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प्रभास खण्ड · अध्याय 393

केदार-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 392अध्याय-सूचीअध्याय 394

श्लोक 1 (skanda.7.393.1)

पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । केदारमिति विख्यातं सर्वपापहरं नृणाम्

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha tīrthaṁ trailokyaviśrutam | kedāramiti vikhyātaṁ sarvapāpaharaṁ nṛṇām

पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब त्रैलोक्य में विख्यात, केदार नाम से प्रसिद्ध, मनुष्यों के सभी पापों का नाश करने वाले तीर्थ में जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.393.2)

यत्र मन्दाकिनी पुण्या सरस्वत्या समागता । तत्र स्नातो नरो राजन्मुच्यते सर्वकिल्बिषैः

yatra mandākinī puṇyā sarasvatyā samāgatā | tatra snāto naro rājanmucyate sarvakilbiṣaiḥ

जहाँ पुण्य मन्दाकिनी सरस्वती से मिलती है, वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य, हे राजन, सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.393.3)

शृणु राजन्यथावृत्तमितिहासं पुरातनम् । ऋषिभिर्बहुधा गीतमर्बुदे पर्वतोत्तमे

śṛṇu rājanyathāvṛttamitihāsaṁ purātanam | ṛṣibhirbahudhā gītamarbude parvatottame

हे राजन, वह प्राचीन इतिहास सुनिए, जैसा घटित हुआ था, जिसे ऋषियों ने अर्बुद पर्वतश्रेष्ठ पर अनेक प्रकार से गाया है।

श्लोक 4 (skanda.7.393.4)

अजपालो नृपश्रेष्ठः सूर्यवंशसमुद्भवः । सप्तद्वीपवतीं पृथ्वीं स पाति नात्र संशयः

ajapālo nṛpaśreṣṭhaḥ sūryavaṁśasamudbhavaḥ | saptadvīpavatīṁ pṛthvīṁ sa pāti nātra saṁśayaḥ

अजपाल नामक राजश्रेष्ठ सूर्यवंश में उत्पन्न हुआ था। वह सातों द्वीपों वाली पृथ्वी का पालन करता था, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 5 (skanda.7.393.5)

न हस्तिनो न पादाता न चाश्वास्तस्य भूपतेः । न रथाश्च महाराज न कोशाश्च तथाविधाः

na hastino na pādātā na cāśvāstasya bhūpateḥ | na rathāśca mahārāja na kośāśca tathāvidhāḥ

उस राजा के पास न हाथी थे, न पैदल सैनिक, न घोड़े। हे महाराज, न रथ थे और न ही उस प्रकार का कोष था।

श्लोक 6 (skanda.7.393.6)

न गृह्णाति करं राजन्प्रजाभ्योथाधिकं नृप । राज्यं स ईदृशं चक्रे सर्वलोकहिते रतः

na gṛhṇāti karaṁ rājanprajābhyothādhikaṁ nṛpa | rājyaṁ sa īdṛśaṁ cakre sarvalokahite rataḥ

हे राजन, वह प्रजा से आवश्यकता से अधिक कर नहीं लेता था। वह सभी लोकों के हित में रत रहकर इस प्रकार राज्य करता था।

श्लोक 7 (skanda.7.393.7)

जातापराधो भूपृष्ठे जायते चेत्कथंचन । तं गत्वा निग्रहं तस्य चक्रुः शस्त्राणि तत्क्षणात्

jātāparādho bhūpṛṣṭhe jāyate cetkathaṁcana | taṁ gatvā nigrahaṁ tasya cakruḥ śastrāṇi tatkṣaṇāt

यदि पृथ्वी पर कहीं कोई अपराध हो जाता, तो उसके पास जाकर स्वयं शस्त्र ही उसी क्षण उसका निग्रह कर देते थे।

श्लोक 8 (skanda.7.393.8)

एवमस्य नरेन्द्रस्य वर्त्तमानस्य भूतले । सुखेन रमते लोको राज्ये निहतकंटके

evamasya narendrasya varttamānasya bhūtale | sukhena ramate loko rājye nihatakaṇṭake

इस प्रकार इस नरेन्द्र के पृथ्वी पर शासन करते हुए, लोग निष्कण्टक राज्य में सुखपूर्वक विहार करते थे।

