प्रभास खण्ड · अध्याय 387
वसिष्ठाज्ञा से नन्दिवर्धन पर्वत द्वारा विवर-पूरण का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.387.1)
सूत उवाच । श्रुत्वा हिमाचलो वाक्यं वसिष्ठस्य महात्मनः । चिन्तयामास तत्कार्यं विवरस्य प्रपूरणे
sūta uvāca | śrutvā himācalo vākyaṁ vasiṣṭhasya mahātmanaḥ | cintayāmāsa tatkāryaṁ vivarasya prapūraṇe
सूत जी ने कहा - महात्मा वसिष्ठ का वचन सुनकर हिमाचल उस विवर को भरने के कार्य के विषय में विचार करने लगे।
श्लोक 2 (skanda.7.387.2)
चिरं विचार्य तमृषिमिदमाह नगोत्तमः । क उपायो नगानां वै तत्र गंतुं वदस्व मे
ciraṁ vicārya tamṛṣimidamāha nagottamaḥ | ka upāyo nagānāṁ vai tatra gantuṁ vadasva me
बहुत देर विचार करके उस पर्वतश्रेष्ठ ने उस ऋषि से कहा - मुझे बताइए, वहाँ जाने के लिए पर्वतों का क्या उपाय है?
श्लोक 3 (skanda.7.387.3)
पक्षच्छेदस्तु शक्रेण सर्वेषां च पुरा कृतः । तस्मादस्य मुनिश्रेष्ठ कार्यस्य पश्य निश्चयम्
pakṣacchedastu śakreṇa sarveṣāṁ ca purā kṛtaḥ | tasmādasya muniśreṣṭha kāryasya paśya niścayam
पूर्वकाल में इन्द्र ने सभी पर्वतों के पंख काट दिए थे। इसलिए, हे मुनिश्रेष्ठ, इस कार्य का समाधान आप ही बताएँ।
श्लोक 4 (skanda.7.387.4)
वसिष्ठ उवाच । अस्त्युपायो नगानां तु तत्र नेतुं महानग । तवायं तनयस्तत्र विख्यातो नंदिवर्द्धनः
vasiṣṭha uvāca | astyupāyo nagānāṁ tu tatra netuṁ mahānaga | tavāyaṁ tanayastatra vikhyāto nandivarddhanaḥ
वसिष्ठ जी ने कहा - हे महापर्वत, वहाँ किसी पर्वत को ले जाने का उपाय है। तुम्हारा यह पुत्र नन्दिवर्धन वहाँ विख्यात है।
श्लोक 5 (skanda.7.387.5)
तस्यार्बुद इति ख्यातो वयस्यः परमं प्रियः । नागः प्राणभृतां श्रेष्ठः खेचरोऽपि च वीर्यवान्
tasyārbuda iti khyāto vayasyaḥ paramaṁ priyaḥ | nāgaḥ prāṇabhṛtāṁ śreṣṭhaḥ khecaro'pi ca vīryavān
उसका अर्बुद नाम से प्रसिद्ध एक परम प्रिय मित्र है, जो नाग है, सभी प्राणियों में श्रेष्ठ, आकाशचारी और पराक्रमी है।
श्लोक 6 (skanda.7.387.6)
स वा ऊर्ध्वगतिः क्षिप्रं क्षणान्नेष्यत्यसंशयः । लीलया सर्वकृत्येषु तं विदित्वाऽहमागतः
sa vā ūrdhvagatiḥ kṣipraṁ kṣaṇānneṣyatyasaṁśayaḥ | līlayā sarvakṛtyeṣu taṁ viditvā'hamāgataḥ
उसकी गति ऊर्ध्व की ओर है, वह क्षणभर में शीघ्र ले जा सकेगा, इसमें संदेह नहीं। सभी कार्यों को वह सहज लीला से कर सकता है, यह जानकर ही मैं आया हूँ।
श्लोक 7 (skanda.7.387.7)
आदेशो दीयतामस्य दुःखं कर्तुं च नार्हसि । अवश्यं यदि भक्तोऽसि तत्र प्रेषय सत्वरम्
ādeśo dīyatāmasya duḥkhaṁ kartuṁ ca nārhasi | avaśyaṁ yadi bhakto'si tatra preṣaya satvaram
