प्रभास खण्ड · अध्याय 413
कपिलातीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.413.1)
पौलस्त्य उवाच ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ कपिलातीर्थमुत्तमम् यत्र स्नातो नरः सम्यङ्मुच्यते सर्वकिल्बिषैः
paulastya uvāca tato gacchennṛpaśreṣṭha kapilātīrthamuttamam yatra snāto naraḥ samyaṅmucyate sarvakilbiṣaiḥ
पुलस्त्य जी ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ, तदनन्तर उस उत्तम कपिलातीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ भलीभाँति स्नान किया हुआ मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.7.413.2)
पुराऽभून्नृपतिर्नाम सुप्रभः परवीरहा नित्यं च मृगयाशीलो मृगाणामहिते रतः
purā'bhūnnṛpatirnāma suprabhaḥ paravīrahā nityaṁ ca mṛgayāśīlo mṛgāṇāmahite rataḥ
पूर्वकाल में सुप्रभ नामक एक राजा था, जो शत्रुवीरों का नाशक था, सदा मृगया-शील और मृगों के अहित में रत रहता था।
श्लोक 3 (skanda.7.413.3)
न तथा स्त्रीषु नो भोगे नाश्वयाने न वारणे तस्याभूदनुरागश्च यथा मृगविमर्द्दने
na tathā strīṣu no bhoge nāśvayāne na vāraṇe tasyābhūdanurāgaśca yathā mṛgavimarddane
उसे न तो स्त्रियों में, न भोग में, न अश्वारोहण में, न गजारोहण में उतना अनुराग था, जितना मृगों के वध में था।
श्लोक 4 (skanda.7.413.4)
स कदाचिन्नृपश्रेष्ठ मृगासक्तोऽर्बुदं गतः अपश्यत्सानुदेशे च मृगीं शिशुसमावृताम्
sa kadācinnṛpaśreṣṭha mṛgāsakto'rbudaṁ gataḥ apaśyatsānudeśe ca mṛgīṁ śiśusamāvṛtām
हे नृपश्रेष्ठ, एक बार वह मृगया में आसक्त होकर अर्बुद पर्वत पर गया और पर्वत की एक उपत्यका में उसने बच्चे से घिरी हुई एक मृगी देखी,
श्लोक 5 (skanda.7.413.5)
स्तनं धयन्तीं सुस्निग्धां शिशोः क्षीरानुरागिणः सा तेन विद्धा बाणेन सहसा नतपर्वणा
stanaṁ dhayantīṁ susnigdhāṁ śiśoḥ kṣīrānurāgiṇaḥ sā tena viddhā bāṇena sahasā nataparvaṇā
जो अपने स्नेहमयी दूध-प्रिय बच्चे को स्तनपान करा रही थी। वह सहसा उसके वक्रपर्व बाण से बिंध गई।
श्लोक 6 (skanda.7.413.6)
अथ सा पार्थिवं दृष्ट्वा प्रगृहीतशरासनम् द्वितीयं योजयानं च मृगी बाणं सुनिर्मलम्
atha sā pārthivaṁ dṛṣṭvā pragṛhītaśarāsanam dvitīyaṁ yojayānaṁ ca mṛgī bāṇaṁ sunirmalam
तब उस राजा को धनुष उठाए, दूसरा उज्ज्वल बाण चढ़ाते देखकर वह मृगी,
श्लोक 7 (skanda.7.413.7)
ततः सा कोपसन्तप्ता भूपालं प्रत्यभाषत नायं धर्मः स्मृतः क्षात्त्रो यस्त्वयाद्य निषेवितः
tataḥ sā kopasaṁtaptā bhūpālaṁ pratyabhāṣata nāyaṁ dharmaḥ smṛtaḥ kṣāttro yastvayādya niṣevitaḥ
क्रोध से संतप्त होकर राजा से बोली — यह वह क्षात्रधर्म नहीं है, जिसका तूने आज आचरण किया है —
श्लोक 8 (skanda.7.413.8)
शयानो मैथुनासक्तः स्तनपो व्याधिपीडितः न हंतव्यो मृगो राजन्मृगी च शिशुना वृता
śayāno maithunāsaktaḥ stanapo vyādhipīḍitaḥ na haṁtavyo mṛgo rājanmṛgī ca śiśunā vṛtā
सोए हुए, मैथुन में आसक्त, स्तनपान कराते हुए, व्याधि से पीड़ित मृग का वध नहीं करना चाहिए, हे राजन्, न ही बच्चे सहित मृगी का।
श्लोक 9 (skanda.7.413.9)
तदद्य मरणं जातं मम सर्वं नृपाधम तव बाणं समासाद्य पुत्रस्य च मया विना
tadadya maraṇaṁ jātaṁ mama sarvaṁ nṛpādhama tava bāṇaṁ samāsādya putrasya ca mayā vinā
इसलिए हे नृपाधम, आज तेरे बाण से मेरी, और मेरे बिना मेरे पुत्र की भी, मृत्यु हो गई।
श्लोक 10 (skanda.7.413.10)
यस्मादहमधर्मेण हता भूमिपते त्वया तस्मादत्रैव सानौ त्वं रौद्रव्याघ्रो भविष्यसि
yasmādahamadharmeṇa hatā bhūmipate tvayā tasmādatraiva sānau tvaṁ raudravyāghro bhaviṣyasi
चूँकि हे भूमिपते, मैं तेरे द्वारा अधर्मपूर्वक मारी गई हूँ, इसलिए यहीं इस पर्वत-शिखर पर तू भयंकर व्याघ्र बनेगा।
श्लोक 11 (skanda.7.413.11)
पुलस्त्य उवाच तच्छ्रुत्वा सुमहत्पापं स नृपो भयसंकुलम् तां वै प्रसादयामास प्राणशेषां तदा मृगीम्
pulastya uvāca tacchrutvā sumahatpāpaṁ sa nṛpo bhayasaṁkulaḥ tāṁ vai prasādayāmāsa prāṇaśeṣāṁ tadā mṛgīm
पुलस्त्य जी ने कहा — उस महापाप को सुनकर भय से व्याकुल राजा ने तब प्राणशेष उस मृगी को मनाने का प्रयत्न किया।
श्लोक 12 (skanda.7.413.12)
अविवेकान्मया भद्रे हता त्वं निर्घृणेन च कुरु शापविमोक्षं त्वं तस्माद्दीनस्य सन्मृगि
avivekānmayā bhadre hatā tvaṁ nirghṛṇena ca kuru śāpavimokṣaṁ tvaṁ tasmāddīnasya sanmṛgi
हे भद्रे, अविवेक से, निर्दयतापूर्वक मैंने तुझे मार डाला; इसलिए हे सन्मृगि, इस दीन को शाप से मुक्ति दे।
श्लोक 13 (skanda.7.413.13)
