Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 394

कलियुग-प्रभाव से अर्बुदाचल पर सभी तीर्थों के आगमन का वर्णन

अध्याय 393अध्याय-सूचीअध्याय 395

श्लोक 1 (skanda.7.394.1)

ययातिरुवाच । केदारं श्रूयते ब्रह्मन्पर्वते च हिमाचले । गंगा तस्माद्विनिष्क्रान्ता प्रविष्टा पूर्वसागरम्

yayātiruvāca | kedāraṁ śrūyate brahmanparvate ca himācale | gaṅgā tasmādviniṣkrāntā praviṣṭā pūrvasāgaram

ययाति ने कहा - हे ब्रह्मन्, सुना जाता है कि केदार हिमाचल पर्वत पर है, जहाँ से गंगा निकलकर पूर्वी सागर में प्रवेश करती है।

श्लोक 2 (skanda.7.394.2)

तथा सरस्वती देवी चूतवृक्षाद्विनिर्गता । पश्चिमं सागरं प्राप्ता गृहीत्वा वडवानलम्

tathā sarasvatī devī cūtavṛkṣādvinirgatā | paścimaṁ sāgaraṁ prāptā gṛhītvā vaḍavānalam

तथा देवी सरस्वती आम्रवृक्ष से निकलकर, वडवानल को साथ लेकर पश्चिमी सागर में पहुँचती हैं।

श्लोक 3 (skanda.7.394.3)

कथमत्र समायातः केदारश्चात्र कौतुकम् । सर्वं विस्तरतो ब्रूहि विचित्रं मम भूसुर

kathamatra samāyātaḥ kedāraścātra kautukam | sarvaṁ vistarato brūhi vicitraṁ mama bhūsura

तो केदार यहाँ (अर्बुद में) कैसे आया, यह मुझे बड़ा कुतूहल है। हे भूसुर, यह विचित्र बात मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 4 (skanda.7.394.4)

पुलस्त्य उवाच । सत्यमेतन्महाराज यन्नोऽत्र परिपृच्छसि । शृणुष्वावहितो भूत्वा यथा जातं श्रुतं तु वै

pulastya uvāca | satyametanmahārāja yanno'tra paripṛcchasi | śṛṇuṣvāvahito bhūtvā yathā jātaṁ śrutaṁ tu vai

पुलस्त्य ने कहा - हे महाराज, जो तुम मुझसे पूछ रहे हो, यह सत्य है। एकाग्रचित्त होकर सुनो, जैसा घटित हुआ और जैसा मैंने सुना है।

श्लोक 5 (skanda.7.394.5)

गंगाद्यानि च तीर्थानि केदाराद्या दिवौकसः । मया सह पुरा देवाः शक्राद्या नृपसत्तमाः

gaṅgādyāni ca tīrthāni kedārādyā divaukasaḥ | mayā saha purā devāḥ śakrādyā nṛpasattamāḥ

हे राजश्रेष्ठ, गंगा आदि तीर्थ, केदार आदि, तथा इन्द्र आदि देवता, पूर्वकाल में मेरे साथ थे।

श्लोक 6 (skanda.7.394.6)

ब्रह्माणं प्रति राजेन्द्र गताः सर्वे महर्षयः । सर्वे तत्र कथाश्चक्रुर्धर्म्या नाना पृथक्पृथक्

brahmāṇaṁ prati rājendra gatāḥ sarve maharṣayaḥ | sarve tatra kathāścakrurdharmyā nānā pṛthakpṛthak

हे राजेन्द्र, सभी महर्षि ब्रह्मा के पास गए। वहाँ सभी ने अलग-अलग विविध धर्म-कथाएँ कीं।

श्लोक 7 (skanda.7.394.7)

समुदाये च देवानां सर्वतीर्थानि पार्थिव । क्षेत्राण्युपस्थितान्येव वनान्युपवनानि च

samudāye ca devānāṁ sarvatīrthāni pārthiva | kṣetrāṇyupasthitānyeva vanānyupavanāni ca

हे राजन, उस देव-समुदाय में सभी तीर्थ, क्षेत्र, वन और उपवन उपस्थित हुए थे।

श्लोक 8 (skanda.7.394.8)

ततः कथाप्रसंगेन इन्द्रः प्राह चतुर्मुखम् । कौतुकेन समायुक्तः पप्रच्छ नृपसत्तम

tataḥ kathāprasaṅgena indraḥ prāha caturmukham | kautukena samāyuktaḥ papraccha nṛpasattama

