प्रभास खण्ड · अध्याय 397
हृषीकेश-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.397.1)
पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् । अंबरीषस्य राजर्षेरैशान्यां पापनाशनम्
pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha tīrthaṁ trailokyaviśrutam | ambarīṣasya rājarṣeraiśānyāṁ pāpanāśanam
पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब त्रैलोक्य में विख्यात, राजर्षि अंबरीष के तीर्थ की ईशान दिशा में स्थित, पापनाशक तीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.397.2)
यत्र स्वयं हृषीकेशः काले च कलिसंज्ञके । तस्य वाक्यादृतस्तीर्थे स्वयं हि परितिष्ठति
yatra svayaṁ hṛṣīkeśaḥ kāle ca kalisaṁjñake | tasya vākyādṛtastīrthe svayaṁ hi paritiṣṭhati
जहाँ स्वयं हृषीकेश, कलियुग नामक काल में भी, उसके वचन का आदर करके उस तीर्थ में स्वयं ही निवास करते हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.397.3)
पुरासीत्पृथिवीपालो ह्यंबरीषो युगे कृते । हरिमाराधयामास तपस्तेपे सुदुष्करम्
purāsītpṛthivīpālo hyaṁbarīṣo yuge kṛte | harimārādhayāmāsa tapastepe sudurdṣkaram
कृतयुग में अंबरीष नामक पृथ्वीपाल था, जिसने हरि की आराधना की और अत्यन्त दुष्कर तप किया।
श्लोक 4 (skanda.7.397.4)
तस्मिंस्तीर्थे स राजेन्द्रो मितभक्षो जितेन्द्रियः । सहस्रमेकं वर्षाणां तत आसीत्फलाशनः
tasminstīrthe sa rājendro mitabhakṣo jitendriyaḥ | sahasramekaṁ varṣāṇāṁ tata āsītphalāśanaḥ
उस तीर्थ में वह राजेन्द्र, संयमित आहार और जितेन्द्रिय होकर, एक हजार वर्षों तक फलाहारी रहा।
श्लोक 5 (skanda.7.397.5)
सहस्रे द्वे ततो राजञ्छीर्णपर्णाशनोऽभवत् । सहस्रे द्वे ततो भूयो जलाहारो बभूव ह
sahasre dve tato rājañchīrṇaparṇāśano'bhavat | sahasre dve tato bhūyo jalāhāro babhūva ha
फिर दो हजार वर्षों तक, हे राजन्, वह सूखे पत्तों का आहार करने लगा। फिर और दो हजार वर्षों तक वह केवल जल का आहार लेने लगा।
श्लोक 6 (skanda.7.397.6)
सहस्रत्रितयं राजन्वायुभक्षो बभूव ह । चिन्तयन्पुंडरीकाक्षं मानसे श्रद्धयान्वितः
sahasratritayaṁ rājanvāyubhakṣo babhūva ha | ciṁtayanpuṇḍarīkākṣaṁ mānase śraddhayānvitaḥ
फिर तीन हजार वर्षों तक, हे राजन्, वह केवल वायु का भक्षण करने लगा, श्रद्धापूर्वक मन में कमलनयन (विष्णु) का ध्यान करते हुए।
श्लोक 7 (skanda.7.397.7)
दश वर्षसहस्रान्ते ततश्च नृपसत्तम । तुतोष भगवान्विष्णुस्तस्यासौ दर्शनं ददौ
daśa varṣasahasrānte tataśca nṛpasattama | tutoṣa bhagavānviṣṇustasyāsau darśanaṁ dadau
हे राजश्रेष्ठ, दस हजार वर्ष के अन्त में भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उसे अपना दर्शन दिया।
श्लोक 8 (skanda.7.397.8)
कृत्वा देवपते रूपमारुह्यैरावतं गजम् । अब्रवीद्वरदोऽस्मीति अंबरीषं नराधिपम्
kṛtvā devapate rūpamāruhyairāvataṁ gajam | abravīdvarado'smīti aṁbarīṣaṁ narādhipam
देवताओं के स्वामी (इन्द्र) का रूप धारण कर ऐरावत हाथी पर सवार होकर, उन्होंने अंबरीष राजा से कहा - "मैं वरदाता हूँ।"
श्लोक 9 (skanda.7.397.9)
इंद्र उवाच । वरं वरय भद्रं ते राजन्यन्मनसीप्सितम् । त्वां दृष्ट्वा भक्तिसंयुक्तमागतोऽहमसंशयम्