मृग्युवाच यदा तु कपिलां नाम द्रक्ष्यसे त्वं पयस्विनीम् धेनुं तया समालापात्प्रकृतिं यास्यसे पुनः
mṛgyuvāca yadā tu kapilāṁ nāma drakṣyase tvaṁ payasvinīm dhenuṁ tayā samālāpātprakṛtiṁ yāsyase punaḥ
मृगी ने कहा — जब तू पयस्विनी कपिला नामक गाय को देखेगा, उससे बातचीत करने पर तू पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त होगा।
श्लोक 14 (skanda.7.413.14)
एवमुक्त्वा मृगी राजाग्रतः प्राणैर्व्ययुज्यत पीडिता शरघातेन पुत्रस्नेहाद्विशेषतः
evamuktvā mṛgī rājāgrataḥ prāṇairvyayujyata pīḍitā śaraghātena putrasnehādviśeṣataḥ
ऐसा कहकर मृगी बाण के आघात से, विशेषतः पुत्रस्नेह से पीड़ित होकर, राजा के सामने ही प्राण त्याग गई।
श्लोक 15 (skanda.7.413.15)
अथाऽसौ पार्थिवः सद्यो रौद्रास्यः समजायत व्याघ्रो दशकरालश्च तीक्ष्णदन्तनखस्तथा भक्षयामास तां सेनामात्मीयां क्रोधमूर्च्छितः
athā'sau pārthivaḥ sadyo raudrāsyaḥ samajāyata vyāghro daśakarālaśca tīkṣṇadantanakhastathā bhakṣayāmāsa tāṁ senāmātmīyāṁ krodhamūrcchitaḥ
तब वह राजा तत्क्षण भयंकर मुखवाला, तीक्ष्ण दाँत-नखों वाला व्याघ्र बन गया, और क्रोध से उन्मत्त होकर उसने अपनी ही सेना को खा डाला।
श्लोक 16 (skanda.7.413.16)
ततस्ते सैनिका राजन्हतशेषाः सुदुःखिताः स्वगृहाणि ययुस्तत्र यथा वृत्तं जने पुरे
tataste sainikā rājanhataśeṣāḥ suduḥkhitāḥ svagṛhāṇi yayustatra yathā vṛttaṁ jane pure
हे राजन्, तब वे सैनिक, जो शेष बचे थे, अत्यन्त दुःखी होकर अपने घरों को गए, और नगर के लोगों को,
श्लोक 17 (skanda.7.413.17)
निवेदयन्तो वृत्तांतं चत्वरेषु त्रिकेषु च यथा वै व्याघ्रतां प्राप्तः स राजाऽर्बुदपर्वते
nivedayaṁto vṛttāṁtaṁ catvareṣu trikeṣu ca yathā vai vyāghratāṁ prāptaḥ sa rājā'rbudaparvate
चौराहों और तिराहों में यह वृत्तान्त सुनाने लगे — कि किस प्रकार वह राजा अर्बुद पर्वत पर व्याघ्र बन गया।
श्लोक 18 (skanda.7.413.18)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य पुत्रं भूरिपराक्रमम् राज्येऽभिषेचयामासु नाम्ना ख्यातं महौजसम्
tacchrutvā vacanaṁ tasya putraṁ bhūriparākramam rājye'bhiṣecayāmāsu nāmnā khyātaṁ mahaujasam
यह सुनकर उन्होंने उसके अत्यन्त पराक्रमी, महातेजस्वी और नामतः विख्यात पुत्र का राज्याभिषेक कर दिया।
श्लोक 19 (skanda.7.413.19)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्मिन्सानौ नृपोत्तम तृषार्तं गोकुलं प्राप्तं गोपगोपीसमाकुलम्
kasyacittvatha kālasya tasminsānau nṛpottama tṛṣārtaṁ gokulaṁ prāptaṁ gopagopīsamākulam
हे नृपोत्तम, कुछ समय बीतने पर उस पर्वत-शिखर पर ग्वाल-ग्वालिनों से भरा हुआ एक गोकुल प्यास से व्याकुल होकर आया।
श्लोक 20 (skanda.7.413.20)
तत्रैका गौः परिभ्रष्टा स्वयूथात्तृणतृष्णया कपिलेति च विख्याता स्वयूथस्याग्रगामिनी
tatraikā gauḥ paribhraṣṭā svayūthāttṛṇatṛṣṇayā kapileti ca vikhyātā svayūthasyāgragāminī
वहाँ एक गाय तृण की तृष्णा से अपने झुण्ड से बिछड़ गई — वह कपिला नाम से विख्यात, अपने झुण्ड की अग्रगामिनी थी,
श्लोक 21 (skanda.7.413.21)
अच्छिन्नाग्रतृणं या तु सदा भक्षयते नृप अथ सा गह्वरं प्राप्ता गिरेः शून्यं भयंकरम्
acchinnāgratṛṇaṁ yā tu sadā bhakṣayate nṛpa atha sā gahvaraṁ prāptā gireḥ śūnyaṁ bhayaṁkaram
जो सदा अखंडित अग्रभाग वाला तृण ही खाती थी। वह एक शून्य और भयंकर पर्वत-गुहा में जा पहुँची।
श्लोक 22 (skanda.7.413.22)
तत्राससाद तां व्याघ्रो दंष्ट्रोत्कटमुखावहः सा तं दृष्टवती पापं त्रासमाप मृगीव हि
tatrāsasāda tāṁ vyāghro daṁṣṭrotkaṭamukhāvahaḥ sā taṁ dṛṣṭavatī pāpaṁ trāsamāpa mṛgīva hi
वहाँ उग्र दाढ़ों वाला भयानक मुख धारण करने वाला व्याघ्र उसके पास पहुँचा। उस पापी को देखकर वह मृगी की भाँति भयभीत हो गई,
श्लोक 23 (skanda.7.413.23)
स्मरंती गोकुले बद्धं स्वसुतं क्षीरपायिनम् दुःखेन रुदतीं तां स दृष्ट्वोवाच मृगाधिपः
smaraṁtī gokule baddhaṁ svasutaṁ kṣīrapāyinam duḥkhena rudatīṁ tāṁ sa dṛṣṭvovāca mṛgādhipaḥ
और गोकुल में बँधे अपने दूध पीते बछड़े का स्मरण करने लगी। उसे दुःख से रोते देखकर मृगों के अधिपति ने उससे कहा।
श्लोक 24 (skanda.7.413.24)
व्याघ्र उवाच किं वृथा रुद्यते धेनो मां प्राप्य न हि जीवितम् विद्यते कस्यचिन्मूर्खे स्मरेष्टां देवतां ततः
vyāghra uvāca kiṁ vṛthā rudyate dheno māṁ prāpya na hi jīvitam vidyate kasyacinmūrkhe smareṣṭāṁ devatāṁ tataḥ
व्याघ्र ने कहा — हे धेनु, व्यर्थ क्यों रोती है? मुझे पाकर तेरा जीवित रहना नहीं है। क्या किसी मूर्ख को उस समय अपनी प्रिय देवता का स्मरण होता है?