उसे आज्ञा दीजिए, उसे दुःखी करना उचित नहीं है। यदि तुम सचमुच भक्त हो, तो उसे शीघ्र ही वहाँ भेज दो।
श्लोक 8 (skanda.7.387.8)
सूत उवाच । वसिष्ठस्य वचः श्रुत्वा हिमवान्पुत्रवत्सलः । दुःखेन महताऽऽविष्टश्चिंतयामास भूधरः
sūta uvāca | vasiṣṭhasya vacaḥ śrutvā himavānputravatsalaḥ | duḥkhena mahatā'viṣṭaścintayāmāsa bhūdharaḥ
सूत जी ने कहा - वसिष्ठ जी का वचन सुनकर अपने पुत्र से स्नेह रखने वाले हिमवान महान दुःख से आविष्ट होकर विचार करने लगे।
श्लोक 9 (skanda.7.387.9)
मैनाकस्तनयोऽस्माकं प्रविष्टः सागरे भयात् । ज्येष्ठं तु सर्वथा चाथ वसिष्ठो नेतुमागतः । किं कृत्यमधुनाऽस्माकं कथं श्रेयो भविष्यति
mainākastanayo'smākaṁ praviṣṭaḥ sāgare bhayāt | jyeṣṭhaṁ tu sarvathā cātha vasiṣṭho netumāgataḥ | kiṁ kṛtyamadhunā'smākaṁ kathaṁ śreyo bhaviṣyati
हमारा पुत्र मैनाक भय के कारण सागर में जा छिपा, और अब वसिष्ठ हमारे सबसे बड़े पुत्र को ले जाने के लिए आए हैं। अब हमें क्या करना चाहिए, हमारा कल्याण कैसे होगा?
श्लोक 10 (skanda.7.387.10)
इतः शापभयं तीव्रमितो दुःखं च पुत्रजम् । वरं पुत्रवियोगोऽस्तु न शापो द्विजसंभवः
itaḥ śāpabhayaṁ tīvramito duḥkhaṁ ca putrajam | varaṁ putraviyogo'stu na śāpo dvijasaṁbhavaḥ
एक ओर शाप का तीव्र भय है, दूसरी ओर पुत्र-वियोग का दुःख है। पुत्र का वियोग ही श्रेष्ठ है, ब्राह्मण का शाप नहीं।
श्लोक 11 (skanda.7.387.11)
स एवं निश्चयं कृत्वा नंदिवर्धनमुक्तवान् । गच्छ त्वं पुत्र मे वाक्याद्वसिष्ठस्याश्रमं प्रति
sa evaṁ niścayaṁ kṛtvā nandivardhanamuktavān | gaccha tvaṁ putra me vākyādvasiṣṭhasyāśramaṁ prati
ऐसा निश्चय करके उन्होंने नन्दिवर्धन से कहा - हे पुत्र, मेरे वचन से तुम वसिष्ठ जी के आश्रम की ओर जाओ।
श्लोक 12 (skanda.7.387.12)
तत्रास्ति विवरो रौद्रस्तं प्रपूरय सत्वरम् । अर्बुदं नागमादाय मित्रं प्राणभृतां वरम्
tatrāsti vivaro raudrastaṁ prapūraya satvaram | arbudaṁ nāgamādāya mitraṁ prāṇabhṛtāṁ varam
वहाँ एक भयानक विवर है, उसे शीघ्र भर दो, अपने मित्र, प्राणियों में श्रेष्ठ नाग अर्बुद को साथ लेकर।
श्लोक 13 (skanda.7.387.13)
नंदिवर्द्धन उवाच । पापीयान्स विभो देशः फलमूलैर्विवर्जितः । पालाशैः खादिरैराढ्यो धवैः शाल्मलिभिस्तथा
nandivarddhana uvāca | pāpīyānsa vibho deśaḥ phalamūlairvivarjitaḥ | pālāśaiḥ khādirairāḍhyo dhavaiḥ śālmalibhistathā
नन्दिवर्धन ने कहा - हे प्रभो, वह देश अत्यन्त पापपूर्ण है, फल-मूल से रहित है, केवल पलाश, खैर, धव और शाल्मली वृक्षों से भरा है।
