanda.7.386.50)
तत्क्षणात्समनुप्राप्तो गौतमस्य निवेशनम् । एतस्मिन्नेव काले तु अहिल्या कृतमण्डना
tatkṣaṇātsamanuprāpto gautamasya niveśanam | etasminneva kāle tu ahilyā kṛtamaṇḍanā
वह तुरन्त ही गौतम के घर पहुँच गया। उसी समय अहिल्या, जो अपना शृंगार कर चुकी थी।
श्लोक 51 (skanda.7.386.51)
स्नाता चाभ्येत्य भर्तारं साध्वी वाक्यमुवाच ह । उत्तंकोऽद्य न सम्प्राप्तः शापं दास्याम्यहं ध्रुवम्
snātā cābhyetya bhartāraṁ sādhvī vākyamuvāca ha | uttaṅko'dya na samprāptaḥ śāpaṁ dāsyāmyahaṁ dhruvam
और स्नान कर चुकी थी, अपने पति के पास आकर बोली - उत्तंक आज तक नहीं लौटा है, मैं उसे अवश्य शाप दूँगी।
श्लोक 52 (skanda.7.386.52)
शिथिलो गुरुकृत्येषु स यदालक्षितो मया । तस्या वाक्यावसाने तु उत्तंकः पर्यदृश्यत
śithilo gurukṛtyeṣu sa yadālakṣito mayā | tasyā vākyāvasāne tu uttaṅkaḥ paryadṛśyata
क्योंकि मैंने उसे गुरु-कार्यों में शिथिल पाया है। उसके यह वचन समाप्त होते ही उत्तंक वहाँ दिखाई पड़ा।
श्लोक 53 (skanda.7.386.53)
प्रसन्नवदनो हृष्टः कुण्डलाभ्यां समन्वितः । प्रणिपत्य स तां भक्त्या कुण्डले संन्यवेदयत्
prasannavadano hṛṣṭaḥ kuṇḍalābhyāṁ samanvitaḥ | praṇipatya sa tāṁ bhaktyā kuṇḍale saṁnyavedayat
प्रसन्न मुख वाला, हर्षित और कुण्डलों सहित उसने भक्तिपूर्वक गुरुमाता को प्रणाम करके कुण्डल उन्हें सौंप दिए।
श्लोक 54 (skanda.7.386.54)
सा दृष्ट्वा तत्क्षणात्साध्वी कर्णाभ्यां संन्यवेशयत् । स्वगृहाय ततस्तूर्णमुत्तंकं विससर्ज ह
sā dṛṣṭvā tatkṣaṇātsādhvī karṇābhyāṁ saṁnyaveśayat | svagṛhāya tatastūrṇamuttaṅkaṁ visasarja ha
उन्हें देखते ही उस साध्वी ने तुरन्त उन्हें अपने दोनों कानों में पहन लिया, और फिर तुरन्त उत्तंक को उसके घर के लिए विदा कर दिया।
श्लोक 55 (skanda.7.386.55)
वसिष्ठ उवाच । एवं स विवरो जातस्तक्षकोत्तंककारणात् । यथा मे चिन्त्यते नित्यं धेन्वर्थं श्वभ्रपूरणे
vasiṣṭha uvāca | evaṁ sa vivaro jātastakṣakottaṅkakāraṇāt | yathā me cintyate nityaṁ dhenvarthaṁ śvabhrapūraṇe
वसिष्ठ जी ने कहा - इस प्रकार तक्षक और उत्तंक के कारण यह विवर बना, जिसे मैं गौ के लिए भरने का सदा विचार करता रहा हूँ।
श्लोक 56 (skanda.7.386.56)
तस्मात्त्वं पूरय क्षिप्रं नान्यः शक्तोऽत्र कर्मणि । शीघ्रं कुरु नगश्रेष्ठ मम कार्यमसंशयम्
tasmāttvaṁ pūraya kṣipraṁ nānyaḥ śakto'tra karmaṇi | śīghraṁ kuru nagaśreṣṭha mama kāryamasaṁśayam
इसलिए तुम शीघ्र ही इसे भर दो, इस कार्य में कोई अन्य समर्थ नहीं है। हे पर्वतश्रेष्ठ, मेरे इस कार्य को शीघ्र पूरा करो, इसमें कोई संशय नहीं।