प्रभास खण्ड · अध्याय 400
मणिकर्णिकेश्वर-माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.400.1)
पुलस्त्य उवाच । ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ तीर्थं पापप्रणाशनम् । मणिकर्णिकसंज्ञं तु सर्वलोकेषु विश्रुतम्
pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha tīrthaṁ pāpapraṇāśanam | maṇikarṇikasaṁjñaṁ tu sarvalokeṣu viśrutam
पुलस्त्य ने कहा - हे राजश्रेष्ठ, तब पापनाशक तीर्थ में जाना चाहिए, जो मणिकर्णिका नाम से सभी लोकों में विख्यात है।
श्लोक 2 (skanda.7.400.2)
यत्र सिद्धिं गता राजन्वालखिल्या महर्षयः । तैस्तत्र निर्मितं कुण्डं सुरम्यं गिरिगह्वरे
yatra siddhiṁ gatā rājanvālakhilyā maharṣayaḥ | taistatra nirmitaṁ kuṇḍaṁ suramyaṁ girigahvare
हे राजन्, जहाँ वालखिल्य महर्षि सिद्धि को प्राप्त हुए। उन्होंने वहाँ पर्वत की गुफा में यह सुरम्य कुण्ड बनाया।
श्लोक 3 (skanda.7.400.3)
तेषां तत्रोपविष्टानां मुनीनां भावितात्मनाम् । महाश्चर्यमभूत्तत्र तत्त्वं शृणु नराधिप
teṣāṁ tatropaviṣṭānāṁ munīnāṁ bhāvitātmanām | mahāścaryamabhūttatra tattvaṁ śṛṇu narādhipa
वहाँ बैठे उन भावशुद्ध मुनियों के समक्ष एक महान आश्चर्य हुआ। हे राजन्, उसका तत्त्व सुनिए।
श्लोक 4 (skanda.7.400.4)
किरातवनिता काचिन्नाम्ना च मणिकर्णिका । अतिकृष्णा विरूपाक्षी कराला भीषणाकृतिः
kirātavanitā kācinnāmnā ca maṇikarṇikā | atikṛṣṇā virūpākṣī karālā bhīṣaṇākṛtiḥ
एक किरात (शिकारी) जाति की स्त्री थी, जिसका नाम मणिकर्णिका था। वह अत्यन्त काली, विकृत नेत्रों वाली, भयंकर और डरावने रूप वाली थी।
श्लोक 5 (skanda.7.400.5)
तृषार्त्ता तत्र संप्राप्ता मध्यंदिनगते रवौ । ग्रस्ते च राहुणा सूर्ये प्रविष्टा सलिले तु सा
tṛṣārttā tatra samprāptā madhyaṁdinagate ravau | graste ca rāhuṇā sūrye praviṣṭā salile tu sā
प्यास से व्याकुल होकर वह वहाँ पहुँची, जब सूर्य मध्याह्न में थे। सूर्य राहु द्वारा ग्रस्त होने पर वह उस जल में उतर गई।
श्लोक 6 (skanda.7.400.6)
एतस्मिन्नेव काले तु दिव्यरूपवपुर्धरा । मुनीनां पश्यतां चैव विनिष्क्रांता सुमध्यमा
etasminneva kāle tu divyarūpavapurdharā | munīnāṁ paśyatāṁ caiva viniṣkrāntā sumadhyamā
उसी समय, मुनियों के देखते-देखते, दिव्य रूप धारण किए वह सुन्दर स्त्री जल से बाहर निकली।
श्लोक 7 (skanda.7.400.7)
अथ तस्याः पतिः प्राप्तस्तदन्वेषणतत्परः । पप्रच्छ तां वरारोहां पत्न्या दुःखेन दुःखितः
atha tasyāḥ patiḥ prāptastadanveṣaṇatatparaḥ | papraccha tāṁ varārohāṁ patnyā duḥkhena duḥkhitaḥ
तब उसका पति, जो उसे खोज रहा था, वहाँ आ पहुँचा। अपनी पत्नी के दुःख से दुःखी होकर उसने उस सुन्दरी से पूछा।
श्लोक 8 (skanda.7.400.8)
मम भार्यात्र संप्राप्ता यदि दृष्टा सुमध्यमे । शीघ्रं वद वरारोहे बालकोऽयं तदुद्भवः
mama bhāryātra samprāptā yadi dṛṣṭā sumadhyame | śīghraṁ vada varārohe bālako'yaṁ tadudbhavaḥ
हे सुमध्यमा, यदि मेरी पत्नी यहाँ आती हुई दिखाई दी हो, तो हे सुन्दरी, शीघ्र बताओ - यह बालक उसी से उत्पन्न है।