श्लोक 9 (skanda.7.393.9)

कामं वर्षति पर्जन्यः सस्यानि रसवंति च । गावः प्रभूतदुग्धाश्च विद्यमाने नराधिपे

kāmaṁ varṣati parjanyaḥ sasyāni rasavaṁti ca | gāvaḥ prabhūtadugdhāśca vidyamāne narādhipe

उस राजा के रहते हुए, इच्छानुसार वर्षा होती थी, अन्न रसीला होता था, और गौएँ भरपूर दूध देती थीं।

श्लोक 10 (skanda.7.393.10)

केनचित्त्वथ कालेन वसिष्ठो भगवान्मुनिः । तीर्थयात्राप्रसंगेन तस्य गेहमुपागतः

kenacittvatha kālena vasiṣṭho bhagavānmuniḥ | tīrthayātrāprasaṅgena tasya gehamupāgataḥ

किसी समय भगवान मुनि वसिष्ठ तीर्थयात्रा के प्रसंग में उसके घर पधारे।

श्लोक 11 (skanda.7.393.11)

तं दृष्ट्वा पूजयामास शास्त्रदृष्टेन वर्त्मना । प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यामर्घ्यपाद्यादिभिस्तथा

taṁ dṛṣṭvā pūjayāmāsa śāstradṛṣṭena vartmanā | pratyutthānābhivādābhyāmarghyapādyādibhistathā

उसे देखकर राजा ने शास्त्रोक्त विधि से उसकी पूजा की - उठकर अभिवादन करके, अर्घ्य-पाद्य आदि से।

श्लोक 12 (skanda.7.393.12)

एवं संपूजितस्तेन भक्त्या परमया नृप । सुखोपविष्टो विश्रांतो वसिष्ठो मुनिसत्तमः । राजर्षीणां कथाश्चक्रे देवर्षीणां तथैव च

evaṁ saṁpūjitastena bhaktyā paramayā nṛpa | sukhopaviṣṭo viśrāṁto vasiṣṭho munisattamaḥ | rājarṣīṇāṁ kathāścakre devarṣīṇāṁ tathaiva ca

हे राजन, इस प्रकार परम भक्ति से पूजित, आराम से बैठे, विश्राम कर चुके मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ ने राजर्षियों और देवर्षियों की कथाएँ कहीं।

श्लोक 13 (skanda.7.393.13)

ततः कथावसाने तु कस्मिंश्चिन्नृपसत्तम । पप्रच्छ विनयोपेतस्तं मुनिं शंसितव्रतम्

tataḥ kathāvasāne tu kasmiṁścinnṛpasattama | papraccha vinayopetastaṁ muniṁ śaṁsitavratam

हे राजश्रेष्ठ, तब कथा के अन्त में किसी विषय पर विनम्रतापूर्वक राजा ने उस व्रतनिष्ठ मुनि से प्रश्न पूछा।

श्लोक 14 (skanda.7.393.14)

अजपाल उवाच । अतीतानागतं विप्र वर्त्तमानं तथैव च । त्वं वेत्सि सकलं ब्रह्मंस्तपश्चर्याप्रभावतः

ajapāla uvāca | atītānāgataṁ vipra varttamānaṁ tathaiva ca | tvaṁ vetsi sakalaṁ brahmaṁstapaścaryāprabhāvataḥ

अजपाल ने कहा - हे विप्र, भूत, भविष्य और वर्तमान - सब कुछ आप अपने तपस्या के प्रभाव से जानते हैं, हे ब्रह्मन्।

श्लोक 15 (skanda.7.393.15)

कौतुकं हृदि मे जातं वर्त्तते मुनिपुंगव । प्रसादः क्रियतां मह्यं कथयस्व प्रसादतः

kautukaṁ hṛdi me jātaṁ varttate munipuṅgava | prasādaḥ kriyatāṁ mahyaṁ kathayasva prasādataḥ

हे मुनिश्रेष्ठ, मेरे मन में एक कुतूहल उत्पन्न हुआ है। मुझ पर कृपा कीजिए और अपनी कृपा से मुझे बताइए।

श्लोक 16 (skanda.7.393.16)