indra uvāca | varaṁ varaya bhadraṁ te rājanyanmanasīpsitam | tvāṁ dṛṣṭvā bhaktisaṁyuktamāgato'hamasaṁśayam
इन्द्र ने कहा - हे राजन्, तुम्हारा कल्याण हो, जो तुम्हारे मन में अभीष्ट हो, वर माँगो। भक्तियुक्त तुम्हें देखकर मैं निश्चय ही आया हूँ।
श्लोक 10 (skanda.7.397.10)
अंबरीष उवाच । मुक्तिं दातुमशक्तोसि त्वं च वृत्रनिषूदन । तव प्रसादाद्देवेश त्रैलोक्यं मम वर्त्तते । स्वागतं गच्छ देवेश न वरो रोचते मम
aṁbarīṣa uvāca | muktiṁ dātumaśakto'si tvaṁ ca vṛtraniṣūdana | tava prasādāddeveśa trailokyaṁ mama varttate | svāgataṁ gaccha deveśa na varo rocate mama
अंबरीष ने कहा - हे वृत्रनाशक, तुम मुक्ति देने में असमर्थ हो। हे देवेश, तुम्हारी कृपा से त्रैलोक्य भी मेरे लिए महत्वहीन है। हे देवेश, तुम्हारा स्वागत है, जाओ, मुझे कोई वर नहीं चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.7.397.11)
सर्वथा दास्यते मह्यं वरं तुष्टश्चतुर्भुजः । तदाहं प्रतिगृह्णामि गच्छ देव नमोस्तु ते
sarvathā dāsyate mahyaṁ varaṁ tuṣṭaścaturbhujaḥ | tadāhaṁ pratigṛhṇāmi gaccha deva namo'stu te
जब चतुर्भुज विष्णु स्वयं प्रसन्न होकर मुझे वर देंगे, तभी मैं उसे स्वीकार करूँगा। जाओ, हे देव, तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 12 (skanda.7.397.12)
इन्द्र उवाच । वरं वरय राजर्षे यत्ते मनसि वर्त्तते । ब्रह्मविष्णुत्रिनेत्राणामहमीशो नृपोतम
indra uvāca | varaṁ varaya rājarṣe yatte manasi varttate | brahmaviṣṇutrinetrāṇāmahamīśo nṛpottama
इन्द्र ने कहा - हे राजर्षि, जो कुछ तुम्हारे मन में हो, वर माँगो। हे राजश्रेष्ठ, मैं ब्रह्मा, विष्णु और त्रिनेत्र (शिव) का भी स्वामी हूँ।
श्लोक 13 (skanda.7.397.13)
अन्येषां चैव देवानां त्रैलोक्यस्याप्यहं विभुः । वरं वरय तस्मात्त्वं प्रसादान्मे सुदुर्ल्लभम्
anyeṣāṁ caiva devānāṁ trailokyasyāpyahaṁ vibhuḥ | varaṁ varaya tasmāttvaṁ prasādānme sudurllabham
मैं अन्य सभी देवताओं और त्रैलोक्य का भी स्वामी हूँ। इसलिए तुम मुझसे कृपापूर्वक कोई अत्यन्त दुर्लभ वर माँगो।
श्लोक 14 (skanda.7.397.14)
प्रसन्ने मयि राजेन्द्र प्रसन्नाः सर्वदेवताः । कुरु मे वचनं राजन्गृह्यतां वरमुत्तमम्
prasanne mayi rājendra prasannāḥ sarvadevatāḥ | kuru me vacanaṁ rājangṛhyatāṁ varamuttamam
हे राजेन्द्र, मेरे प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं। हे राजन्, मेरा वचन मानो, उत्तम वर ग्रहण करो।
श्लोक 15 (skanda.7.397.15)
अंबरीष उवाच । राजा त्वं सर्वदेवानां त्रैलोक्यस्य तथेश्वरः । सप्तद्वीपवती राजा अहं वृत्रनिषूदन
aṁbarīṣa uvāca | rājā tvaṁ sarvadevānāṁ trailokyasya tatheśvaraḥ | saptadvīpavatī rājā ahaṁ vṛtraniṣūdana
अंबरीष ने कहा - हे वृत्रनाशक, तुम सभी देवताओं के राजा हो, त्रैलोक्य के स्वामी भी हो, और मैं सप्तद्वीपवती पृथ्वी का राजा हूँ।
श्लोक 16 (skanda.7.397.16)
हषीकेशस्य सद्भक्तं विद्धि मां तात निश्चयम् । आगतश्च हृषीकेशो वरं दास्यत्यसंशयम्
hṛṣīkeśasya sadbhaktaṁ viddhi māṁ tāta niścayam | āgataśca hṛṣīkeśo varaṁ dāsyatyasaṁśayam
हे तात, निश्चय जानो, मैं हृषीकेश का सद्भक्त हूँ। स्वयं हृषीकेश ही आकर मुझे वर देंगे, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 17 (skanda.7.397.17)
