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प्रभास खण्ड · अध्याय 405

पिण्डोदकतीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 404अध्याय-सूचीअध्याय 406

श्लोक 1 (skanda.7.405.1)

पुलस्त्य उवाच ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ पिण्डोदकमनुत्तमम् तीर्थं यत्र तपस्तप्तं पिण्डोदकद्विजातिना

pulastya uvāca tato gacchennṛpaśreṣṭha piṇḍodakamanuttamam tīrthaṁ yatra tapastaptaṁ piṇḍodakadvijātinā

पुलस्त्य जी ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ, तदनन्तर उस परम उत्तम पिण्डोदक तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ पिण्डोदक नामक द्विज ने तप किया था।

श्लोक 2 (skanda.7.405.2)

पुरा पिण्डोदकोनाम ब्राह्मणोऽभून्महामते मन्दप्रज्ञोऽल्पमेधावी सोपाध्यायेन पाठितः

purā piṇḍodakonāma brāhmaṇo'bhūnmahāmate mandaprajño'lpamedhāvī sopādhyāyena pāṭhitaḥ

हे महामते, पूर्वकाल में पिण्डोदक नामक एक ब्राह्मण था, जो उपाध्याय द्वारा पढ़ाए जाने पर भी मन्दबुद्धि और अल्पमेधावी था।

श्लोक 3 (skanda.7.405.3)

अशक्तोऽध्ययनं कर्तुं जाड्यभावान्महीपते स वैराग्यं परं गत्वा संप्राप्तो गिरिगह्वरे

aśakto'dhyayanaṁ kartuṁ jāḍyabhāvānmahīpate sa vairāgyaṁ paraṁ gatvā saṁprāpto girigahvare

हे महीपते, जड़बुद्धि के कारण अध्ययन करने में असमर्थ होकर वह परम वैराग्य को प्राप्त होकर एक पर्वत-गुहा में पहुँचा।

श्लोक 4 (skanda.7.405.4)

एतस्मिन्नेव कालेतु तत्रैव च सरस्वती वीणाविनोदसंयुक्ता विविक्ते तमुपस्थिता

etasminneva kāletu tatraiva ca sarasvatī vīṇāvinodasaṁyuktā vivikte tamupasthitā

उसी समय वहाँ वीणावादन में रत सरस्वती देवी उस एकान्त स्थान में उसके पास आईं।

श्लोक 5 (skanda.7.405.5)

तं दृष्ट्वा ब्राह्मणं खिन्नं वैराग्येण समन्वितम् कृपाविष्टा महादेवी वाक्यमेतदुवाच ह

taṁ dṛṣṭvā brāhmaṇaṁ khinnaṁ vairāgyeṇa samanvitam kṛpāviṣṭā mahādevī vākyametaduvāca ha

वैराग्य से युक्त उस खिन्न ब्राह्मण को देखकर, कृपा से भरी महादेवी ने यह वचन कहा।

श्लोक 6 (skanda.7.405.6)

सरस्वत्युवाच कस्मात्त्वं खिद्यसे विप्र विरक्त इव भाससे कस्मान्न हृष्यसि हृदा कस्मादत्र त्वमागतः वद शीघ्रं महाभाग तवांतिके वसाम्यहम्

sarasvatyuvāca kasmāttvaṁ khidyase vipra virakta iva bhāsase kasmānna hṛṣyasi hṛdā kasmādatra tvamāgataḥ vada śīghraṁ mahābhāga tavāṁtike vasāmyaham

सरस्वती ने कहा — हे विप्र, तुम क्यों खिन्न हो? तुम विरक्त-से प्रतीत हो रहे हो। तुम्हारा हृदय प्रसन्न क्यों नहीं है? तुम यहाँ क्यों आए हो? हे महाभाग, शीघ्र कहो — मैं तुम्हारे समीप निवास करूँगी।

श्लोक 7 (skanda.7.405.7)

पिण्डोदक उवाच अहं वैराग्यमापन्न उपाध्यायतिरस्कृतः ज्ञानहीनो महाभागे मृत्युं वांछामि सांप्रतम्

piṇḍodaka uvāca ahaṁ vairāgyamāpanna upādhyāyatiraskṛtaḥ jñānahīno mahābhāge mṛtyuṁ vāṁchāmi sāṁpratam

पिण्डोदक ने कहा — मैं उपाध्याय द्वारा तिरस्कृत होकर वैराग्य को प्राप्त हुआ हूँ; हे महाभागे, ज्ञानहीन होकर अब मैं मृत्यु चाहता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.7.405.8)

न मे सरस्वती देवी जिह्वाग्रे परिवर्तते कारणं नान्यदस्तीह मृत्योर्मम वरानने

na me sarasvatī devī jihvāgre parivartate kāraṇaṁ nānyadastīha mṛtyormama varānane

हे वरानने, मेरी जिह्वा के अग्रभाग पर सरस्वती देवी विराजमान नहीं होतीं; मेरी मृत्यु का इसके अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है।