श्लोक 25 (skanda.7.413.25)
कपिलोवाच स्वजीवितभयाद्व्याघ्र न रोदिमि कथंचन पुत्रो मे बालको गोष्ठ्यां क्षीरपायी प्रतीक्षते
kapilovāca svajīvitabhayādvyāghra na rodimi kathaṁcana putro me bālako goṣṭhyāṁ kṣīrapāyī pratīkṣate
कपिला ने कहा — हे व्याघ्र, मैं अपने जीवन के भय से किसी भी प्रकार नहीं रो रही; मेरा दुधमुँहा बालक बछड़ा गोष्ठ में मेरी प्रतीक्षा कर रहा है।
श्लोक 26 (skanda.7.413.26)
नाद्यापि स तृणा न्यत्ति तेनाहं शोकविक्लवा रोद्मि व्याघ्र सुतस्नेहात्सत्येनात्मानमालभे
nādyāpi sa tṛṇā nyatti tenāhaṁ śokaviklavā rodmi vyāghra sutasnehātsatyenātmānamālabhe
वह अभी तक तृण नहीं खाता; इसलिए मैं शोक से विह्वल हूँ। हे व्याघ्र, मैं पुत्रस्नेह से रो रही हूँ — मैं सत्य की शपथ लेकर कहती हूँ।
श्लोक 27 (skanda.7.413.27)
पाययित्वा सुतं बालं दृष्ट्वा पृष्ट्वा जनं स्वकम् पुनः प्रत्यागमिष्यामि यदि त्वं मन्यसे विभो
pāyayitvā sutaṁ bālaṁ dṛṣṭvā pṛṣṭvā janaṁ svakam punaḥ pratyāgamiṣyāmi yadi tvaṁ manyase vibho
अपने बालक पुत्र को दूध पिलाकर, अपने लोगों को देख-पूछकर, हे विभो, यदि तुम उचित समझो तो मैं पुनः लौट आऊँगी।
श्लोक 28 (skanda.7.413.28)
व्याघ्र उवाच गत्वा स्वसुतसांनिध्यं दृष्ट्वात्मीयं च गोकुलम् पुनरागमनं यत्ते न च तच्छ्रद्दधाम्यहम्
vyāghra uvāca gatvā svasutasāṁnidhyaṁ dṛṣṭvātmīyaṁ ca gokulam punarāgamanaṁ yatte na ca tacchraddadhāmyaham
व्याघ्र ने कहा — अपने पुत्र के पास जाकर, अपना गोकुल देखकर, तेरा पुनः लौटना — इस पर मुझे विश्वास नहीं है।
श्लोक 29 (skanda.7.413.29)
भयान्मां भाषसे चैवं नास्ति प्राणसमं भयम् तस्मात्प्राणभयान्न त्वमागमिष्यसि धेनुके
bhayānmāṁ bhāṣase caivaṁ nāsti prāṇasamaṁ bhayam tasmātprāṇabhayānna tvamāgamiṣyasi dhenuke
तू भय से ऐसा कहती है; प्राण के समान कोई भय नहीं होता। इसलिए, हे धेनुके, प्राण-भय के कारण तू नहीं लौटेगी।
श्लोक 30 (skanda.7.413.30)
कपिलोवाच शपथैरागमिष्यामि सत्यमेतच्छृणुष्व मे प्रत्ययो यदि ते भूयान्मां मुञ्च त्वं मृगाधिप
kapilovāca śapathairāgamiṣyāmi satyametacchṛṇuṣva me pratyayo yadi te bhūyānmāṁ muñca tvaṁ mṛgādhipa
कपिला ने कहा — मैं शपथ लेकर आऊँगी — यह सत्य मुझसे सुनो। हे मृगाधिप, यदि तुझे विश्वास हो, तो मुझे छोड़ दे।
श्लोक 31 (skanda.7.413.31)
व्याघ्र उवाच ब्रूहि ताञ्छपथान्भद्रे समागच्छसि यैः पुनः ततोऽहं प्रत्ययं गत्वा मोचयिष्यामि वा न वा
vyāghra uvāca brūhi tāñchapathānbhadre samāgacchasi yaiḥ punaḥ tato'haṁ pratyayaṁ gatvā mocayiṣyāmi vā na vā
व्याघ्र ने कहा — हे भद्रे, वे शपथें बताओ, जिनसे तू पुनः लौटेगी; फिर मैं विश्वास कर, तुझे छोड़ूँ या न छोड़ूँ।
श्लोक 32 (skanda.7.413.32)
कपिलोवाच वेदाध्ययनसंपन्नं ब्राह्मणं वंचयेत्तु यः तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
kapilovāca vedādhyayanasaṁpannaṁ brāhmaṇaṁ vaṁcayettu yaḥ tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
कपिला ने कहा — जो वेदाध्ययन-सम्पन्न ब्राह्मण को धोखा देता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 33 (skanda.7.413.33)
गुरुद्रोहरतानां च यत्पापं जायते नृणाम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
gurudroharatānāṁ ca yatpāpaṁ jāyate nṛṇām tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
गुरु के प्रति द्रोह करने वाले मनुष्यों को जो पाप लगता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 34 (skanda.7.413.34)
यत्पापं ब्राह्मणं हत्वा गां च हत्वा प्रजायते तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
yatpāpaṁ brāhmaṇaṁ hatvā gāṁ ca hatvā prajāyate tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
ब्राह्मण को मारने और गौ को मारने से जो पाप उत्पन्न होता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 35 (skanda.7.413.35)
मित्रद्रोहे च यत्पापं यत्पापं गुरुवंचके तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
mitradrohe ca yatpāpaṁ yatpāpaṁ guruvaṁcake tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
मित्रद्रोह में जो पाप है, गुरु को ठगने में जो पाप है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 36 (skanda.7.413.36)
यो गां स्पृशति पादेन ब्राह्मणं पावकं तथा तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
yo gāṁ spṛśati pādena brāhmaṇaṁ pāvakaṁ tathā tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
जो गौ, ब्राह्मण और अग्नि को पैर से स्पर्श करता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 37 (skanda.7.413.37)
कूपारामतडागानां यो भंगं कुरुत नरः तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
kūpārāmataḍāgānāṁ yo bhaṁgaṁ kuruta naraḥ tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
कुआँ, बगीचे और तालाबों को जो मनुष्य नष्ट करता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 38 (skanda.7.413.38)
कृतघ्नस्य च यत्पापं सूचकस्य च यद्भवेत् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
kṛtaghnasya ca yatpāpaṁ sūcakasya ca yadbhavet tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
कृतघ्न का जो पाप है, तथा चुगलखोर का जो पाप होता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 39 (skanda.7.413.39)
मद्यमांसरतानां च यत्पापं जायते नृणाम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
madyamāṁsaratānāṁ ca yatpāpaṁ jāyate nṛṇām tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
