प्रभास खण्ड · अध्याय 396
रूपतीर्थ-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.396.1)
पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ रूपतीर्थमनुत्तमम् । सर्वपापहरं नॄणां रूपसौभण्यदायकम्
pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha rūpatīrthamanuttamam | sarvapāpaharaṁ nṝṇāṁ rūpasaubhaṇyadāyakam
पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब सर्वोत्तम रूपतीर्थ में जाना चाहिए, जो मनुष्यों के सभी पापों का नाश करने वाला और रूप-सौभाग्य देने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.396.2)
तत्र पूर्वं वपुर्नाम्ना लोके ख्याता वराप्सराः । सिद्धिं गता महाराज यथा पूर्वं निगद्यते
tatra pūrvaṁ vapurnāmnā loke khyātā varāpsarāḥ | siddhiṁ gatā mahārāja yathā pūrvaṁ nigadyate
वहाँ पूर्वकाल में "वपु" नाम से लोक में विख्यात एक उत्तम अप्सरा सिद्धि को प्राप्त हुई थी, जैसा पहले कहा जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.396.3)
पुराऽऽसीत्काचिदाभीरी विरूपा विकृतानना । लम्बोदरी च कुग्रीवा स्थूलदंतशिरोरुहा
purā'sītkācidābhīrī virūpā vikṛtānanā | lambodarī ca kugrīvā sthūladaṁtaśiroruhā
प्राचीन काल में कोई अभीर (ग्वाल) जाति की स्त्री थी, जो कुरूप थी, विकृत मुख वाली, लम्बे पेट वाली, टेढ़ी गर्दन वाली, मोटे दाँतों और बालों वाली।
श्लोक 4 (skanda.7.396.4)
एकदा फलमादातुं भ्रममाणाऽर्बुदाचले । माघशुक्लतृतीयायां पतिता गिरिनिर्झरे
ekadā phalamādātuṁ bhramamāṇā'rbudācale | māghaśuklatṛtīyāyāṁ patitā girinirjhare
एक बार फल लेने की इच्छा से अर्बुद पर्वत पर घूमते हुए, माघ शुक्ल तृतीया को वह पर्वतीय झरने में गिर पड़ी।
श्लोक 5 (skanda.7.396.5)
दिव्यमाल्यांबरधरा दिव्यैरंगैः समन्विता । पद्मनेत्रा सुकेशांता सर्वलक्षणलक्षिता
divyamālyāmbaradharā divyairaṅgaiḥ samanvitā | padmanetrā sukeśāntā sarvalakṣaṇalakṣitā
वह दिव्य माला-वस्त्र धारण किए, दिव्य अंगों से युक्त, कमल-नेत्री, सुन्दर केश वाली, सभी शुभ लक्षणों से युक्त हो गई।
श्लोक 6 (skanda.7.396.6)
सा संजाता महाराज तीर्थस्यास्य प्रभावतः । एतस्मिन्नेव काले तु शक्रस्तत्र समागतः
sā saṁjātā mahārāja tīrthasyāsya prabhāvataḥ | etasminneva kāle tu śakrastatra samāgataḥ
हे महाराज, वह इस तीर्थ के प्रभाव से ऐसी बन गई। उसी समय इन्द्र वहाँ आए।
श्लोक 7 (skanda.7.396.7)
क्रीडार्थं पर्वतश्रेष्ठे तां ददर्श शुभेक्षणाम् । ततः कामशरैर्विद्धस्तामुवाच सुमध्यमाम्
krīḍārthaṁ parvataśreṣṭhe tāṁ dadarśa śubhekṣaṇām | tataḥ kāmaśarairviddhastāmuvāca sumadhyamām
उस पर्वतश्रेष्ठ में क्रीड़ा के लिए आए इन्द्र ने उस शुभनेत्रा को देखा। तब काम के बाणों से बिंधकर उन्होंने उस सुमध्यमा से कहा।
श्लोक 8 (skanda.7.396.8)
इन्द्र उवाच । का त्वं वद वरारोहे किमर्थं त्वमिहागता । देवी वा नागकन्या वा सिद्धा विद्याधरी तु वा
indra uvāca | kā tvaṁ vada varārohe kimarthaṁ tvamihāgatā | devī vā nāgakanyā vā siddhā vidyādharī tu vā
इन्द्र ने कहा - हे सुन्दरी, तुम कौन हो, बताओ, तुम यहाँ किस लिए आई हो? क्या तुम देवी हो, नागकन्या हो, सिद्धा हो, या विद्याधरी हो?
