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प्रभास खण्ड · अध्याय 390

वसिष्ठाश्रम-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 389अध्याय-सूचीअध्याय 391

श्लोक 1 (skanda.7.390.1)

पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ वसिष्ठं तपसां निधिम् । यं दृष्ट्वा मानवः सम्यक्कृतार्थत्वमवाप्नुयात्

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha vasiṣṭhaṁ tapasāṁ nidhim | yaṁ dṛṣṭvā mānavaḥ samyakkṛtārthatvamavāpnuyāt

पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब तपस्या के भण्डार वसिष्ठ तीर्थ में जाना चाहिए, जिसे देखकर मनुष्य पूर्णतः कृतार्थता को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 2 (skanda.7.390.2)

तत्रास्ति जलसम्पूर्णं कुण्डं पापहरं नृणाम् । तस्मिन्कुण्डे नृपश्रेष्ठ वसिष्ठेन महात्मना

tatrāsti jalasampūrṇaṁ kuṇḍaṁ pāpaharaṁ nṛṇām | tasminkuṇḍe nṛpaśreṣṭha vasiṣṭhena mahātmanā

वहाँ जल से पूर्ण एक कुण्ड है, जो मनुष्यों के पापों का नाश करता है। हे राजश्रेष्ठ, उस कुण्ड में महात्मा वसिष्ठ ने।

श्लोक 3 (skanda.7.390.3)

गोमती च समानीता तपसा नृपसत्तम । तत्र स्नातो नरः सम्यक्पातकैर्विप्रमुच्यते

gomatī ca samānītā tapasā nṛpasattama | tatra snāto naraḥ samyakpātakairvipramucyate

हे राजश्रेष्ठ, अपने तप से गोमती नदी को ले आए थे। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य पूर्णतः पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.7.390.4)

ऋषिधान्येन यस्तत्र श्राद्धं नृप समाचरेत् । स पितृंस्तारयेत्सर्वान्पक्षयोरुभयोरपि

ṛṣidhānyena yastatra śrāddhaṁ nṛpa samācaret | sa pitṛṁstārayetsarvānpakṣayorubhayorapi

हे राजन, जो वहाँ ऋषि-धान्य (नीवार) से श्राद्ध करता है, वह दोनों पक्षों के सभी पितरों का उद्धार कर देता है।

श्लोक 5 (skanda.7.390.5)

अत्र गाथा पुरा गीता नारदेन महात्मना । स्नात्वा पुण्योदके तत्र दृष्ट्वा तं मुनिसत्तमम्

atra gāthā purā gītā nāradena mahātmanā | snātvā puṇyodake tatra dṛṣṭvā taṁ munisattamam

यहाँ महात्मा नारद ने पूर्वकाल में एक गाथा गाई थी, जब उस पुण्य जल में स्नान करके और उस मुनिश्रेष्ठ को देखकर।

श्लोक 6 (skanda.7.390.6)

किं गयाश्राद्धदानेन किमन्यैर्मखविस्तरैः । वसिष्ठस्याश्रमं प्राप्य यः श्राद्धं कुरुते नरः । स पितॄंस्तारयेत्सर्वानात्मना नृपसत्तम

kiṁ gayāśrāddhadānena kimanyairmakhavistaraiḥ | vasiṣṭhasyāśramaṁ prāpya yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ | sa pitṝṁstārayetsarvānātmanā nṛpasattama

गया में श्राद्ध-दान से क्या लाभ, अन्य विस्तृत यज्ञों से क्या लाभ? हे राजश्रेष्ठ, जो मनुष्य वसिष्ठ के आश्रम में पहुँचकर श्राद्ध करता है, वह स्वयं ही अपने सभी पितरों का उद्धार कर देता है।

श्लोक 7 (skanda.7.390.7)

तत्रैवारुंधती साध्वी वसिष्ठस्य समीपतः । पूजनीया विशेषेण सर्वकामप्रदा नृणाम्

tatraivāruṁdhatī sādhvī vasiṣṭhasya samīpataḥ | pūjanīyā viśeṣeṇa sarvakāmapradā nṛṇām

वहीं वसिष्ठ के निकट साध्वी अरुंधती हैं, जो विशेष रूप से पूजनीय हैं और मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.390.8)

बाल्ये वयसि यत्पापं वार्द्धके यौवनेऽपि वा । वसिष्ठदर्शनात्सद्यो नराणां याति संक्षयम्

bālye vayasi yatpāpaṁ vārddhake yauvane'pi vā | vasiṣṭhadarśanātsadyo narāṇāṁ yāti saṁkṣayam