मद्य-मांस में रत मनुष्यों को जो पाप उत्पन्न होता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 40 (skanda.7.413.40)
राजपैशुन्यकर्तॄणां यत्पापं जायते नृणाम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
rājapaiśunyakartṝṇāṁ yatpāpaṁ jāyate nṛṇām tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
राजा से चुगली करने वालों को जो पाप उत्पन्न होता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 41 (skanda.7.413.41)
वेदविक्रयकर्तॄणां यत्पापं संप्रजायते तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
vedavikrayakartṝṇāṁ yatpāpaṁ saṁprajāyate tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
वेद बेचने वालों को जो पाप उत्पन्न होता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 42 (skanda.7.413.42)
दीयमानं द्विजातीनां निवारयति योऽल्पधीः तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
dīyamānaṁ dvijātīnāṁ nivārayati yo'lpadhīḥ tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
जो अल्पबुद्धि मनुष्य द्विजों को दिए जाते दान में विघ्न डालता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 43 (skanda.7.413.43)
विश्वस्तघातकानां च यत्पापं समुदाहृतम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
viśvastaghātakānāṁ ca yatpāpaṁ samudāhṛtam tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
विश्वस्त का घात करने वालों का जो पाप कहा गया है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 44 (skanda.7.413.44)
द्विजद्वेषरतानां हि यत्पापं जायते नृणाम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
dvijadveṣaratānāṁ hi yatpāpaṁ jāyate nṛṇām tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
द्विजों से द्वेष करने वाले मनुष्यों को जो पाप उत्पन्न होता है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 45 (skanda.7.413.45)
परवादरतानां च पापं यच्च दुरात्मनाम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
paravādaratānāṁ ca pāpaṁ yacca durātmanām tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
दुरात्माओं की परनिंदा में रत रहने का जो पाप है, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 46 (skanda.7.413.46)
रात्रौ ये पापकर्माणो भक्षंति दधिसक्तुकान् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
rātrau ye pāpakarmāṇo bhakṣaṁti dadhisaktukān tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
जो पापकर्मी रात्रि में दधि और सत्तू खाते हैं, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 47 (skanda.7.413.47)
वृंताकं मूलकं श्वेतं रक्तं येऽश्नंति गृंजनम् तेन पापेन लिप्यामि यद्यहं नागमे पुनः
vṛṁtākaṁ mūlakaṁ śvetaṁ raktaṁ ye'śnaṁti gṛṁjanam tena pāpena lipyāmi yadyahaṁ nāgame punaḥ
जो बैंगन, श्वेत मूली और लाल गाजर खाते हैं, यदि मैं पुनः न आऊँ तो उसी पाप से लिप्त होऊँ।
श्लोक 48 (skanda.7.413.48)
पुलस्त्य उवाच स तस्याः शपथाञ्छ्रुत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः प्रत्ययं च तदा गत्वा व्याघ्रो वाक्यमथाब्रवीत्
pulastya uvāca sa tasyāḥ śapathāñchrutvā vismayotphullalocanaḥ pratyayaṁ ca tadā gatvā vyāghro vākyamathābravīt
पुलस्त्य जी ने कहा — उसकी शपथें सुनकर विस्मय से फैली आँखों वाला वह व्याघ्र, तब विश्वास प्राप्त कर, यह वचन बोला।
श्लोक 49 (skanda.7.413.49)
व्याघ्र उवाच गच्छ त्वं गोकुले भद्रे पुनरागमनं कुरु न चैतदवगंतव्यं यदयं वञ्चितो मया
vyāghra uvāca gaccha tvaṁ gokule bhadre punarāgamanaṁ kuru na caitadavagaṁtavyaṁ yadayaṁ vañcito mayā
व्याघ्र ने कहा — हे भद्रे, तू गोकुल जा, और पुनः लौट आना; यह न समझा जाए कि मैं इसमें छला गया हूँ।
श्लोक 50 (skanda.7.413.50)
कपिले गच्छ पश्य त्वं तनयं सुतवत्सले पाययित्वा स्तनं पूर्णमवघ्राय च मूर्धनि
kapile gaccha paśya tvaṁ tanayaṁ sutavatsale pāyayitvā stanaṁ pūrṇamavaghrāya ca mūrdhani
हे कपिले, हे पुत्रवत्सले, जा, अपने पुत्र को देख, उसे भरा हुआ स्तन पिलाकर और उसके सिर को सूँघकर,
श्लोक 51 (skanda.7.413.51)
मातरं भ्रातरं दृष्ट्वा सखीः स्वजनवबांधवान् सत्यमेवाग्रतः कृत्वा नान्यथा कर्तुमर्हसि
mātaraṁ bhrātaraṁ dṛṣṭvā sakhīḥ svajanavabāṁdhavān satyamevāgrataḥ kṛtvā nānyathā kartumarhasi
अपनी माता, भाई, सखियों, स्वजनों और बान्धवों को देखकर, सत्य को ही आगे रखकर — अन्यथा मत करना।
श्लोक 52 (skanda.7.413.52)
पुलस्त्य उवाच साऽनुज्ञाता मृगेन्द्रेण कपिला पुत्रवत्सला अश्रुपूर्णमुखी दीना प्रस्थिता गोकुलं प्रति
pulastya uvāca sā'nujñātā mṛgendreṇa kapilā putravatsalā aśrupūrṇamukhī dīnā prasthitā gokulaṁ prati
पुलस्त्य जी ने कहा — मृगेन्द्र से आज्ञा पाकर पुत्रवत्सला कपिला, अश्रुपूर्ण मुख वाली, दीन, गोकुल की ओर चल पड़ी,
श्लोक 53 (skanda.7.413.53)
वेपमाना भयोद्विग्ना शोकसागरमध्यगा करिणीव हि रौद्रेण हरिणा सा बलीयसा ततः स्वगोकुलं प्राप्ता रभमाणा मुहुर्मुहुः
vepamānā bhayodvignā śokasāgaramadhyagā kariṇīva hi raudreṇa hariṇā sā balīyasā tataḥ svagokulaṁ prāptā rabhamāṇā muhurmuhuḥ
काँपती हुई, भय से व्याकुल, शोक-सागर के मध्य में डूबी हुई — मानो किसी बलवान् भयंकर सिंह से पीछा की गई हथिनी हो। फिर वह अपने गोकुल में पहुँची, बार-बार रँभाती हुई।
श्लोक 54 (skanda.7.413.54)
