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प्रभास खण्ड · अध्याय 389

नागतीर्थ-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 388अध्याय-सूचीअध्याय 390

श्लोक 1 (skanda.7.389.1)

ऋषय ऊचुः । अर्बुदस्य च माहात्म्यं विस्तरेण वदस्व नः । कौतुकं सूत नो जातं कथयस्व यथा शुभम्

ṛṣaya ūcuḥ | arbudasya ca māhātmyaṁ vistareṇa vadasva naḥ | kautukaṁ sūta no jātaṁ kathayasva yathā śubham

ऋषियों ने कहा - हे सूत, हमें अर्बुद का माहात्म्य विस्तार से बताइए। हमारे मन में कुतूहल उत्पन्न हुआ है, कृपया वह शुभ कथा कहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.389.2)

सूत उवाच । पुरासीच्च ऋषिश्रेष्ठः पुलस्त्यो भगवान्मुनिः । ययातेश्च गृहे यातस्तं नत्वा चाब्रवीन्नृपः

sūta uvāca | purāsīcca ṛṣiśreṣṭhaḥ pulastyo bhagavānmuniḥ | yayāteśca gṛhe yātastaṁ natvā cābravīnnṛpaḥ

सूत जी ने कहा - पूर्वकाल में ऋषिश्रेष्ठ भगवान पुलस्त्य मुनि थे। वे राजा ययाति के घर पधारे, और राजा ने उन्हें प्रणाम करके कहा।

श्लोक 3 (skanda.7.389.3)

ययातिरुवाच । स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ सफलं मेऽद्यजीवितम् । कथयस्व प्रसादेन कथामर्बुदसंभवाम्

yayātiruvāca | svāgataṁ te muniśreṣṭha saphalaṁ me'dyajīvitam | kathayasva prasādena kathāmarbudasaṁbhavām

ययाति ने कहा - हे मुनिश्रेष्ठ, आपका स्वागत है। आज मेरा जीवन सफल हुआ। कृपापूर्वक अर्बुद की उत्पत्ति की कथा कहिए।

श्लोक 4 (skanda.7.389.4)

अर्बुदाख्यो नगो नाम विख्यातो यो धरातले । तस्य यात्राक्रमं ब्रूहि तत्फलं द्विजसत्तम

arbudākhyo nago nāma vikhyāto yo dharātale | tasya yātrākramaṁ brūhi tatphalaṁ dvijasattama

पृथ्वी पर विख्यात जो अर्बुद नामक पर्वत है, हे द्विजश्रेष्ठ, उसकी यात्रा-विधि और उसका फल बताइए।

श्लोक 5 (skanda.7.389.5)

सर्वं विस्तरतो ब्रूहि तीर्थयात्रापरायण । तस्माद्वद मुनिश्रेष्ठ येन यात्रां करोम्यहम्

sarvaṁ vistarato brūhi tīrthayātrāparāyaṇa | tasmādvada muniśreṣṭha yena yātrāṁ karomyaham

हे तीर्थयात्रा में तत्पर मुने, मुझे सब कुछ विस्तार से बताइए, जिससे मैं वह यात्रा कर सकूँ।

श्लोक 6 (skanda.7.389.6)

पुलस्त्य उवाच । बहुधर्ममयो राजन्नर्बुदः पर्वतोत्तमः । अशक्तो विस्तराद्वक्तुमपि वर्षशतैरपि

pulastya uvāca | bahudharmamayo rājannarbudaḥ parvatottamaḥ | aśakto vistarādvaktumapi varṣaśatairapi

पुलस्त्य ने कहा - हे राजन, अर्बुद पर्वत बहुत धर्मों से युक्त है, उसका पूर्ण विस्तार से वर्णन सौ वर्षों में भी नहीं किया जा सकता।

श्लोक 7 (skanda.7.389.7)

संक्षेपादेव वक्ष्यामि तीर्थमुख्यानि ते तथा । नागतीर्थं तु तत्राद्यं सर्वकामप्रदं नृणाम्

saṁkṣepādeva vakṣyāmi tīrthamukhyāni te tathā | nāgatīrthaṁ tu tatrādyaṁ sarvakāmapradaṁ nṛṇām

