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प्रभास खण्ड · अध्याय 398

सिद्धेश्वर-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 397अध्याय-सूचीअध्याय 399

श्लोक 1 (skanda.7.398.1)

पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ देवं सिद्धेश्वरं परम् । सिद्धिदं प्राणिनां सम्यक्सिद्धेन स्थापितं पुरा

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha devaṁ siddheśvaraṁ param | siddhidaṁ prāṇināṁ samyaksiddhena sthāpitaṁ purā

पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब परम देव सिद्धेश्वर के पास जाना चाहिए, जो प्राणियों को सिद्धि देने वाले हैं, जिनकी स्थापना पूर्वकाल में एक सिद्ध ने पूर्णतः की थी।

श्लोक 2 (skanda.7.398.2)

तत्र विश्वावसुर्नाम सिद्धस्तेपे महातपः । बहुवर्षाणि संस्थाप्य शिवं भक्तिपरायणः

tatra viśvāvasurnāma siddhastepe mahātapaḥ | bahuvarṣāṇi saṁsthāpya śivaṁ bhaktiparāyaṇaḥ

वहाँ विश्वावसु नामक सिद्ध ने, शिव की स्थापना करके, भक्तिपरायण होकर अनेक वर्षों तक महान तप किया।

श्लोक 3 (skanda.7.398.3)

जितक्रोधो जितमदो जितसर्वेंद्रियक्रियः । तावद्वर्षसहस्रांते भगवान्वृषभध्वजः । तुतोष नृपतेस्तस्य स्वयं दर्शनमाययौ

jitakrodho jitamado jitasarvendriyakriyaḥ | tāvadvarṣasahasrānte bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ | tutoṣa nṛpatestasya svayaṁ darśanamāyayau

क्रोध, मद और समस्त इन्द्रिय-क्रियाओं को जीतकर, उतने ही हजार वर्षों के अन्त में, भगवान वृषभध्वज प्रसन्न हुए और स्वयं उस राजा (सिद्ध) को दर्शन देने पधारे।

श्लोक 4 (skanda.7.398.4)

अब्रवीत्तं महादेवो वरदोस्मीति पार्थिव

abravīttaṁ mahādevo varado'smīti pārthiva

महादेव ने उससे कहा - हे राजन्, मैं वरदाता हूँ।

श्लोक 5 (skanda.7.398.5)

श्रीभगवानुवाच । वरं वरय भद्रं ते यत्ते मनसि वर्त्तते । दास्यामि ते प्रसन्नोऽहं यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

śrībhagavānuvāca | varaṁ varaya bhadraṁ te yatte manasi varttate | dāsyāmi te prasanno'haṁ yadyapi syātsudurlabham

भगवान ने कहा - तुम्हारा कल्याण हो, जो कुछ तुम्हारे मन में हो, वर माँगो। मैं प्रसन्न होकर तुम्हें दूँगा, भले ही वह अत्यन्त दुर्लभ हो।

श्लोक 6 (skanda.7.398.6)

विश्वावसुरुवाच । एतल्लिंगं सुरश्रेष्ठ ध्यात्वा मनसि निश्चयम् । सर्वान्कामानवाप्नोतु प्रसादात्तव शंकर

viśvāvasuruvāca | etalliṅgaṁ suraśreṣṭha dhyātvā manasi niścayam | sarvānkāmānavāpnotu prasādāttava śaṅkara

विश्वावसु ने कहा - हे देवश्रेष्ठ, जो इस लिंग का मन में निश्चयपूर्वक ध्यान करे, हे शंकर, तुम्हारी कृपा से वह सभी कामनाओं को प्राप्त करे।

श्लोक 7 (skanda.7.398.7)

पुलस्त्य उवाच । एवमस्त्विति स प्रोच्य तत्रैवांतरधीयत । सिद्धेश्वरं ततो गत्वा सिद्धिं याति सहस्रशः

pulastya uvāca | evamastviti sa procya tatraivāṁtaradhīyata | siddheśvaraṁ tato gatvā siddhiṁ yāti sahasraśaḥ