तब बातचीत के प्रसंग में इन्द्र ने चतुर्मुख ब्रह्मा से कहा। हे राजश्रेष्ठ, कुतूहल से युक्त होकर उन्होंने प्रश्न पूछा।

श्लोक 9 (skanda.7.394.9)

इन्द्र उवाच । भगवन्पुण्यमाहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि सांप्रतम् । प्रमाणं चैव सर्वेषां कृतादीनां पृथग्विधम्

indra uvāca | bhagavanpuṇyamāhātmyaṁ śrotumicchāmi sāmpratam | pramāṇaṁ caiva sarveṣāṁ kṛtādīnāṁ pṛthagvidham

इन्द्र ने कहा - हे भगवन्, अब मैं पुण्य का माहात्म्य सुनना चाहता हूँ, और कृत आदि सभी युगों का अलग-अलग प्रमाण भी।

श्लोक 10 (skanda.7.394.10)

ब्रह्मोवाच । लक्षं सप्तदश प्रोक्तं युगमानं सुराधिप । अष्टाविंशतिभिः सार्द्धं सहस्रैः कृतमुच्यते

brahmovāca | lakṣaṁ saptadaśa proktaṁ yugamānaṁ surādhipa | aṣṭāviṁśatibhiḥ sārddhaṁ sahasraiḥ kṛtamucyate

ब्रह्मा ने कहा - हे देवराज, सत्रह लाख (वर्षों) को युग का मान कहा गया है। अट्ठाईस हजार सहित कृतयुग कहा जाता है।

श्लोक 11 (skanda.7.394.11)

लक्षद्वादशभिः प्रोक्तं युगं त्रेताभिसंज्ञितम् । षण्णवत्यधिकैश्चैव सहस्रैः परिमाणितम्

lakṣadvādaśabhiḥ proktaṁ yugaṁ tretābhisaṁjñitam | ṣaṇṇavatyadhikaiścaiva sahasraiḥ parimāṇitam

बारह लाख वर्षों से त्रेतायुग कहा गया है, जो छियानवे हजार अधिक वर्षों से परिमित है।

श्लोक 12 (skanda.7.394.12)

लक्षाण्यष्टौ चतुःषष्टिसहस्रैः परिकीर्तितम् । ततो वै द्वापरं नाम युगं देवप्रकीर्तितम्

lakṣāṇyaṣṭau catuḥṣaṣṭisahasraiḥ parikīrtitam | tato vai dvāparaṁ nāma yugaṁ devaprakīrtitam

आठ लाख वर्ष और चौंसठ हजार से युक्त, इस प्रकार द्वापर नामक युग देवताओं द्वारा कहा गया है।

श्लोक 13 (skanda.7.394.13)

लक्षैश्चतुर्भिर्विख्यातो द्वात्रिंशद्भिः कलिस्तथा । सहस्रैश्च सुरश्रेष्ठ युगमानमितीरितम्

lakṣaiścaturbhirvikhyāto dvātriṁśadbhiḥ kalistathā | sahasraiśca suraśreṣṭha yugamānamitīritam

चार लाख वर्षों से विख्यात, और बत्तीस हजार से युक्त - हे देवश्रेष्ठ, कलियुग का मान इस प्रकार बताया गया है।

श्लोक 14 (skanda.7.394.14)

चतुष्पदः कृते धर्मः शुक्लवर्णो जनार्दनः । न दुर्भिक्षं न च व्याधिस्तस्मिन्भवति वै क्वचित्

catuṣpadaḥ kṛte dharmaḥ śuklavarṇo janārdanaḥ | na durbhikṣaṁ na ca vyādhistasminbhavati vai kvacit

कृतयुग में धर्म चार पैरों पर खड़ा है, और जनार्दन का वर्ण श्वेत होता है। उस युग में न कहीं अकाल होता है, न कोई रोग।

श्लोक 15 (skanda.7.394.15)

क्रियते च तदा धर्मो नाकाले मरणं नृणाम् । लांगलेन विना सस्यं भूरिक्षीराश्च धेनवः

kriyate ca tadā dharmo nākāle maraṇaṁ nṛṇām | lāṅgalena vinā sasyaṁ bhūrikṣīrāśca dhenavaḥ