श्लोक 9 (skanda.7.396.9)
मनो मेऽपहृतं सुभ्रूस्त्वया च पद्मनेत्रया । शक्रोऽहं सर्वदेवेशो भज मां चारुहासिनि
mano me'pahṛtaṁ subhrūstvayā ca padmanetrayā | śakro'haṁ sarvadeveśo bhaja māṁ cāruhāsini
हे सुभ्रू, हे कमलनेत्री, तुमने मेरा मन हर लिया है। मैं सभी देवताओं का स्वामी इन्द्र हूँ, हे मधुर हासिनी, मुझे स्वीकार करो।
श्लोक 10 (skanda.7.396.10)
नार्युवाच । आभीरी त्रिदशाधीश तथाहं बहुभर्तृका । फलार्थं तु समायाता पतिता गिरिनिर्झरे
nāryuvāca | ābhīrī tridaśādhīśa tathāhaṁ bahubhartṛkā | phalārthaṁ tu samāyātā patitā girinirjhare
स्त्री ने कहा - हे देवाधीश, मैं अभीर जाति की हूँ, और मेरे अनेक पति हैं। मैं फल लेने आई थी और पर्वतीय झरने में गिर पड़ी।
श्लोक 11 (skanda.7.396.11)
स्नात्वा रूपमिदं प्राप्ता सुरूपं च शुभं मया । दुर्ल्लभस्त्वं हि देवानां किं पुनर्मर्त्यजन्मनाम्
snātvā rūpamidaṁ prāptā surūpaṁ ca śubhaṁ mayā | durllabhastvaṁ hi devānāṁ kiṁ punarmartyajanmanām
स्नान करके मैंने यह सुन्दर, शुभ रूप प्राप्त किया है। आप तो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं, फिर मनुष्य-जन्म वालों की तो बात ही क्या!
श्लोक 12 (skanda.7.396.12)
वशगास्ते सुराः सर्वे मयि किं क्रियते स्पृहा । भज मां त्रिदशाधीश यथाकामं सुराधिप
vaśagāste surāḥ sarve mayi kiṁ kriyate spṛhā | bhaja māṁ tridaśādhīśa yathākāmaṁ surādhipa
सभी देवता आपके वशवर्ती हैं, फिर मुझ पर इच्छा क्यों करते हो? हे देवाधीश, हे सुराधिप, यथेच्छ मुझे स्वीकार करो।
श्लोक 13 (skanda.7.396.13)
पुलस्त्य उवाच । एवमुक्तस्तया शक्रः कामयामास तां तदा । निवृत्तमदनो भूत्वा तामुवाच सुमध्यमाम्
pulastya uvāca | evamuktastayā śakraḥ kāmayāmāsa tāṁ tadā | nivṛttamadano bhūtvā tāmuvāca sumadhyamām
पुलस्त्य ने कहा - उसके ऐसा कहने पर इन्द्र ने उसकी कामना की। फिर काम-भाव से निवृत्त होकर उन्होंने उस सुमध्यमा से कहा।
श्लोक 14 (skanda.7.396.14)
इन्द्र उवाच । वरं वरय कल्याणि यत्ते मनसि वर्त्तते । विनयात्तव तुष्टोऽहं दास्यामि वरमुत्तमम्
indra uvāca | varaṁ varaya kalyāṇi yatte manasi varttate | vinayāttava tuṣṭo'haṁ dāsyāmi varamuttamam
इन्द्र ने कहा - हे कल्याणी, जो कुछ तुम्हारे मन में है, वर माँगो। तुम्हारी विनयशीलता से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें उत्तम वर दूँगा।
श्लोक 15 (skanda.7.396.15)
नार्युवाच । माघशुक्लतृतीयायां नरो वा वनिता तथा । स्नानं यः कुरुते भक्त्या प्रीताः स्युः सर्वदेवताः
nāryuvāca | māghaśuklatṛtīyāyāṁ naro vā vanitā tathā | snānaṁ yaḥ kurute bhaktyā prītāḥ syuḥ sarvadevatāḥ
स्त्री ने कहा - माघ शुक्ल तृतीया को जो पुरुष या स्त्री भक्तिपूर्वक स्नान करे, उससे सभी देवता प्रसन्न हों।
श्लोक 16 (skanda.7.396.16)
सुरूपं जायतां तेषां दुर्ल्लभं त्रिदशैरपि । मां नय त्वं सहस्राक्ष सुरावासं सुराधिप
surūpaṁ jāyatāṁ teṣāṁ durllabhaṁ tridaśairapi | māṁ naya tvaṁ sahasrākṣa surāvāsaṁ surādhipa