वसिष्ठ उवाच । ब्रूहि पार्थिवशार्दूल यत्ते मनसि वर्त्तते । कथयिष्यामि तत्सर्वं यद्यपि स्यात्सुदुर्ल्लभम्

vasiṣṭha uvāca | brūhi pārthivaśārdūla yatte manasi varttate | kathayiṣyāmi tatsarvaṁ yadyapi syātsudurllabham

वसिष्ठ जी ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, जो कुछ तुम्हारे मन में है, कहो। मैं वह सब बताऊँगा, भले ही वह अत्यन्त दुर्लभ हो।

श्लोक 17 (skanda.7.393.17)

राजोवाच । केन कर्मविपाकेन ममैतद्राज्यमुत्तमम् । निष्कण्टकं सदा क्षेमं सर्वकामसमन्वितम्

rājovāca | kena karmavipākena mamaitadrājyamuttamam | niṣkaṇṭakaṁ sadā kṣemaṁ sarvakāmasamanvitam

राजा ने कहा - किस कर्म के फल से मेरा यह उत्तम राज्य निष्कण्टक, सदा कुशलक्षेम से युक्त और सभी कामनाओं से पूर्ण है?

श्लोक 18 (skanda.7.393.18)

न दीनो न च दुःखार्त्तो व्याधिग्रस्तो न कोऽपि च । विद्यते मम राज्ये च न दरिद्रो महामुने

na dīno na ca duḥkhārtto vyādhigrasto na ko'pi ca | vidyate mama rājye ca na daridro mahāmune

हे महामुने, मेरे राज्य में न कोई दीन है, न कोई दुःखी है, न कोई रोगग्रस्त है, न कोई निर्धन है।

श्लोक 19 (skanda.7.393.19)

नारीयं मम साध्वी च प्राणेभ्योऽपि गरीयसी । मच्चित्ता मद्गतप्राणा नित्यं मम हिते रता । अनया चिंतितं ब्रह्मन्सर्वं विस्तरतो वद

nārīyaṁ mama sādhvī ca prāṇebhyo'pi garīyasī | maccittā madgataprāṇā nityaṁ mama hite ratā | anayā ciṁtitaṁ brahmansarvaṁ vistarato vada

यह मेरी साध्वी पत्नी मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। वह मन-वचन-कर्म से मुझमें ही लीन है, प्राणों तक मुझ में स्थित है, सदा मेरे हित में रत रहती है। हे ब्रह्मन्, उसने भी जो सोचा है, वह सब भी मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 20 (skanda.7.393.20)

किं दानस्य प्रभावेन व्रतयागस्य वा मुने । तपसो वा मुनिश्रेष्ठ व्रतस्य नियमस्य च

kiṁ dānasya prabhāveṇa vratayāgasya vā mune | tapaso vā muniśreṣṭha vratasya niyamasya ca

हे मुने, क्या यह दान के प्रभाव से है, व्रत-यज्ञ से है, या हे मुनिश्रेष्ठ, तप से, व्रत से या नियम से?

श्लोक 21 (skanda.7.393.21)

जन्मान्तरकृतं पुण्यं परं कौतूहलं हि मे । कथयस्व प्रसादेन विस्तरेण द्विजोत्तम

janmāntarakṛtaṁ puṇyaṁ paraṁ kautūhalaṁ hi me | kathayasva prasādena vistareṇa dvijottama

पूर्व जन्म में किया गया वह पुण्य - इसमें मुझे बड़ी उत्सुकता है। हे द्विजश्रेष्ठ, कृपापूर्वक विस्तार से बताइए।

श्लोक 22 (skanda.7.393.22)

वसिष्ठ उवाच । शृणु सर्वं महीपाल विस्तरेण च कथ्यते । न च मन्युस्त्वया कार्यो न च व्रीडा महामते

vasiṣṭha uvāca | śṛṇu sarvaṁ mahīpāla vistareṇa ca kathyate | na ca manyustvayā kāryo na ca vrīḍā mahāmate

वसिष्ठ जी ने कहा - हे राजन, सब कुछ सुनो, मैं विस्तार से कहूँगा। हे महामते, तुम्हें इस पर क्रोध या लज्जा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.7.393.23)

अन्यदेहांतरे राजञ्छूद्रजातिसमुद्भवः । शूद्रजातिरियं साध्वी तव पत्नी ह्यभूत्पुरा

anyadehāntare rājañchūdrajātisamudbhavaḥ | śūdrajātiriyaṁ sādhvī tava patnī hyabhūtpurā

