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प्रभास खण्ड · अध्याय 388

अचलेश्वर-उत्पत्ति का वर्णन

अध्याय 387अध्याय-सूचीअध्याय 389

श्लोक 1 (skanda.7.388.1)

सूत उवाच । स कृत्वा स्वाश्रमं तत्र वसिष्ठो भगवान्मुनिः । तत्र शंभोर्निवासाय तपस्तेपे सुदारुणम्

sūta uvāca | sa kṛtvā svāśramaṁ tatra vasiṣṭho bhagavānmuniḥ | tatra śambhornivāsāya tapastepe sudāruṇam

सूत जी ने कहा - वहाँ अपना आश्रम बनाकर भगवान मुनि वसिष्ठ ने शम्भु के निवास के लिए वहाँ अत्यन्त कठोर तप किया।

श्लोक 2 (skanda.7.388.2)

स बभूव मुनिः सम्यक्फलाहारसमन्वितः । शीर्णपर्णाशनः पश्चाद्द्वे शते समपद्यत

sa babhūva muniḥ samyakphalāhārasamanvitaḥ | śīrṇaparṇāśanaḥ paścāddve śate samapadyata

वह मुनि पूर्णतः फलाहारी हो गए, यह दो सौ वर्ष चला। इसके बाद वे सूखे पत्तों का आहार करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.7.388.3)

जलाहारः पञ्चशतवर्षाणि संबभूव ह । वर्षाणां वायुभक्षोऽभूत्ततो दशशतानि च

jalāhāraḥ pañcaśatavarṣāṇi saṁbabhūva ha | varṣāṇāṁ vāyubhakṣo'bhūttato daśaśatāni ca

फिर पाँच सौ वर्षों तक वे केवल जल का आहार लेते रहे। फिर एक हजार वर्षों तक वे केवल वायु का भक्षण करते रहे।

श्लोक 4 (skanda.7.388.4)

पञ्चाग्निसाधको ग्रीष्मे हेमन्ते सलिलाशयः । वर्षास्वाकाशवासी च सहस्रं च ततोऽभवत्

pañcāgnisādhako grīṣme hemante salilāśayaḥ | varṣāsvākāśavāsī ca sahasraṁ ca tato'bhavat

ग्रीष्म में पंचाग्नि-साधना करते, हेमन्त में जल में रहते और वर्षा में आकाश के नीचे रहते हुए एक हजार वर्ष और बीत गए।

श्लोक 5 (skanda.7.388.5)

ततस्तुष्टो महादेवस्तस्यर्षेः सुमहात्मनः । भित्त्वा तं पर्वतं सद्यस्तत्पुरो लिंगमुत्थितम् । तं दृष्ट्वा विस्मयाविष्टो मुनिः स्तोत्रमुदैरयत्

tatastuṣṭo mahādevastasyarṣeḥ sumahātmanaḥ | bhittvā taṁ parvataṁ sadyastatpuro liṅgamutthitam | taṁ dṛṣṭvā vismayāviṣṭo muniḥ stotramudairayat

तब उस महात्मा ऋषि से प्रसन्न होकर महादेव ने उस पर्वत को भेदकर तत्काल उसके सामने एक लिंग प्रकट किया। उसे देखकर आश्चर्यचकित मुनि ने स्तोत्र का पाठ किया।

श्लोक 6 (skanda.7.388.6)

नमः शिवाय शुद्धाय सर्वगायाऽमृताय च । कपर्द्दिने नमस्तुभ्यं नमस्तस्मै त्रिमूर्त्तये

namaḥ śivāya śuddhāya sarvagāyā'mṛtāya ca | kaparddine namastubhyaṁ namastasmai trimūrttaye

शिव को, शुद्ध, सर्वव्यापी और अमृतस्वरूप को नमस्कार है। जटाधारी को नमस्कार है, त्रिमूर्ति को नमस्कार है।

श्लोक 7 (skanda.7.388.7)

नमः स्थूलाय सूक्ष्माय व्यापकाय महात्मने । निषंगिणे नमस्तुभ्यं त्रिनेत्राय नमोनमः

namaḥ sthūlāya sūkṣmāya vyāpakāya mahātmane | niṣaṅgiṇe namastubhyaṁ trinetrāya namonamaḥ

स्थूल, सूक्ष्म, व्यापक और महात्मा को नमस्कार है। शस्त्रधारी को नमस्कार है, त्रिनेत्र को बारंबार नमस्कार है।

श्लोक 8 (skanda.7.388.8)

नमश्चन्द्रकलाधार नमो दिग्वसनाय च । पिनाकपाणये तुभ्यमष्टमूर्ते नमोनमः

namaścandrakalādhāra namo digvasanāya ca | pinākapāṇaye tubhyamaṣṭamūrte namonamaḥ