उन्हें ऐसा सुन्दर रूप प्राप्त हो, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। हे सहस्राक्ष, हे देवाधिप, मुझे देवताओं के निवास स्थान ले चलो।
श्लोक 17 (skanda.7.396.17)
पुलस्त्य उवाच । एवमस्त्विति तामुक्त्वा गृहीत्वा तां सुराधिपः । विमाने च तया सार्द्धं जगाम त्रिदिवं प्रति
pulastya uvāca | evamastviti tāmuktvā gṛhītvā tāṁ surādhipaḥ | vimāne ca tayā sārddhaṁ jagāma tridivaṁ prati
पुलस्त्य ने कहा - "ऐसा ही हो" कहकर देवाधिप ने उसे ग्रहण किया और विमान में उसके साथ स्वर्ग की ओर चले गए।
श्लोक 18 (skanda.7.396.18)
वपुः प्राप्तं तया यस्मात्तस्मात्पार्थिवसत्तम । नाम्ना वपुरिति ख्याता सा बभूव वराप्सराः
vapuḥ prāptaṁ tayā yasmāttasmātpārthivasattama | nāmnā vapuriti khyātā sā babhūva varāpsarāḥ
चूँकि उसने अपना (शारीरिक) रूप प्राप्त किया, इसलिए, हे राजश्रेष्ठ, वह "वपु" नाम से विख्यात उत्तम अप्सरा बन गई।
श्लोक 19 (skanda.7.396.19)
माघशुक्लतृतीयायां देवास्तस्मिञ्जलाशये । स्नानं सर्वे प्रकुर्वंति प्रभाते भक्तिसंयुताः
māghaśuklatṛtīyāyāṁ devāstasmiñjalāśaye | snānaṁ sarve prakurvanti prabhāte bhaktisaṁyutāḥ
माघ शुक्ल तृतीया को उस जलाशय में सभी देवता प्रातःकाल भक्तिपूर्वक स्नान करते हैं।
श्लोक 20 (skanda.7.396.20)
तत्रान्या देवकन्याश्च सिद्धयक्षांगनास्तथा । यस्तत्र कुरुते स्नानं तस्मिन्काले नराधिप
tatrānyā devakanyāśca siddhayakṣāṅganāstathā | yastatra kurute snānaṁ tasminkāle narādhipa
वहाँ अन्य देवकन्याएँ, सिद्धांगनाएँ और यक्षांगनाएँ भी आती हैं। हे राजन, उस समय जो वहाँ स्नान करता है।
श्लोक 21 (skanda.7.396.21)
रूपं च लभते तादृग्यादृग्लब्धं तया पुरा । सर्वे तत्र भविष्यंति सिद्धविद्याधरोरगाः
rūpaṁ ca labhate tādṛgyādṛglabdhaṁ tayā purā | sarve tatra bhaviṣyanti siddhavidyādharoragāḥ
वह वैसा ही रूप प्राप्त करता है, जैसा उस स्त्री ने पूर्वकाल में प्राप्त किया था। वहाँ सिद्ध, विद्याधर और नाग सभी उपस्थित होंगे।
श्लोक 22 (skanda.7.396.22)
तस्यैव पूर्वदिग्भागे बिलमस्ति सुशोभनम् । यत्रागत्य प्रकुर्वंति स्नानं पातालकन्यकाः
tasyaiva pūrvadigbhāge bilamasti suśobhanam | yatrāgatya prakurvanti snānaṁ pātālakanyakāḥ
उसी के पूर्वी दिशा में एक अत्यन्त सुन्दर बिल है, जहाँ पाताल की कन्याएँ आकर स्नान करती हैं।
श्लोक 23 (skanda.7.396.23)
तत्र स्नात्वा गृहीत्वापो बिले तस्मिन्व्रजंति ताः । तत्र वैनायके पीठे महत्पाषाणजं जलम्
tatra snātvā gṛhītvāpo bile tasminvrajanti tāḥ | tatra vaināyake pīṭhe mahatpāṣāṇajaṁ jalam
वहाँ स्नान करके, जल ग्रहण करके, वे उस बिल में चली जाती हैं। वहाँ गणेश के पीठ पर एक विशाल पाषाण से उत्पन्न जल है।
श्लोक 24 (skanda.7.396.24)
तेनोदकेन संयुक्तः सिद्धो भवति मानवः । गृहीत्वा तज्जलं यस्तु यत्र यत्राभिगच्छति
tenodakena saṁyuktaḥ siddho bhavati mānavaḥ | gṛhītvā tajjalaṁ yastu yatra yatrābhigacchati
उस जल से युक्त होकर मनुष्य सिद्ध हो जाता है। जो उस जल को लेकर जहाँ-जहाँ भी जाता है।
श्लोक 25 (skanda.7.396.25)