तस्याः शब्दं ततः श्रुत्वा ज्ञात्वा वत्सः स्वमातरम् सम्मुखः प्रययौ तूर्णमूर्द्ध्वपुच्छः प्रहर्षितः
tasyāḥ śabdaṁ tataḥ śrutvā jñātvā vatsaḥ svamātaram sammukhaḥ prayayau tūrṇamūrdhvapucchaḥ praharṣitaḥ
उसका शब्द सुनकर और अपनी माता को पहचानकर वह बछड़ा हर्षित होकर पूँछ ऊपर उठाए हुए तुरन्त उसके सम्मुख दौड़ा।
श्लोक 55 (skanda.7.413.55)
अकालागमनं तस्या रौद्रं भंभारवं तथा दृष्ट्वा श्रुत्वा च वत्सोऽसौ शंकितः परिपृच्छति
akālāgamanaṁ tasyā raudraṁ bhaṁbhāravaṁ tathā dṛṣṭvā śrutvā ca vatso'sau śaṁkitaḥ paripṛcchati
उसके असमय आगमन और उसकी भयंकर रँभाहट को देख-सुनकर, वह बछड़ा शंकित होकर पूछने लगा।
श्लोक 56 (skanda.7.413.56)
वत्स उवाच न ते पश्यामि सौम्यत्वं दुर्मना इव लक्ष्यमे किमर्थमन्यवेलायां समायाता वदस्व मे
vatsa uvāca na te paśyāmi saumyatvaṁ durmanā iva lakṣyame kimarthamanyavelāyāṁ samāyātā vadasva me
बछड़े ने कहा — मुझे तेरी सौम्यता नहीं दिख रही, तू मुझे उद्विग्न-सी लग रही है। किस कारण तू असमय आई है, मुझे बता।
श्लोक 57 (skanda.7.413.57)
कपिलोवाच पिब पुत्र स्तनं पश्चात्कारणं चापि मे शृणु आगताऽहं तव स्नेहात्कुरु तृप्तिं यथेप्सिताम्
kapilovāca piba putra stanaṁ paścātkāraṇaṁ cāpi me śṛṇu āgatā'haṁ tava snehātkuru tṛptiṁ yathepsitām
कपिला ने कहा — पहले दूध पी ले, पुत्र, फिर कारण भी मुझसे सुन। तेरे स्नेह के कारण मैं आई हूँ, यथेच्छ तृप्त हो ले।
श्लोक 58 (skanda.7.413.58)
अपश्चिममिदं पुत्र दुर्लभं मातृदर्शनम् मयाऽद्य पुत्र गंतव्यं शपथैरागता यतः
apaścimamidaṁ putra durlabhaṁ mātṛdarśanam mayā'dya putra gaṁtavyaṁ śapathairāgatā yataḥ
यह, हे पुत्र, तेरी माता का अन्तिम और दुर्लभ दर्शन है। आज मुझे जाना है, पुत्र, क्योंकि मैं शपथ लेकर यहाँ आई हूँ।
श्लोक 59 (skanda.7.413.59)
व्याघ्रस्य कामरूपस्य दातव्यं जीवितं मया तेनाहं शपथैर्मुक्ता कारणात्तव पुत्रक
vyāghrasya kāmarūpasya dātavyaṁ jīvitaṁ mayā tenāhaṁ śapathairmuktā kāraṇāttava putraka
इच्छानुसार रूप धारण करने वाले व्याघ्र को मुझे अपना जीवन देना है। इसीलिए, पुत्र, तेरे कारण मैं शपथों से मुक्त हुई हूँ।
श्लोक 60 (skanda.7.413.60)
मयाऽद्य तत्र गंतव्यं मृगराजसमीपतः यदा च शपथैः पुत्र दास्यामि च कलेवरम्
mayā'dya tatra gaṁtavyaṁ mṛgarājasamīpataḥ yadā ca śapathaiḥ putra dāsyāmi ca kalevaram
आज मुझे वहाँ, मृगराज के समीप जाना है, क्योंकि पुत्र, मुझे शपथों द्वारा अपना शरीर देना है।
श्लोक 61 (skanda.7.413.61)
वत्स उवाच अहं तत्र गमिष्यामि यत्र त्वं गंतुमिच्छसि श्लाघ्यं हि मरणं मेऽद्य त्वया सह न संशयः
vatsa uvāca ahaṁ tatra gamiṣyāmi yatra tvaṁ gaṁtumicchasi ślāghyaṁ hi maraṇaṁ me'dya tvayā saha na saṁśayaḥ
बछड़े ने कहा — मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ तू जाना चाहती है; क्योंकि आज तेरे साथ मेरी मृत्यु प्रशंसनीय ही होगी, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 62 (skanda.7.413.62)
एकाकिनाऽपि मर्त्तव्यं यस्मान्मया त्वया विना यदि मां सहितं तत्र त्वया व्याघ्रो वधिष्यति
ekākinā'pi marttavyaṁ yasmānmayā tvayā vinā yadi māṁ sahitaṁ tatra tvayā vyāghro vadhiṣyati
चूँकि तेरे बिना मुझे अकेले भी मरना ही है, इसलिए यदि व्याघ्र वहाँ तेरे साथ मुझे भी मार डाले,
श्लोक 63 (skanda.7.413.63)
या गतिर्मातृभक्तानां ध्रुवं सा मे भविष्यति तस्मादवश्यं यास्यामि त्वया सह न संशयः
yā gatirmātṛbhaktānāṁ dhruvaṁ sā me bhaviṣyati tasmādavaśyaṁ yāsyāmi tvayā saha na saṁśayaḥ
तो जो गति मातृभक्तों की होती है, वह निश्चय ही मेरी होगी। इसलिए मैं तेरे साथ अवश्य जाऊँगा, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 64 (skanda.7.413.64)
अथवाऽत्रैव तिष्ठ त्वं शपथाः संतु मे तव तव स्थाने प्रयास्यामि मातस्त्वं यदि मन्यसे
athavā'traiva tiṣṭha tvaṁ śapathāḥ saṁtu me tava tava sthāne prayāsyāmi mātastvaṁ yadi manyase
अथवा तू यहीं ठहर, शपथें मुझ पर हों तेरे बदले। हे माता, यदि तू उचित समझे, तो मैं तेरे स्थान पर जाऊँगा।
श्लोक 65 (skanda.7.413.65)
जनन्या विप्रयुक्तस्य जीवितं न हि मे प्रियम् नास्ति मातृसमः कश्चिद्बालानां क्षीरजीविनाम्
jananyā viprayuktasya jīvitaṁ na hi me priyam nāsti mātṛsamaḥ kaścidbālānāṁ kṣīrajīvinām
माता से बिछुड़े का जीवन मुझे प्रिय नहीं है। दुग्धजीवी बालकों के लिए माता के समान कोई नहीं होता।
श्लोक 66 (skanda.7.413.66)
नास्ति मातृसमो नाथो नास्ति मातृसमा गतिः ये मातृनिरताः पुत्रास्ते यांति परमां गतिम्
nāsti mātṛsamo nātho nāsti mātṛsamā gatiḥ ye mātṛniratāḥ putrāste yāṁti paramāṁ gatim
माता के समान कोई नाथ नहीं, माता के समान कोई गति नहीं। जो पुत्र माता में रत रहते हैं, वे परम गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 67 (skanda.7.413.67)
कपिलोवाच ममैव विहितो मृत्युर्न ते पुत्रक सांप्रतम् न चायमन्यभूतानां मृत्युः स्यादन्यमृत्युतः
kapilovāca mamaiva vihito mṛtyurna te putraka sāṁpratam na cāyamanyabhūtānāṁ mṛtyuḥ syādanyamṛtyutaḥ
कपिला ने कहा — मृत्यु मेरे ही लिए विहित है, हे पुत्र, अभी तेरे लिए नहीं; और एक प्राणी की मृत्यु दूसरे की मृत्यु से नहीं टल सकती।
श्लोक 68 (skanda.7.413.68)
अपश्चिममिदं पुत्र मातुः सन्देशमुत्तमम् शृणुष्वावहितो भूत्वा परिणामसुखावहम्
apaścimamidaṁ putra mātuḥ sandeśamuttamam śṛṇuṣvāvahito bhūtvā pariṇāmasukhāvaham
यह, हे पुत्र, तेरी माता का अन्तिम और उत्तम सन्देश है; सावधान होकर सुन, यह परिणाम में सुखदायक है।
श्लोक 69 (skanda.7.413.69)