पुलस्त्य ने कहा - "ऐसा ही हो" कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गए। तब सिद्धेश्वर में जाकर हजारों लोग सिद्धि को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.398.8)

प्रभावात्तस्य लिंगस्य कामानिष्टानवाप्नुयुः । ततो धर्मक्रियाः सर्वा गता नाशं धरातले

prabhāvāttasya liṅgasya kāmāniṣṭānavāpnuyuḥ | tato dharmakriyāḥ sarvā gatā nāśaṁ dharātale

उस लिंग के प्रभाव से लोगों को अपनी सभी इच्छित कामनाएँ प्राप्त होने लगीं, जिससे पृथ्वी पर सभी धर्म-क्रियाएँ नष्ट होने लगीं।

श्लोक 9 (skanda.7.398.9)

न कश्चिद्यजते यज्ञैर्न दानानि प्रयच्छति । सिद्धेश्वरप्रसादेन सिद्धिं यांति नरा भुवि

na kaścidyajate yajñairna dānāni prayacchati | siddheśvaraprasādena siddhiṁ yānti narā bhuvi

कोई भी यज्ञों द्वारा यजन नहीं करता, न दान देता है, क्योंकि सिद्धेश्वर की कृपा से पृथ्वी पर मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.398.10)

उच्छिन्नेषु च यज्ञेषु दानेषु नृपसत्तम । इन्द्राद्यास्त्रिदशाः सर्वे परं दुःखमुपागताः

ucchinneṣu ca yajñeṣu dāneṣu nṛpasattama | indrādyāstridaśāḥ sarve paraṁ duḥkhamupāgatāḥ

हे राजश्रेष्ठ, यज्ञों और दानों के बन्द हो जाने पर, इन्द्र आदि सभी देवता अत्यन्त दुःखी हो गए।

श्लोक 11 (skanda.7.398.11)

ज्ञात्वा यज्ञविघातं च तद्विघाताय वासवः । वज्रेणाच्छादयामास यथा सिद्धिर्न जायते

jñātvā yajñavighātaṁ ca tadvighātāya vāsavaḥ | vajreṇācchādayāmāsa yathā siddhirna jāyate

यज्ञों के इस विघात को जानकर, उसे रोकने के लिए इन्द्र ने अपने वज्र से उसे ढक दिया, ताकि सिद्धि प्राप्त न हो सके।

श्लोक 12 (skanda.7.398.12)

तथापि संनिधौ तस्य सिद्धेशस्य नृपोत्तम । कर्मणो जायते सिद्धिः पातकस्य परिक्षयः

tathāpi sannidhau tasya siddheśasya nṛpottama | karmaṇo jāyate siddhiḥ pātakasya parikṣayaḥ

फिर भी, हे राजश्रेष्ठ, उस सिद्धेश्वर की उपस्थिति में कर्मों की सिद्धि होती है, और पापों का पूर्ण नाश होता है।

श्लोक 13 (skanda.7.398.13)

यस्तु माघचतुर्द्दश्यां सोमवारे नृपोत्तम । शुक्लायां वाथ कृष्णायां स्पृष्ट्वा सिद्धो भवेन्नरः

yastu māghacaturddaśyāṁ somavāre nṛpottama | śuklāyāṁ vātha kṛṣṇāyāṁ spṛṣṭvā siddho bhavennaraḥ

हे राजश्रेष्ठ, जो व्यक्ति माघ मास की चतुर्दशी को, चाहे शुक्ल हो या कृष्ण, यदि सोमवार को पड़े, तो उसे स्पर्श करके मनुष्य सिद्ध हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.7.398.14)

अद्यापि जायते सिद्धिः सत्यमेतन्मयोदितम् । तस्मात्सिद्धेश्वरं गत्वा नत्वा यास्यति सद्गतिम्

adyāpi jāyate siddhiḥ satyametanmayoditam | tasmātsiddheśvaraṁ gatvā natvā yāsyati sadgatim

आज भी सिद्धि उत्पन्न होती है, यह सत्य मैंने तुम्हें बताया है। इसलिए सिद्धेश्वर में जाकर प्रणाम करके मनुष्य सद्गति को प्राप्त होता है।

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