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प्रभास खण्ड · अध्याय 391

अचलेश्वर-प्रभाव का वर्णन

अध्याय 390अध्याय-सूचीअध्याय 392

श्लोक 1 (skanda.7.391.1)

पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ सुपुण्यमचलेश्वरम् । यं दृष्ट्वा सिद्धिमाप्नोति नरः श्रद्धासमन्वितः

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha supuṇyamacaleśvaram | yaṁ dṛṣṭvā siddhimāpnoti naraḥ śraddhāsamanvitaḥ

पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब परम पुण्यदायक अचलेश्वर में जाना चाहिए, जिसे देखकर श्रद्धायुक्त मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 2 (skanda.7.391.2)

तत्र कृष्णचतुर्दश्यां यः श्राद्धं कुरुते नरः । आश्विने फाल्गुने वापि स याति परमां गतिम्

tatra kṛṣṇacaturdaśyāṁ yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ | āśvine phālgune vāpi sa yāti paramāṁ gatim

वहाँ आश्विन या फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को जो मनुष्य श्राद्ध करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.7.391.3)

यस्तु पूजयते भक्त्या दक्षिणां दिशमास्थितः । पुष्पैः पत्रैः फलैश्चैव सोऽश्वमेधफलं लभेत्

yastu pūjayate bhaktyā dakṣiṇāṁ diśamāsthitaḥ | puṣpaiḥ patraiḥ phalaiścaiva so'śvamedhaphalaṁ labhet

जो व्यक्ति दक्षिण दिशा में स्थित होकर भक्तिपूर्वक फूल, पत्ते और फल से पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.7.391.4)

पंचामृतेन यस्तत्र तर्पणं कुरुते नरः । सोऽपि देवस्य सांनिध्यं शिवलोकमवाप्नुयात्

paṁcāmṛtena yastatra tarpaṇaṁ kurute naraḥ | so'pi devasya sāṁnidhyaṁ śivalokamavāpnuyāt

जो व्यक्ति वहाँ पंचामृत से तर्पण करता है, वह भी उस देव की सांनिध्य प्राप्त करके शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 5 (skanda.7.391.5)

प्रदक्षिणांते यस्तस्य प्रणामं कुरुते नरः । नश्यंति सर्वपापानि प्रदक्षिणपदेपदे

pradakṣiṇāṁte yastasya praṇāmaṁ kurute naraḥ | naśyanti sarvapāpāni pradakṣiṇapadepade

जो व्यक्ति परिक्रमा के अन्त में उसे प्रणाम करता है, उसके सभी पाप परिक्रमा के हर कदम पर नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.391.6)

तत्राश्चर्यमभूत्पूर्वं तत्त्वं शृणु महामते । मया पूर्वं श्रुतं स्वर्गे नारदाच्छक्रसन्निधौ

tatrāścaryamabhūtpūrvaṁ tattvaṁ śṛṇu mahāmate | mayā pūrvaṁ śrutaṁ svarge nāradācchakrasannidhau

वहाँ पूर्वकाल में एक आश्चर्य हुआ था, हे महामते, उसका तत्त्व सुनिए। मैंने इसे पहले स्वर्ग में इन्द्र के समीप नारद से सुना था।

श्लोक 7 (skanda.7.391.7)

तत्र पूर्वं शुको नीडं वृक्षे चैवाकरोद्द्विजः । गतागतेन नीडस्य कुरुते तं प्रदक्षिणाम्

tatra pūrvaṁ śuko nīḍaṁ vṛkṣe caivākarodddvijaḥ | gatāgatena nīḍasya kurute taṁ pradakṣiṇām

वहाँ पूर्वकाल में एक तोता (पक्षी) ने वृक्ष पर घोंसला बना लिया था। घोंसले में आते-जाते हुए वह उसकी (लिंग की) परिक्रमा करता था।

श्लोक 8 (skanda.7.391.8)

न च भक्त्या महाराज पक्षियोनिसमुद्भवः । अथासौ मृत्युमापन्नः कालेन महता शुकः

na ca bhaktyā mahārāja pakṣiyonisamudbhavaḥ | athāsau mṛtyumāpannaḥ kālena mahatā śukaḥ

हे महाराज, पक्षी-योनि से उत्पन्न होने के कारण वह भक्तिवश नहीं करता था। फिर बहुत समय बीतने पर वह तोता मृत्यु को प्राप्त हुआ।

श्लोक 9 (skanda.7.391.9)

संजातः पार्थिवे वंशे राजा वेणुरिति स्मृतः । जातिस्मरो महाराज सर्वशत्रुनिकृन्तनः

saṁjātaḥ pārthive vaṁśe rājā veṇuriti smṛtaḥ | jātismaro mahārāja sarvaśatrunikṛntanaḥ

वह एक राजवंश में उत्पन्न हुआ, जिसे राजा वेणु कहा जाता है। हे महाराज, वह जातिस्मर था और सभी शत्रुओं का नाशक था।

श्लोक 10 (skanda.7.391.10)

