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प्रभास खण्ड · अध्याय 392

भद्रकर्णह्रद त्रिनेत्र-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 391अध्याय-सूचीअध्याय 393

श्लोक 1 (skanda.7.392.1)

पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ भद्रकर्णं महाह्रदम् । त्रिनेत्राभाः शिला यत्र दृश्यंतेऽद्यापि भूरिशः

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha bhadrakarṇaṁ mahāhradam | trinetrābhāḥ śilā yatra dṛśyante'dyāpi bhūriśaḥ

पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब भद्रकर्ण नामक महान सरोवर में जाना चाहिए, जहाँ आज भी त्रिनेत्र के समान प्रतीत होने वाली अनेक शिलाएँ दिखाई देती हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.392.2)

तस्यैव पश्चिमे भागे लिंगमस्ति पिनाकिनः । यं दृष्ट्वा मानवस्तत्र त्रिनेत्रसदृशो भवेत्

tasyaiva paścime bhāge liṅgamasti pinākinaḥ | yaṁ dṛṣṭvā mānavastatra trinetrasadṛśo bhavet

उसी सरोवर के पश्चिमी भाग में पिनाकधारी का लिंग है, जिसे देखकर वहाँ मनुष्य त्रिनेत्र के समान हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.392.3)

भद्रकर्णगणोनाम पुरासीच्छिववल्लभः । तेनात्र स्थापितं लिंगं ह्रदश्चैव विनिर्मितः

bhadrakarṇagaṇo nāma purāsīcchivavallabhaḥ | tenātra sthāpitaṁ liṅgaṁ hradaścaiva vinirmitaḥ

पूर्वकाल में भद्रकर्ण नामक शिव के प्रिय गण थे। उन्होंने ही यहाँ इस लिंग की स्थापना की और इस सरोवर का निर्माण किया।

श्लोक 4 (skanda.7.392.4)

केनचित्त्वथ कालेन संग्रामे दानवैः सह । युयुधे पुरतः शंभोर्नानागणसमन्वितः

kenacittvatha kālena saṁgrāme dānavaiḥ saha | yuyudhe purataḥ śambhornānāgaṇasamanvitaḥ

किसी समय शंभु के सामने अनेक गणों के साथ मिलकर उसने दानवों के साथ युद्ध किया।

श्लोक 5 (skanda.7.392.5)

नष्टे स्कंदे हते सैन्ये वीरभद्रे पराजिते । गतास्ते भयसंत्रस्ता महाकाले विनिर्जिते

naṣṭe skande hate sainye vīrabhadre parājite | gatāste bhayasaṁtrastā mahākāle vinirjite

जब स्कन्द पराजित हुए, सेना मारी गई, वीरभद्र हार गए, और महाकाल भी परास्त हो गए, तब वे सभी भय से त्रस्त होकर वहाँ से चले गए।

श्लोक 6 (skanda.7.392.6)

बलवान्नमुचिर्नाम दानवो बलवत्तरः । खड्गचर्मधरः शीघ्रं महेश्वरमुपाद्रवत्

balavānnamucirnāma dānavo balavattaraḥ | khaḍgacarmadharaḥ śīghraṁ maheśvaramupādravat

नमुचि नामक एक अत्यन्त बलवान दानव था। तलवार और ढाल धारण किए हुए वह शीघ्रता से महेश्वर पर आक्रमण करने दौड़ा।

श्लोक 7 (skanda.7.392.7)

भद्रकर्णस्तु तं दृष्ट्वा दानवं तदनंतरम् । पतंतं संमुखस्तस्य तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्

bhadrakarṇastu taṁ dṛṣṭvā dānavaṁ tadanaṁtaram | patantaṁ saṁmukhastasya tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

तब भद्रकर्ण ने उस दानव को देखकर, उसके सामने आकर आक्रमण करते हुए उससे कहा - रुको, रुको!