श्लोक 9 (skanda.7.405.9)

दृष्टोऽकस्मात्त्वया चाहं ततो यास्यामि चान्यतः मरणं हि मम श्रेयो मूकभावान्न जीवितम्

dṛṣṭo'kasmāttvayā cāhaṁ tato yāsyāmi cānyataḥ maraṇaṁ hi mama śreyo mūkabhāvānna jīvitam

अकस्मात् आपके द्वारा देखे जाने पर अब मैं यहाँ से अन्यत्र चला जाऊँगा; क्योंकि मूकभाव में जीवन बिताने से तो मृत्यु ही मेरे लिए श्रेयस्कर है।

श्लोक 10 (skanda.7.405.10)

सरस्वत्युवाच अहं सरस्वती देवी सदास्मिन्वरपर्वते निशासुखे त्रयोदश्यां करोमि वसतिं द्विज तस्मात्त्वं प्रार्थय वरं यदभीष्टं सुदुर्लभम्

sarasvatyuvāca ahaṁ sarasvatī devī sadāsminvaraparvate niśāsukhe trayodaśyāṁ karomi vasatiṁ dvija tasmāttvaṁ prārthaya varaṁ yadabhīṣṭaṁ sudurlabham

सरस्वती ने कहा — हे द्विज, मैं सरस्वती देवी सदा इस उत्तम पर्वत पर सुखद त्रयोदशी की रात्रि में निवास करती हूँ। इसलिए तुम वर माँगो, जो भी तुम्हें अभीष्ट हो, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।

श्लोक 11 (skanda.7.405.11)

पिण्डोदक उवाच प्रसादात्तव वै वाणि सर्वज्ञत्वं ममेप्सितम् एतत्तीर्थं तु मन्नाम्ना ख्यातिं यातु शुचिस्मिते

piṇḍodaka uvāca prasādāttava vai vāṇi sarvajñatvaṁ mamepsitam etattīrthaṁ tu mannāmnā khyātiṁ yātu śucismite

पिण्डोदक ने कहा — हे वाणि, आपकी कृपा से मुझे सर्वज्ञता अभीष्ट है; और हे शुचिस्मिते, यह तीर्थ मेरे नाम से ख्याति को प्राप्त हो।

श्लोक 12 (skanda.7.405.12)

सरस्वत्युवाच अद्यप्रभृति सर्वज्ञो ह्यत्र लोके भविष्यसि नाम्ना तव तथा तीर्थमेतत्ख्यातिं प्रयास्यति

sarasvatyuvāca adyaprabhṛti sarvajño hyatra loke bhaviṣyasi nāmnā tava tathā tīrthametatkhyātiṁ prayāsyati

सरस्वती ने कहा — आज से तुम इस लोक में सर्वज्ञ हो जाओगे; और इसी प्रकार यह तीर्थ भी तुम्हारे नाम से ख्याति को प्राप्त होगा।

श्लोक 13 (skanda.7.405.13)

निशामुखे त्रयोदश्यां योऽत्र स्नानं करिष्यति भविष्यति स सर्वज्ञो यद्यपि स्यात्सुमन्दधीः

niśāmukhe trayodaśyāṁ yo'tra snānaṁ kariṣyati bhaviṣyati sa sarvajño yadyapi syātsumandadhīḥ

जो भी यहाँ त्रयोदशी की रात्रि के आरम्भ में स्नान करेगा, वह सर्वज्ञ हो जाएगा, चाहे वह अत्यन्त मन्दबुद्धि ही क्यों न हो।

श्लोक 14 (skanda.7.405.14)

अत्र मे सततं वासो भविष्यति द्विजोत्तम यस्मात्तस्मात्सदा स्नानं कर्तव्यं सुसमाहितैः

atra me satataṁ vāso bhaviṣyati dvijottama yasmāttasmātsadā snānaṁ kartavyaṁ susamāhitaiḥ

हे द्विजोत्तम, यहाँ मेरा सतत निवास रहेगा; इसलिए सुसमाहित मनुष्यों को सदा यहाँ स्नान करना चाहिए।

श्लोक 15 (skanda.7.405.15)

एवमुक्त्वा ततो देवी तत्रैवांतरधीयत पिण्डोदको हि सर्वज्ञो भूत्वाथ स्वगृहं ययौ व्यस्मापयज्जनान्सर्वांस्तत्तीर्थस्य समाश्रयात्

evamuktvā tato devī tatraivāṁtaradhīyata piṇḍodako hi sarvajño bhūtvātha svagṛhaṁ yayau vyasmāpayajjanānsarvāṁstattīrthasya samāśrayāt

ऐसा कहकर देवी वहीं अन्तर्धान हो गईं। और पिण्डोदक सर्वज्ञ होकर अपने घर गया, तथा उस तीर्थ के आश्रय से उसने सभी लोगों को चकित कर दिया।

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