चन्द्रकला को धारण करने वाले को नमस्कार, दिशाओं को ही वस्त्र बनाने वाले को नमस्कार। पिनाकधारी, अष्टमूर्ति को बारंबार नमस्कार है।

श्लोक 9 (skanda.7.388.9)

नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानगम्याय ते नमः । नमस्ते ज्ञानदेहाय सर्वज्ञानमयाय च

namaste jñānarūpāya jñānagamyāya te namaḥ | namaste jñānadehāya sarvajñānamayāya ca

ज्ञानस्वरूप को नमस्कार, ज्ञान से ही जिन तक पहुँचा जा सके उन्हें नमस्कार। ज्ञानदेह को नमस्कार, सर्वज्ञानमय को नमस्कार।

श्लोक 10 (skanda.7.388.10)

काशीपते नमस्तुभ्यं गिरिशाय नमोनमः । जगत्कारणरूपाय महादेवाय ते नमः

kāśīpate namastubhyaṁ giriśāya namonamaḥ | jagatkāraṇarūpāya mahādevāya te namaḥ

हे काशीपति, तुम्हें नमस्कार है, गिरीश को बारंबार नमस्कार है। जगत के कारणस्वरूप महादेव को नमस्कार है।

श्लोक 11 (skanda.7.388.11)

गौरीकान्त नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं शिवात्मने । ब्रह्मविष्णुस्वरूपाय त्रिनेत्राय नमोनमः

gaurīkānta namastubhyaṁ namastubhyaṁ śivātmane | brahmaviṣṇusvarūpāya trinetrāya namonamaḥ

हे गौरीपति, तुम्हें नमस्कार, शिवात्मा को नमस्कार। ब्रह्मा और विष्णु के स्वरूप, त्रिनेत्र को बारंबार नमस्कार है।

श्लोक 12 (skanda.7.388.12)

विश्वरूपाय शुद्धाय नमस्तुभ्यं महात्मने । नमो विश्वस्वरूपाय सर्वदेवमयाय च

viśvarūpāya śuddhāya namastubhyaṁ mahātmane | namo viśvasvarūpāya sarvadevamayāya ca

विश्वरूप, शुद्ध और महात्मा को नमस्कार है। विश्वस्वरूप और सर्वदेवमय को नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.7.388.13)

सूत उवाच । एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी । परितुष्टोऽस्मि ते भद्रं वरं वरय सुव्रत

sūta uvāca | etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī | parituṣṭo'smi te bhadraṁ varaṁ varaya suvrata

सूत जी ने कहा - उसी समय एक अशरीरी वाणी हुई - मैं तुमसे अत्यन्त संतुष्ट हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, हे सुव्रत, वर माँगो।

श्लोक 14 (skanda.7.388.14)

इत्युक्त्वा पर्वतं भित्त्वा तत्पुरो लिंगमुत्थितम्

ityuktvā parvataṁ bhittvā tatpuro liṅgamutthitam

ऐसा कहकर - पर्वत को भेदकर उसके सामने वह लिंग प्रकट हुआ था।

श्लोक 15 (skanda.7.388.15)

वसिष्ठ उवाच । लिंगेऽस्मिंस्तव सांनिध्यं सदा भवतु शंकर । मया पूर्वं प्रतिज्ञातं नगस्येह महात्मने । सत्यं कुरु वचो मे त्वं यदि तुष्टोऽसि शंकर

vasiṣṭha uvāca | liṅge'sminstava sāṁnidhyaṁ sadā bhavatu śaṅkara | mayā pūrvaṁ pratijñātaṁ nagasyeha mahātmane | satyaṁ kuru vaco me tvaṁ yadi tuṣṭo'si śaṅkara

वसिष्ठ जी ने कहा - हे शंकर, इस लिंग में तुम्हारी सांनिध्य सदा बनी रहे। हे महात्मन, मैंने पूर्व में यहाँ इस पर्वत से यह प्रतिज्ञा की थी। हे शंकर, यदि तुम प्रसन्न हो, तो मेरे इस वचन को सत्य करो।

श्लोक 16 (skanda.7.388.16)

श्रीभगवानुवाच । अद्यप्रभृति लिंगेऽस्मिन्सांनिध्यं मे भविष्यति । त्वद्वाक्याद्ब्राह्मणश्रेष्ठ सर्वं सत्यं भविष्यति

śrībhagavānuvāca | adyaprabhṛti liṅge'sminsāṁnidhyaṁ me bhaviṣyati | tvadvākyādbrāhmaṇaśreṣṭha sarvaṁ satyaṁ bhaviṣyati