उस युग में धर्म का ही आचरण होता है, मनुष्यों की अकाल मृत्यु नहीं होती। बिना हल के ही अन्न उत्पन्न होता है, और गौएँ प्रचुर दूध देती हैं।

श्लोक 16 (skanda.7.394.16)

कामः क्रोधो भयं लोभो मत्सरश्चाभ्यसूयता । तस्मिन्युगे सहस्राक्ष न भवंति कदाचन

kāmaḥ krodho bhayaṁ lobho matsaraścābhyasūyatā | tasminyuge sahasrākṣa na bhavanti kadācana

हे सहस्राक्ष, उस युग में लोभ, क्रोध, भय, लालच, ईर्ष्या और द्वेष कभी नहीं होते।

श्लोक 17 (skanda.7.394.17)

ततस्त्रेतायुगे जातस्त्रिपादो धर्म एव च । चिरायुषो नरास्तस्मिन्रक्तवर्णो जनार्दनः

tatastretāyuge jātastripādo dharma eva ca | cirāyuṣo narāstasminraktavarṇo janārdanaḥ

फिर त्रेतायुग में धर्म तीन पैरों वाला हो जाता है। उस युग में मनुष्य दीर्घायु होते हैं और जनार्दन का वर्ण रक्त होता है।

श्लोक 18 (skanda.7.394.18)

तस्मिन्यज्ञाः प्रवर्त्तंते प्राणिनामिष्टदायिनः । न कामादिप्रवृत्तिश्च तस्मिन्संजायते नृणाम्

tasminyajñāḥ pravarttante prāṇinām iṣṭadāyinaḥ | na kāmādipravṛttiśca tasminsaṁjāyate nṛṇām

उस युग में यज्ञ प्रवृत्त होते हैं, जो प्राणियों को अभीष्ट फल देने वाले हैं। उस युग में मनुष्यों में काम आदि की प्रवृत्ति नहीं होती।

श्लोक 19 (skanda.7.394.19)

तपसा ब्रह्मचर्येण स्नानैर्दानैः पृथग्विधैः । तथा यज्ञैर्जपैर्होमैस्तत्र वृत्तिर्भवेन्नृणाम्

tapasā brahmacaryeṇa snānairdānaiḥ pṛthagvidhaiḥ | tathā yajñairjapairhomaistatra vṛttirbhavennṛṇām

तप से, ब्रह्मचर्य से, विविध स्नान-दान से, तथा यज्ञ, जप और हवन से ही उस युग में मनुष्यों की वृत्ति होती है।

श्लोक 20 (skanda.7.394.20)

ततस्तु द्वापरं नाम तृतीयं युग मुच्यते । द्विपदो धर्मः सञ्जातः पीतवर्णो जनार्द्दनः

tatastu dvāparaṁ nāma tṛtīyaṁ yuga mucyate | dvipado dharmaḥ sañjātaḥ pītavarṇo janārddanaḥ

फिर तीसरा युग द्वापर कहा जाता है। उसमें धर्म दो पैरों वाला हो जाता है, और जनार्दन का वर्ण पीत होता है।

श्लोक 21 (skanda.7.394.21)

फलाकांक्षाप्रवृत्तानि जपयज्ञतपांसि च । सत्यानृतान्वितो लोको द्वापरे सुरसत्तम

phalākāṅkṣāpravṛttāni japayajñatapāṁsi ca | satyānṛtānvito loko dvāpare surasattama

उसमें जप, यज्ञ और तप फल की कामना से किए जाते हैं। हे देवश्रेष्ठ, द्वापर में लोग सत्य और असत्य दोनों से युक्त होते हैं।

श्लोक 22 (skanda.7.394.22)

तत्रान्योन्यं महीपाला युयुधुर्वसुधातले । सुपूताश्च दिवं यांति यज्ञैरिष्ट्वा जनार्दनम्

tatrānyonyaṁ mahīpālā yuyudhurvasudhātale | supūtāśca divaṁ yānti yajñairiṣṭvā janārdanam

उसमें राजा लोग पृथ्वी पर परस्पर युद्ध करते हैं, और यज्ञों द्वारा जनार्दन का यजन करके पूर्ण पवित्र होकर स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 23 (skanda.7.394.23)

ततः कलियुगं घोरं चतुर्थं तु प्रवर्त्तते । एकपादो भवेद्धर्मः संत्रस्तो नित्यपूजने

tataḥ kaliyugaṁ ghoraṁ caturthaṁ tu pravarttate | ekapādo bhaveddharmaḥ saṁtrasto nityapūjane