हे राजन, पूर्व देह में तुम शूद्र जाति में उत्पन्न हुए थे, और यह तुम्हारी साध्वी पत्नी भी पूर्वकाल में शूद्र जाति की थी।

श्लोक 24 (skanda.7.393.24)

केनचित्त्वथ कालेन दुर्भिक्षे समुपस्थिते । अन्नक्षयान्महाराज सर्वलोकः क्षुधार्दितः

kenacittvatha kālena durbhikṣe samupasthite | annakṣayānmahārāja sarvalokaḥ kṣudhārditaḥ

किसी समय जब भीषण अकाल पड़ा, तो अन्न के अभाव में, हे महाराज, समस्त लोक भूख से पीड़ित हो गया।

श्लोक 25 (skanda.7.393.25)

ततस्त्वं भार्यया सार्द्धमन्यदेशांतरे गतः । समारुह्य च कृच्छ्रेण कस्मिंश्चिद्गिरिनिर्झरे

tatastvaṁ bhāryayā sārddhamanyadeśāntare gataḥ | samāruhya ca kṛcchreṇa kasmiṁścidgirinirjhare

तब तुम अपनी पत्नी के साथ किसी दूसरे देश को गए। कठिनाई से चढ़ते हुए तुम किसी पर्वतीय झरने पर पहुँचे।

श्लोक 26 (skanda.7.393.26)

त्वया दृष्टं मनोहारि शुभं पंकजकाननम् । तत्र स्नात्वा पयः पीत्वा पितृदेवाः प्रतर्पिताः

tvayā dṛṣṭaṁ manohāri śubhaṁ paṁkajakānanam | tatra snātvā payaḥ pītvā pitṛdevāḥ pratarpitāḥ

तुमने वहाँ एक मनोहर, शुभ कमलवन देखा। वहाँ स्नान करके, जल पीकर, तुमने पितरों और देवताओं का तर्पण किया।

श्लोक 27 (skanda.7.393.27)

मनसा चिंतितं ह्येतत्पद्मान्यादाय करोम्यहम् । विक्रयं येन चाहारो भवेन्मम च सर्वथा

manasā ciṁtitaṁ hyetatpadmānyādāya karomyaham | vikrayaṁ yena cāhāro bhavenmama ca sarvathā

तुमने मन में सोचा - मैं ये कमल लेकर इनका विक्रय करूँगा, जिससे किसी भी प्रकार मुझे भोजन मिल सके।

श्लोक 28 (skanda.7.393.28)

ततः पद्मानि भूरीणि गृहीत्वा भार्यया सह । गतो यत्र जनो भूरि गतः पार्थिवसत्तम

tataḥ padmāni bhūrīṇi gṛhītvā bhāryayā saha | gato yatra jano bhūri gataḥ pārthivasattama

तब बहुत से कमल लेकर पत्नी के साथ, हे राजश्रेष्ठ, तुम वहाँ गए जहाँ बहुत से लोग जमा थे।

श्लोक 29 (skanda.7.393.29)

न केऽपि प्रतिगृह्णंति लोका दुर्भिक्षपीडिताः । भ्रमितस्त्वं च सर्वत्र श्रांतो वैराग्यमागतः

na ke'pi pratigṛhṇanti lokā durbhikṣapīḍitāḥ | bhramitastvaṁ ca sarvatra śrāṁto vairāgyamāgataḥ

भूख से पीड़ित लोगों में से कोई भी उन्हें खरीदने को तैयार नहीं हुआ। तुम सब जगह भटकते रहे, थक गए, और वैराग्य को प्राप्त हुए।

श्लोक 30 (skanda.7.393.30)

ततो दिनावसाने तु गुहामेकां समाश्रितः । भूमौ पद्मानि निक्षिप्य क्षुधाविष्टः प्रसुप्तवान्

tato dināvasāne tu guhāmekāṁ samāśritaḥ | bhūmau padmāni nikṣipya kṣudhāviṣṭaḥ prasuptavān

तब दिन के अन्त में तुमने एक गुफा का सहारा लिया। भूमि पर कमल रखकर, भूख से व्याकुल होकर तुम सो गए।

श्लोक 31 (skanda.7.393.31)