भगवान ने कहा - आज से इस लिंग में मेरी सांनिध्य बनी रहेगी। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, तुम्हारे वचन से सब कुछ सत्य होगा।

श्लोक 17 (skanda.7.388.17)

स्तोत्रेणानेन यो मर्त्यो मां स्तविष्यति भक्तितः । कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामाश्विने मुनिसत्तम

stotreṇānena yo martyo māṁ staviṣyati bhaktitaḥ | kṛṣṇapakṣe caturdaśyāmāśvine munisattama

हे मुनिश्रेष्ठ, जो मनुष्य आश्विन मास की कृष्ण चतुर्दशी को इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेगा।

श्लोक 18 (skanda.7.388.18)

मत्प्रियार्थं तु शक्रेण प्रेषिता मुनिसत्तम । मन्दाकिनीति विख्याता नदी त्रैलोक्यपाविनी

matpriyārthaṁ tu śakreṇa preṣitā munisattama | mandākinīti vikhyātā nadī trailokyapāvinī

हे मुनिश्रेष्ठ, मेरी प्रसन्नता के लिए इन्द्र द्वारा भेजी गई त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली मन्दाकिनी नामक विख्यात नदी।

श्लोक 19 (skanda.7.388.19)

देवस्योत्तरदिग्भागे कुंडं तिष्ठति नित्यशः । तस्यां स्नात्वा मुनिश्रेष्ठ लिंगं मे पश्यते तु यः । स याति परमं स्थानं जरामरणवर्जितम्

devasyottaradigbhāge kuṇḍaṁ tiṣṭhati nityaśaḥ | tasyāṁ snātvā muniśreṣṭha liṅgaṁ me paśyate tu yaḥ | sa yāti paramaṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam

उस देव के उत्तर दिशा में एक कुण्ड सदा विद्यमान रहता है। हे मुनिश्रेष्ठ, जो उसमें स्नान करके मेरे लिंग का दर्शन करेगा, वह जरा-मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होगा।

श्लोक 20 (skanda.7.388.20)

अचलं भेदयित्वा तु यस्मान्मे लिंगमुद्गतम् । अचलेश्वरनाम्नैव लोके ख्यातिं गमिष्यति

acalaṁ bhedayitvā tu yasmānme liṅgamudgatam | acaleśvaranāmnaiva loke khyātiṁ gamiṣyati

चूँकि इस लिंग की उत्पत्ति पर्वत को भेदकर हुई, इसलिए यह लोक में "अचलेश्वर" इसी नाम से विख्यात होगा।

श्लोक 21 (skanda.7.388.21)

अस्य लिंगस्य माहात्म्यान्न कदाचिच्चलिष्यति । सर्वथा म इदं लिंगं प्रलयान्ते न चाल्यते

asya liṅgasya māhātmyānna kadācicicaliṣyati | sarvathā ma idaṁ liṅgaṁ pralayānte na cālyate

इस लिंग के माहात्म्य से यह कभी विचलित नहीं होगा। यह मेरा लिंग सर्वथा प्रलयकाल में भी कभी विचलित नहीं होता।

श्लोक 22 (skanda.7.388.22)

सूत उवाच । एतावदुक्त्वा वचनं विरराम महेश्वरः । वसिष्ठोऽपि सुहृष्टात्मा गौतमाद्या मुनीश्वराः

sūta uvāca | etāvaduktvā vacanaṁ virarāma maheśvaraḥ | vasiṣṭho'pi suhṛṣṭātmā gautamādyā munīśvarāḥ

सूत जी ने कहा - इतना कहकर महेश्वर मौन हो गए। वसिष्ठ जी अत्यन्त हर्षित हृदय हुए, और गौतम आदि मुनीश्वर भी।

श्लोक 23 (skanda.7.388.23)

शक्रादयस्ततो देवास्तीर्थान्यायतनानि च । आनयामास ब्रह्मर्षिस्तपसा पर्वतोत्तमे

śakrādayastato devāstīrthānyāyatanāni ca | ānayāmāsa brahmarṣistapasā parvatottame

तब इन्द्र आदि देवताओं, तीर्थों और मन्दिरों को उस ब्रह्मर्षि ने अपने तप से उस पर्वतश्रेष्ठ पर ले आया।

श्लोक 24 (skanda.7.388.24)

ततस्तुष्टः सुरश्रेष्ठस्तत्र वासमथाकरोत्

tatastuṣṭaḥ suraśreṣṭhastatra vāsamathākarot

तब प्रसन्न होकर उस देवश्रेष्ठ (महादेव) ने वहीं निवास करना आरम्भ कर दिया।

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