वने चर सदा वत्स अप्रमादपरो भव प्रमादात्सर्वभूतानि विनश्यंति न संशयः
vane cara sadā vatsa apramādaparo bhava pramādātsarvabhūtāni vinaśyaṁti na saṁśayaḥ
हे वत्स, सदा वन में विचरण कर, और सदा अप्रमादी बन; प्रमाद से सभी प्राणी नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 70 (skanda.7.413.70)
न च लोभेन चर्तव्यं विषमस्थं तृणं क्वचित् लोभाद्विनाशो जंतूनामिह लोके परत्र च
na ca lobhena cartavyaṁ viṣamasthaṁ tṛṇaṁ kvacit lobhādvināśo jaṁtūnāmiha loke paratra ca
लोभवश कभी भी विषम स्थान के तृण को नहीं चरना चाहिए; लोभ से इस लोक और परलोक में जीवों का विनाश होता है।
श्लोक 71 (skanda.7.413.71)
समुद्रमटवीं युद्धं विशंते लोभमोहिताः लोभादि कार्यमत्युग्रं कुर्वंति त्याज्य एव सः
samudramaṭavīṁ yuddhaṁ viśaṁte lobhamohitāḥ lobhādi kāryamatyugraṁ kurvaṁti tyājya eva saḥ
लोभ से मोहित होकर प्राणी समुद्र, वन और युद्ध में प्रवेश करते हैं; लोभवश अत्यन्त उग्र कार्य करते हैं — वह लोभ त्याज्य ही है।
श्लोक 72 (skanda.7.413.72)
लोभात्प्रमादादाश्वासात्पुरुषो बाध्यते त्रिभिः तस्माल्लोभो न कर्त्तव्यो न प्रमादो न विश्वसेत्
lobhātpramādādāśvāsātpuruṣo bādhyate tribhiḥ tasmāllobho na karttavyo na pramādo na viśvaset
लोभ, प्रमाद और अति-विश्वास — इन तीनों से पुरुष बाधित होता है; इसलिए लोभ नहीं करना चाहिए, प्रमाद नहीं करना चाहिए, और अन्ध-विश्वास नहीं करना चाहिए।
श्लोक 73 (skanda.7.413.73)
आत्मा च सततं पुत्र रक्षितव्यः प्रयत्नतः सर्वेभ्यः श्वापदेभ्यश्च म्लेच्छेभ्यस्तस्करादितः
ātmā ca satataṁ putra rakṣitavyaḥ prayatnataḥ sarvebhyaḥ śvāpadebhyaśca mlecchebhyastaskarāditaḥ
और हे पुत्र, अपनी रक्षा सदा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए — सभी हिंसक पशुओं से, म्लेच्छों से, चोरों आदि से,
श्लोक 74 (skanda.7.413.74)
तिर्यग्भ्यः पापयोनिभ्यः सदा विचरता वने न च शोकस्त्वया कार्यः सर्वेषां मरणं धुवम्
tiryagbhyaḥ pāpayonibhyaḥ sadā vicaratā vane na ca śokastvayā kāryaḥ sarveṣāṁ maraṇaṁ dhuvam
तथा वन में सदा विचरण करते हुए पापयोनि तिर्यंचों से। और तुझे शोक नहीं करना चाहिए, सबकी मृत्यु ध्रुव है।
श्लोक 75 (skanda.7.413.75)
अस्माकं प्रतिवाचं च शृणु शोकविनाशिनीम् यथा हि पथिकः कश्चिच्छायार्थी वृक्षमास्थितः विश्रान्तश्च पुनर्याति तद्वद्भूतसमागमः
asmākaṁ prativācaṁ ca śṛṇu śokavināśinīm yathā hi pathikaḥ kaścicchāyārthī vṛkṣamāsthitaḥ viśrāntaśca punaryāti tadvadbhūtasamāgamaḥ
अब हमारा यह शोकनाशक उत्तर सुन — जैसे कोई पथिक छाया चाहकर वृक्ष के नीचे बैठता है, और विश्राम कर पुनः चल पड़ता है, वैसा ही प्राणियों का यह समागम है।
श्लोक 76 (skanda.7.413.76)
पुलस्त्य उवाच एवं संभाष्य तं वत्समवघ्राय च मूर्द्धनि स्वमातरं सखीवर्गं ततो द्रष्टुं समागता
pulastya uvāca evaṁ saṁbhāṣya taṁ vatsamavaghrāya ca mūrdhani svamātaraṁ sakhīvargaṁ tato draṣṭuṁ samāgatā
पुलस्त्य जी ने कहा — इस प्रकार अपने बछड़े से बातें कर, उसके सिर को सूँघकर, वह फिर अपनी माता और सखी-वर्ग को देखने के लिए आई।
श्लोक 77 (skanda.7.413.77)
अब्रवीच्च ततो वाक्यं पुत्रशोकेन दुःखिता अंबाः शृणुत मे वाक्यमपश्चिममिदं स्फुटम्
abravīcca tato vākyaṁ putraśokena duḥkhitā aṁbāḥ śṛṇuta me vākyamapaścimamidaṁ sphuṭam
तब पुत्रशोक से दुःखी होकर उसने यह वचन कहा — हे माताओं, मेरा वचन सुनो, यह स्पष्ट रूप से मेरा अन्तिम वचन है।
श्लोक 78 (skanda.7.413.78)
अनाथमबलं दीनं फेनपं मम पुत्रकम् मातृशोकाभिसंतप्तं सर्वास्तं पालयिष्यथ
anāthamabalaṁ dīnaṁ phenapaṁ mama putrakam mātṛśokābhisaṁtaptaṁ sarvāstaṁ pālayiṣyatha
मेरा यह अनाथ, अबल, दीन, दुधमुँहा पुत्र, माता के शोक से संतप्त — आप सब उसकी रक्षा करना।
श्लोक 79 (skanda.7.413.79)
भाविनीनामयं पुत्रः सांप्रतं च विशेषतः स्नपनीयः पायितव्यः पोष्यः पाल्यः स्वपुत्रवत्
bhāvinīnāmayaṁ putraḥ sāṁprataṁ ca viśeṣataḥ snapanīyaḥ pāyitavyaḥ poṣyaḥ pālyaḥ svaputravat
यह पुत्र अब विशेषतः आप होने वाली माताओं का है; इसे स्नान कराना, पिलाना, पोषण करना और अपने पुत्र की भाँति पालना चाहिए।
श्लोक 80 (skanda.7.413.80)
चरंतं विषमे स्थाने चरंतं परगोकुले अकार्येषु प्रवर्तंतं हे सख्यो वारयिष्यथ
caraṁtaṁ viṣame sthāne caraṁtaṁ paragokule akāryeṣu pravartaṁtaṁ he sakhyo vārayiṣyatha
जब यह विषम स्थान में विचरे, जब यह दूसरे के गोकुल में विचरे, जब यह अकार्यों में प्रवृत्त हो — हे सखियों, तुम इसे रोकना।
श्लोक 81 (skanda.7.413.81)
क्षमध्वं च महाभागा यास्येऽहं सत्यसंश्रयात् यत्राऽसौ तिष्ठते व्याघ्रो मुक्ताऽहं येन सांप्रतम्
kṣamadhvaṁ ca mahābhāgā yāsye'haṁ satyasaṁśrayāt yatrā'sau tiṣṭhate vyāghro muktā'haṁ yena sāṁpratam
हे महाभागाओं, मुझे क्षमा करो; मैं सत्य के आश्रय से वहाँ जाऊँगी, जहाँ वह व्याघ्र है, जिसने अभी मुझे मुक्त किया है।
श्लोक 82 (skanda.7.413.82)
सर्वास्ता वचनं श्रुत्वा तस्याः शोकसमन्विताः विषादं परमं गत्वा वाक्यमूचुः सुदुःखिताः
sarvāstā vacanaṁ śrutvā tasyāḥ śokasamanvitāḥ viṣādaṁ paramaṁ gatvā vākyamūcuḥ suduḥkhitāḥ
वे सब उसका वचन सुनकर, उसके शोक से युक्त होकर, परम विषाद को प्राप्त होकर, अत्यन्त दुःखी होकर यह वचन बोलीं —
श्लोक 83 (skanda.7.413.83)
कपिले नैव गंतव्यं न ते दोषो भविष्यति प्राणात्यये न दोषोऽस्ति संपराये च दारुणे
kapile naiva gaṁtavyaṁ na te doṣo bhaviṣyati prāṇātyaye na doṣo'sti saṁparāye ca dāruṇe