मैं संक्षेप में ही तुम्हें उसके मुख्य तीर्थों को बताऊँगा। उनमें पहला नागतीर्थ है, जो मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्लोक 8 (skanda.7.389.8)

नारीणां च विशेषेण पुत्रसौभाग्यदायकम् । शृणु राजन्पुरावृत्तं यतोऽत्याश्चर्यमुत्तमम्

nārīṇāṁ ca viśeṣeṇa putrasaubhāgyadāyakam | śṛṇu rājanpurāvṛttaṁ yato'tyāścaryamuttamam

विशेष रूप से स्त्रियों के लिए यह पुत्र और सौभाग्य देने वाला है। हे राजन, इसके विषय में एक अत्यन्त अद्भुत प्राचीन वृत्तान्त सुनिए।

श्लोक 9 (skanda.7.389.9)

गौतमी ब्राह्मणी नाम्ना सती साध्वी पतिव्रता । बालवैधव्यसंप्राप्ता तीर्थयात्रापरायणा

gautamī brāhmaṇī nāmnā satī sādhvī pativratā | bālavaidhavyasaṁprāptā tīrthayātrāparāyaṇā

गौतमी नाम की एक सती, साध्वी, पतिव्रता ब्राह्मणी थी, जो बचपन में ही विधवा हो गई थी और तीर्थयात्रा में तत्पर रहती थी।

श्लोक 10 (skanda.7.389.10)

अर्बुदं सा च संप्राप्ता नागतीर्थं विवेश ह । तस्मिञ्जले निमग्ना सा स्नातुमभ्याययौ पुरा

arbudaṁ sā ca samprāptā nāgatīrthaṁ viveśa ha | tasmiñjale nimagnā sā snātumabhyāyayau purā

वह अर्बुद पर्वत पहुँचकर नागतीर्थ में प्रवेश कर गई। वह उस जल में डूबकर स्नान करने के लिए वहाँ आई थी।

श्लोक 11 (skanda.7.389.11)

नायका पुत्रसंयुक्ता तत्तीर्थं समुपागता । शुश्रूषां सा तस्तस्याश्चक्रे नानाविधां नृप

nāyakā putrasaṁyuktā tattīrthaṁ samupāgatā | śuśrūṣāṁ sā tastasyāścakre nānāvidhāṁ nṛpa

हे राजन, वहाँ पुत्र सहित एक सुहागिन स्त्री भी उस तीर्थ में आई थी। उसने अपने पुत्र की विविध प्रकार से सेवा-शुश्रूषा की।

श्लोक 12 (skanda.7.389.12)

सर्वोपकरणैर्दर्भैः सुमनोभिः पृथग्विधैः । अथ सा चिंतयामास गौतमी पुत्रदुःखिता

sarvopakaraṇairdarbhaiḥ sumanobhiḥ pṛthagvidhaiḥ | atha sā ciṁtayāmāsa gautamī putraduḥkhitā

कुश, फूलों तथा विविध सामग्रियों के साथ। तब पुत्र-रहित होने के दुःख से पीड़ित गौतमी सोचने लगी।

श्लोक 13 (skanda.7.389.13)

धन्योऽयं तनयो ह्यस्याः शुश्रूषां कुरुते सदा । पुत्रयुक्ता त्वियं धन्या धिगहं पुत्रवर्जिता

dhanyo'yaṁ tanayo hyasyāḥ śuśrūṣāṁ kurute sadā | putrayuktā tviyaṁ dhanyā dhigahaṁ putravarjitā

धन्य है यह पुत्र, जो सदा अपनी माता की सेवा करता है। धन्य है यह पुत्रवती स्त्री, धिक्कार है मुझे, जो पुत्रहीन हूँ।

श्लोक 14 (skanda.7.389.14)

अहं भर्त्रा वियुक्ता च पुत्रहीना सुदुःखिता । अथ सा निर्गता तस्मात्सलिलान्नृपसत्तम

ahaṁ bhartrā viyuktā ca putrahīnā suduḥkhitā | atha sā nirgatā tasmātsalilānnṛpasattama