फिर घोर कलियुग नामक चौथा युग प्रवृत्त होता है। उसमें धर्म एक पैर वाला हो जाता है, और नित्य पूजन में भी भयभीत रहता है।

श्लोक 24 (skanda.7.394.24)

कृष्णवर्णो भवेद्विष्णुः पापाधिक्यं प्रवर्तते । माया च मत्सरश्चैव कामः क्रोधस्तथा भयम्

kṛṣṇavarṇo bhavedviṣṇuḥ pāpādhikyaṁ pravartate | māyā ca matsaraścaiva kāmaḥ krodhastathā bhayam

विष्णु का वर्ण कृष्ण हो जाता है, और पाप की अधिकता होने लगती है। माया, ईर्ष्या, काम, क्रोध तथा भय भी बढ़ जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.7.394.25)

अर्थलुब्धास्तथा भूपा लोभमोहशतान्विताः । अल्पायुषो नरास्तत्र अल्पसस्या च मेदिनी

arthalubdhāstathā bhūpā lobhamohaśatānvitāḥ | alpāyuṣo narāstatra alpasasyā ca medinī

राजा लोग धन के लोभी हो जाते हैं, सैकड़ों प्रकार के लोभ-मोह से युक्त हो जाते हैं। मनुष्य अल्पायु हो जाते हैं, और पृथ्वी की उपज कम हो जाती है।

श्लोक 26 (skanda.7.394.26)

अल्पक्षीरास्तथा गावः सत्यहीना द्विजातयः । तत्र मायाविनो लोका जैह्व्यौपस्थ्यपरायणाः

alpakṣīrāstathā gāvaḥ satyahīnā dvijātayaḥ | tatra māyāvino lokā jaihvyaupasthyaparāyaṇāḥ

गौएँ अल्प दूध देती हैं, ब्राह्मण सत्य से रहित हो जाते हैं। उसमें लोग मायावी हो जाते हैं, स्वाद और काम-भोग में तत्पर रहते हैं।

श्लोक 27 (skanda.7.394.27)

सत्यहीनास्तथा पापा भविष्यंति कलौ युगे । तत्र षोडशमे वर्षे नराः पलितकुन्तलाः

satyahīnāstathā pāpā bhaviṣyanti kalau yuge | tatra ṣoḍaśame varṣe narāḥ palitakuntalāḥ

कलियुग में लोग सत्यरहित और पापी हो जाएँगे। उसमें सोलहवें वर्ष में ही मनुष्यों के बाल सफेद हो जाएँगे।

श्लोक 28 (skanda.7.394.28)

नार्यो द्वादशमे वर्षे भविष्यंति सुगर्भिताः । भविष्यति क्रमाद्वर्णसंकरश्च सुराधिप

nāryo dvādaśame varṣe bhaviṣyanti sugarbhitāḥ | bhaviṣyati kramādvarṇasaṅkaraśca surādhipa

स्त्रियाँ बारहवें वर्ष में ही गर्भवती हो जाएँगी। हे देवराज, क्रमशः वर्णसंकरता भी उत्पन्न होगी।

श्लोक 29 (skanda.7.394.29)

एकाकारा भविष्यंति सर्ववर्णाश्रमाश्च वै । नाशं यास्यंति यज्ञाश्च कुलधर्मः सनातनः

ekākārā bhaviṣyanti sarvavarṇāśramāśca vai | nāśaṁ yāsyanti yajñāśca kuladharmaḥ sanātanaḥ

सभी वर्ण और आश्रम एक समान हो जाएँगे। यज्ञ और सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 30 (skanda.7.394.30)

व्यर्थानि तत्र तीर्थानि म्लेच्छस्पृष्टानि सर्वशः । भविष्यंति सुरश्रेष्ठ प्रभावरहितानि च

vyarthāni tatra tīrthāni mlecchaspṛṣṭāni sarvaśaḥ | bhaviṣyanti suraśreṣṭha prabhāvarahitāni ca

उसमें सभी तीर्थ म्लेच्छों द्वारा स्पर्श किए जाकर व्यर्थ हो जाएँगे। हे देवश्रेष्ठ, वे अपने प्रभाव से रहित हो जाएँगे।

श्लोक 31 (skanda.7.394.31)