हे कपिले, तुझे जाना ही नहीं चाहिए; तुझे कोई दोष नहीं लगेगा। प्राणसंकट में और घोर विपत्ति में कोई दोष नहीं होता।
श्लोक 84 (skanda.7.413.84)
अत्र गाथा पुरा गीता मुनिभिर्धर्मवादिभिः प्राणात्यये समुत्पन्ने शपथे नास्ति पातकम्
atra gāthā purā gītā munibhirdharmavādibhiḥ prāṇātyaye samutpanne śapathe nāsti pātakam
इस विषय में पूर्वकाल में धर्मवादी मुनियों द्वारा एक गाथा गाई गई है — प्राणसंकट उत्पन्न होने पर शपथ में कोई पाप नहीं होता।
श्लोक 85 (skanda.7.413.85)
कपिलोवाच प्राणिनां प्राण रक्षार्थं वदाम्येवानृतं वचः नात्मार्थमुपयुञ्जामि स्वल्पमप्यनृतं क्वचित्
kapilovāca prāṇināṁ prāṇa rakṣārthaṁ vadāmyevānṛtaṁ vacaḥ nātmārthamupayuñjāmi svalpamapyanṛtaṁ kvacit
कपिला ने कहा — प्राणियों के प्राणों की रक्षा के लिए मैं असत्य वचन भी बोल सकती हूँ; किन्तु अपने लिए मैं कभी थोड़ा भी असत्य काम में नहीं लाती।
श्लोक 86 (skanda.7.413.86)
अश्वमेधसहस्रं तु सत्यं च तुलया धृतम् अश्वमेधसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते
aśvamedhasahasraṁ tu satyaṁ ca tulayā dhṛtam aśvamedhasahasrāddhi satyameva viśiṣyate
एक ओर सहस्र अश्वमेध यज्ञ, और दूसरी ओर सत्य — इन्हें तराजू में रखा जाए, तो सहस्र अश्वमेध यज्ञों से भी सत्य ही श्रेष्ठ है।
श्लोक 87 (skanda.7.413.87)
तस्मान्नानृतमात्मानं करिष्ये जीविताशया आज्ञापयतु मामार्या यास्ये यत्र मृगाधिपः
tasmānnānṛtamātmānaṁ kariṣye jīvitāśayā ājñāpayatu māmāryā yāsye yatra mṛgādhipaḥ
इसलिए जीवन की आशा से मैं स्वयं को असत्य नहीं बनाऊँगी। हे आर्याओं, मुझे आज्ञा दो — मैं वहाँ जाऊँगी, जहाँ मृगाधिप है।
श्लोक 88 (skanda.7.413.88)
वयस्या ऊचुः कपिले त्वं नमस्कार्या सर्वैरपि सुरासुरैः यत्त्वं परमसत्येन प्राणांस्त्यजसि दुस्त्यजान्
vayasyā ūcuḥ kapile tvaṁ namaskāryā sarvairapi surāsuraiḥ yattvaṁ paramasatyena prāṇāṁstyajasi dustyajān
सखियों ने कहा — हे कपिले, तू सभी सुर-असुरों द्वारा भी नमस्कार के योग्य है, क्योंकि तू परम सत्य के लिए दुस्त्यज प्राणों का त्याग कर रही है।
श्लोक 89 (skanda.7.413.89)
अवश्यं न च ते भावी मृत्युः सत्यात्कथंचन प्रमाणं यदि सत्यं हि व्रज पंथाः शिवोऽस्तु ते
avaśyaṁ na ca te bhāvī mṛtyuḥ satyātkathaṁcana pramāṇaṁ yadi satyaṁ hi vraja paṁthāḥ śivo'stu te
सत्य के कारण तेरी मृत्यु किसी भी प्रकार निश्चित नहीं होगी। यदि सत्य ही प्रमाण है, तो जा — तेरा मार्ग शुभ हो।
श्लोक 90 (skanda.7.413.90)
पुलस्त्य उवाच एवमुक्ता च कपिला गता यत्र मृगाधिपः अथासौ कपिलां दृष्ट्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः अब्रवीत्प्रश्रितं वाक्यं हर्षगद्गदया गिरा
pulastya uvāca evamuktā ca kapilā gatā yatra mṛgādhipaḥ athāsau kapilāṁ dṛṣṭvā vismayotphullalocanaḥ abravītpraśritaṁ vākyaṁ harṣagadgadayā girā
पुलस्त्य जी ने कहा — ऐसा कहे जाने पर कपिला वहाँ गई, जहाँ मृगाधिप था। तब कपिला को देखकर वह, विस्मय से फैली आँखों वाला, हर्ष से गद्गद वाणी में विनम्र वचन बोला।
श्लोक 91 (skanda.7.413.91)
व्याघ्र उवाच स्वागतं तव कल्याणि कपिले सत्यवादिनि नहि सत्यवतां किंचिदशुभं विद्यते क्वचित्
vyāghra uvāca svāgataṁ tava kalyāṇi kapile satyavādini nahi satyavatāṁ kiṁcidaśubhaṁ vidyate kvacit
व्याघ्र ने कहा — हे कल्याणि, हे सत्यवादिनि कपिले, तेरा स्वागत है! सत्यवादियों का कहीं कुछ भी अशुभ नहीं होता।
श्लोक 92 (skanda.7.413.92)
त्वयोक्तं कपिले पूर्वं शपथैरागमाय च तेन मे कौतुकं जातं याताऽऽगच्छेत्पुनः कथम्
tvayoktaṁ kapile pūrvaṁ śapathairāgamāya ca tena me kautukaṁ jātaṁ yātā''gacchetpunaḥ katham
हे कपिले, तूने पहले मुझसे कहा था कि तू शपथों से लौटेगी; उससे मुझे कौतुक हुआ था — गई हुई पुनः कैसे लौटेगी?
श्लोक 93 (skanda.7.413.93)
तस्माद्गच्छ मया मुक्ता यत्राऽसौ तनयस्तव तिष्ठते गोकुले बद्धः क्षीरपायी सुदुःखितः
tasmādgaccha mayā muktā yatrā'sau tanayastava tiṣṭhate gokule baddhaḥ kṣīrapāyī suduḥkhitaḥ
इसलिए जा — मैंने तुझे मुक्त कर दिया है — जहाँ तेरा वह पुत्र गोकुल में बँधा हुआ, दूध पीता हुआ, अत्यन्त दुःखी होकर प्रतीक्षा कर रहा है।
श्लोक 94 (skanda.7.413.94)
पुलस्त्य उवाच एतस्मिन्नेव काले तु स राजा प्रकृतिं गतः मृगीशापेन निर्मुक्तो दिव्यरूपवपुर्धरः ततोऽब्रवीत्प्रहृष्टात्मा कपिलां सत्यवादिनीम्
pulastya uvāca etasminneva kāle tu sa rājā prakṛtiṁ gataḥ mṛgīśāpena nirmukto divyarūpavapurdharaḥ tato'bravītprahṛṣṭātmā kapilāṁ satyavādinīm
पुलस्त्य जी ने कहा — उसी क्षण वह राजा मृगी के शाप से मुक्त होकर, दिव्य रूप-शरीर धारण किए हुए, अपने स्वरूप को प्राप्त हो गया। तब हर्षित होकर उसने सत्यवादिनी कपिला से कहा।
श्लोक 95 (skanda.7.413.95)
राजोवाच प्रसादात्तव मुक्तोऽहं शापादस्मात्सुदारुणात् किं ते प्रियं करोम्यद्य धेनुके ब्रूहि सत्वरम्
rājovāca prasādāttava mukto'haṁ śāpādasmātsudāruṇāt kiṁ te priyaṁ karomyadya dhenuke brūhi satvaram
राजा ने कहा — तेरी कृपा से मैं इस अत्यन्त भयंकर शाप से मुक्त हुआ हूँ। हे धेनुके, आज मैं तेरे लिए क्या प्रिय कार्य करूँ, शीघ्र बता।
श्लोक 96 (skanda.7.413.96)
कपिलोवाच कृतकृत्याऽस्मि राजेन्द यत्त्वं मुक्तोऽसि किल्बिषात् पिपासा बाधतेत्यर्थं सांप्रतं जलमानय
kapilovāca kṛtakṛtyā'smi rājenda yattvaṁ mukto'si kilbiṣāt pipāsā bādhatetyarthaṁ sāṁprataṁ jalamānaya
कपिला ने कहा — हे राजेन्द्र, मैं कृतकृत्य हो गई, कि तू पाप से मुक्त हुआ। प्यास मुझे बहुत बाधा दे रही है, अभी जल ले आओ।