श्लोक 9 (skanda.7.400.9)
तृषार्त्तश्च क्षुधाविष्टो रुदते च मुहुर्मुहुः । दृष्टा चेत्कथ्यतां सुभ्रूर्विनाऽयं तां मरिष्यति
tṛṣārttaśca kṣudhāviṣṭo rudate ca muhurmuhuḥ | dṛṣṭā cetkathyatāṁ subhrūrvinā'yaṁ tāṁ mariṣyati
प्यास और भूख से व्याकुल यह बार-बार रो रहा है। हे भ्रूवाली, यदि उसे देखा हो तो बताओ, उसके बिना यह मर जाएगा।
श्लोक 10 (skanda.7.400.10)
स्त्र्युवाच । साऽहं ते दयिता कान्त तीर्थस्यास्य प्रभावतः । दिव्यरूपमिदं प्राप्ता देवैरपि सुदुर्लभम्
stryuvāca | sā'haṁ te dayitā kānta tīrthasyāsya prabhāvataḥ | divyarūpamidaṁ prāptā devairapi sudurlabham
स्त्री ने कहा - हे प्रिय, मैं ही तुम्हारी प्रिया हूँ। इस तीर्थ के प्रभाव से मुझे यह दिव्य रूप प्राप्त हुआ है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 11 (skanda.7.400.11)
त्वं चापि सलिले ह्यस्मिन्कुरु स्नानं त्वरान्वितः । प्राप्स्यसि त्वं परं रूपं यथा प्राप्तं मयाऽनघ
tvaṁ cāpi salile hyasminkuru snānaṁ tvarānvitaḥ | prāpsyasi tvaṁ paraṁ rūpaṁ yathā prāptaṁ mayā'nagha
तुम भी शीघ्रता से इस जल में स्नान करो, हे निष्पाप, तुम भी वैसा ही उत्तम रूप प्राप्त कर लोगे, जैसा मैंने प्राप्त किया।
श्लोक 12 (skanda.7.400.12)
अथासौ सह पुत्रेण प्रविष्टस्तत्र निर्झरे । विमुक्ते भास्करे राजन्विरूपश्चाभवत्पुनः
athāsau saha putreṇa praviṣṭastatra nirjhare | vimukte bhāskare rājanvirūpaścābhavatpunaḥ
तब वह अपने पुत्र सहित उस झरने में उतर गया, किन्तु हे राजन्, सूर्य के मुक्त होते ही वह पुनः कुरूप हो गया।
श्लोक 13 (skanda.7.400.13)
दुःखेन मृत्युमापन्नस्तस्मिन्नेव जलाशये । अथ सा भर्तृशोकाच्च मरणे कृतनिश्चया
duḥkhena mṛtyumāpannastasminneva jalāśaye | atha sā bhartṛśokācca maraṇe kṛtaniścayā
दुःख से वह उसी जलाशय में मृत्यु को प्राप्त हो गया। तब पति के शोक से वह स्त्री मरने का निश्चय करने लगी।
श्लोक 14 (skanda.7.400.14)
चितिं कृत्वा समं तेन ज्वालयामास पावकम् । अथ ते मुनयो दृष्ट्वा तथाशीलां शुभांगनाम्
citiṁ kṛtvā samaṁ tena jvālayāmāsa pāvakam | atha te munayo dṛṣṭvā tathāśīlāṁ śubhāṅganām
उसने उसके साथ चिता बनाकर अग्नि प्रज्वलित की। तब उन मुनियों ने उस सुन्दर, सुशील स्त्री को देखकर।
श्लोक 15 (skanda.7.400.15)
कृपया परयाविष्टास्तामूचुर्विस्मयान्विताः । सर्वे तस्याश्च संदृष्ट्वा साहसं च नृपोत्तम
kṛpayā parayāviṣṭāstāmūcurvismayānvitāḥ | sarve tasyāśca saṁdṛṣṭvā sāhasaṁ ca nṛpottama
परम करुणा से आविष्ट होकर, आश्चर्यचकित होकर उससे बोले। हे राजश्रेष्ठ, उसके इस साहस को देखकर सभी।
श्लोक 16 (skanda.7.400.16)
ऋषय ऊचुः । दिव्यरूपं त्वया प्राप्तं देवैरपि सुदुर्लभम् । कस्मादेनं सुपाप्मानमनुगच्छसि भामिनि
ṛṣaya ūcuḥ | divyarūpaṁ tvayā prāptaṁ devairapi sudurlabham | kasmādenaṁ supāpmānamanugacchasi bhāmini
ऋषियों ने कहा - तुमने यह दिव्य रूप पाया है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। हे भामिनी, तुम इस अत्यन्त पापी (कुरूप) पति का अनुसरण क्यों कर रही हो?