श्लोक 14 (skanda.7.387.14)
सुनिष्ठुरैर्नृपशुभिर्भिल्लैश्च विविधैरपि । नद्यो वहंति नो तत्र दुष्टा लोकाश्च वासिनः । नार्होऽहं पर्वतश्रेष्ठ तत्र गंतुं कथंचन
suniṣṭhurairnṛpaśubhirbhillaiśca vividhairapi | nadyo vahanti no tatra duṣṭā lokāśca vāsinaḥ | nārho'haṁ parvataśreṣṭha tatra gantuṁ kathaṁcana
वह अत्यन्त क्रूर पशुतुल्य मनुष्यों और तरह-तरह के भीलों से भरा है, वहाँ नदियाँ नहीं बहतीं और वहाँ के निवासी दुष्ट हैं। हे पर्वतश्रेष्ठ, मैं किसी भी प्रकार वहाँ जाने योग्य नहीं हूँ।
श्लोक 15 (skanda.7.387.15)
अथोवाच वसिष्ठस्तं संत्रस्तं नंदिवर्द्धनम् । मा भीः कार्या त्वया तत्र देशे दौष्ट्यात्कथंचन
athovāca vasiṣṭhastaṁ saṁtrastaṁ nandivarddhanam | mā bhīḥ kāryā tvayā tatra deśe dauṣṭyātkathaṁcana
तब वसिष्ठ जी ने उस भयभीत नन्दिवर्धन से कहा - तुम्हें उस देश की दुष्टता के कारण किसी प्रकार भय नहीं करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.7.387.16)
तव मूर्ध्नि सदा वासो मम तत्र भविष्यति । तीर्थानि सरितो देवाः पुण्यान्यायतनानि च
tava mūrdhni sadā vāso mama tatra bhaviṣyati | tīrthāni sarito devāḥ puṇyānyāyatanāni ca
तुम्हारे शिखर पर मेरा सदा निवास रहेगा। वहाँ तीर्थ, नदियाँ, देवता तथा पुण्य मन्दिर होंगे।
श्लोक 17 (skanda.7.387.17)
वृक्षाश्च विविधाकाराः पत्रपुष्पफलान्विताः । सदा तत्र भविष्यंति मृगाश्च विहगाः शुभाः
vṛkṣāśca vividhākārāḥ patrapuṣpaphalānvitāḥ | sadā tatra bhaviṣyanti mṛgāśca vihagāḥ śubhāḥ
वहाँ पत्र-पुष्प-फल से युक्त तरह-तरह के वृक्ष सदा रहेंगे, साथ ही सुन्दर मृग और पक्षी भी।
श्लोक 18 (skanda.7.387.18)
अहमेवानयिष्यामि तवार्थे च महेश्वरम् । तदा स्थास्यंति वै तत्र सर्वे देवाः सवासवाः
ahamevānayiṣyāmi tavārthe ca maheśvaram | tadā sthāsyanti vai tatra sarve devāḥ savāsavāḥ
तुम्हारे लिए मैं स्वयं महेश्वर को वहाँ लाऊँगा, तब इन्द्र सहित सभी देवता वहाँ निवास करेंगे।
श्लोक 19 (skanda.7.387.19)
सूत उवाच । वसिष्ठस्य वचः श्रुत्व संहृष्टो नंदिवर्द्धनः । अर्बुदं नागमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह
sūta uvāca | vasiṣṭhasya vacaḥ śrutvā saṁhṛṣṭo nandivarddhanaḥ | arbudaṁ nāgamāsādya vākyametaduvāca ha
सूत जी ने कहा - वसिष्ठ जी के वचन सुनकर अत्यन्त हर्षित हुए नन्दिवर्धन ने नाग अर्बुद के पास जाकर यह वचन कहा।
श्लोक 20 (skanda.7.387.20)
तत्र यावोऽद्य भद्रं ते वयस्य विनयान्वित । एतत्कार्यमहं मन्ये सांप्रतं द्विजसंभवम्
tatra yāvo'dya bhadraṁ te vayasya vinayānvita | etatkāryamahaṁ manye sāmprataṁ dvijasaṁbhavam
