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प्रभास खण्ड · अध्याय 431

गौतमाश्रम तीर्थ माहात्म्य वर्णन

अध्याय 430अध्याय-सूचीअध्याय 432

श्लोक 1 (skanda.7.431.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ सुपूर्णं गौतमाश्रमम् । यत्र पूर्वं तपस्तप्तं गौतमेन महात्मना

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha supūrṇaṁ gautamāśramam | yatra pūrvaṁ tapastaptaṁ gautamena mahātmanā

पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर अत्यन्त पूर्णताप्रद गौतमाश्रम में जाना चाहिए, जहाँ महात्मा गौतम ने पूर्वकाल में तपस्या की थी।

श्लोक 2 (skanda.7.431.2)

पुराऽऽसीद्गौतमो नाम मुनिः परमधार्मिकः । स भक्त्याऽऽराधयामास देवदेवं महेश्वरम्

purāsīdgautamo nāma muniḥ paramadhārmikaḥ | sa bhaktyārādhayāmāsa devadevaṁ maheśvaram

पूर्वकाल में गौतम नामक एक परम धार्मिक मुनि थे। उन्होंने भक्तिपूर्वक देवदेव महेश्वर की आराधना की।

श्लोक 3 (skanda.7.431.3)

भक्त्याऽऽराधयमानस्य निर्भिद्य धरणीतलम् । समुत्तस्थौ महल्लिंगं परं माहेश्वरं नृप

bhaktyārādhayamānasya nirbhidya dharaṇītalam | samuttasthau mahalliṅgaṁ paraṁ māheśvaraṁ nṛpa

हे राजन्! भक्तिपूर्वक आराधना करते हुए उनके सामने पृथ्वीतल को भेदकर एक महान् परम माहेश्वर लिंग प्रकट हुआ।

श्लोक 4 (skanda.7.431.4)

एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी । पूजयैतन्महल्लिंगं त्वद्भक्त्या समुपस्थितम् । वरं वरय भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते

etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī | pūjayaitanmahalliṅgaṁ tvadbhaktyā samupasthitam | varaṁ varaya bhadraṁ te yatte manasi vartate

उसी समय एक अशरीरी वाणी ने कहा - "तुम्हारी भक्ति से प्रकट हुए इस महान् लिंग की पूजा करो। तुम्हारे मन में जो हो, वह वर माँगो - तुम्हारा कल्याण हो।"

श्लोक 5 (skanda.7.431.5)

॥ गौतम उवाच ॥ अत्राश्रमपदे देव त्वया शम्भो जगत्पते । सदा कार्यं हि सान्निध्यं यदि तुष्टो मम प्रभो

gautama uvāca | atrāśramapade deva tvayā śambho jagatpate | sadā kāryaṁ hi sānnidhyaṁ yadi tuṣṭo mama prabho

गौतम ने कहा - "हे देव! हे शम्भो! हे जगत्पते! हे प्रभो! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो आपकी सन्निधि इस आश्रम में सदा बनी रहे।"

श्लोक 6 (skanda.7.431.6)

यस्त्वां पश्यति सद्भक्त्या ब्रह्मलोकं स गच्छतु

yastvāṁ paśyati sadbhaktyā brahmalokaṁ sa gacchatu

"जो सच्ची भक्ति से आपका दर्शन करता है, वह ब्रह्मलोक को जाए।"

श्लोक 7 (skanda.7.431.7)

॥ आकाशवाण्युवाच ॥ माघमासे चतुर्द्दश्यां योऽत्र मां वीक्षयिष्यति । कृष्णायां ब्राह्मणश्रेष्ठ स यास्यति परां गतिम्

ākāśavāṇyuvāca | māghamāse caturddaśyāṁ yo'tra māṁ vīkṣayiṣyati | kṛṣṇāyāṁ brāhmaṇaśreṣṭha sa yāsyati parāṁ gatim

आकाशवाणी ने कहा - "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! जो माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को यहाँ मेरा दर्शन करेगा, वह परम गति को प्राप्त होगा।"

श्लोक 8 (skanda.7.431.8)

एवमुक्त्वा ततो वाणी विरराम महीपते । तत्रास्ति कुण्डमपरं पवित्रं जलपूरितम् । तत्र स्नातो नरः सद्यः कुलं तारयतेऽखिलम्

evamuktvā tato vāṇī virarāma mahīpate | tatrāsti kuṇḍamaparaṁ pavitraṁ jalapūritam | tatra snāto naraḥ sadyaḥ kulaṁ tārayate'khilam

हे भूपते! ऐसा कहकर वह वाणी मौन हो गयी। वहाँ एक अन्य पवित्र, जल से परिपूर्ण कुण्ड है। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य तत्काल अपने सम्पूर्ण कुल को तार देता है।

श्लोक 9 (skanda.7.431.9)

यस्तत्र कुरुते श्राद्धं विशेषादिन्दुसंक्षये । गयाश्राद्धफलं तस्य सकलं जायते ध्रुवम्

yastatra kurute śrāddhaṁ viśeṣādindusaṁkṣaye | gayāśrāddhaphalaṁ tasya sakalaṁ jāyate dhruvam

जो वहाँ विशेष रूप से अमावस्या को श्राद्ध करता है, उसे निश्चय ही सम्पूर्ण गया-श्राद्ध का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 10 (skanda.7.431.10)

तत्र दानं प्रशंसंति तिलानां मुनिपुंगवाः । तिलसंख्यानि वर्षाणि दानात्स्वर्गे वसेन्नृप

tatra dānaṁ praśaṁsanti tilānāṁ munipuṅgavāḥ | tilasaṁkhyāni varṣāṇi dānātsvarge vasennṛpa

वहाँ मुनिश्रेष्ठ तिल के दान की प्रशंसा करते हैं। हे राजन्! उस दान से मनुष्य तिलों की संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 11 (skanda.7.431.11)

अर्बुदे गौतमी यात्रा सिंहस्थे च बृहस्पतौ । अमायां सोमवारेण द्विषड्गोदावरीफलम्

arbude gautamī yātrā siṁhasthe ca bṛhaspatau | amāyāṁ somavāreṇa dviṣaḍgodāvarīphalam

सिंहस्थ बृहस्पति में, सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या पर, अर्बुद पर गौतमी की यात्रा गोदावरी के फल से बारह गुना फल देती है।

श्लोक 12 (skanda.7.431.12)

षष्टिवर्षसहस्राणि भागीरथ्यवगाहने । सकृद्गोदावरीस्नानात्सिंहस्थे च बृहस्पतौ

ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi bhāgīrathyavagāhane | sakṛdgodāvarīsnānātsiṁhasthe ca bṛhaspatau

भागीरथी में अवगाहन का साठ सहस्र वर्षों का फल, सिंहस्थ बृहस्पति में एक बार गोदावरी-स्नान से प्राप्त हो जाता है।

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