एतच्छ्रुत्वा ततो वाक्यं ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । तत्र स्थितानि तीर्थानि ब्रह्माणमिदमब्रुवन्

etacchrutvā tato vākyaṁ brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ | tatra sthitāni tīrthāni brahmāṇamidamabruvan

अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा का यह वचन सुनकर वहाँ उपस्थित सभी तीर्थों ने ब्रह्मा से यह कहा।

श्लोक 32 (skanda.7.394.32)

तीर्थान्यूचुः । कथं वयं भविष्यामः संप्राप्ते दारुणे कलौ । स्थानं नो ब्रूहि देवेश स्थातव्यं च सदैव हि

tīrthānyūcuḥ | kathaṁ vayaṁ bhaviṣyāmaḥ samprāpte dāruṇe kalau | sthānaṁ no brūhi deveśa sthātavyaṁ ca sadaiva hi

तीर्थों ने कहा - भयानक कलियुग के आने पर हमारी क्या दशा होगी? हे देवेश, हमें बताइए कि हमें कहाँ सदा के लिए स्थित रहना चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.7.394.33)

ब्रह्मोवाच । अर्बुदः पर्वतश्रेष्ठः कलिस्तत्र न विद्यते । अतस्तत्र च गंतव्यं तीर्थैरायतनैः सह

brahmovāca | arbudaḥ parvataśreṣṭhaḥ kalistatra na vidyate | atastatra ca gaṁtavyaṁ tīrthairāyatanaiḥ saha

ब्रह्मा ने कहा - अर्बुद पर्वतश्रेष्ठ में कलियुग का प्रवेश नहीं है। इसलिए तीर्थों और मन्दिरों सहित वहीं जाना चाहिए।

श्लोक 34 (skanda.7.394.34)

अपि कृत्वा महत्पापमर्बुदं प्रेक्षते तु यः । कलिदोषविनिर्मुक्तः स यास्यति परां गतिम्

api kṛtvā mahatpāpamarbudaṁ prekṣate tu yaḥ | kalidoṣavinirmuktaḥ sa yāsyati parāṁ gatim

यहाँ तक कि जो व्यक्ति महान पाप करके भी अर्बुद को देखता है, वह कलियुग के दोष से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (skanda.7.394.35)

पुलस्त्य उवाच । एवमुक्त्वा चतुर्वक्त्रो ब्रह्मलोकं गतो नृप । ततः सर्वाणि तीर्थानि गतानि च कलौ युगे

pulastya uvāca | evamuktvā caturvaktro brahmalokaṁ gato nṛpa | tataḥ sarvāṇi tīrthāni gatāni ca kalau yuge

पुलस्त्य ने कहा - ऐसा कहकर चतुर्मुख ब्रह्मा ब्रह्मलोक को चले गए। हे राजन, तब कलियुग में सभी तीर्थ वहाँ चले गए।

श्लोक 36 (skanda.7.394.36)

भूमावर्बुदशैलेन्द्रे संस्थितानि कलेर्भयात् । गंगा सरस्वती चैव यमुना पुष्कराणि च

bhūmāvarbudaśailendre saṁsthitāni kalerbhayāt | gaṅgā sarasvatī caiva yamunā puṣkarāṇi ca

कलियुग के भय से वे सभी अर्बुद पर्वतराज पर स्थित हो गए - गंगा, सरस्वती, यमुना और पुष्कर भी।

श्लोक 37 (skanda.7.394.37)

कुरुक्षेत्रं प्रभासं च ब्रह्मावर्तं तथैव च । तिस्रःकोट्योऽर्द्धकोटिश्च यानि तीर्थानि भूतले

kurukṣetraṁ prabhāsaṁ ca brahmāvartaṁ tathaiva ca | tisraḥkoṭyo'rddhakoṭiśca yāni tīrthāni bhūtale

कुरुक्षेत्र, प्रभास और ब्रह्मावर्त भी, तथा पृथ्वी पर जो साढ़े तीन करोड़ तीर्थ हैं, वे सब भी।

श्लोक 38 (skanda.7.394.38)

तेषां वासश्च सञ्जातः पर्वतेऽर्बुदसंज्ञिके । एवं तत्र समापन्ना गंगा चैव सरस्वती

teṣāṁ vāsaśca sañjātaḥ parvate'rbudasaṁjñike | evaṁ tatra samāpannā gaṅgā caiva sarasvatī

उन सबका निवास अर्बुद नामक पर्वत पर हो गया। इस प्रकार वहाँ गंगा और सरस्वती दोनों मिल गईं।