एतस्मिन्नेव काले तु कर्णयोस्ते समागतः । पठतां द्विजमुख्यानां ध्वनिर्वेदपुराणयोः

etasminneva kāle tu karṇayoste samāgataḥ | paṭhatāṁ dvijamukhyānāṁ dhvanirvedapurāṇayoḥ

उसी समय तुम्हारे कानों में श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा वेद-पुराण पढ़ने की ध्वनि पहुँची।

श्लोक 32 (skanda.7.393.32)

तं श्रुत्वा सहसोत्थाय ज्ञात्वा जागरणं ततः । पद्मान्यादाय तत्रैव सभार्यः शिवमंदिरे

taṁ śrutvā sahasotthāya jñātvā jāgaraṇaṁ tataḥ | padmānyādāya tatraiva sabhāryaḥ śivamandire

उसे सुनकर तुम तुरन्त उठ खड़े हुए, और यह जानकर कि वहाँ जागरण हो रहा है, कमल लेकर पत्नी सहित वहीं शिव मन्दिर में गए।

श्लोक 33 (skanda.7.393.33)

तत्र नागवती वेश्या शिवरात्रिपरायणा । केदारे परया भक्त्या करोति निशि जागरम्

tatra nāgavatī veśyā śivarātriparāyaṇā | kedāre parayā bhaktyā karoti niśi jāgaram

वहाँ नागवती नाम की एक वेश्या थी, जो शिवरात्रि में तत्पर रहती थी। वह केदार में परम भक्ति से रात्रि-जागरण करती थी।

श्लोक 34 (skanda.7.393.34)

तस्याः पार्श्वे स्थिता दासी त्वया पृष्टा नरेश्वर । देवस्य पुरतो बाले किमर्थं रात्रिजागरम्

tasyāḥ pārśve sthitā dāsī tvayā pṛṣṭā nareśvara | devasya purato bāle kimarthaṁ rātrijāgaram

उसके पास खड़ी उसकी दासी से, हे नरेश्वर, तुमने पूछा - हे बालिके, इस देवता के सामने रात्रि-जागरण किसलिए है?

श्लोक 35 (skanda.7.393.35)

तयोक्तं शिवरात्र्यां वै वेश्येयं वरवर्णिनी । कुरुते नागवती नाम रात्रौ भक्त्या च जागरम्

tayoktaṁ śivarātryāṁ vai veśyeyaṁ varavarṇinī | kurute nāgavatī nāma rātrau bhaktyā ca jāgaram

उसने कहा - शिवरात्रि के अवसर पर यह सुन्दर वेश्या, जिसका नाम नागवती है, रात्रि में भक्तिपूर्वक जागरण करती है।

श्लोक 36 (skanda.7.393.36)

यः श्रद्धाभक्तिसंयुक्तः कुरुते रात्रिजागरम् । पूजयित्वा महादेवं स याति परमं पदम्

yaḥ śraddhābhaktisaṁyuktaḥ kurute rātrijāgaram | pūjayitvā mahādevaṁ sa yāti paramaṁ padam

जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति से युक्त होकर रात्रि-जागरण करता है और महादेव की पूजा करता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 37 (skanda.7.393.37)

कृत्वोपवासं पद्मैर्य्यः पूजयेत्त्र्यंबकं नरः । स याति रुद्रसालोक्यं सेव्यमानोऽप्सरोगणैः

kṛtvopavāsaṁ padmairyaḥ pūjayettryambakaṁ naraḥ | sa yāti rudrasālokyaṁ sevyamāno'psarogaṇaiḥ

जो व्यक्ति उपवास करके कमलों से त्र्यम्बक की पूजा करता है, वह अप्सरागणों द्वारा सेवित होकर रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 38 (skanda.7.393.38)

सकामो लभते कामान्देवैरपि सुदुर्ल्लभान् । स त्वं पद्मानि मे देहि कांचनं च पलत्रयम् । एतेषां मूल्यमादाय प्राणाधारं समाचर

sakāmo labhate kāmāndevairapi sudurllabhān | sa tvaṁ padmāni me dehi kāṁcanaṁ ca palatrayam | eteṣāṁ mūlyamādāya prāṇādhāraṁ samācara