बाल्यावस्था में, वृद्धावस्था में या यौवन में जो भी पाप किया गया हो, वसिष्ठ के दर्शन से मनुष्यों का वह पाप तुरन्त नष्ट हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.7.390.9)

दीपं प्रयच्छते यस्तु वसिष्ठाग्रे समाहितः । सुखसौभाग्यसंयुक्तस्तेजस्वी जायते नरः

dīpaṁ prayacchate yastu vasiṣṭhāgre samāhitaḥ | sukhasaubhāgyasaṁyuktastejasvī jāyate naraḥ

जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर वसिष्ठ के सामने दीप जलाता है, वह सुख-सौभाग्य से युक्त और तेजस्वी हो जाता है।

श्लोक 10 (skanda.7.390.10)

उपवासपरो यस्तु तत्रैका रजनीं नयेत् । स याति परमं स्थानं यत्र सप्तर्षयोऽमलाः

upavāsaparo yastu tatraikā rajanīṁ nayet | sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra saptarṣayo'malāḥ

जो व्यक्ति उपवास करते हुए वहाँ एक रात्रि व्यतीत करता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है जहाँ निर्मल सप्तर्षि निवास करते हैं।

श्लोक 11 (skanda.7.390.11)

त्रिरात्रिं कुरुते यस्तु वसिष्ठाग्रे समाहितः । स याति च महर्लोकं जरामरणवर्जितः

trirātriṁ kurute yastu vasiṣṭhāgre samāhitaḥ | sa yāti ca maharlokaṁ jarāmaraṇavarjitaḥ

जो व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर वसिष्ठ के सामने तीन रात्रि व्यतीत करता है, वह जरा-मृत्यु से रहित होकर महर्लोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 12 (skanda.7.390.12)

यस्तु मासोपवासं च वसिष्ठाग्रे करोति च । सोऽपि मुक्तिमवाप्नोति न याति स भवार्णवम्

yastu māsopavāsaṁ ca vasiṣṭhāgre karoti ca | so'pi muktimavāpnoti na yāti sa bhavārṇavam

जो व्यक्ति वसिष्ठ के सामने एक मास का उपवास करता है, वह भी मुक्ति प्राप्त करता है और उसे संसार-सागर में पुनः नहीं जाना पड़ता।

श्लोक 13 (skanda.7.390.13)

श्रावणस्य सिते पक्षे पौर्णमास्यां समाहितः । ऋषिं तर्पयते यस्तु ब्रह्मलोकं स गच्छति

śrāvaṇasya site pakṣe paurṇamāsyāṁ samāhitaḥ | ṛṣiṁ tarpayate yastu brahmalokaṁ sa gacchati

श्रावण मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा को जो एकाग्रचित्त होकर ऋषि का तर्पण करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 14 (skanda.7.390.14)

वसिष्ठस्याग्रतो यस्तु गायत्र्यष्टशतं जपेत् । आजन्ममरणात्पापात्सद्यो मुच्येत मानवः

vasiṣṭhasyāgrato yastu gāyatryaṣṭaśataṁ japet | ājanmamaraṇātpāpātsadyo mucyeta mānavaḥ

जो व्यक्ति वसिष्ठ के सामने गायत्री मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करता है, वह जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी पापों से तुरन्त मुक्त हो जाता है।

श्लोक 15 (skanda.7.390.15)

वामदेवं यजेत्तत्र यदि श्रद्धासमन्वितः । अग्निष्टोमफलं राजन्सद्यः प्राप्नोति मानवः

vāmadevaṁ yajettatra yadi śraddhāsamanvitaḥ | agniṣṭomaphalaṁ rājansadyaḥ prāpnoti mānavaḥ

यदि श्रद्धा से युक्त होकर वहाँ वामदेव की पूजा करे, तो हे राजन, मनुष्य तुरन्त अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 16 (skanda.7.390.16)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन द्रष्टव्योऽसौ महामुनिः । शुचिभिः श्रद्धया युक्तास्ते यास्यंति परं पदम्

tasmātsarvaprayatnena draṣṭavyo'sau mahāmuniḥ | śucibhiḥ śraddhayā yuktāste yāsyanti paraṁ padam

इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक उस महामुनि का दर्शन करना चाहिए। जो शुद्ध और श्रद्धायुक्त हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.390.17)

तस्मात्सर्वात्मना राजन्वामदेवं च पूजयेत्

tasmātsarvātmanā rājanvāmadevaṁ ca pūjayet

इसलिए, हे राजन, पूर्ण मन से वामदेव की पूजा करनी चाहिए।

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