इन्द्र उवाच । ददतो मम भूपाल न गृह्णासि वरं यदि । वज्रं त्वां प्रेरयिष्यामि वधाय कृतनिश्चयः
indra uvāca | dadato mama bhūpāla na gṛhṇāsi varaṁ yadi | vajraṁ tvāṁ preṣayiṣyāmi vadhāya kṛtaniścayaḥ
इन्द्र ने कहा - हे राजन्, यदि मेरे द्वारा दिए जाने पर भी तुम वर नहीं लेते, तो मैं तुम्हारे वध का निश्चय करके तुम पर वज्र चलाऊँगा।
श्लोक 18 (skanda.7.397.18)
एवमुक्त्वा सहस्राक्षः सृक्किणी परिलेलिहन् । कुलिशं भ्रामयामास गृहीत्वा दक्षिणे करे
evamuktvā sahasrākṣaḥ sṛkkiṇī parilelihan | kuliśaṁ bhrāmayāmāsa gṛhītvā dakṣiṇe kare
ऐसा कहकर सहस्राक्ष इन्द्र, अपने मुख के कोनों को चाटते हुए, अपने दाहिने हाथ में वज्र लेकर उसे घुमाने लगे।
श्लोक 19 (skanda.7.397.19)
तस्येवं भ्राम्यमाणस्य महोत्पाता बभूविरे । ततः पर्वतशृंगाणि विशीर्णानि समंततः
tasyevaṁ bhrāmyamāṇasya mahotpātā babhūvire | tataḥ parvataśṛṅgāṇi viśīrṇāni samaṁtataḥ
उसके इस प्रकार घुमाने से महान उत्पात होने लगे। तब सभी दिशाओं में पर्वत-शिखर टूट-टूटकर बिखर गए।
श्लोक 20 (skanda.7.397.20)
आवृतं गगनं मेघैर्विधुन्वानैर्महीं तदा । न किंचिद्दृश्यते तत्र सर्वं संतमसावृतम्
āvṛtaṁ gaganaṁ meghairvidhunvānairmahīṁ tadā | na kiṁciddṛśyate tatra sarvaṁ saṁtamasāvṛtam
आकाश बादलों से ढक गया, जो पृथ्वी को हिला रहे थे, तब कुछ भी दिखाई नहीं देता था, सब कुछ घोर अंधकार से ढक गया।
श्लोक 21 (skanda.7.397.21)
एतस्मिन्नेव काले तु स राजा हरिवत्सलः । निमील्य लोचने स्वीये समाधिस्थो बभूव ह
etasminneva kāle tu sa rājā harivatsalaḥ | nimīlya locane svīye samādhistho babhūva ha
उसी समय उस हरि-भक्त राजा ने अपनी आँखें बन्द कर लीं और समाधिस्थ हो गया।
श्लोक 22 (skanda.7.397.22)
ततस्तुष्टो जगन्नाथ साक्षात्प्रत्यक्षतां गतः । ऐरावतः स गरुडस्तत्क्षणात्समजायत
tatastuṣṭo jagannātha sākṣātpratyakṣatāṁ gataḥ | airāvataḥ sa garuḍastatkṣaṇātsamajāyata
तब लोकनाथ प्रसन्न होकर साक्षात् प्रकट हो गए, और उसी क्षण वह ऐरावत गरुड़ बन गया।
श्लोक 23 (skanda.7.397.23)
तमुवाच हृषीकेशो मेघगंभीरया गिरा । ध्यानस्थितं नृपश्रेष्ठं शंखचक्रगदाधरः
tamuvāca hṛṣīkeśo meghagambhīrayā girā | dhyānasthitaṁ nṛpaśreṣṭhaṁ śaṅkhacakragadādharaḥ
शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले हृषीकेश ने बादल के समान गम्भीर वाणी में समाधिस्थ उस राजश्रेष्ठ से कहा।
श्लोक 24 (skanda.7.397.24)
श्रीभगवानुवाच । परितुष्टोऽस्मि ते वत्सानन्यभक्तजनेश्वर । वरं वरय भद्रं ते यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
śrībhagavānuvāca | parituṣṭo'smi te vatsānanyabhaktajaneśvara | varaṁ varaya bhadraṁ te yadyapi syātsudurlabham
भगवान ने कहा - हे वत्स, हे अनन्य भक्त, मैं तुमसे अत्यन्त संतुष्ट हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो, भले ही वह अत्यन्त दुर्लभ हो।
श्लोक 25 (skanda.7.397.25)
अंबरीष उवाच । यदि प्रसन्नो भगवन्यदि देयो वरो मम । संसाराब्धेस्तारणाय वरदो भव मे हरे
aṁbarīṣa uvāca | yadi prasanno bhagavanyadi deyo varo mama | saṁsārābdhestāraṇāya varado bhava me hare