स्वर्गे वा भूतले वापि न केनापि प्रधृष्यते । तत्रास्ति विवरद्वारे तिलकोनाम पादपः
svarge vā bhūtale vāpi na kenāpi pradhṛṣyate | tatrāsti vivaradvāre tilako nāma pādapaḥ
चाहे स्वर्ग में हो या पृथ्वीतल पर, वह किसी के द्वारा भी पराजित नहीं होता। वहाँ बिल के द्वार पर तिलक नामक एक वृक्ष है।
श्लोक 26 (skanda.7.396.26)
तस्य पुष्पैः फलैश्चैव सर्वं कार्यं प्रसिद्ध्यति । भक्षणाद्धारणाद्वापि सिद्धो भवति मानवः
tasya puṣpaiḥ phalaiścaiva sarvaṁ kāryaṁ prasiddhyati | bhakṣaṇāddhāraṇādvāpi siddho bhavati mānavaḥ
उसके फूलों और फलों से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। खाने से या धारण करने से भी मनुष्य सिद्ध हो जाता है।
श्लोक 27 (skanda.7.396.27)
तस्मिन्बिले तु पाषाणाः समन्ताच्छंखसन्निभाः । तेनोदकेन संस्पृष्टा भवंति च हिरण्मयाः
tasminbile tu pāṣāṇāḥ samantācchaṅkhasannibhāḥ | tenodakena saṁspṛṣṭā bhavanti ca hiraṇmayāḥ
उस बिल में चारों ओर शंख के समान पाषाण हैं। उस जल से स्पर्श किए जाने पर वे स्वर्णमय हो जाते हैं।
श्लोक 28 (skanda.7.396.28)
वन्ध्या नारी जलं तत्र या पिबेत्तिलकान्वितम् । अपि वर्षशताब्दा च सद्यो गर्भवती भवेत्
vaṁdhyā nārī jalaṁ tatra yā pibettilakānvitam | api varṣaśatābdā ca sadyo garbhavatī bhavet
जो बाँझ स्त्री वहाँ तिलक के जल को पीती है, चाहे वह सौ वर्ष की हो, वह तुरन्त गर्भवती हो जाती है।
श्लोक 29 (skanda.7.396.29)
व्याधिग्रस्तोऽपि यो मर्त्त्यः स्नानं तत्र समाचरेत् । नीरोगो जायते सद्यो ग्रहग्रस्तो विमुच्यते
vyādhigrasto'pi yo marttyaḥ snānaṁ tatra samācaret | nīrogo jāyate sadyo grahagrasto vimucyate
जो रोगग्रस्त मनुष्य भी वहाँ स्नान करता है, वह तुरन्त नीरोग हो जाता है, और ग्रहग्रस्त व्यक्ति भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 30 (skanda.7.396.30)
भूतप्रेतपिशाचानां दोषः सद्यः प्रणश्यति । तेनोदकेन संस्पृष्टे सर्वं नश्यति दुष्कृतम्
bhūtapretapiśācānāṁ doṣaḥ sadyaḥ praṇaśyati | tenodakena saṁspṛṣṭe sarvaṁ naśyati duṣkṛtam
भूत-प्रेत-पिशाच के दोष तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। उस जल से स्पर्श किए जाने पर सभी पाप-कर्म नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 31 (skanda.7.396.31)
अपि कीटपतंगा ये पिशाचाः पक्षिणो मृगाः । तेनोदकेन ये स्पृष्टाः सद्यो यास्यंति सद्गतिम्
api kīṭapataṁgā ye piśācāḥ pakṣiṇo mṛgāḥ | tenodakena ye spṛṣṭāḥ sadyo yāsyanti sadgatim
यहाँ तक कि जो कीड़े-पतंगे, पिशाच, पक्षी या मृग उस जल से स्पर्श किए जाते हैं, वे भी तुरन्त सद्गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 32 (skanda.7.396.32)
ययातिरुवाच । अप्यद्भुतमिदं ब्रह्मन्माहात्म्यं भवता मम । कथितं रूपतीर्थस्य न भूतं न भविष्यति
yayātiruvāca | apyadbhutamidaṁ brahmanmāhātmyaṁ bhavatā mama | kathitaṁ rūpatīrthasya na bhūtaṁ na bhaviṣyati
ययाति ने कहा - हे ब्रह्मन्, आपने मुझे रूपतीर्थ का यह अद्भुत माहात्म्य बताया है, जो न कभी हुआ और न होगा।
श्लोक 33 (skanda.7.396.33)