कामनायुक्त व्यक्ति भी वे कामनाएँ प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं। (उसने कहा) तुम मुझे अपने कमल दे दो, मैं तीन पल सोना दूँगी; इनका मूल्य लेकर अपने प्राणों की रक्षा (भोजन) कर लेना।

श्लोक 39 (skanda.7.393.39)

ततस्त्वं भार्यया चोक्तो गृह्यमाणे च कांचने । न ग्राह्यं मूल्यमेतेषां त्वया नाथ कथंचन

tatastvaṁ bhāryayā cokto gṛhyamāṇe ca kāṁcane | na grāhyaṁ mūlyametesāṁ tvayā nātha kathaṁcana

तब जब तुम वह सोना लेने ही वाले थे, तुम्हारी पत्नी ने कहा - हे नाथ, तुम्हें इनका मूल्य किसी भी प्रकार नहीं लेना चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.7.393.40)

उपवासो बलाज्जातो ह्यन्नाभावाद्वयोरपि । पद्मैरेभिर्हरः पूज्यो द्वाभ्यामेवाद्य निश्चयम्

upavāso balājjāto hyannābhāvādvayorapi | padmairebhirharaḥ pūjyo dvābhyāmevādya niścayam

हम दोनों का अन्न के अभाव में यह उपवास स्वतः ही हो गया है। इन्हीं कमलों से आज हम दोनों मिलकर हर की पूजा करें, यह निश्चित है।

श्लोक 41 (skanda.7.393.41)

इदं त्वयाऽद्य कर्त्तव्यं त्याज्यमस्यास्तु कांचनम् । भार्याया वचनं श्रुत्वा तैः पद्मैः पूजितः शिवः

idaṁ tvayā'dya karttavyaṁ tyājyamasyāstu kāṁcanam | bhāryāyā vacanaṁ śrutvā taiḥ padmaiḥ pūjitaḥ śivaḥ

तुम्हें आज यही करना चाहिए, इसका सोना त्याग दो। पत्नी का यह वचन सुनकर तुमने उन्हीं कमलों से शिव की पूजा की।

श्लोक 42 (skanda.7.393.42)

श्रद्धया च सभार्येण जागरं च शिवाग्रतः । कृतं त्वया महाराज भार्यया शिवमंदिरे

śraddhayā ca sabhāryeṇa jāgaraṁ ca śivāgrataḥ | kṛtaṁ tvayā mahārāja bhāryayā śivamandire

हे महाराज, श्रद्धापूर्वक पत्नी सहित तुमने शिव मन्दिर में शिव के सामने जागरण किया।

श्लोक 43 (skanda.7.393.43)

पुराणश्रवणं जातं तत्र पार्थिवसत्तम । शिवरात्र्यां महाराज पद्मैस्तु पूजितः शिवः

purāṇaśravaṇaṁ jātaṁ tatra pārthivasattama | śivarātryāṁ mahārāja padmaistu pūjitaḥ śivaḥ

हे राजश्रेष्ठ, वहाँ पुराण-श्रवण भी हुआ। हे महाराज, शिवरात्रि को कमलों से शिव की पूजा हुई।

श्लोक 44 (skanda.7.393.44)

केदारस्याग्रतो भक्त्या रात्रौ जागरणं तथा । कृतं त्वया महाराज एकाग्रेण च चेतसा

kedārasyāgrato bhaktyā rātrau jāgaraṇaṁ tathā | kṛtaṁ tvayā mahārāja ekāgreṇa ca cetasā

हे महाराज, इसी प्रकार तुमने केदार के सामने भक्तिपूर्वक और एकाग्रचित्त होकर रात्रि-जागरण किया।

श्लोक 45 (skanda.7.393.45)

ततः प्रभाते संजाते भिक्षां कृत्वा च पारणा । कृता त्वया महाराज शिवाग्रे सह भार्यया

tataḥ prabhāte saṁjāte bhikṣāṁ kṛtvā ca pāraṇā | kṛtā tvayā mahārāja śivāgre saha bhāryayā

तब प्रातःकाल होने पर भिक्षा माँगकर, हे महाराज, तुमने अपनी पत्नी सहित शिव के सामने व्रत का पारण किया।

श्लोक 46 (skanda.7.393.46)