श्लोक 39 (skanda.7.394.39)

तत्र शांता नराः सम्यक्परं निर्वाणमाप्नुयुः । श्राद्धं कृत्वा महाराज स्वर्गे यांति च पूर्वजाः

tatra śāntā narāḥ samyakparaṁ nirvāṇamāpnuyuḥ | śrāddhaṁ kṛtvā mahārāja svarge yānti ca pūrvajāḥ

वहाँ शान्त मनुष्य पूर्णतः परम निर्वाण को प्राप्त होते हैं। हे महाराज, वहाँ श्राद्ध करने से पूर्वज स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 40 (skanda.7.394.40)

शृणु तत्राभवत्पूर्वं यदाश्चर्यं महामते । ऋषिर्मंकणकोनाम सरस्वत्यास्तटे स्थितः

śṛṇu tatrābhavatpūrvaṁ yadāścaryaṁ mahāmate | ṛṣirmaṅkaṇako nāma sarasvatyāstaṭe sthitaḥ

हे महामते, वहाँ पूर्वकाल में जो आश्चर्य हुआ था, सुनिए। मंकणक नामक ऋषि सरस्वती के तट पर निवास करते थे।

श्लोक 41 (skanda.7.394.41)

तपस्तेपे सुधर्मात्मा कामक्रोधविवर्जितः । तस्यैवं वर्तमानस्य क्षुतमासीत्कदाचन

tapastepe sudharmātmā kāmakrodhavivarjitaḥ | tasyaivaṁ vartamānasya kṣutamāsītkadācana

वह धर्मात्मा, काम-क्रोध से रहित, तप करता रहता था। इस प्रकार रहते हुए, किसी समय उसे छींक आई।

श्लोक 42 (skanda.7.394.42)

पित्तं प्रपतितं तत्र तच्च रक्तमयं बभौ । तद्दृष्ट्वाऽतीव हृष्टः स मंकणर्षिर्बभूव ह

pittaṁ prapatitaṁ tatra tacca raktamayaṁ babhau | taddṛṣṭvā'tīva hṛṣṭaḥ sa maṅkaṇarṣirbabhūva ha

वहाँ पित्त गिरा, जो रक्त के समान प्रतीत हुआ। उसे देखकर वह मंकणक ऋषि अत्यन्त प्रसन्न हो गए।

श्लोक 43 (skanda.7.394.43)

सिद्धोऽहमिति विज्ञाय ततो नृत्यं चकार सः । तस्यैवं वर्तमानस्य जगत्स्थावरजंगमम्

siddho'hamiti vijñāya tato nṛtyaṁ cakāra saḥ | tasyaivaṁ vartamānasya jagatsthāvarajaṅgamam

यह जानकर कि "मैं सिद्ध हो गया हूँ," वह नृत्य करने लगा। उसके इस प्रकार करते हुए, चराचर सम्पूर्ण जगत।

श्लोक 44 (skanda.7.394.44)

तत्र संक्षोभमापन्नं सागरा अपि चुक्षुभुः । गृहकृत्यानि संत्यज्य सर्वे विस्मयमागताः

tatra saṁkṣobhamāpannaṁ sāgarā api cukṣubhuḥ | gṛhakṛtyāni saṁtyajya sarve vismayamāgatāḥ

भी विक्षुब्ध हो गया, यहाँ तक कि सागर भी क्षुब्ध हो उठे। सभी अपने घरेलू कार्यों को छोड़कर आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 45 (skanda.7.394.45)

तस्यैवं नृत्यमानस्य सर्वे लोका नृपोत्तम । ननृतुः पार्थिवश्रेष्ठ प्रभावात्तस्य सन्मुनेः

tasyaivaṁ nṛtyamānasya sarve lokā nṛpottama | nanṛtuḥ pārthivaśreṣṭha prabhāvāttasya sanmuneḥ

हे राजश्रेष्ठ, उसके इस प्रकार नृत्य करते समय सभी लोक भी नाचने लगे, उस श्रेष्ठ मुनि के प्रभाव से।

श्लोक 46 (skanda.7.394.46)

ततो देवगणाः सर्वे गत्वा कामनिषूदनम् । यथाऽयं नृत्यते नैव तथा कुरु महेश्वर

tato devagaṇāḥ sarve gatvā kāmaniṣūdanam | yathā'yaṁ nṛtyate naiva tathā kuru maheśvara