मैं अपने पति से वियुक्त और पुत्रहीन होकर अत्यन्त दुःखी हूँ। हे राजश्रेष्ठ, तब वह उस जल से बाहर निकली।

श्लोक 15 (skanda.7.389.15)

विनाऽपि भर्तृसंयोगात्सद्यो गर्भवती ह्यभूत् । सा गर्भलक्षणैर्युक्ता सुजनव्रीडयाऽन्विता

vinā'pi bhartṛsaṁyogātsadyo garbhavatī hyabhūt | sā garbhalakṣaṇairyuktā sujanavrīḍayā'nvitā

बिना पति के संयोग के ही वह तुरन्त गर्भवती हो गई। गर्भ के लक्षणों से युक्त होकर वह सज्जनों के सामने लज्जा से भर गई।

श्लोक 16 (skanda.7.389.16)

चकार मरणे बुद्धिं ज्वालयामास पावकम् । एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी

cakāra maraṇe buddhiṁ jvālayāmāsa pāvakam | etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī

उसने मरने का निश्चय कर लिया और अग्नि प्रज्वलित कर ली। उसी समय एक अशरीरी वाणी ने कहा।

श्लोक 17 (skanda.7.389.17)

वागुवाच । नो त्वं गौतमि चित्याग्नौ प्रवेशं कर्तुमर्हसि । दोषो नास्ति तवात्रार्थे तीर्थस्यास्य प्रभावतः

vāguvāca | no tvaṁ gautami cityāgnau praveśaṁ kartumarhasi | doṣo nāsti tavātrārthe tīrthasyāsya prabhāvataḥ

वाणी ने कहा - हे गौतमी, तुम्हें चिता की अग्नि में प्रवेश नहीं करना चाहिए। इस विषय में तुम्हारा कोई दोष नहीं है, यह इस तीर्थ के प्रभाव से हुआ है।

श्लोक 18 (skanda.7.389.18)

यो यद्वांछति चित्ते च जलमध्ये स्थितो नरः । चिन्तितं च तदाप्नोति नारी वा नात्र संशयः

yo yadvāñchati citte ca jalamadhye sthito naraḥ | ciṁtitaṁ ca tadāpnoti nārī vā nātra saṁśayaḥ

जो पुरुष या स्त्री इस जल के भीतर रहते हुए मन में जो कुछ चाहता है, वह उसे प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 19 (skanda.7.389.19)

त्वया तस्याः सुतं दृष्ट्वा पुत्रवांछा कृता हृदि । तव गर्भगतो नूनं पुत्रः पुत्रि भविष्यति

tvayā tasyāḥ sutaṁ dṛṣṭvā putravāñchā kṛtā hṛdi | tava garbhagato nūnaṁ putraḥ putri bhaviṣyati

तुमने उसके पुत्र को देखकर मन में पुत्र की कामना कर ली थी। हे पुत्री, तुम्हारे गर्भ में निश्चय ही एक पुत्र आ गया है।

श्लोक 20 (skanda.7.389.20)

तस्माद्विरम भद्रं ते निर्दोषासि पतिव्रते । विरराम ततः साध्वी गौतमी मरणान्नृप

tasmādvirama bhadraṁ te nirdoṣāsi pativrate | virarāma tataḥ sādhvī gautamī maraṇānnṛpa

इसलिए रुक जाओ, तुम्हारा कल्याण हो, हे पतिव्रता, तुम निर्दोष हो। हे राजन, तब साध्वी गौतमी मरने के विचार से रुक गई।

श्लोक 21 (skanda.7.389.21)

श्रुत्वाऽऽकाशगतां वाणीं देवदूतेन भाषिताम् । दृष्ट्वा पतिं विना गर्भं वाक्यमेतदुवाच ह

śrutvā'kāśagatāṁ vāṇīṁ devadūtena bhāṣitām | dṛṣṭvā patiṁ vinā garbhaṁ vākyametaduvāca ha

