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प्रभास खण्ड · अध्याय 399

शुक्रेश्वर-माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 398अध्याय-सूचीअध्याय 400

श्लोक 1 (skanda.7.399.1)

पुलस्त्य उवाच । ततः शुक्रेश्वरं गच्छेच्छुक्रेण स्थापितं पुरा । यं दृष्ट्वा मानवः सद्यः सर्वपापैः प्रमुच्यते

pulastya uvāca | tataḥ śukreśvaraṁ gacchecchukreṇa sthāpitaṁ purā | yaṁ dṛṣṭvā mānavaḥ sadyaḥ sarvapāpaiḥ pramucyate

पुलस्त्य ने कहा - फिर शुक्रेश्वर में जाना चाहिए, जिसकी स्थापना पूर्वकाल में शुक्राचार्य ने की थी, जिसे देखकर मनुष्य तुरन्त सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.7.399.2)

दृष्ट्वा दैत्यान्पुरा देवैर्निर्जितान्नृपसत्तम । चिन्तयामास मेधावी भार्गवस्तान्प्रति द्विजः

dṛṣṭvā daityānpurā devairnirjitānnṛpasattama | ciṁtayāmāsa medhāvī bhārgavastānprati dvijaḥ

हे राजश्रेष्ठ, पूर्वकाल में देवताओं द्वारा पराजित दैत्यों को देखकर, बुद्धिमान भार्गव ब्राह्मण (शुक्राचार्य) उनके विषय में विचार करने लगे।

श्लोक 3 (skanda.7.399.3)

कथं दैत्याः सुराञ्जित्वा प्राप्स्यंति च महायशः । आराध्य शंकरं सिद्धिं गच्छामि मनसेप्सितम्

kathaṁ daityāḥ surāñjitvā prāpsyanti ca mahāyaśaḥ | ārādhya śaṅkaraṁ siddhiṁ gacchāmi manasepsitam

दैत्य देवताओं को जीतकर महायश कैसे प्राप्त करेंगे? शंकर की आराधना करके मैं मनोवांछित सिद्धि प्राप्त करूँगा।

श्लोक 4 (skanda.7.399.4)

एवं स निश्चयं कृत्वा गतोऽर्बुदमथाचलम् । भूमेर्विवरमासाद्य तपस्तेपे सुदारुणम्

evaṁ sa niścayaṁ kṛtvā gato'rbudamathācalam | bhūmervivaramāsādya tapastepe sudāruṇam

ऐसा निश्चय करके वे अर्बुद पर्वत पर गए, और भूमि में एक विवर पाकर अत्यन्त कठोर तप किया।

श्लोक 5 (skanda.7.399.5)

शिवलिंगं प्रतिष्ठाप्य धूपगंधानुलेपनैः । अनिशं पूजयामास श्रद्धया परयान्वितः

śivaliṅgaṁ pratiṣṭhāpya dhūpagandhānulepanaiḥ | aniśaṁ pūjayāmāsa śraddhayā parayānvitaḥ

शिवलिंग की स्थापना करके, धूप, गन्ध और अनुलेपन से, परम श्रद्धा से युक्त होकर वे निरन्तर पूजा करते रहे।

श्लोक 6 (skanda.7.399.6)

ततो वर्षसहस्रांते तुतोष भगवाञ्छिवः । तस्य संदर्शनं दत्त्वा वाक्यमेतदुवाच ह

tato varṣasahasrāṁte tutoṣa bhagavāñchivaḥ | tasya saṁdarśanaṁ dattvā vākyametaduvāca ha

फिर एक हजार वर्ष के अन्त में भगवान शिव प्रसन्न हुए, और उसे दर्शन देकर यह वचन कहा।

श्लोक 7 (skanda.7.399.7)

श्रीमहादेव उवाच । परितुष्टोऽस्मि ते विप्र भक्त्या तव द्विजोत्तम । वरं वरय भद्रं ते यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्

śrīmahādeva uvāca | parituṣṭo'smi te vipra bhaktyā tava dvijottama | varaṁ varaya bhadraṁ te yadyapi syātsudurlabham

महादेव ने कहा - हे विप्र, हे द्विजश्रेष्ठ, तुम्हारी भक्ति से मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ। तुम्हारा कल्याण हो, वर माँगो, भले ही वह अत्यन्त दुर्लभ हो।

श्लोक 8 (skanda.7.399.8)