हे मित्र, हे विनयी, चलो आज हम वहाँ चलें, तुम्हारा कल्याण हो। मैं समझता हूँ कि यह ब्राह्मण का कार्य अभी अत्यावश्यक है।
श्लोक 21 (skanda.7.387.21)
अर्बुद उवाच । अहं तत्रागमिष्यामि स्नेहात्ते पर्वतात्मज । तत्रैव च वसिष्यामि त्वया सार्द्धमसंशयम्
arbuda uvāca | ahaṁ tatrāgamiṣyāmi snehātte parvatātmaja | tatraiva ca vasiṣyāmi tvayā sārddhamasaṁśayam
अर्बुद ने कहा - हे पर्वतपुत्र, तुम्हारे स्नेह के कारण मैं वहाँ अवश्य चलूँगा, और तुम्हारे साथ वहीं निवास भी करूँगा, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 22 (skanda.7.387.22)
किं त्वहं प्रणयाद्भ्रातर्वक्ष्यामि यद्वचः शृणु । प्रणयान्नान्यथा कार्यं यद्यहं तव संमतः
kiṁ tvahaṁ praṇayādbhrātarvakṣyāmi yadvacaḥ śṛṇu | praṇayānnānyathā kāryaṁ yadyahaṁ tava saṁmataḥ
किन्तु हे भ्राता, स्नेहवश मैं जो वचन कहूँगा, उसे सुनो। यदि मैं तुम्हें प्रिय हूँ, तो स्नेहवश तुम्हें उसे अन्यथा नहीं करना है।
श्लोक 23 (skanda.7.387.23)
मन्नाम्ना ख्यातिमायातु नान्यत्किंचिद्वृणोम्यहम् । ततः सोऽपि प्रतिज्ञाय आरूढस्तस्य चोपरि । प्रणम्य पितरौ चैव प्रतस्थे मुनिना सह
mannāmnā khyātimāyātu nānyatkiṁciddvṛṇomyaham | tataḥ so'pi pratijñāya ārūḍhastasya copari | praṇamya pitarau caiva pratasthe muninā saha
मेरे नाम से वह ख्याति प्राप्त करे, मैं और कुछ नहीं माँगता। तब उसने भी वचन देकर उसके ऊपर सवार होकर, अपने माता-पिता को प्रणाम करके, मुनि के साथ प्रस्थान किया।
श्लोक 24 (skanda.7.387.24)
दिव्यैर्वृक्षैः शुभैः पूर्णैर्नदीनिर्झरसंकुलैः । मधुरैर्विहगैर्युक्तो मृगैः सौम्यैः समन्वितः
divyairvṛkṣaiḥ śubhaiḥ pūrṇairnadīnirjharasaṁkulaiḥ | madhurairvihagairyukto mṛgaiḥ saumyaiḥ samanvitaḥ
दिव्य, शुभ वृक्षों से भरा, नदियों और झरनों से युक्त, मधुर स्वर वाले पक्षियों और सौम्य मृगों से युक्त।
श्लोक 25 (skanda.7.387.25)
मुक्तोऽर्बुदेन तत्रैव विवरे मुनिवाक्यतः । समस्तस्तत्रानासाग्रं गतः पर्वतसत्तमः
mukto'rbudena tatraiva vivare munivākyataḥ | samastastatrānāsāgraṁ gataḥ parvatasattamaḥ
उस श्रेष्ठ पर्वत को मुनि के वचनानुसार अर्बुद द्वारा उसी विवर में छोड़ दिया गया, और वह अपनी सम्पूर्णता में उसके नासाग्र तक भरता गया।
श्लोक 26 (skanda.7.387.26)
विमुक्तो विवरे तस्मिन्नर्बुदेन महात्मना । परिपूर्णे महारौद्रे संतुष्टो मुनिपुंगवः
vimukto vivare tasminnarbudena mahātmanā | paripūrṇe mahāraudre saṁtuṣṭo munipuṅgavaḥ