श्लोक 17 (skanda.7.400.17)
स्त्र्युवाच । पतिव्रताहं विप्रेन्द्राः सदा भर्तृपरायणा । किं रूपेण करिष्यामि विना पत्या निजेन च
stryuvāca | pativratāhaṁ viprendrāḥ sadā bhartṛparāyaṇā | kiṁ rūpeṇa kariṣyāmi vinā patyā nijena ca
स्त्री ने कहा - हे विप्रेन्द्रो, मैं पतिव्रता हूँ, सदा अपने पति में तत्पर रहती हूँ। अपने पति के बिना मैं इस रूप का क्या करूँगी?
श्लोक 18 (skanda.7.400.18)
विरूपो वा सुरूपो वा दरिद्रो वा धनाधिपः । स्त्रीणामेकः पतिर्भर्त्ता गतिर्नान्या जगत्त्रये
virūpo vā surūpo vā daridro vā dhanādhipaḥ | strīṇāmekaḥ patirbhartā gatirnānyā jagattraye
चाहे कुरूप हो या सुरूप, दरिद्र हो या धनाधिप, स्त्रियों के लिए एक ही पति उनका स्वामी है, तीनों लोकों में उनकी कोई अन्य गति नहीं है।
श्लोक 19 (skanda.7.400.19)
बालकोऽयं मुनिश्रेष्ठा भवच्छरणमागतः । अहं कान्तेन संयुक्ता प्रविशामि हुताशनम्
bālako'yaṁ muniśreṣṭhā bhavaccharaṇamāgataḥ | ahaṁ kāntena saṁyuktā praviśāmi hutāśanam
हे मुनिश्रेष्ठो, यह बालक आपकी शरण में आया है। मैं अपने प्रियतम के साथ मिलकर अग्नि में प्रवेश करूँगी।
श्लोक 20 (skanda.7.400.20)
पुलस्त्य उवाच । अथ ते मुनयः सर्वे ज्ञात्वा तस्याः सुनिश्चयम् । कृपया परयाविष्टाः संवीक्ष्य च परस्परम्
pulastya uvāca | atha te munayaḥ sarve jñātvā tasyāḥ suniścayam | kṛpayā parayāviṣṭāḥ saṁvīkṣya ca parasparam
पुलस्त्य ने कहा - तब उसका दृढ़ निश्चय जानकर वे सभी मुनि परम करुणा से आविष्ट होकर एक-दूसरे को देखने लगे।
श्लोक 21 (skanda.7.400.21)
ततो जीवापयामासुस्तत्पतिं ते मुनीश्वराः । सद्रूपेण समायुक्तं दिव्यलक्षणलक्षितम्
tato jīvāpayāmāsustatpatiṁ te munīśvarāḥ | sadrūpeṇa samāyuktaṁ divyalakṣaṇalakṣitam
तब उन मुनीश्वरों ने उसके पति को पुनर्जीवित किया, सुन्दर रूप से युक्त तथा दिव्य लक्षणों से चिह्नित करके।
श्लोक 22 (skanda.7.400.22)
एतस्मिन्नेव कालं तु विमानं मनसेप्सितम् । देवकन्यासमाकीर्णं सद्यस्तत्र समागतम्
etasminneva kālaṁ tu vimānaṁ manasepsitam | devakanyāsamākīrṇaṁ sadyastatra samāgatam
उसी समय मनोवांछित विमान, देवकन्याओं से भरा हुआ, तुरन्त वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 23 (skanda.7.400.23)
अथ तौ दंपती तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् । पुरतः प्रणिपत्याथ प्रस्थितौ त्रिदिवं प्रति
atha tau daṁpatī teṣāṁ munīnāṁ bhāvitātmanām | purataḥ praṇipatyātha prasthitau tridivaṁ prati
तब वह दम्पति उन भावशुद्ध मुनियों के सामने प्रणाम करके स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गए।
श्लोक 24 (skanda.7.400.24)
अथ तैर्मुनिभिः प्रोक्ता सा नारी मणिकर्णिका । वरं वरय कल्याणि सर्वे तुष्टा वयं तव
atha tairmunibhiḥ proktā sā nārī maṇikarṇikā | varaṁ varaya kalyāṇi sarve tuṣṭā vayaṁ tava
तब उन मुनियों ने उस मणिकर्णिका स्त्री से कहा - हे कल्याणी, वर माँगो, हम सभी तुमसे संतुष्ट हैं।
श्लोक 25 (skanda.7.400.25)
पतिव्रतत्वेन तुष्टाः सत्येन च विशेषतः । नास्माकं दर्शनं व्यर्थं जायते च कथंचन