शुक्र उवाच । यदि तुष्टो महादेव विद्यां देहि महेश्वर । यया जीवंति संप्राप्ता मृत्युं संख्येपि जंतवः

śukra uvāca | yadi tuṣṭo mahādeva vidyāṁ dehi maheśvara | yayā jīvanti samprāptā mṛtyuṁ saṁkhye'pi jaṁtavaḥ

शुक्र ने कहा - हे महादेव, यदि आप प्रसन्न हैं, तो हे महेश्वर, मुझे वह विद्या दीजिए, जिससे युद्ध में मृत्यु को प्राप्त हुए प्राणी भी जीवित हो जाएँ।

श्लोक 9 (skanda.7.399.9)

पुलस्त्य उवाच । प्रदाय वै शिवस्तस्मै तां विद्यां नृपसत्तम । अब्रवीच्च पुनः शुक्रं वरमन्यं वृणीष्व मे

pulastya uvāca | pradāya vai śivastasmai tāṁ vidyāṁ nṛpasattama | abravīcca punaḥ śukraṁ varamanyaṁ vṛṇīṣva me

पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, शिव ने उसे वह विद्या देकर पुनः शुक्र से कहा - मुझसे कोई अन्य वर भी माँगो।

श्लोक 10 (skanda.7.399.10)

शुक्र उवाच । एतत्कार्तिकमासस्य शुक्लाष्टम्यां तु यः स्पृशेत् । ततो लिंगं पूजयेच्च यः पुमाञ्छ्रद्धयान्वितः

śukra uvāca | etatkārtikamāsasya śuklāṣṭamyāṁ tu yaḥ spṛśet | tato liṅgaṁ pūjayecca yaḥ pumāñchraddhayānvitaḥ

शुक्र ने कहा - कार्तिक मास की शुक्ल अष्टमी को जो इसे स्पर्श करे और फिर श्रद्धायुक्त होकर इस लिंग की पूजा करे।

श्लोक 11 (skanda.7.399.11)

अल्पमृत्युभयं तस्य मा भूत्तव प्रसादतः । इष्टान्कामानवाप्नोतु इहलोके परत्र च

alpamṛtyubhayaṁ tasya mā bhūttava prasādataḥ | iṣṭānkāmānavāpnotu ihaloke paratra ca

उसे अकाल मृत्यु का भय आपकी कृपा से न हो। वह इस लोक और परलोक में अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त करे।

श्लोक 12 (skanda.7.399.12)

पुलस्त्य उवाच । एवमस्त्विति स प्रोच्य तत्रैवांतरधीयत । शुक्रोपि दानवान्संख्ये हतान्देवैरनेकशः

pulastya uvāca | evamastviti sa procya tatraivāṁtaradhīyata | śukro'pi dānavānsaṁkhye hatāndevairanekaśaḥ

पुलस्त्य ने कहा - "ऐसा ही हो" कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गए। शुक्र ने भी युद्ध में देवताओं द्वारा मारे गए अनेक दानवों को।

श्लोक 13 (skanda.7.399.13)

विद्यायाश्च प्रभावेन जीवयामास तान्मुनिः । तस्याग्रेऽस्मिन्महाकुण्डं निर्मलं पापनाशनम्

vidyāyāśca prabhāvena jīvayāmāsa tānmuniḥ | tasyāgre'sminmahākuṇḍaṁ nirmalaṁ pāpanāśanam

उस विद्या के प्रभाव से उस मुनि ने पुनर्जीवित कर दिया। उसके सामने यह विशाल, निर्मल, पापनाशक कुण्ड है।

श्लोक 14 (skanda.7.399.14)

तत्र स्नातो नरः सम्यक्पातकैश्च प्रमुच्यते । तत्र श्राद्धेन राजेंद्र तुष्टा यांति पितामहाः

tatra snāto naraḥ samyakpātakaiśca pramucyate | tatra śrāddhena rājendra tuṣṭā yānti pitāmahāḥ

वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य पूर्णतः पापों से मुक्त हो जाता है। हे राजेन्द्र, वहाँ श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होकर स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 15 (skanda.7.399.15)

तर्पिताः सलिलेनैव किं पुनः पिंडदानतः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत्

tarpitāḥ salilenaiva kiṁ punaḥ piṇḍadānataḥ | tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret

केवल जल के तर्पण से ही वे तृप्त हो जाते हैं, फिर पिण्डदान से क्या कहना! इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिए।

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