प्रभास खण्ड · अध्याय 432
कुलसंतारण तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.432.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ कुलसंतारणं गच्छेत्तत्र तीर्थमनुत्तमम् । यत्र स्नातो नरः सम्यक्कुलं तारयतेऽखिलम्
pulastya uvāca | kulasaṁtāraṇaṁ gacchettatra tīrthamanuttamam | yatra snāto naraḥ samyakkulaṁ tārayate'khilam
पुलस्त्य ने कहा - वहाँ कुलसंतारण नामक अनुपम तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ भलीभाँति स्नान करने वाला मनुष्य अपने सम्पूर्ण कुल को तार देता है।
श्लोक 2 (skanda.7.432.2)
दश पूर्वान्भविष्यांश्च तथात्मानं नृपोत्तम । उद्धरेच्छ्रद्धयायुक्तस्तत्र दानेन मानवः
daśa pūrvānbhaviṣyāṁśca tathātmānaṁ nṛpottama | uddharecchraddhayāyuktastatra dānena mānavaḥ
हे नृपोत्तम! श्रद्धायुक्त मनुष्य वहाँ दान द्वारा दस पूर्वजों, दस भावी वंशजों तथा स्वयं का भी उद्धार कर लेता है।
श्लोक 3 (skanda.7.432.3)
आसीदप्रस्तुतो नाम राजा पूर्वं स पापकृत् । नापि दानं तथा ज्ञानं न ध्यानं न च सत्क्रिया
āsīdaprastuto nāma rājā pūrvaṁ sa pāpakṛt | nāpi dānaṁ tathā jñānaṁ na dhyānaṁ na ca satkriyā
पूर्वकाल में अप्रस्तुत नामक एक राजा था, जो पापी था। उसमें न दान था, न ज्ञान, न ध्यान और न ही सत्कर्म।
श्लोक 4 (skanda.7.432.4)
तस्मिञ्छासति लोकानां नासीत्सौख्यं कदाचन । परदार रुचिर्नित्यं महादण्डपरश्च सः
tasmiñchāsati lokānāṁ nāsītsaukhyaṁ kadācana | paradāra rucirnityaṁ mahādaṇḍaparaśca saḥ
उसके शासन में प्रजा को कभी सुख नहीं मिला। वह सदा परस्त्री में रुचि रखने वाला तथा अत्यधिक दण्ड देने वाला था।
श्लोक 5 (skanda.7.432.5)
न्यायतोऽन्यायतो वापि करोति धनसंग्रहम् । स घातयति लोकांश्च निर्दोषान्पापकृत्तमः
nyāyato'nyāyato vāpi karoti dhanasaṁgraham | sa ghātayati lokāṁśca nirdoṣānpāpakṛttamaḥ
वह न्याय से या अन्याय से धन एकत्रित करता था। वह महापापी निर्दोष लोगों की भी हत्या करवा देता था।
श्लोक 6 (skanda.7.432.6)
ततो वार्धक्यमापन्नस्तथापि न शमं गतः । कस्यचित्त्वथ कालस्य पितृभिः प्रतिबोधितः । तं प्रसुप्तं समासाद्य नारकेयैः सुदुःखितैः
tato vārdhakyamāpannastathāpi na śamaṁ gataḥ | kasyacittvatha kālasya pitṛbhiḥ pratibodhitaḥ | taṁ prasuptaṁ samāsādya nārakeyaiḥ suduḥkhitaiḥ
तत्पश्चात् वह वृद्धावस्था को प्राप्त हुआ, फिर भी उसे शान्ति नहीं मिली। तत्पश्चात् किसी समय, अत्यन्त दुःखी नारकीय पितरों ने सोते हुए उसके पास आकर उसे जगाया।
श्लोक 7 (skanda.7.432.7)
॥ पितर ऊचुः ॥ वयं शुद्धसमाचारा नित्यं धर्मपरायणाः । दानयज्ञतपःशीलाः स्वदारनिरतास्तथा
pitara ūcuḥ | vayaṁ śuddhasamācārā nityaṁ dharmaparāyaṇāḥ | dānayajñatapaḥśīlāḥ svadāraniratāstathā
पितरों ने कहा - "हम शुद्धाचारी, नित्य धर्मपरायण, दान-यज्ञ-तप के स्वभाव वाले, अपनी ही पत्नियों में रत थे -"
श्लोक 8 (skanda.7.432.8)
स्वकर्मभिः कुलांगार दिवं प्राप्ता यथार्हतः । कुपुत्रं त्वां समासाद्य नरकं समुपस्थिताः । तस्मादुद्धर नः सर्वान्कृत्वा किंचिच्छुभार्चनम्
svakarmabhiḥ kulāṅgāra divaṁ prāptā yathārhataḥ | kuputraṁ tvāṁ samāsādya narakaṁ samupasthitāḥ | tasmāduddhara naḥ sarvānkṛtvā kiñcicchubhārcanam