ततः कालांतरेणैव कालधर्मं गतो भवान् । भार्येयं च त्वया सार्धं संप्रविष्टा हुताशनम्

tataḥ kālāntareṇaiva kāladharmaṁ gato bhavān | bhāryeyaṁ ca tvayā sārdhaṁ saṁpraviṣṭā hutāśanam

फिर कुछ समय बाद तुम काल के अधीन होकर मृत्यु को प्राप्त हुए। तुम्हारी यह पत्नी भी तुम्हारे साथ अग्नि में प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 47 (skanda.7.393.47)

ततो जाता महाराज दशार्णाधिपतेः सुता । वैदेहे नगरे राजा जातस्त्वं पार्थिवोत्तम

tato jātā mahārāja daśārṇādhipateḥ sutā | vaidehe nagare rājā jātastvaṁ pārthivottama

तब हे महाराज, वह दशार्ण देश के राजा की पुत्री बनकर जन्मी, और हे राजश्रेष्ठ, तुम विदेह नगर में राजा के रूप में जन्मे।

श्लोक 48 (skanda.7.393.48)

अजपाल इति ख्यातो नाम्ना च धरणीतले । सर्वेषां प्राणिनां त्वं च वल्लभो नृपसत्तम

ajapāla iti khyāto nāmnā ca dharaṇītale | sarveṣāṁ prāṇināṁ tvaṁ ca vallabho nṛpasattama

तुम "अजपाल" इस नाम से पृथ्वी पर विख्यात हुए। हे राजश्रेष्ठ, तुम सभी प्राणियों के प्रिय बने।

श्लोक 49 (skanda.7.393.49)

एतस्मात्कारणाज्जाता भार्येयं प्राणसंमता । भूयोऽपि तव संजाता यन्मां त्वं परिपृच्छसि

etasmātkāraṇājjātā bhāryeyaṁ prāṇasaṁmatā | bhūyo'pi tava saṁjātā yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi

इसी कारण यह प्राणों से भी प्रिय पत्नी तुम्हें पुनः प्राप्त हुई, जिसके विषय में तुमने मुझसे पूछा था।

श्लोक 50 (skanda.7.393.50)

तस्य देवस्य माहात्म्यात्केदारस्य महीपते । राज्यं ते सुखदं नृणां तथा निहतकण्टकम्

tasya devasya māhātmyātkedārasya mahīpate | rājyaṁ te sukhadaṁ nṛṇāṁ tathā nihatakaṇṭakam

हे राजन्, उस देवता केदार के माहात्म्य से ही तुम्हारा राज्य मनुष्यों के लिए सुखदायक और निष्कण्टक है।

श्लोक 51 (skanda.7.393.51)

प्राप्तं त्वया महाराज केदारस्य प्रसादतः । येन त्वं सैन्यहीनोऽपि पृथिवीं परिरक्षसि

prāptaṁ tvayā mahārāja kedārasya prasādataḥ | yena tvaṁ sainyahīno'pi pṛthivīṁ parirakṣasi

हे महाराज, यह सब तुमने केदार की कृपा से ही प्राप्त किया है, जिसके कारण तुम सेना के बिना भी पृथ्वी की रक्षा करते हो।

श्लोक 52 (skanda.7.393.52)

पुलस्त्य उवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा स राजा विस्मयान्वितः । गमनाय मतिं चक्रे केदारं प्रति भूमिपः

pulastya uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā sa rājā vismayānvitaḥ | gamanāya matiṁ cakre kedāraṁ prati bhūmipaḥ

पुलस्त्य ने कहा - उसका यह वचन सुनकर वह राजा आश्चर्यचकित हो गया, और उस भूपति ने केदार की ओर जाने का निश्चय किया।

श्लोक 53 (skanda.7.393.53)

स गत्वा पर्वते रम्ये पूजयित्वा च तं विभुम् । शिवरात्रिपरः सम्यग्वर्षेवर्षे बभूव ह

sa gatvā parvate ramye pūjayitvā ca taṁ vibhum | śivarātriparaḥ samyagvarṣevarṣe babhūva ha

वहाँ जाकर उस सुन्दर पर्वत पर उस प्रभु की पूजा करके वह हर वर्ष विधिपूर्वक शिवरात्रि व्रत में तत्पर रहने लगा।

श्लोक 54 (skanda.7.393.54)