अंबरीष ने कहा - हे भगवन्, यदि आप प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना ही है, तो हे हरि, संसार-सागर से पार करने के लिए मुझे वरदान दीजिए।
श्लोक 26 (skanda.7.397.26)
पुलस्त्य उवाच । अथाह भगवान्विष्णुरंबरीषं जनाधिपम् । ज्ञानयोगं सुविस्तीर्णं संसारक्षयकारणम्
pulastya uvāca | athāha bhagavānviṣṇuraṁbarīṣaṁ janādhipam | jñānayogaṁ suvistīrṇaṁ saṁsārakṣayakāraṇam
पुलस्त्य ने कहा - तब भगवान विष्णु ने राजा अंबरीष को विस्तृत ज्ञानयोग बताया, जो संसार के नाश का कारण है।
श्लोक 27 (skanda.7.397.27)
यस्मिञ्जाते नरः सद्यः संसारान्मुच्यते नृप । श्रुत्वा स नृपतिः सम्यक्प्रणम्योवाच केशवम्
yasmiñjāte naraḥ sadyaḥ saṁsārānmucyate nṛpa | śrutvā sa nṛpatiḥ samyakpraṇamyovāca keśavam
जिसके उत्पन्न होने पर मनुष्य तुरन्त संसार से मुक्त हो जाता है। उसे भली-भाँति सुनकर उस राजा ने प्रणाम करके केशव से कहा।
श्लोक 28 (skanda.7.397.28)
अंबरीष उवाच । भगवन्यस्त्वया प्रोक्तो योगोऽयं मम विस्तरात् । दुर्ज्ञेयः स नृणां देव विशेषाच्च कलौ युगे
aṁbarīṣa uvāca | bhagavanyastvayā prokto yogo'yaṁ mama vistarāt | durjñeyaḥ sa nṛṇāṁ deva viśeṣācca kalau yuge
अंबरीष ने कहा - हे भगवन्, आपने मुझे विस्तार से यह जो योग बताया है, हे देव, वह मनुष्यों के लिए, विशेषकर कलियुग में, दुर्बोध है।
श्लोक 29 (skanda.7.397.29)
अपि चेत्सुप्रसन्नोऽसि क्रियायोगं ब्रवीहि मे । लोकानां तारणार्थाय शंखचक्रगदाधर
api cetsuprasanno'si kriyāyogaṁ bravīhi me | lokānāṁ tāraṇārthāya śaṅkhacakragadādhara
यदि आप सचमुच प्रसन्न हैं, तो हे शंख-चक्र-गदाधर, लोकों के उद्धार के लिए मुझे क्रियायोग बताइए।
श्लोक 30 (skanda.7.397.30)
पुलस्त्य उवाच । ततस्तस्मै नरेन्द्राय क्रियायोगं जनार्द्दनः । यथायोग्यं नृपश्रेष्ठ कथयामास केशवः
pulastya uvāca | tatastasmai narendrāya kriyāyogaṁ janārddanaḥ | yathāyogyaṁ nṛpaśreṣṭha kathayāmāsa keśavaḥ
पुलस्त्य ने कहा - तब उस राजा को, हे राजश्रेष्ठ, जनार्दन केशव ने यथायोग्य क्रियायोग बताया।
श्लोक 31 (skanda.7.397.31)
तं श्रुत्वा तुष्टहृदयोऽम्बरीषो वाक्यमब्रवीत्
taṁ śrutvā tuṣṭahṛdayo'mbarīṣo vākyamabravīt
उसे सुनकर प्रसन्न हृदय वाले अंबरीष ने यह वचन कहा।
श्लोक 32 (skanda.7.397.32)
अंबरीष उवाच । यदि तुष्टोऽसि भगवन्रूपेणानेन माधव । ममाश्रमे त्वं देवेश सदा सन्निहितो भव
aṁbarīṣa uvāca | yadi tuṣṭo'si bhagavanrūpeṇānena mādhava | mamāśrame tvaṁ deveśa sadā sannihito bhava
अंबरीष ने कहा - हे भगवन्, हे माधव, यदि आप इस रूप में प्रसन्न हैं, तो हे देवेश, आप सदा मेरे आश्रम में उपस्थित रहें।
श्लोक 33 (skanda.7.397.33)
यतस्त्वत्प्रतिमामेकामर्चयामि विधानतः । पूजयिष्यंति लोकास्त्वां शंखचक्रगदाधरम्
yatastvatpratimāmekāmarcayāmi vidhānataḥ | pūjayiṣyanti lokāstvāṁ śaṅkhacakragadādharam
क्योंकि मैं आपकी एक प्रतिमा को विधिपूर्वक पूजा करूँगा। लोग शंख-चक्र-गदाधारी आप की पूजा करेंगे।
श्लोक 34 (skanda.7.397.34)
पुलस्त्य उवाच । तथोक्तो माधवेनासौ चकार हरिमंदिरम् । प्रतिमां पूजयामास गन्धपुष्पानुलेपनैः
pulastya uvāca | tathokto mādhavenāsau cakāra harimandiram | pratimāṁ pūjayāmāsa gandhapuṣpānulepanaiḥ