स तं स्मृत्वा प्रभावं हि प्रदक्षिणासमुद्भवम् । अचलेश्वरमासाद्य प्रदक्षिणामथाकरोत्

sa taṁ smṛtvā prabhāvaṁ hi pradakṣiṇāsamudbhavam | acaleśvaramāsādya pradakṣiṇāmathākarot

उस प्रभाव को स्मरण करके, जो परिक्रमा से उत्पन्न हुआ था, उसने अचलेश्वर के पास पहुँचकर परिक्रमा करना आरम्भ कर दिया।

श्लोक 11 (skanda.7.391.11)

नक्तं दिनं महाराज नान्यत्किंचित्करोति सः । न तथा तपसे यत्नो न नैवेद्ये कथंचन

naktaṁ dinaṁ mahārāja nānyatkiṁcitkaroti saḥ | na tathā tapase yatno na naivedye kathaṁcana

हे महाराज, वह रात-दिन कुछ और नहीं करता था। न तप के लिए इतना प्रयत्न करता था, न नैवेद्य के लिए किसी प्रकार।

श्लोक 12 (skanda.7.391.12)

न पुष्पे धूपदाने च प्रदक्षिणापरः सदा । केनचित्त्वथ कालेन मुनयोऽत्र समागताः

na puṣpe dhūpadāne ca pradakṣiṇāparaḥ sadā | kenacittvatha kālena munayo'tra samāgatāḥ

न फूल और धूप अर्पित करने में, वह सदा केवल परिक्रमा में ही तत्पर रहता था। किसी समय वहाँ मुनि एकत्र हुए।

श्लोक 13 (skanda.7.391.13)

नारदः शौनकश्चैव हारीतो देवलस्तथा । गालवः कपिलो नंदः सुहोत्रः कश्यपो नृपः

nāradaḥ śaunakaścaiva hārīto devalastathā | gālavaḥ kapilo nandaḥ suhotraḥ kaśyapo nṛpaḥ

नारद, शौनक, हारीत, देवल, गालव, कपिल, नन्द, सुहोत्र तथा राजा कश्यप।

श्लोक 14 (skanda.7.391.14)

एते चान्ये च बहवो देवव्रतपरायणाः । केचित्स्नानं कारयंति तस्य लिंगस्य भक्तितः

ete cānye ca bahavo devavrataparāyaṇāḥ | kecitsnānaṁ kārayanti tasya liṅgasya bhaktitaḥ

ये और अन्य अनेक देव-व्रत में तत्पर मुनि थे। उनमें से कुछ भक्तिपूर्वक उस लिंग को स्नान करा रहे थे।

श्लोक 15 (skanda.7.391.15)

अन्ये च विविधां पूजां जपमन्ये समाहिताः । एके नृत्यंति राजेंद्र गायंति च तथा परे

anye ca vividhāṁ pūjāṁ japamanye samāhitāḥ | eke nṛtyanti rājendra gāyanti ca tathā pare

कुछ अन्य विविध पूजा में लगे थे, कुछ एकाग्रचित्त होकर जप कर रहे थे। हे राजेन्द्र, कुछ नृत्य कर रहे थे और कुछ गा रहे थे।

श्लोक 16 (skanda.7.391.16)

बलिमन्ये प्रयच्छंति स्तुतिं कुर्वंति चापरे । अथाश्चर्यं परं दृष्ट्वा प्रदक्षिणापरं नृपम्

balimanye prayacchanti stutiṁ kurvanti cāpare | athāścaryaṁ paraṁ dṛṣṭvā pradakṣiṇāparaṁ nṛpam

कुछ बलि अर्पित कर रहे थे और कुछ स्तुति कर रहे थे। तब उन्होंने उस राजा को केवल परिक्रमा में तत्पर देखकर बड़ा आश्चर्य किया।

श्लोक 17 (skanda.7.391.17)

परं कौतुकमापन्ना वाक्यमेतदथाब्रुवन् । प्रदक्षिणासमुद्भूतं कारणं ज्ञातुमिच्छवः

paraṁ kautukamāpannā vākyametadathābruvan | pradakṣiṇāsamudbhūtaṁ kāraṇaṁ jñātumicchavaḥ

बड़े कुतूहल से भरकर उन्होंने यह वचन कहा, वे परिक्रमा से उत्पन्न हुए कारण को जानना चाहते थे।

श्लोक 18 (skanda.7.391.18)

ऋषय ऊचुः । कस्मात्त्वं पार्थिवश्रेष्ठ प्रदक्षिणापरः सदा । देवस्यास्य विशेषेण सत्यं नो वक्तुमर्हसि

ṛṣaya ūcuḥ | kasmāttvaṁ pārthivaśreṣṭha pradakṣiṇāparaḥ sadā | devasyāsya viśeṣeṇa satyaṁ no vaktumarhasi

ऋषियों ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तुम इस देव की क्यों सदा केवल परिक्रमा में ही तत्पर रहते हो? हमें सत्य बताने की कृपा करो।

श्लोक 19 (skanda.7.391.19)