तब सभी देवगण कामनाशक महेश्वर के पास जाकर बोले - ऐसा कुछ करो, हे महेश्वर, जिससे वह इस प्रकार न नाचे।

श्लोक 47 (skanda.7.394.47)

अथ ब्राह्मणरूपेण शंभुनोक्तो द्विजोत्तमः । त्वया ब्रह्मंस्तपस्तप्तमधुना नृत्यते कथम्

atha brāhmaṇarūpeṇa śambhunokto dvijottamaḥ | tvayā brahmaṁstapastaptamadhunā nṛtyate katham

तब शम्भु ने ब्राह्मण रूप धारण करके उस द्विजश्रेष्ठ से कहा - हे ब्रह्मन्, तुमने तप किया है, अब यह नृत्य क्यों कर रहे हो?

श्लोक 48 (skanda.7.394.48)

मंकण उवाच । किं न पश्यसि हे ब्रह्मन्रक्तं पित्तं च मे स्थितम् । संजातं सिद्धिमापन्नो रक्तं पित्तं यतो मम

maṅkaṇa uvāca | kiṁ na paśyasi he brahmanraktaṁ pittaṁ ca me sthitam | saṁjātaṁ siddhimāpanno raktaṁ pittaṁ yato mama

मंकणक ने कहा - हे ब्रह्मन्, क्या तुम मेरे भीतर स्थित रक्तमय पित्त को नहीं देख रहे? मेरा पित्त रक्त के समान हो गया है, इसीलिए मैं सिद्धि को प्राप्त हुआ मानता हूँ।

श्लोक 49 (skanda.7.394.49)

एतस्मात्कारणाद्धर्षाद्द्विज नृत्यं करोम्यहम् । एवमुक्तस्ततस्तेन देवदेवो महेश्वरः

etasmātkāraṇāddharṣāddvija nṛtyaṁ karomyaham | evamuktastatastena devadevo maheśvaraḥ

इसी कारण से, हे द्विज, हर्षवश मैं नृत्य कर रहा हूँ। उसके ऐसा कहने पर देवदेव महेश्वर ने।

श्लोक 50 (skanda.7.394.50)

तर्जन्या ताडयामास स्वांगुष्ठं नृपसत्तम । ततोंगुष्ठाद्विनिष्क्रांतं भस्म वै बिसपांडुरम्

tarjanyā tāḍayāmāsa svāṅguṣṭhaṁ nṛpasattama | tatoṅguṣṭhādviniṣkrāṁtaṁ bhasma vai bisapāṇḍuram

हे राजश्रेष्ठ, अपनी तर्जनी अँगुली से अपने अँगूठे पर प्रहार किया। तब उसके अँगूठे से लोटस-नाल के समान श्वेत भस्म निकली।

श्लोक 51 (skanda.7.394.51)

ततो मंकणकं प्राह पश्य विप्र करान्मम । शुभ्रं भस्म विनिष्क्रांतं पश्य मे द्विज कौतुकम्

tato maṅkaṇakaṁ prāha paśya vipra karānmama | śubhraṁ bhasma viniṣkrāṁtaṁ paśya me dvija kautukam

तब उसने मंकणक से कहा - हे विप्र, मेरे हाथों को देखो। मेरा उज्ज्वल भस्म निकला है, हे द्विज, मेरा यह कौतुक देखो।

श्लोक 52 (skanda.7.394.52)

पुलस्त्य उवाच । तद्दृष्ट्वा विस्मितो विप्रो ज्ञात्वा तं वृषभध्वजम् । जानुभ्यामवनिं गत्वा वाक्यमेतदुवाच ह

pulastya uvāca | taddṛṣṭvā vismito vipro jñātvā taṁ vṛṣabhadhvajam | jānubhyāmavaniṁ gatvā vākyametaduvāca ha

पुलस्त्य ने कहा - उसे देखकर वह ब्राह्मण आश्चर्यचकित हो गया, और उसे वृषभध्वज (शिव) जानकर, घुटनों के बल पृथ्वी पर गिरकर यह वचन कहा।

श्लोक 53 (skanda.7.394.53)

मंकण उवाच । नूनं भवान्महादेवः साक्षाद्दृष्टः प्रसीद मे । निश्चितं त्वं मया ज्ञात एतन्मे हृदि वर्तते

maṅkaṇa uvāca | nūnaṁ bhavānmahādevaḥ sākṣāddṛṣṭaḥ prasīda me | niścitaṁ tvaṁ mayā jñāta etanme hṛdi vartate