पुलस्त्य ने कहा - माधव द्वारा ऐसा आदिष्ट होकर उसने हरि-मन्दिर बनवाया, और उस प्रतिमा की गन्ध-पुष्प-अनुलेपन से पूजा की।
श्लोक 35 (skanda.7.397.35)
ततः कालेन महता भगवान्विष्णुमंदिरे । तेनैव वपुषा प्राप्तः सपुत्रः सहबांधवः
tataḥ kālena mahatā bhagavānviṣṇumandire | tenaiva vapuṣā prāptaḥ saputraḥ sahabāṁdhavaḥ
फिर बहुत समय बाद, विष्णु मन्दिर में स्वयं भगवान उसी रूप में प्राप्त हुए, अपने पुत्रों और बन्धुओं सहित।
श्लोक 36 (skanda.7.397.36)
अद्यापि भगवान्विष्णुः सत्यवाक्येन भूपतेः । सदा संनिहितो विष्णुस्तस्मिन्नवसरे कलौ
adyāpi bhagavānviṣṇuḥ satyavākyena bhūpateḥ | sadā saṁnihito viṣṇustasminnavasare kalau
आज भी भगवान विष्णु उस राजा के सत्यवचन के कारण, कलियुग के इस अवसर पर भी, सदा वहाँ उपस्थित रहते हैं।
श्लोक 37 (skanda.7.397.37)
तदारभ्य महाराज क्रियायोगो धरातले । प्रवृत्तः प्रतिमाकारः काले च कलिसंज्ञके
tadārabhya mahārāja kriyāyogo dharātale | pravṛttaḥ pratimākāraḥ kāle ca kalisaṁjñake
हे महाराज, तभी से पृथ्वी पर मूर्ति के रूप में क्रियायोग प्रवृत्त हुआ, विशेष रूप से कलियुग नामक काल में।
श्लोक 38 (skanda.7.397.38)
यस्तं पूजयते भक्त्या हृषीकेशे नृपार्बुदे । स याति विष्णुसालोक्यं प्रसादाच्च हरेर्नृप
yastaṁ pūjayate bhaktyā hṛṣīkeśe nṛpārbude | sa yāti viṣṇusālokyaṁ prasādācca harernṛpa
हे राजन्, जो व्यक्ति अर्बुद में हृषीकेश की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह हरि की कृपा से विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
श्लोक 39 (skanda.7.397.39)
एकादश्यां महाराज जागरं यः सदा नृप । करिष्यति निराहारो हृषीकेशाग्रतः स्थितः । स यास्यति परं स्थानं दुर्ल्लभं त्रिदशैरपि
ekādaśyāṁ mahārāja jāgaraṁ yaḥ sadā nṛpa | kariṣyati nirāhāro hṛṣīkeśāgrataḥ sthitaḥ | sa yāsyati paraṁ sthānaṁ durllabhaṁ tridaśairapi
हे राजन्, जो व्यक्ति एकादशी को सदा उपवास करते हुए, हृषीकेश के सामने स्थित होकर जागरण करेगा, वह देवताओं के लिए भी दुर्लभ परम स्थान को प्राप्त होगा।
श्लोक 40 (skanda.7.397.40)
यत्पुण्यं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे । तत्फलं लभते मर्त्त्यो हृषीकेशस्य दर्शनात्
yatpuṇyaṁ kapilādāne kārtikyāṁ jyeṣṭhapuṣkare | tatphalaṁ labhate marttyo hṛṣīkeśasya darśanāt
कार्तिक में ज्येष्ठ पुष्कर में कपिला गौ के दान से जो पुण्य मिलता है, वही फल मर्त्य मनुष्य हृषीकेश के दर्शन से प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 41 (skanda.7.397.41)
शुक्ले वा यदि वा कृष्णे संप्राप्ते हरिवासरे । यः पश्यति हृषीकेशमश्वमेधफलं लभेत्
śukle vā yadi vā kṛṣṇe samprāpte harivāsare | yaḥ paśyati hṛṣīkeśamaśvamedhaphalaṁ labhet
चाहे शुक्ल पक्ष हो या कृष्ण पक्ष, जब हरिवासर (एकादशी) आती है, जो हृषीकेश का दर्शन करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 42 (skanda.7.397.42)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पूजयेत्तु विधानतः । यस्तत्र चतुरो मासन्सम्यग्व्रतपरायणः । अभ्यर्चयेद्धृषीकेशं न स भूयोऽभिजायते
tasmātsarvaprayatnena pūjayettu vidhānataḥ | yastatra caturo māsansamyagvrataparāyaṇaḥ | abhyarcayeddhṛṣīkeśaṁ na sa bhūyo'bhijāyate