श्लोक 8 (skanda.7.392.8)

छित्त्वाऽसिमसिना तस्य चर्म चापि महाबलः । स्तनयोरंतरे दैत्यं कोपाविष्टोऽहनन्नृप

chittvā'simasinā tasya carma cāpi mahābalaḥ | stanayoraṁtare daityaṁ kopāviṣṭo'hanannṛpa

उस महाबली ने तलवार से उसकी ढाल काट दी और क्रोध से भरकर उस दैत्य को उसकी छाती के बीच में मार डाला।

श्लोक 9 (skanda.7.392.9)

अथासौ निहतस्तेन प्रविश्य विपुलं तमः । निपपात महीपृष्ठे वायुभग्न इव द्रुमः । वधं प्राप्तस्तु दैत्योऽसौ नत्वा हरमसौ स्थितः । सत्ये स्थितं च तं दृष्ट्वा ततस्तुष्टो महेश्वरः

athāsau nihatastena praviśya vipulaṁ tamaḥ | nipapāta mahīpṛṣṭhe vāyubhagna iva drumaḥ | vadhaṁ prāptastu daityo'sau natvā haramasau sthitaḥ | satye sthitaṁ ca taṁ dṛṣṭvā tatastuṣṭo maheśvaraḥ

तब वह दैत्य उससे मारा जाकर घोर अंधकार में प्रवेश करते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा, जैसे वायु से टूटा वृक्ष गिरता है। मृत्यु को प्राप्त होते हुए भी वह दैत्य हर को नमस्कार करके स्थित हुआ। उसे सत्य में स्थित देखकर महेश्वर प्रसन्न हुए।

श्लोक 10 (skanda.7.392.10)

श्रीभगवानुवाच । तव वीर्येण संतुष्टो धर्मेण च विशेषतः । वरं वरय भद्रं ते नित्यं यो हृदये स्थितः

śrībhagavānuvāca | tava vīryeṇa saṁtuṣṭo dharmeṇa ca viśeṣataḥ | varaṁ varaya bhadraṁ te nityaṁ yo hṛdaye sthitaḥ

भगवान ने कहा - मैं तुम्हारे पराक्रम से और विशेष रूप से तुम्हारे धर्म से संतुष्ट हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, जो सदा मेरे हृदय में स्थित है, उसे वर के रूप में माँगो।

श्लोक 11 (skanda.7.392.11)

भद्रकर्णं उवाच । यन्मया स्थापितं लिंगमर्बुदे सुरसत्तम । अत्रास्तु तव सांनिध्यं ह्रदेऽस्मिंश्च स्थिरो भव

bhadrakarṇamuvāca | yanmayā sthāpitaṁ liṅgamarbude surasattama | atrāstu tava sāṁnidhyaṁ hrade'sminśca sthiro bhava

भद्रकर्ण ने कहा - हे देवश्रेष्ठ, अर्बुद में जो लिंग मैंने स्थापित किया है, उसमें आपकी सांनिध्य बनी रहे, और आप इस सरोवर में स्थिर होकर रहें।

श्लोक 12 (skanda.7.392.12)

श्रीभगवानुवाच । माघमासे चतुर्द्दश्यां कृष्णपक्षे सदा मम । सांनिध्यं च विशेषेण ह्रदे लिंगे भविष्यति

śrībhagavānuvāca | māghamāse caturddaśyāṁ kṛṣṇapakṣe sadā mama | sāṁnidhyaṁ ca viśeṣeṇa hrade liṅge bhaviṣyati

भगवान ने कहा - माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को इस सरोवर और लिंग में मेरी सांनिध्य विशेष रूप से सदा बनी रहेगी।

श्लोक 13 (skanda.7.392.13)

भद्रकर्णह्रदे स्नात्वा त्रिनेत्रं यः समाहितः । द्रक्ष्यते स तु मे स्थानं शाश्वतं यास्यति धुवम्

bhadrakarṇahrade snātvā trinetraṁ yaḥ samāhitaḥ | drakṣyate sa tu me sthānaṁ śāśvataṁ yāsyati dhruvam

जो व्यक्ति भद्रकर्ण सरोवर में स्नान करके एकाग्रचित्त होकर त्रिनेत्र का दर्शन करेगा, वह निश्चय ही मेरे शाश्वत स्थान को प्राप्त होगा।

श्लोक 14 (skanda.7.392.14)

तस्मात्सर्वत्र यत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत् । पूजयित्वा च तल्लिंगं शिवलोकं स गच्छति

tasmātsarvatra yatnena snānaṁ tatra samācaret | pūjayitvā ca talliṅgaṁ śivalokaṁ sa gacchati

इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिए। उस लिंग की पूजा करके मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है।

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