pativratatvena tuṣṭāḥ satyena ca viśeṣataḥ | nāsmākaṁ darśanaṁ vyarthaṁ jāyate ca kathaṁcana
तुम्हारे पातिव्रत्य और विशेषकर तुम्हारी सत्यनिष्ठा से हम संतुष्ट हैं। हमारा दर्शन किसी भी प्रकार व्यर्थ नहीं जाता।
श्लोक 26 (skanda.7.400.26)
मणिकर्णिकोवाच । यदि मां मुनयस्तुष्टाः प्रयच्छथ वरं मुदा । यदत्रास्ति महालिंगं मन्नाम्ना तद्भविष्यति
maṇikarṇikovāca | yadi māṁ munayastuṣṭāḥ prayacchatha varaṁ mudā | yadatrāsti mahāliṅgaṁ mannāmnā tadbhaviṣyati
मणिकर्णिका ने कहा - हे मुनियो, यदि तुम मुझसे प्रसन्न हो और प्रसन्नतापूर्वक वर देते हो, तो यहाँ जो यह महालिंग है, वह मेरे ही नाम से जाना जाए।
श्लोक 27 (skanda.7.400.27)
एतदेव ममाभीष्टं नान्यदस्ति प्रयोजनम् । सर्वेषां च प्रसादेन स्वर्गं गच्छामि सांप्रतम्
etadeva mamābhīṣṭaṁ nānyadasti prayojanam | sarveṣāṁ ca prasādena svargaṁ gacchāmi sāmpratam
यही मेरा अभीष्ट है, इसके अतिरिक्त और कोई प्रयोजन नहीं है। अब मैं आप सबकी कृपा से स्वर्ग जाती हूँ।
श्लोक 28 (skanda.7.400.28)
ऋषय ऊचुः । एवं भवतु ते ख्यातिस्तीर्थलिंगे वरानने । तव नामान्वितं जातं तीर्थं वै मणिकर्णिका
ṛṣaya ūcuḥ | evaṁ bhavatu te khyātistīrthaliṅge varānane | tava nāmānvitaṁ jātaṁ tīrthaṁ vai maṇikarṇikā
ऋषियों ने कहा - हे सुमुखी, ऐसा ही हो, इस तीर्थ-लिंग में तुम्हारी ख्याति बनी रहे। यह तीर्थ अब तुम्हारे नाम से "मणिकर्णिका" कहलाएगा।
श्लोक 29 (skanda.7.400.29)
पुलस्त्य उवाच । भर्त्रा सह दिवं प्राप्ता पुत्रेणैव समन्विता । वालखिल्यास्तपोनिष्ठा विशेषात्तत्र संस्थिताः
pulastya uvāca | bhartrā saha divaṁ prāptā putreṇaiva samanvitā | vālakhilyāstaponiṣṭhā viśeṣāttatra saṁsthitāḥ
पुलस्त्य ने कहा - वह अपने पति और पुत्र सहित स्वर्ग को प्राप्त हुई। तपोनिष्ठ वालखिल्य ऋषि विशेष रूप से वहीं निवास करने लगे।
श्लोक 30 (skanda.7.400.30)
तत्र सूर्यग्रहे प्राप्ते स्नानदानादिकाः क्रियाः । यः करोति फलं तस्य कुरुक्षेत्रसमं भवेत्
tatra sūryagrahe prāpte snānadānādikāḥ kriyāḥ | yaḥ karoti phalaṁ tasya kurukṣetrasamaṁ bhavet
वहाँ सूर्यग्रहण के समय जो स्नान-दान आदि क्रियाएँ करता है, उसे कुरुक्षेत्र के समान फल प्राप्त होता है।
श्लोक 31 (skanda.7.400.31)
यं यं काममभिध्याय स्नानं तत्र करोति यः । तं तं प्राप्नोति राजेन्द्र सम्यग्ध्यानसमन्वितः
yaṁ yaṁ kāmamabhidhyāya snānaṁ tatra karoti yaḥ | taṁ taṁ prāpnoti rājendra samyagdhyānasamanvitaḥ
हे राजेन्द्र, जो व्यक्ति जिस-जिस कामना का ध्यान करके वहाँ स्नान करता है, वह भली-भाँति ध्यानपूर्वक उसी-उसी कामना को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 32 (skanda.7.400.32)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत् । तीर्थे दानं यथाशक्त्या देवर्षिपितृतर्पणम्
tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret | tīrthe dānaṁ yathāśaktyā devarṣipitṛtarpaṇam
इसलिए हर प्रकार से यत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिए, तथा अपनी शक्ति के अनुसार दान और देव-ऋषि-पितरों का तर्पण करना चाहिए।