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प्रभास खण्ड · अध्याय 42

चण्डीश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

श्लोक 1 (skanda.7.42.1)

॥ ईश्वर उवाच ॥ ततो गच्छेन्महादेवि चण्डीशं देवमुत्तमम् ॥ सोमेशादीशदिग्भागे धनुषां सप्तके स्थितम्

|| īśvara uvāca || tato gacchenmahādevi caṇḍīśaṁ devamuttamam || someśādīśadigbhāge dhanuṣāṁ saptake sthitam

ईश्वर ने कहा - फिर हे महादेवि! उत्तम देव चण्डीश के पास जाना चाहिए, जो सोमेश से ईशान दिशा में सात धनुष दूर स्थित हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.42.2)

दण्डपाणेस्तु भवनाद्दक्षिणे नातिदूरगम् ॥ चंड्या प्रतिष्ठितं पूर्वं चण्डेनाराधितं ततः

daṇḍapāṇestu bhavanāddakṣiṇe nātidūragam || caṁḍyā pratiṣṭhitaṁ pūrvaṁ caṇḍenārādhitaṁ tataḥ

दण्डपाणि के मंदिर से दक्षिण में, अधिक दूर नहीं, पूर्वकाल में चण्डी द्वारा प्रतिष्ठित तथा तत्पश्चात् चण्ड द्वारा आराधित -

श्लोक 3 (skanda.7.42.3)

गणेन मम देवेशि तत्कृत्वा दुष्करं तपः ॥ तेन चण्डेश्वरं लिंगं प्रख्यातं धरणीतले

gaṇena mama deveśi tatkṛtvā duṣkaraṁ tapaḥ || tena caṇḍeśvaraṁ liṁgaṁ prakhyātaṁ dharaṇītale

- हे देवेशि! मेरे उस गण ने कठिन तपस्या की, उसी से चण्डेश्वर लिंग पृथ्वीतल पर प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 4 (skanda.7.42.4)

स्नापयेत्पयसा पूर्वं दध्ना घृतयुतेन च ॥ मधुनेक्षुरसेनैव कुंकुमेन विलेपयेत्

snāpayetpayasā pūrvaṁ dadhnā ghṛtayutena ca || madhunekṣurasenaiva kuṁkumena vilepayet

पहले दूध से, फिर दही में घी मिलाकर, तथा शहद और गन्ने के रस से स्नान कराना चाहिए; कुंकुम से उसका विलेपन करना चाहिए।

श्लोक 5 (skanda.7.42.5)

कर्पूरोशीरमिश्रेण मृगनाभिरसेन च ॥ चन्दनेन सुगन्धेन पुष्पैः संपूजयेत्ततः

karpūrośīramiśreṇa mṛganābhirasena ca || candanena sugandhena puṣpaiḥ saṁpūjayettataḥ

कपूर और खस के मिश्रण से, कस्तूरी के रस से, सुगंधित चंदन और पुष्पों से फिर उसकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.7.42.6)

दग्ध्वा धूपं पुरो देवि ततो देवस्य चागुरुम् ॥ वस्त्रैः संपूजयेत्पश्चादात्मवित्तानुसारतः

dagdhvā dhūpaṁ puro devi tato devasya cāgurum || vastraiḥ saṁpūjayetpaścādātmavittānusārataḥ

हे देवि! देव के सम्मुख धूप जलाकर, फिर अगुरु जलाकर, तत्पश्चात् अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्रों से उनकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 7 (skanda.7.42.7)

नैवेद्यं परमान्नं च दत्त्वा दीपसम न्वितम् ॥ ततो दद्याद्द्विजातिभ्यो यथाशक्त्या तु दक्षिणाम्

naivedyaṁ paramānnaṁ ca dattvā dīpasama nvitam || tato dadyāddvijātibhyo yathāśaktyā tu dakṣiṇām

नैवेद्य तथा खीर अर्पित कर दीपक सहित, फिर द्विजों को अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए।

श्लोक 8 (skanda.7.42.8)

दक्षिणां दिशमास्थाय यत्किंचित्तत्र दीयते॥ चण्डीशस्य वरारोहे तत्सर्वं चाक्षयं भवेत्

dakṣiṇāṁ diśamāsthāya yatkiṁcittatra dīyate|| caṇḍīśasya varārohe tatsarvaṁ cākṣayaṁ bhavet

दक्षिण दिशा की ओर मुख करके चण्डीश को जो कुछ भी वहाँ दिया जाता है, हे वरारोहे! वह सब अक्षय हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.7.42.9)

यः श्राद्धं कुरुते तत्र चण्डीशस्य तु दक्षिणे ॥ आकल्पं तृप्तिमायांति पितरस्तस्य भामिनि

yaḥ śrāddhaṁ kurute tatra caṇḍīśasya tu dakṣiṇe || ākalpaṁ tṛptimāyāṁti pitarastasya bhāmini

जो वहाँ चण्डीश के दक्षिण में श्राद्ध करता है, हे भामिनि! उसके पितर कल्प-पर्यन्त तृप्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.42.10)

अयने चोत्तरे प्राप्ते यः कुर्याद्घृत कम्बलम् ॥ न स भूयोऽत्र संसारे जन्म प्राप्नोति दारुणम्

ayane cottare prāpte yaḥ kuryādghṛta kambalam || na sa bhūyo'tra saṁsāre janma prāpnoti dāruṇam

उत्तरायण के आने पर जो घी और कम्बल का दान करता है, वह इस संसार में फिर कभी भयंकर जन्म नहीं पाता।

श्लोक 11 (skanda.7.42.11)

एवं कृत्वा नरो भक्त्या यात्रां देवस्य शूलिनः ॥ निर्माल्यातिक्रमोद्भूतैरज्ञानाद्भक्षणोद्भवैः ॥ पापैः प्रमुच्यते जंतुस्तथाऽन्यैः कर्मसंभवैः

evaṁ kṛtvā naro bhaktyā yātrāṁ devasya śūlinaḥ || nirmālyātikramodbhūtairajñānādbhakṣaṇodbhavaiḥ || pāpaiḥ pramucyate jaṁtustathā'nyaiḥ karmasaṁbhavaiḥ

इस प्रकार भक्तिपूर्वक शूलधारी देव की यात्रा करने वाला मनुष्य निर्माल्य के उल्लंघन से उत्पन्न पापों से, अज्ञानवश उसके भक्षण से उत्पन्न पापों से, तथा अन्य कर्मजनित पापों से भी मुक्त हो जाता है।

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