उस आकाशवाणी को सुनकर, जो देवदूत द्वारा कही गई थी, और पति के बिना ही गर्भ को देखकर उसने यह वचन कहा।

श्लोक 22 (skanda.7.389.22)

अहो तीर्थप्रभावोऽयमपूर्वः प्रतिभाति मे । यत्र संजायते गर्भः स्त्रीणां शुक्ररजोविना

aho tīrthaprabhāvo'yamapūrvaḥ pratibhāti me | yatra saṁjāyate garbhaḥ strīṇāṁ śukrarajovinā

अहो, यह तीर्थ का प्रभाव मुझे अद्भुत प्रतीत होता है, जहाँ बिना वीर्य-रज के संयोग के ही स्त्रियों को गर्भ प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.7.389.23)

नाहं कुत्रापि यास्यामि मुक्त्वेदं तीर्थमुत्तमम् । एवमुक्त्वा ततः साध्वी तत्रैव न्यवसत्सदा

nāhaṁ kutrāpi yāsyāmi muktvedaṁ tīrthamuttamam | evamuktvā tataḥ sādhvī tatraiva nyavasatsadā

मैं इस उत्तम तीर्थ को छोड़कर अब कहीं नहीं जाऊँगी। ऐसा कहकर वह साध्वी वहीं सदा के लिए निवास करने लगी।

श्लोक 24 (skanda.7.389.24)

पुत्रं वै जनयामास सर्वलक्षणलक्षितम् । तत्र पार्थिवशार्दूल कृष्णपक्षेऽश्विनस्य च

putraṁ vai janayāmāsa sarvalakṣaṇalakṣitam | tatra pārthivaśārdūla kṛṣṇapakṣe'śvinasya ca

हे राजश्रेष्ठ, उसने वहीं आश्विन मास के कृष्णपक्ष में सभी शुभ लक्षणों से युक्त पुत्र को जन्म दिया।

श्लोक 25 (skanda.7.389.25)

यः पुनः कुरुते श्राद्धं तस्य वंशो न नश्यति । न प्रेतो जायते राजन्वंशे तस्य कदाचन

yaḥ punaḥ kurute śrāddhaṁ tasya vaṁśo na naśyati | na preto jāyate rājanvaṁśe tasya kadācana

जो व्यक्ति यहाँ श्राद्ध करता है, उसके वंश का नाश नहीं होता। हे राजन, उसके वंश में कभी कोई प्रेत उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 26 (skanda.7.389.26)

यः पुमान्कामरहितः स्नानं तत्र समाचरेत् । श्राद्धं च पार्थिवश्रेष्ठ तस्य लोकाः सनातनाः

yaḥ pumānkāmarahitaḥ snānaṁ tatra samācaret | śrāddhaṁ ca pārthivaśreṣṭha tasya lokāḥ sanātanāḥ

जो व्यक्ति निष्काम भाव से वहाँ स्नान करता है और श्राद्ध करता है, हे राजश्रेष्ठ, उसे सनातन लोक प्राप्त होते हैं।

श्लोक 27 (skanda.7.389.27)

या स्त्री पुष्पफलान्येव तीर्थे चास्मिन्विसर्जयेत् । सा स्यात्पुत्रवती धन्या सौभाग्यं च प्रपद्यते

yā strī puṣpaphalānyeva tīrthe cāsminvisarjayet | sā syātputravatī dhanyā saubhāgyaṁ ca prapadyate

जो स्त्री इस तीर्थ में फूल और फल अर्पित करती है, वह धन्य होकर पुत्रवती हो जाती है और सौभाग्य को प्राप्त करती है।

श्लोक 28 (skanda.7.389.28)

निष्कामा स्वर्गमाप्नोति दुष्प्राप्यं त्रिदशैरपि । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यात्रां तस्य समाचरेत्

niṣkāmā svargamāpnoti duṣprāpyaṁ tridaśairapi | tasmātsarvaprayatnena yātrāṁ tasya samācaret

निष्काम स्त्री उस स्वर्ग को प्राप्त करती है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। इसलिए सब प्रकार से यत्नपूर्वक उसकी यात्रा करनी चाहिए।

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