श्लोक 97 (skanda.7.413.97)
नैवानृतं विजानीहि सत्यमेतन्मयोदितम्
naivānṛtaṁ vijānīhi satyametanmayoditam
इसे असत्य मत समझो, यह मैंने सत्य ही कहा है।
श्लोक 98 (skanda.7.413.98)
पुलस्त्य उवाच अथासौ पार्थिवो हस्ते चापमादाय सत्वरम् सज्यं कृत्वा शरं गृह्य जघान धरणीतलम्
pulastya uvāca athāsau pārthivo haste cāpamādāya satvaram sajyaṁ kṛtvā śaraṁ gṛhya jaghāna dharaṇītalam
पुलस्त्य जी ने कहा — तब उस राजा ने हाथ में शीघ्र धनुष लेकर, उसे प्रत्यंचा चढ़ाकर और बाण लेकर, धरती पर प्रहार किया।
श्लोक 99 (skanda.7.413.99)
ततः सलिलमुत्तस्थौ निर्मलं शीतलं शुभम् तत्र सा कपिला स्नात्वा वितृषा समपद्यत
tataḥ salilamuttasthau nirmalaṁ śītalaṁ śubham tatra sā kapilā snātvā vitṛṣā samapadyata
तब वहाँ निर्मल, शीतल, शुभ जल उठ खड़ा हुआ। वहाँ उस कपिला ने स्नान कर प्यास से मुक्ति पाई।
श्लोक 100 (skanda.7.413.100)
एतस्मिन्नन्तरे धर्मः स्वयं तत्र समागतः अब्रवीत्कपिलां हृष्टो वरं वरय शोभने
etasminnantare dharmaḥ svayaṁ tatra samāgataḥ abravītkapilāṁ hṛṣṭo varaṁ varaya śobhane
इसी बीच धर्म स्वयं वहाँ आए, और हर्षित होकर कपिला से बोले — हे शोभने, वर माँगो।
श्लोक 101 (skanda.7.413.101)
तव सत्येन तुष्टोऽहं नास्ति ते सदृशी क्वचित् त्रैलोक्ये सकले धेनुर्न भविष्यति वै शुभे
tava satyena tuṣṭo'haṁ nāsti te sadṛśī kvacit trailokye sakale dhenurna bhaviṣyati vai śubhe
तेरे सत्य से मैं प्रसन्न हूँ; तेरे समान कोई कहीं नहीं है। हे शुभे, सम्पूर्ण त्रैलोक्य में तेरे समान कोई गाय नहीं होगी।
श्लोक 102 (skanda.7.413.102)
कपिलोवाच प्रसादात्तव गच्छेय सह राज्ञा सगोकुला सुप्रभेण पदं दिव्यं जरामरणवर्जितम्
kapilovāca prasādāttava gaccheya saha rājñā sagokulā suprabheṇa padaṁ divyaṁ jarāmaraṇavarjitam
कपिला ने कहा — आपकी कृपा से मैं राजा और अपने गोकुल सहित, सुप्रभ के साथ, जरा-मरण से रहित दिव्य पद को प्राप्त होऊँ।
श्लोक 103 (skanda.7.413.103)
मन्नाम्ना ख्यातिमायातु पुण्यमेतज्जलाशयम् सर्वपापहरं नृणां सर्वकामप्रदं तथा
mannāmnā khyātimāyātu puṇyametajjalāśayam sarvapāpaharaṁ nṛṇāṁ sarvakāmapradaṁ tathā
यह पुण्य जलाशय मेरे नाम से ख्याति को प्राप्त हो, मनुष्यों के सब पाप हरने वाला तथा सब कामनाओं को देने वाला हो।
श्लोक 104 (skanda.7.413.104)
धर्म उवाच येऽत्र स्नानं करिष्यंति सुपुण्ये सलिले शुभे चतुर्द्दश्यां विशेषेण ते यास्यंति परां गतिम्
dharma uvāca ye'tra snānaṁ kariṣyaṁti supuṇye salile śubhe caturddaśyāṁ viśeṣeṇa te yāsyaṁti parāṁ gatim
धर्म ने कहा — जो भी यहाँ इस अत्यन्त पुण्य, शुभ जल में स्नान करेंगे, विशेषतः चतुर्दशी को, वे परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 105 (skanda.7.413.105)
तव नाम्ना सुपुण्यं हि तीर्थमेतद्भविष्यति दर्शमुद्दिश्य मर्त्यस्तु प्राप्स्यते गोसहस्रकम् स्नानाल्लक्षगुणं दानात्पुण्यं चैव तथाऽक्षयम्
tava nāmnā supuṇyaṁ hi tīrthametadbhaviṣyati darśamuddiśya martyastu prāpsyate gosahasrakam snānāllakṣaguṇaṁ dānātpuṇyaṁ caiva tathā'kṣayam
तेरे नाम से यह अत्यन्त पुण्यमय तीर्थ प्रसिद्ध होगा। यहाँ दर्शन के उद्देश्य से आने वाला मर्त्य सहस्र गायों का, स्नान से लाखगुना, दान से पुण्य तथा अक्षय फल प्राप्त करेगा।
श्लोक 106 (skanda.7.413.106)
येऽत्र श्राद्धं करिष्यंति मानवाः सुसमाहिताः सर्वदानफलं तेषां भुक्तिमुक्ती महात्मनाम्
ye'tra śrāddhaṁ kariṣyaṁti mānavāḥ susamāhitāḥ sarvadānaphalaṁ teṣāṁ bhuktimuktī mahātmanām
जो सुसमाहित मनुष्य यहाँ श्राद्ध करेंगे, उन महात्माओं को सभी दानों का फल तथा भोग-मुक्ति दोनों प्राप्त होंगे।
श्लोक 107 (skanda.7.413.107)
अपि कीटपतंगा ये तृषार्ताः सलिले शुभे मज्जयिष्यति यास्यंति तेऽपि स्थानं दिवौकसाम्
api kīṭapataṁgā ye tṛṣārtāḥ salile śubhe majjayiṣyati yāsyaṁti te'pi sthānaṁ divaukasām
प्यास से पीड़ित कीट-पतंग भी यदि इस शुभ जल में डुबकी लगाएँगे, तो वे भी देवताओं के स्थान को प्राप्त होंगे —
श्लोक 108 (skanda.7.413.108)
किं पुनर्भक्तिसंयुक्ता मानवाः सत्यवादिनः मनस्विनो महाभागाः श्रद्धावंतो विचक्षणाः
kiṁ punarbhaktisaṁyuktā mānavāḥ satyavādinaḥ manasvino mahābhāgāḥ śraddhāvaṁto vicakṣaṇāḥ
फिर भक्तियुक्त, सत्यवादी, मनस्वी, महाभाग, श्रद्धावान् और विचक्षण मनुष्यों की तो बात ही क्या!
श्लोक 109 (skanda.7.413.109)
पुलस्त्य उवाच एतस्मिन्नेव काले तु विमानानि सहस्रशः समायातानि राजेंद्र कपिलायाः प्रभावतः
pulastya uvāca etasminneva kāle tu vimānāni sahasraśaḥ samāyātāni rājeṁdra kapilāyāḥ prabhāvataḥ
पुलस्त्य जी ने कहा — हे राजेन्द्र, उसी समय कपिला के प्रभाव से सहस्रों विमान वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 110 (skanda.7.413.110)
तान्यारुह्याथ कपिला गोपगोकुलसंकुला सुप्रभेण समायुक्ता तत्पदं परमं गता
tānyāruhyātha kapilā gopagokulasaṁkulā suprabheṇa samāyuktā tatpadaṁ paramaṁ gatā
उन पर आरूढ़ होकर कपिला, गोप-गोकुल से भरी हुई, सुप्रभ सहित, उस परम पद को प्राप्त हुई।
श्लोक 111 (skanda.7.413.111)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तत्र स्नानं समाचरेत् श्राद्धं चैवात्मनः शक्त्या दानं पार्थिवसत्तम
tasmātsarvaprayatnena tatra snānaṁ samācaret śrāddhaṁ caivātmanaḥ śaktyā dānaṁ pārthivasattama
हे पार्थिवसत्तम, इसलिए सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक वहाँ स्नान करना चाहिए, तथा अपनी शक्ति के अनुसार श्राद्ध और दान करना चाहिए।