"- अपने-अपने कर्मों से यथोचित स्वर्ग को प्राप्त हुए थे। किन्तु हे कुलांगार! तुझ जैसा कुपुत्र पाकर हम नरक को प्राप्त हो गये हैं। अतः कुछ शुभ पूजा करके हम सबका उद्धार कर।"
श्लोक 9 (skanda.7.432.9)
कर्मभिस्तव पापात्मन्वयं नरकमाश्रिताः । नरकं दश यास्यंति भविष्याश्च तथा भवान्
karmabhistava pāpātmanvayaṁ narakamāśritāḥ | narakaṁ daśa yāsyanti bhaviṣyāśca tathā bhavān
"हे पापात्मन्! तेरे कर्मों से हम नरक में जा पड़े हैं; दस पितर तथा दस भावी वंशज भी नरक जाएँगे, और तू भी।"
श्लोक 10 (skanda.7.432.10)
एवमुक्त्वा च ते सर्वे पितरस्तु सुदुःखिताः । याताश्च नरकं भूयः प्रबुद्धः सोऽपि पार्थिवः
evamuktvā ca te sarve pitarastu suduḥkhitāḥ | yātāśca narakaṁ bhūyaḥ prabuddhaḥ so'pi pārthivaḥ
ऐसा कहकर वे सभी अत्यन्त दुःखी पितर पुनः नरक को चले गये; और वह राजा भी जाग गया।
श्लोक 11 (skanda.7.432.11)
ततो दुःखमनुप्राप्तः पितृवाक्यानि संस्मरन् । रुरोद प्रातरुत्थाय तं भार्या प्रत्यभाषत
tato duḥkhamanuprāptaḥ pitṛvākyāni saṁsmaran | ruroda prātarutthāya taṁ bhāryā pratyabhāṣata
तब दुःखी होकर, पितरों के वचनों का स्मरण करते हुए, वह प्रातःकाल उठकर रोने लगा; उससे उसकी पत्नी ने कहा।
श्लोक 12 (skanda.7.432.12)
॥ इन्दुमत्युवाच ॥ किमर्थं राजशार्दूल त्वं रोदिषि महास्वनम् । कथं ते कुशलं राज्ये शरीरे वा पुरेऽथवा
indumatyuvāca | kimarthaṁ rājaśārdūla tvaṁ rodiṣi mahāsvanam | kathaṁ te kuśalaṁ rājye śarīre vā pure'thavā
इन्दुमती ने कहा - "हे राजशार्दूल! आप इतने जोर से क्यों रो रहे हैं? क्या आपका राज्य, शरीर अथवा नगर में कुशल है?"
श्लोक 13 (skanda.7.432.13)
॥ राजोवाच ॥ मया दृष्टोऽद्य स्वप्नांते पिता ह्यथ पितामहः । अपश्यं दुःखितान्देवि ताभ्यामथाग्रजान्पितॄन्
rājovāca | mayā dṛṣṭo'dya svapnānte pitā hyatha pitāmahaḥ | apaśyaṁ duḥkhitāndevi tābhyāmathāgrajānpitṝn
राजा ने कहा - "हे देवि! आज स्वप्न के अन्त में मैंने अपने पिता तथा पितामह को देखा। मैंने उन्हें तथा उनके साथ अपने पूर्वज पितरों को भी दुःखी देखा।"
श्लोक 14 (skanda.7.432.14)
उपालब्धोऽस्मि तैः सर्वैस्तव कर्मभिरीदृशैः । दारुणे नरके प्राप्ता अधर्मादिविचेष्टितैः
upālabdho'smi taiḥ sarvaistava karmabhirīdṛśaiḥ | dāruṇe narake prāptā adharmādiviceṣṭitaiḥ
"उन सब ने मुझे उलाहना दिया - 'तुम्हारे ऐसे कर्मों से, तुम्हारे अधर्म आदि आचरण से, हम भयंकर नरक को प्राप्त हुए हैं।'"
श्लोक 15 (skanda.7.432.15)
अथान्ये दश यास्यन्ति भविष्याश्च भवानपि । तस्मात्कृत्वा शुभं कर्म दुर्गतेश्चोद्धरस्व नः
athānye daśa yāsyanti bhaviṣyāśca bhavānapi | tasmātkṛtvā śubhaṁ karma durgateścoddharasva naḥ
"'और आगे दस भावी वंशज भी वहाँ जाएँगे, और तुम भी। अतः शुभ कर्म करके इस दुर्गति से हमारा उद्धार करो।'"
श्लोक 16 (skanda.7.432.16)
एवमुक्तः प्रबुद्धोऽहं पितृभिर्वरवर्णिनि । तेनाहं दुःखमापन्नस्तद्वाक्यं हृदि संस्मरन्
evamuktaḥ prabuddho'haṁ pitṛbhirvaravarṇini | tenāhaṁ duḥkhamāpannastadvākyaṁ hṛdi saṁsmaran
"हे वरवर्णिनि! पितरों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर मैं जाग गया। उसी से मैं दुःखी हो गया हूँ, उनके वचन को हृदय में स्मरण करते हुए।"
श्लोक 17 (skanda.7.432.17)
॥ इन्दुमत्युवाच ॥ सत्यमेतन्महाराज यदुक्तोऽसि पितामहैः । न त्वया सुकृतं कर्म संस्मरेऽहं कृतं पुरा