महात्मा अर्बुद द्वारा उस विवर में छोड़े जाने पर, वह अत्यन्त भयानक विवर पूर्णतः भर गया, और मुनिश्रेष्ठ संतुष्ट हुए।
श्लोक 27 (skanda.7.387.27)
ब्रवीच्चार्बुदं नागं वरं वरय सुव्रत । परितुष्टोऽस्मि ते भद्र कर्मणानेन पन्नग
bravīccārbudaṁ nāgaṁ varaṁ varaya suvrata | parituṣṭo'smi te bhadra karmaṇānena pannaga
उन्होंने नाग अर्बुद से कहा - हे सुव्रत, वर माँगो। हे भद्र सर्प, इस कार्य से मैं तुमसे अत्यन्त संतुष्ट हूँ।
श्लोक 28 (skanda.7.387.28)
अर्बुद उवाच । एष एव वरोऽस्माकं यत्त्वं तुष्टो महामुने । अवश्यं यदि दातव्यं तच्छृणुष्व द्विजोत्तम
arbuda uvāca | eṣa eva varo'smākaṁ yattvaṁ tuṣṭo mahāmune | avaśyaṁ yadi dātavyaṁ tacchṛṇuṣva dvijottama
अर्बुद ने कहा - हे महामुने, आपका संतुष्ट होना ही मेरे लिए वर है। तथापि, यदि कुछ अवश्य देना ही हो, तो हे द्विजश्रेष्ठ, सुनिए।
श्लोक 29 (skanda.7.387.29)
यच्चैतच्छिखरे ह्यस्मिन्निर्झरं निर्मलोदकम् । नागतीर्थमिति ख्यातिं भूतले यातु सर्वतः
yaccaitacchikhare hyasminnirjharaṁ nirmalodakam | nāgatīrthamiti khyātiṁ bhūtale yātu sarvataḥ
इस शिखर पर यह जो निर्मल जल का झरना है, वह पृथ्वी पर सर्वत्र "नागतीर्थ" नाम से विख्यात हो।
श्लोक 30 (skanda.7.387.30)
अत्रैवाहं वसिष्यामि मित्रस्नेहात्सदा मुने । तत्र स्नात्वा दिवं यातु मानवस्त्वत्प्रसादतः
atraivāhaṁ vasiṣyāmi mitrasnehātsadā mune | tatra snātvā divaṁ yātu mānavastvatprasādataḥ
हे मुने, मित्र-स्नेहवश मैं सदा यहीं निवास करूँगा। यहाँ स्नान करके मनुष्य आपकी कृपा से स्वर्ग को प्राप्त हो।
श्लोक 31 (skanda.7.387.31)
अपि वंध्या च या नारी स्नानमात्रं समाचरेत् । सा स्यात्पुत्रवती विप्र सुखसौभाग्यसंयुता
api vaṁdhyā ca yā nārī snānamātraṁ samācaret | sā syātputravatī vipra sukhasaubhāgyasaṁyutā
यहाँ तक कि जो बाँझ स्त्री भी केवल स्नान करे, हे विप्र, वह भी पुत्रवती और सुख-सौभाग्य से युक्त हो जाएगी।
श्लोक 32 (skanda.7.387.32)
वसिष्ठ उवाच । या वंध्यास्मिञ्जले पूर्णे स्नानमात्रं करिष्यति । सापि पुत्रमवाप्नोति सर्वलक्षणलक्षितम्
vasiṣṭha uvāca | yā vaṁdhyāsmiñjale pūrṇe snānamātraṁ kariṣyati | sāpi putramavāpnoti sarvalakṣaṇalakṣitam
वसिष्ठ जी ने कहा - जो बाँझ स्त्री इस पूर्ण जल में केवल स्नान करेगी, वह भी सभी शुभ लक्षणों से युक्त पुत्र को प्राप्त करेगी।
श्लोक 33 (skanda.7.387.33)
नभसः शुक्लपंचम्यां फलैः पूजां करोति च । अपि वर्षशता नारी सा भविष्यति पुत्रिणी
nabhasaḥ śuklapaṁcamyāṁ phalaiḥ pūjāṁ karoti ca | api varṣaśatā nārī sā bhaviṣyati putriṇī