किमत्र कारणं ब्रह्मन्सर्वेभ्योऽप्यधिकं स्मृतम् । सर्वं विस्तरतो ब्रूहि परं कौतूहलं हि मे
kimatra kāraṇaṁ brahmansarvebhyo'pyadhikaṁ smṛtam | sarvaṁ vistarato brūhi paraṁ kautūhalaṁ hi me
हे ब्रह्मन्, इसका क्या कारण है कि यह सबसे अधिक माना जाता है? मुझे विस्तार से सब कुछ बताइए, मुझे बड़ी उत्सुकता है।
श्लोक 34 (skanda.7.396.34)
पुलस्त्य उवाच । तत्र पूर्वं तपस्तप्तमदित्या नृपसत्तम । इन्द्रे राज्यपरिभ्रष्टे बलौ त्रैलोक्यनायके । अवतीर्णश्चतुर्बाहुरदित्यां नृपसत्तम
pulastya uvāca | tatra pūrvaṁ tapastaptamadityā nṛpasattama | indre rājyaparibhraṣṭe balau trailokyanāyake | avatīrṇaścaturbāhuradityāṁ nṛpasattama
पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, पूर्वकाल में जब बलि त्रैलोक्य का स्वामी होने पर इन्द्र राज्य से भ्रष्ट हो गए, तब अदिति ने वहाँ तप किया। हे राजश्रेष्ठ, तब चतुर्भुज विष्णु अदिति के गर्भ में अवतरित हुए।
श्लोक 35 (skanda.7.396.35)
तस्मिञ्जाते महाविष्णावदित्या चासुरान्तके । गुप्तया विवरद्वारे भयाद्दानवसंभवात्
tasmiñjāte mahāviṣṇāvadityā cāsurāntake | guptayā vivaradvāre bhayāddānavasaṁbhavāt
जब वह महाविष्णु, असुरों का नाशक, अदिति से उत्पन्न हुआ, तो दानवों के भय से अदिति ने उसे विवर के द्वार पर छिपाकर रखा।
श्लोक 36 (skanda.7.396.36)
जातमात्रो हरिस्तस्मिन्स्थापितो निर्झरे तया । तस्मात्पवित्रतां प्राप्तं तीर्थं नॄणामभीष्टदम्
jātamātro haristasminsthāpito nirjhare tayā | tasmātpavitratāṁ prāptaṁ tīrthaṁ nṝṇāmabhīṣṭadam
उसने नवजात हरि को उस झरने में रख दिया। इसीलिए यह तीर्थ पवित्रता को प्राप्त हुआ, जो मनुष्यों की अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करता है।
श्लोक 37 (skanda.7.396.37)
न चान्यत्कारणं राजन्सत्यमेतन्मयोदितम् । माघशुक्लतृतीयायां तत्र जातस्त्रिविक्रमः
na cānyatkāraṇaṁ rājansatyametanmayoditam | māghaśuklatṛtīyāyāṁ tatra jātastrivikramaḥ
हे राजन्, इसका कोई अन्य कारण नहीं है, यह सत्य मैंने तुम्हें बताया है। माघ शुक्ल तृतीया को वहीं त्रिविक्रम (वामन) का जन्म हुआ था।
श्लोक 38 (skanda.7.396.38)
तिलकः सर्ववृक्षाग्र्यः पुत्रवत्परिपालितः । अदित्या सेवितो नित्यं स्वहस्तेन जलैः शुभैः
tilakaḥ sarvavṛkṣāgryaḥ putravatparipālitaḥ | adityā sevito nityaṁ svahastena jalaiḥ śubhaiḥ
तिलक वृक्ष, सभी वृक्षों में श्रेष्ठ, उसे पुत्र के समान पाला-पोसा गया, और अदिति द्वारा नित्य अपने हाथों से शुभ जल से सींचा गया।
श्लोक 39 (skanda.7.396.39)
एतत्ते सर्वमाख्यातं तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत् । सर्वकामप्रदं नॄणामिह लोके परत्र च
etatte sarvamākhyātaṁ tīrthamāhātmyamuttamam | tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret | sarvakāmapradaṁ nṝṇāmiha loke paratra ca
यह मैंने तुम्हें इस तीर्थ का सम्पूर्ण उत्तम माहात्म्य बताया। इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिए, जो इस लोक और परलोक में मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।