मंकणक ने कहा - निश्चय ही आप महादेव हैं, आपको साक्षात् देखा है, मुझ पर प्रसन्न होइए। मैंने आपको निश्चित रूप से पहचान लिया है, यह मेरे हृदय में स्थित है।

श्लोक 54 (skanda.7.394.54)

नान्यस्यायं प्रभावश्च त्वया यो मे प्रदर्शितः । मां समुद्धर देवेश कृपां कृत्वा महेश्वर

nānyasyāyaṁ prabhāvaśca tvayā yo me pradarśitaḥ | māṁ samuddhara deveśa kṛpāṁ kṛtvā maheśvara

यह प्रभाव किसी और का नहीं हो सकता, जो तुमने मुझे दिखाया है। हे देवेश महेश्वर, कृपा करके मेरा उद्धार करो।

श्लोक 55 (skanda.7.394.55)

श्रीमहादेव उवाच । सम्यग्ज्ञातोऽस्मि विप्रेन्द्र त्वयाऽहं नात्र संशयः । वरं वरय भद्रं ते नृत्याधिक्यं यतः कृतम्

śrīmahādeva uvāca | samyagjñāto'smi viprendra tvayā'haṁ nātra saṁśayaḥ | varaṁ varaya bhadraṁ te nṛtyādhikyaṁ yataḥ kṛtam

महादेव ने कहा - हे विप्रेन्द्र, तुमने मुझे पूर्णतः पहचान लिया है, इसमें कोई संशय नहीं। तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो, क्योंकि तुमने अत्यधिक नृत्य किया है।

श्लोक 56 (skanda.7.394.56)

मंकण उवाच । येऽत्र स्नानं प्रकुर्वंति सरस्वत्यां समाहिताः । त्वत्प्रसादात्फलं तेषां राजसूयाश्वमेधयोः

maṅkaṇa uvāca | ye'tra snānaṁ prakurvanti sarasvatyāṁ samāhitāḥ | tvatprasādātphalaṁ teṣāṁ rājasūyāśvamedhayoḥ

मंकणक ने कहा - जो लोग यहाँ एकाग्रचित्त होकर सरस्वती में स्नान करते हैं, आपकी कृपा से उन्हें राजसूय और अश्वमेध यज्ञ का फल मिले।

श्लोक 57 (skanda.7.394.57)

श्रीमहादेव उवाच । येऽत्र स्नानं करिष्यंति सरस्वत्यां समाहिताः । ते यास्यंति परं स्थानं जरामरणवर्जितम्

śrīmahādeva uvāca | ye'tra snānaṁ kariṣyanti sarasvatyāṁ samāhitāḥ | te yāsyanti paraṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam

महादेव ने कहा - जो लोग यहाँ एकाग्रचित्त होकर सरस्वती में स्नान करेंगे, वे जरा-मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होंगे।

श्लोक 58 (skanda.7.394.58)

अत्र गंगासरस्वत्योः संगमे लोकविश्रुते । श्राद्धं कुर्युर्द्विजश्रेष्ठ ते यास्यंति परां गतिम्

atra gaṅgāsarasvatyoḥ saṅgame lokaviśrute | śrāddhaṁ kuryurdvijaśreṣṭha te yāsyanti parāṁ gatim

यहाँ इस लोकविश्रुत गंगा-सरस्वती संगम में, हे द्विजश्रेष्ठ, जो श्राद्ध करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।

श्लोक 59 (skanda.7.394.59)

सुवर्णं येऽत्र दास्यंति यथाशक्त्या द्विजोत्तमे । सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यास्यन्ति परां गतिम्

suvarṇaṁ ye'tra dāsyanti yathāśaktyā dvijottame | sarvapāpavinirmuktāste yāsyanti parāṁ gatim

जो यहाँ अपनी शक्ति के अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सोना दान करेंगे, वे सभी पापों से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होंगे।

श्लोक 60 (skanda.7.394.60)

इत्युक्त्वांतर्दधे राजन्देवदेवो महेश्वरः

ityuktvāntardadhe rājandevadevo maheśvaraḥ

हे राजन, ऐसा कहकर देवदेव महेश्वर अन्तर्धान हो गए।

अध्याय 393अध्याय-सूचीअध्याय 395