इसलिए सब प्रकार से यत्नपूर्वक विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। जो वहाँ चार मास तक सम्यक व्रतपरायण होकर हृषीकेश की पूजा करता है, वह फिर जन्म नहीं लेता।
श्लोक 43 (skanda.7.397.43)
एकः सर्वाणि तीर्थानि करोति नृपसत्तम । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
ekaḥ sarvāṇi tīrthāni karoti nṛpasattama | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
हे राजश्रेष्ठ, एक व्यक्ति सभी तीर्थों का सेवन करता है, जबकि दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है (दोनों समान फल पाते हैं)।
श्लोक 44 (skanda.7.397.44)
एको दानानि सर्वाणि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
eko dānāni sarvāṇi brāhmaṇebhyaḥ prayacchati | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति ब्राह्मणों को सभी प्रकार के दान देता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 45 (skanda.7.397.45)
एकः कन्यासहस्रं तु प्रदद्याच्च यथाविधि । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
ekaḥ kanyāsahasraṁ tu pradadyācca yathāvidhi | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति विधिपूर्वक एक हजार कन्याओं का दान (कन्यादान) करता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 46 (skanda.7.397.46)
सूर्यग्रहे कुरुक्षेत्रे दद्याद्दानमनुत्तमम् । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
sūryagrahe kurukṣetre dadyāddānamanuttamam | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में उत्तम दान देता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 47 (skanda.7.397.47)
अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैर्यजत्येकः सदक्षिणैः । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
agniṣṭomādibhiryajñairyajatyekaḥ sadakṣiṇaiḥ | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति अग्निष्टोम आदि यज्ञों को दक्षिणा सहित करता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 48 (skanda.7.397.48)
एको हिमालयं गत्वा त्यजति स्वकलेवरम् । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
eko himālayaṁ gatvā tyajati svakalevaram | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति हिमालय जाकर अपना शरीर त्याग देता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 49 (skanda.7.397.49)
एकस्तु भृगुपातेन त्यजेद्देहं सुतीर्थके । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
ekastu bhṛgupātena tyajeddehaṁ sutīrthake | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति किसी उत्तम तीर्थ में गिरकर (भृगुपात करके) अपना शरीर त्याग देता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 50 (skanda.7.397.50)
एकः प्रायोपवेशेन प्राणांस्त्यजति मानवः । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
ekaḥ prāyopaveśena prāṇāṁstyajati mānavaḥ | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक मनुष्य प्रायोपवेशन (अनशन) द्वारा अपने प्राण त्याग देता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 51 (skanda.7.397.51)
