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प्रभास खण्ड · अध्याय 41

भैरवेश्वर एवं देवमाता माहात्म्य वर्णन

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

श्लोक 1 (skanda.7.41.1)

॥ ईश्वर उवाच ॥ तस्यैव पूर्वदिग्भागे सरस्वत्या प्रतिष्ठितम् ॥ लिंगं महाप्रभावं तु सोमेशादग्निगोचरे

|| īśvara uvāca || tasyaiva pūrvadigbhāge sarasvatyā pratiṣṭhitam || liṁgaṁ mahāprabhāvaṁ tu someśādagnigocare

ईश्वर ने कहा - उसी के पूर्व दिशा भाग में, सोमेश से अग्नि के समीप, सरस्वती द्वारा प्रतिष्ठित महाप्रभावशाली लिंग है।

श्लोक 2 (skanda.7.41.2)

भैरवेश्वररूपस्तु वाडवः कुम्भसंस्थितः ॥ यत्र देव्या समानीतः सागरस्य समीपतः

bhairaveśvararūpastu vāḍavaḥ kumbhasaṁsthitaḥ || yatra devyā samānītaḥ sāgarasya samīpataḥ

भैरवेश्वर के रूप में वाडवाग्नि, जो कलश में स्थित थी, देवी द्वारा सागर के समीप वहाँ लाई गई थी।

श्लोक 3 (skanda.7.41.3)

विश्रामार्थं क्षणं मुक्त्वा देव्या लिंगं प्रतिष्ठितम् ॥ समभ्यर्च्य विधानेन गृहीत्वा वडवानलम्॥ समुद्रमध्ये चिक्षेप देवानां हितकाम्यया

viśrāmārthaṁ kṣaṇaṁ muktvā devyā liṁgaṁ pratiṣṭhitam || samabhyarcya vidhānena gṛhītvā vaḍavānalam|| samudramadhye cikṣepa devānāṁ hitakāmyayā

विश्राम के लिए क्षणभर के लिए रखकर देवी ने वहाँ लिंग की प्रतिष्ठा की; विधिपूर्वक पूजा कर तथा वडवानल को लेकर, देवताओं के हित की कामना से उसे समुद्र के मध्य में डाल दिया।

श्लोक 4 (skanda.7.41.4)

ततो हृष्टतरा देवाः शंखदुन्दुभिनिःस्वनैः ॥ पूरयन्तोंऽबरं देवीमीडिरे पुष्पवृष्टिभिः

tato hṛṣṭatarā devāḥ śaṁkhadundubhiniḥsvanaiḥ || pūrayantoṁ'baraṁ devīmīḍire puṣpavṛṣṭibhiḥ

तब अत्यंत हर्षित देवता शंख और दुंदुभि की ध्वनियों से आकाश को भरते हुए, पुष्पवर्षा से देवी की स्तुति करने लगे।

श्लोक 5 (skanda.7.41.5)

देवमातेति ते नाम कृत्वोचुस्तां तदा सुराः ॥ कृत्वा तु भैरवं कार्यमसाध्यं देवदानवैः

devamāteti te nāma kṛtvocustāṁ tadā surāḥ || kṛtvā tu bhairavaṁ kāryamasādhyaṁ devadānavaiḥ

उसका नाम "देवमाता" रखकर, तब देवताओं ने उससे कहा, जब उसने देव-दानवों के लिए असाध्य भीषण कार्य को सम्पन्न कर दिया था -

श्लोक 6 (skanda.7.41.6)

प्रतिष्ठितवती चात्र यस्माल्लिंगं महोदयम् ॥ त्वं सर्वसरितां श्रेष्ठा सर्वपातकनाशिनी ॥ तस्माद्भैरवनामेति लिंगं ख्यातिं गमिष्यति

pratiṣṭhitavatī cātra yasmālliṁgaṁ mahodayam || tvaṁ sarvasaritāṁ śreṣṭhā sarvapātakanāśinī || tasmādbhairavanāmeti liṁgaṁ khyātiṁ gamiṣyati

- चूँकि तुमने यहाँ महान महिमा वाला लिंग स्थापित किया है, तुम सभी नदियों में श्रेष्ठ, सर्वपापनाशिनी हो, इसीलिए यह लिंग "भैरव" नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त होगा।

श्लोक 7 (skanda.7.41.7)

इत्युक्ता तु तदा देवी भैरवेश्वरनैर्ऋते ॥ सागरस्य स्थिता रम्ये तत्र मूर्त्तिमती सती

ityuktā tu tadā devī bhairaveśvaranairṛte || sāgarasya sthitā ramye tatra mūrttimatī satī

इस प्रकार कहे जाने पर वह देवी भैरवेश्वर के नैर्ऋत्य भाग में, रमणीय सागर के समीप, मूर्तिमती सती रूप में स्थित हो गई।

श्लोक 8 (skanda.7.41.8)

पूजयेत्तां विधानेन तं तथा भैरवेश्वरम् ॥ महानवम्यां यत्नेन कृत्वा स्नानं विधानतः ॥ सरस्वतीं पूजयित्वा वाग्दोषान्मुच्यतेऽखिलात्

pūjayettāṁ vidhānena taṁ tathā bhairaveśvaram || mahānavamyāṁ yatnena kṛtvā snānaṁ vidhānataḥ || sarasvatīṁ pūjayitvā vāgdoṣānmucyate'khilāt

उसकी तथा भैरवेश्वर की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए; महानवमी को यत्नपूर्वक विधिवत् स्नान कर सरस्वती की पूजा करने से समस्त वाग्दोषों से मुक्ति मिलती है।

श्लोक 9 (skanda.7.41.9)

तस्या लिंगं तु संपूज्य संस्नाप्य पयसा पृथक् ॥ अघोरेणैव विधिवत्सम्यग्यात्राफलं लभेत्

tasyā liṁgaṁ tu saṁpūjya saṁsnāpya payasā pṛthak || aghoreṇaiva vidhivatsamyagyātrāphalaṁ labhet

उसकी पूजा करके, तथा अलग से लिंग को दूध से स्नान कराकर, विधिपूर्वक अघोर मंत्र से ही सम्यक् यात्रा-फल प्राप्त होता है।

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