पुत्रं राज्ये च संस्थाप्य ततोऽर्बुदमथागमत् । प्राप्तो मुक्तिं ततो भूयः सभार्यस्तत्प्रभावतः

putraṁ rājye ca saṁsthāpya tato'rbudamathāgamat | prāpto muktiṁ tato bhūyaḥ sabhāryastatprabhāvataḥ

अपने पुत्र को राज्य में स्थापित करके वह फिर अर्बुद आ गया, और वहाँ उसके प्रभाव से पत्नी सहित मुक्ति को प्राप्त हुआ।

श्लोक 55 (skanda.7.393.55)

एतत्ते सर्वमाख्यातं केदारस्य महीपते । माहात्म्यं शुभदं नृणां सर्वपापप्रणाशनम्

etatte sarvamākhyātaṁ kedārasya mahīpate | māhātmyaṁ śubhadaṁ nṛṇāṁ sarvapāpapraṇāśanam

हे राजन, तुम्हें यह केदार का सम्पूर्ण माहात्म्य बता दिया, जो मनुष्यों के लिए शुभदायक और सभी पापों का नाशक है।

श्लोक 56 (skanda.7.393.56)

माघफाल्गुनयोर्मध्ये कृष्णपक्षे चतुर्दशी । शिवरात्रिरिति ख्याता भूतलेऽस्मिन्महामते

māghaphālgunayormadhye kṛṣṇapakṣe caturdaśī | śivarātririti khyātā bhūtale'sminmahāmate

माघ और फाल्गुन मास के बीच कृष्णपक्ष की चतुर्दशी, हे महामते, इस पृथ्वी पर "शिवरात्रि" के नाम से विख्यात है।

श्लोक 57 (skanda.7.393.57)

तस्यां तु सर्वथा राजन्यात्रां तस्य समाचरेत् । केदारस्य महाराज प्रकुर्यात्पूजनं नृप

tasyāṁ tu sarvathā rājanyātrāṁ tasya samācaret | kedārasya mahārāja prakuryātpūjanaṁ nṛpa

हे राजन, उस दिन हर प्रकार से उसकी यात्रा करनी चाहिए। हे महाराज, उस दिन केदार की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 58 (skanda.7.393.58)

माघकृष्णचतुर्दश्यां यः कुर्यात्तत्र जागरम् । कृतोपवासो नृपते शिवलोकं स गच्छति

māghakṛṣṇacaturdaśyāṁ yaḥ kuryāttatra jāgaram | kṛtopavāso nṛpate śivalokaṁ sa gacchati

हे राजन, जो माघ की कृष्ण चतुर्दशी को वहाँ उपवास करके जागरण करता है, वह शिवलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 59 (skanda.7.393.59)

स्नात्वा गंगासरस्वत्योः संगमे सर्वकामदे । ये प्रपश्यन्ति केदारं ते यास्यंति परां गतिम्

snātvā gaṅgāsarasvatyoḥ saṅgame sarvakāmade | ye prapaśyanti kedāraṁ te yāsyanti parāṁ gatim

गंगा और सरस्वती के संगम में, जो सभी कामनाओं को पूर्ण करता है, स्नान करके जो लोग केदार का दर्शन करते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 60 (skanda.7.393.60)

कुण्डे केदारसंज्ञे यः प्रपिबेद्विमलं जलम् । सप्तपूर्वान्सप्त परान्पूर्वजांस्तारयेत्तु सः

kuṇḍe kedārasaṁjñe yaḥ prapibedvimalaṁ jalam | saptapūrvānsapta parānpūrvajāṁstārayettu saḥ

जो व्यक्ति केदार नामक कुण्ड का निर्मल जल पीता है, वह सात पूर्व और सात परवर्ती पीढ़ियों के पूर्वजों का उद्धार कर देता है।

श्लोक 61 (skanda.7.393.61)

यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्त्या परमया नृप । सोऽपि पापैर्विमुच्येत केदारस्य प्रभावतः

yaścaitacchṛṇuyānnityaṁ bhaktyā paramayā nṛpa | so'pi pāpairvimucyeta kedārasya prabhāvataḥ

हे राजन, जो व्यक्ति परम भक्ति से इसे सदा सुनता है, वह भी केदार के प्रभाव से पापों से मुक्त हो जाता है।

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