ब्रह्मज्ञानं वदत्येकः श्रुत्वा ज्ञानविशारदः । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
brahmajñānaṁ vadatyekaḥ śrutvā jñānaviśāradaḥ | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति ज्ञान में निपुण होकर सुनकर ब्रह्मज्ञान का उपदेश देता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 52 (skanda.7.397.52)
गयाश्राद्धं करोत्येकः पितृपक्षे नृपोत्तम । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
gayāśrāddhaṁ karotyekaḥ pitṛpakṣe nṛpottama | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
हे राजश्रेष्ठ, एक व्यक्ति पितृपक्ष में गया में श्राद्ध करता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 53 (skanda.7.397.53)
चांद्रायणसहस्रं च करोत्येकः समाहितः । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुमास्यं समाहितः
cāndrāyaṇasahasraṁ ca karotyekaḥ samāhitaḥ | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक व्यक्ति एकाग्रचित्त होकर एक हजार चान्द्रायण व्रत करता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 54 (skanda.7.397.54)
व्रतं तपः सहस्राब्दमेकः सम्यक्चरेन्नरः । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
vrataṁ tapaḥ sahasrābdamekaḥ samyakcarennaraḥ | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक मनुष्य एक हजार वर्षों तक विधिवत् व्रत और तप का आचरण करता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 55 (skanda.7.397.55)
एकस्तु चतुरो वेदान्सम्यक्पठति ब्राह्मणः । पश्यत्यन्यो हृषीकेशं चातुर्मास्यं समाहितः
ekastu caturo vedānsamyakpaṭhati brāhmaṇaḥ | paśyatyanyo hṛṣīkeśaṁ cāturmāsyaṁ samāhitaḥ
एक ब्राह्मण भली-भाँति चारों वेदों का अध्ययन करता है, दूसरा एकाग्रचित्त होकर चातुर्मास्य में हृषीकेश का दर्शन करता है।
श्लोक 56 (skanda.7.397.56)
बहुना किमिहोक्तेन शृणु संक्षेपतो नृप । एकतस्तु भवेत्सर्वमेकतो हरिदर्शनम्
bahunā kimihoktena śṛṇu saṁkṣepato nṛpa | ekatastu bhavetsarvamekato haridarśanam
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ, हे राजन्, संक्षेप में सुनो - एक ओर वह सब कुछ है, और दूसरी ओर अकेले हरि का दर्शन।
श्लोक 57 (skanda.7.397.57)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्थातव्यं हरिसंनिधौ । अम्बरीषस्य राजर्षेः स्थानके पापनाशने
tasmātsarvaprayatnena sthātavyaṁ harisaṁnidhau | ambarīṣasya rājarṣeḥ sthānake pāpanāśane
इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक राजर्षि अंबरीष के पापनाशक स्थान में हरि के समीप रहना चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.7.397.58)
एकतस्तु हृषीकेश एकतः कर्णिकेश्वरः । तयोर्मर्त्या मृता ये च मानवा नृपसत्तम
ekatastu hṛṣīkeśa ekataḥ karṇikeśvaraḥ | tayormartyā mṛtā ye ca mānavā nṛpasattama
एक ओर हृषीकेश हैं, दूसरी ओर कर्णिकेश्वर हैं। हे राजश्रेष्ठ, जो भी मनुष्य इन दोनों के बीच मरते हैं।
श्लोक 59 (skanda.7.397.59)
अपि कृत्वा महत्पापं गच्छंति हरिसन्निधौ । हृषीकेशं समालोक्य सद्यो मुक्तिमवाप्नुयात्