न ददासि जलं लिंगे प्रभूतं सुमनोहरम् । पुष्पधूपादिकं वाथ स्तोत्राणि विविधानि च

na dadāsi jalaṁ liṅge prabhūtaṁ sumanoharam | puṣpadhūpādikaṁ vātha stotrāṇi vividhāni ca

तुम इस लिंग को प्रचुर सुन्दर जल भी नहीं चढ़ाते, न फूल-धूप आदि, न विविध स्तोत्र।

श्लोक 20 (skanda.7.391.20)

समर्थोऽसि तथान्येषां दानानां त्वं महीपते । एतन्नः कौतुकं सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि

samartho'si tathānyeṣāṁ dānānāṁ tvaṁ mahīpate | etannaḥ kautukaṁ sarvaṁ yathāvadvaktumarhasi

हे महीपते, तुम अन्य दान देने में भी समर्थ हो। कृपा करके हमारा यह पूरा कुतूहल यथावत् दूर करो।

श्लोक 21 (skanda.7.391.21)

वेणुरुवाच । यदहं संप्रवक्ष्यामि श्रूयतां द्विजसत्तमाः । पूर्वदेहांतरे वृत्तं सर्वं सत्यं विशेषतः

veṇuruvāca | yadahaṁ saṁpravakṣyāmi śrūyatāṁ dvijasattamāḥ | pūrvadehāṁtare vṛttaṁ sarvaṁ satyaṁ viśeṣataḥ

वेणु ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठो, जो मैं कहने जा रहा हूँ उसे सुनिए, यह मेरे पूर्व जन्म में घटित सब कुछ पूर्णतः सत्य है।

श्लोक 22 (skanda.7.391.22)

प्रासादेऽस्मिन्पुरा पक्षी शुकोऽहं स्थितवांस्तदा । कृतवांश्च तदा देवं प्रदक्षिणामहर्निशम्

prāsāde'sminpurā pakṣī śuko'haṁ sthitavāṁstadā | kṛtavāṁśca tadā devaṁ pradakṣiṇāmaharniśam

पूर्वकाल में इस मन्दिर में मैं एक तोता पक्षी के रूप में रहता था। मैं उस समय देवता की दिन-रात परिक्रमा किया करता था।

श्लोक 23 (skanda.7.391.23)

कृपयाऽस्य प्रभावाच्च जातो जातिस्मरस्त्वहम् । अधुना परया भक्त्या यत्करोमि प्रदक्षिणाम्

kṛpayā'sya prabhāvācca jāto jātismarastvaham | adhunā parayā bhaktyā yatkaromi pradakṣiṇām

उसी की कृपा और प्रभाव से मैं जातिस्मर होकर उत्पन्न हुआ। अब मैं परम भक्ति से यह परिक्रमा करता हूँ।

श्लोक 24 (skanda.7.391.24)

न जाने किं फलं मेऽद्य देवस्यास्य प्रसादतः । एतस्मात्कारणाच्चाहं नान्यत्किंचित्करोमि भोः

na jāne kiṁ phalaṁ me'dya devasyāsya prasādataḥ | etasmātkāraṇāccāhaṁ nānyatkiṁcitkaromi bhoḥ

मुझे नहीं मालूम कि आज इस देवता की कृपा से मुझे क्या फल मिलने वाला है। इसी कारण से मैं और कुछ नहीं करता, हे सज्जनो।

श्लोक 25 (skanda.7.391.25)

पुलस्त्य उवाच । वेणुवाक्यं ततः श्रुत्वा मुनयः शंसितव्रताः । विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधुसाध्विति चाब्रुवन्

pulastya uvāca | veṇuvākyaṁ tataḥ śrutvā munayaḥ śaṁsitavratāḥ | vismayotphullanayanāḥ sādhusādhviti cābruvan

पुलस्त्य ने कहा - तब वेणु के वचन सुनकर उन व्रतपरायण मुनियों ने आश्चर्य से भरी आँखों से "साधु-साधु" कहा।

श्लोक 26 (skanda.7.391.26)

ततः प्रदक्षिणपराः सर्वे तत्र महर्षयः । बभूवुर्मुनयः सर्वे श्रद्धया परया युताः

tataḥ pradakṣiṇaparāḥ sarve tatra maharṣayaḥ | babhūvurmunayaḥ sarve śraddhayā parayā yutāḥ

तब वहाँ सभी महर्षि परिक्रमा में तत्पर हो गए, और सभी मुनि परम श्रद्धा से युक्त हो गए।

श्लोक 27 (skanda.7.391.27)

सोऽपि राजा महाभागो वेणुः शंभोः प्रसादतः । शाश्वतं स्थानमापन्नो दुर्ल्लभं त्रिदशैरपि

so'pi rājā mahābhāgo veṇuḥ śambhoḥ prasādataḥ | śāśvataṁ sthānamāpanno durllabhaṁ tridaśairapi

वह महाभाग राजा वेणु भी शम्भु की कृपा से शाश्वत स्थान को प्राप्त हुआ, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

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