भाद्रपद मास की शुक्ल पंचमी को जो फलों से पूजा करती है, वह चाहे सौ वर्ष की स्त्री हो, वह भी पुत्रवती हो जाएगी।
श्लोक 34 (skanda.7.387.34)
येऽत्र स्नानं करिष्यंति ह्यस्मिंस्तीर्थे च भक्तितः । यास्यंति ते परं स्थानं जरामरणवर्जितम्
ye'tra snānaṁ kariṣyanti hyasminstīrthe ca bhaktitaḥ | yāsyanti te paraṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam
जो लोग इस तीर्थ में भक्तिपूर्वक स्नान करेंगे, वे जरा-मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होंगे।
श्लोक 35 (skanda.7.387.35)
श्राद्धं चात्र करिष्यंति पंचम्यां ये समाहिताः । मासे नभसि तीर्थस्य फलं तेषां भविष्यति
śrāddhaṁ cātra kariṣyanti paṁcamyāṁ ye samāhitāḥ | māse nabhasi tīrthasya phalaṁ teṣāṁ bhaviṣyati
जो लोग एकाग्रचित्त होकर भाद्रपद मास की पंचमी को यहाँ श्राद्ध करेंगे, उन्हें इस तीर्थ का पूर्ण फल प्राप्त होगा।
श्लोक 36 (skanda.7.387.36)
सूत उवाच । एवं दत्त्वा वरं तस्य वसिष्ठो भगवान्मुनिः । नंदिवर्द्धनमभ्येत्य वाक्यमेतदुवाच ह
sūta uvāca | evaṁ dattvā varaṁ tasya vasiṣṭho bhagavānmuniḥ | nandivarddhanamabhyetya vākyametaduvāca ha
सूत जी ने कहा - इस प्रकार उसे वर देकर भगवान मुनि वसिष्ठ ने नन्दिवर्धन के पास जाकर यह वचन कहा।
श्लोक 37 (skanda.7.387.37)
वरं च व्रियतां वत्स परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ । विनयात्सौहृदात्सर्वं दास्यामि यत्सुदुर्ल्लभम्
varaṁ ca vriyatāṁ vatsa parituṣṭo'smi te'nagha | vinayātsauhṛdātsarvaṁ dāsyāmi yatsudurllabham
हे वत्स, हे निष्पाप, वर माँगो, मैं तुमसे अत्यन्त संतुष्ट हूँ। तुम्हारी विनम्रता और सौहार्द से मैं वह सब भी दूँगा जो अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 38 (skanda.7.387.38)
नंदिवर्द्धन उवाच । तवास्तु वचनं सत्यं पूर्वोक्तं मुनिसत्तम । सांनिध्यं जायतामत्र अवश्यं तव सर्वदा
nandivarddhana uvāca | tavāstu vacanaṁ satyaṁ pūrvoktaṁ munisattama | sāṁnidhyaṁ jāyatāmatra avaśyaṁ tava sarvadā
नन्दिवर्धन ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ, आपका पूर्वोक्त वचन सत्य हो। यहाँ आपकी सांनिध्य सदा अवश्य बनी रहे।
श्लोक 39 (skanda.7.387.39)
यथाहमर्बुदेत्येवं ख्यातिं गच्छामि भूतले । प्रसादाच्चैव ते भूयादेतन्मे मनसि स्थितम्
yathāhamarbudetyevaṁ khyātiṁ gacchāmi bhūtale | prasādāccaiva te bhūyādetanme manasi sthitam
जैसे मैं "अर्बुद" इस नाम से पृथ्वी पर विख्यात होऊँ - आपकी ही कृपा से यह हो, यही मेरे मन में बसा है।
श्लोक 40 (skanda.7.387.40)
सूत उवाच । एवमस्त्विति तं प्रोच्य वसिष्ठो भगवान्मुनिः । चक्रे स्वमाश्रमं तत्र तस्य वाक्येन नोदितः