api kṛtvā mahatpāpaṁ gacchanti harisannidhau | hṛṣīkeśaṁ samālokya sadyo muktimavāpnuyāt
यहाँ तक कि महान पाप करके भी वे हरि के समीप जाते हैं। हृषीकेश का दर्शन करके वे तुरन्त मुक्ति को प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक 60 (skanda.7.397.60)
पुष्पमेकं हृषीकेशे यश्चारोपयते नृप । सुखसौभाग्यसंयुक्त इह लोके परत्र च
puṣpamekaṁ hṛṣīkeśe yaścāropayate nṛpa | sukhasaubhāgyasaṁyukta iha loke paratra ca
हे राजन्, जो एक फूल भी हृषीकेश को अर्पित करता है, वह इस लोक और परलोक में सुख-सौभाग्य से युक्त होता है।
श्लोक 61 (skanda.7.397.61)
हृषीकेशस्य यो भक्त्या करिष्यत्यनुलेपनम् । स यास्यति परं स्थानं जरामरणवर्जितम्
hṛṣīkeśasya yo bhaktyā kariṣyatyanulepanam | sa yāsyati paraṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam
जो भक्तिपूर्वक हृषीकेश को अनुलेपन (चन्दन) अर्पित करता है, वह जरा-मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होता है।
श्लोक 62 (skanda.7.397.62)
संमार्जनं च तस्याग्रे यः करोति समाहितः । यावत्यो रेणवस्तत्र तावद्वर्षशतानि सः । मोदते विष्णुलोकस्थो नात्र कार्या विचारणा
saṁmārjanaṁ ca tasyāgre yaḥ karoti samāhitaḥ | yāvatyo reṇavastatra tāvadvarṣaśatāni saḥ | modate viṣṇulokastho nātra kāryā vicāraṇā
जो एकाग्रचित्त होकर उसके सामने झाड़ू-बुहारी (सफाई) करता है, वहाँ जितने कण होते हैं, उतने ही सौ वर्षों तक वह विष्णुलोक में आनन्द मनाता है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
श्लोक 63 (skanda.7.397.63)
कार्तिके शुक्लपक्षे च एकादश्यां नृपोत्तम । दीपमारोपयेद्यश्च हृषीकेशाग्रतो नृप
kārtike śuklapakṣe ca ekādaśyāṁ nṛpottama | dīpamāropayedyaśca hṛṣīkeśāgrato nṛpa
हे राजश्रेष्ठ, कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को जो हृषीकेश के सामने दीप जलाता है।
श्लोक 64 (skanda.7.397.64)
यथायथा प्रकाशेत पापं जन्मांतरार्जितम् । तथातथा व्रजेन्नाशं तस्य कायादशेषतः
yathāyathā prakāśeta pāpaṁ janmāṁtarārjitam | tathātathā vrajennāśaṁ tasya kāyādaśeṣataḥ
जैसे-जैसे वह दीप प्रकाशित होता है, वैसे-वैसे उसके जन्मान्तर में अर्जित पाप उसके शरीर से पूर्णतः नष्ट होते जाते हैं।
श्लोक 65 (skanda.7.397.65)
पंचामृतेन यः पूजां हृषीकेशे करिष्यति । दध्ना क्षीरेण वा यस्तु न स भूयोऽभिजायते
paṁcāmṛtena yaḥ pūjāṁ hṛṣīkeśe kariṣyati | dadhnā kṣīreṇa vā yastu na sa bhūyo'bhijāyate
जो व्यक्ति पंचामृत से हृषीकेश की पूजा करता है, या दही और दूध से पूजा करता है, वह फिर जन्म नहीं लेता।
श्लोक 66 (skanda.7.397.66)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन हृषीकेशं समर्चयेत् । संसारबंधतो राजन्मुक्तिमाप्नोति मानवः
tasmātsarvaprayatnena hṛṣīkeśaṁ samarcayet | saṁsārabaṁdhato rājanmuktimāpnoti mānavaḥ
इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक हृषीकेश की पूजा करनी चाहिए। हे राजन्, इससे मनुष्य संसार के बन्धन से मुक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 67 (skanda.7.397.67)
हृषीकेशे विशेषेण कर्त्तव्यं पूजनं सदा
hṛṣīkeśe viśeṣeṇa karttavyaṁ pūjanaṁ sadā
हृषीकेश की सदा विशेष रूप से पूजा करनी चाहिए।