sūta uvāca | evamastviti taṁ procya vasiṣṭho bhagavānmuniḥ | cakre svamāśramaṁ tatra tasya vākyena noditaḥ
सूत जी ने कहा - "ऐसा ही हो" कहकर, उसके वचन से प्रेरित होकर, भगवान मुनि वसिष्ठ ने वहीं अपना आश्रम बना लिया।
श्लोक 41 (skanda.7.387.41)
पनसैश्चंपकैराम्रैः प्रियंगुबिल्वदाडिमैः । नानापक्षिसमायुक्तो देवगन्धर्वसेवितः
panasaiścaṁpakairāmraiḥ priyaṁgubilvadāḍimaiḥ | nānāpakṣisamāyukto devagandharvasevitaḥ
कटहल, चम्पा, आम, प्रियंगु, बिल्व और अनार के वृक्षों से युक्त, तरह-तरह के पक्षियों से भरा, देवताओं और गन्धर्वों द्वारा सेवित।
श्लोक 42 (skanda.7.387.42)
तस्थौ तत्र मुनिश्रेष्ठो ह्यरुंधत्या समन्वितः । गोमतीमानयामास तपसा मुनिसत्तमः
tasthau tatra muniśreṣṭho hyaruṁdhatyā samanvitaḥ | gomatīmānayāmāsa tapasā munisattamaḥ
वहाँ मुनिश्रेष्ठ अरुंधती के साथ निवास करने लगे। उस मुनिश्रेष्ठ ने अपने तप के बल से गोमती नदी को वहाँ ले आया।
श्लोक 43 (skanda.7.387.43)
यस्यां स्नात्वा दिवं यांति अतिपापकृतो नराः । माघमासे विशेषेण मकरस्थे दिवाकरे
yasyāṁ snātvā divaṁ yānti atipāpakṛto narāḥ | māghamāse viśeṣeṇa makarasthe divākare
उसमें स्नान करके अत्यन्त पापी मनुष्य भी स्वर्ग को प्राप्त होते हैं, विशेष रूप से माघ मास में जब सूर्य मकर राशि में हो।
श्लोक 44 (skanda.7.387.44)
येत्र स्नानं करिष्यंति ते यास्यंति परां गतिम्
yetra snānaṁ kariṣyanti te yāsyanti parāṁ gatim
जो लोग वहाँ स्नान करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 45 (skanda.7.387.45)
माघमासे विशेषेण तिलदानं करोति यः । तिलसंख्यानि वर्षाणि स्वर्गे तिष्ठति मानवः
māghamāse viśeṣeṇa tiladānaṁ karoti yaḥ | tilasaṁkhyāni varṣāṇi svarge tiṣṭhati mānavaḥ
विशेष रूप से माघ मास में जो तिल का दान करता है, वह उतने ही वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है, जितने तिल दान किए गए हों।
श्लोक 46 (skanda.7.387.46)
बहुना किमिहोक्तेन स्तानमात्रं समाचरेत्
bahunā kimihoktena snānamātraṁ samācaret
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ, मनुष्य केवल स्नान ही कर ले तो पर्याप्त है।
श्लोक 47 (skanda.7.387.47)
वसिष्ठस्य मुखं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते । अरुंधती पूजनीया पूजनीया विशेषतः
vasiṣṭhasya mukhaṁ dṛṣṭvā punarjanma na vidyate | aruṁdhatī pūjanīyā pūjanīyā viśeṣataḥ
वसिष्ठ जी का मुख देखने मात्र से पुनर्जन्म नहीं होता। अरुंधती विशेष रूप से पूजनीय हैं, पूजनीय हैं।