indumatyuvāca | satyametanmahārāja yaduktosi pitāmahaiḥ | na tvayā sukṛtaṁ karma saṁsmare'haṁ kṛtaṁ purā
इन्दुमती ने कहा - "हे महाराज! यह सत्य है, जो आपके पितामहों ने कहा है। मुझे स्मरण नहीं आता कि आपने पहले कभी कोई पुण्य कर्म किया हो।"
श्लोक 18 (skanda.7.432.18)
यथा सुपुत्रमासाद्य तरंति पितरो नृप । कुपुत्रेण तथा यांति नरकं नात्र संशयः
yathā suputramāsādya taranti pitaro nṛpa | kuputreṇa tathā yānti narakaṁ nātra saṁśayaḥ
हे राजन्! जैसे सुपुत्र पाकर पितर तर जाते हैं, वैसे ही कुपुत्र के कारण वे नरक को जाते हैं - इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 19 (skanda.7.432.19)
स त्वमाहूय विप्रेंद्रान्धर्मशास्त्रविचक्षणान् । पृष्ट्वा तान्कुरु यच्छ्रेयः पितॄणामात्मना सह
sa tvamāhūya viprendrāndharmaśāstravicakṣaṇān | pṛṣṭvā tānkuru yacchreyaḥ pitṝṇāmātmanā saha
अतः धर्मशास्त्र में निपुण श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर, उनसे पूछकर, अपने तथा पितरों के लिए जो कल्याणकारी हो, वह कीजिये।
श्लोक 20 (skanda.7.432.20)
आनयामास राजाऽसौ ततो विप्राननेकशः । वेदवेदांगतत्त्वज्ञान्धर्मशास्त्रविचक्षणान् । उवाच विनयोपेतो भार्यया सहितो हितान्
ānayāmāsa rājā'sau tato viprānanekaśaḥ | vedavedāṅgatattvajñāndharmaśāstravicakṣaṇān | uvāca vinayopeto bhāryayā sahito hitān
तब उस राजा ने वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ, धर्मशास्त्र में निपुण अनेक ब्राह्मणों को बुलाया। विनयपूर्वक, पत्नी सहित, उसने उन हितैषियों से कहा।
श्लोक 21 (skanda.7.432.21)
॥ राजोवाच ॥ कर्मणा केन पितरो निरयस्था द्विजोत्तमाः । स्वर्गं यांति सुपुत्रेण तारिताः प्रोच्यतां स्फुटम्
rājovāca | karmaṇā kena pitaro nirayasthā dvijottamāḥ | svargaṁ yānti suputreṇa tāritāḥ procyatāṁ sphuṭam
राजा ने कहा - "हे द्विजोत्तमो! किस कर्म से नरकवासी पितर, सुपुत्र द्वारा तारित होकर, स्वर्ग को जाते हैं? स्पष्ट रूप से बताइये।"
श्लोक 22 (skanda.7.432.22)
॥ ब्राह्मणा ऊचुः ॥ पितृमेधेन राजेंद्र कृतेन विधिपूर्वकम् । निरयस्था दिवं यांति यद्यपि स्युः सुपापिनः
brāhmaṇā ūcuḥ | pitṛmedhena rājendra kṛtena vidhipūrvakam | nirayasthā divaṁ yānti yadyapi syuḥ supāpinaḥ
ब्राह्मणों ने कहा - "हे राजेन्द्र! विधिपूर्वक किये गये पितृमेध यज्ञ से, नरकवासी पितर स्वर्ग को जाते हैं, चाहे वे महापापी ही क्यों न हों।"
श्लोक 23 (skanda.7.432.23)
॥ राजोवाच ॥ दीक्षयंतु द्विजाः सर्वे तदर्थं मां धृतव्रतम् । यत्किंचिदत्र कर्त्तव्यं प्रोच्यतामखिलं हि तत्
rājovāca | dīkṣayantu dvijāḥ sarve tadarthaṁ māṁ dhṛtavratam | yatkiñcidatra karttavyaṁ procyatāmakhilaṁ hi tat
राजा ने कहा - "इसके लिए व्रतधारी मुझे सभी ब्राह्मण दीक्षित करें। यहाँ जो कुछ भी करना आवश्यक हो, वह सब बताया जाए।"
श्लोक 24 (skanda.7.432.24)
तथोक्तास्ते नृपेंद्रेण ब्राह्मणाः सत्यवादिनः । समग्राः पार्थिवं प्रोचुर्यदुक्तं यज्ञकर्मणि
tathoktāste nṛpendreṇa brāhmaṇāḥ satyavādinaḥ | samagrāḥ pārthivaṁ procuryaduktaṁ yajñakarmaṇi
राजेन्द्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वे सत्यवादी ब्राह्मण सब मिलकर राजा से यज्ञकर्म में जो कहा गया है, वह बताने लगे।
श्लोक 25 (skanda.7.432.25)
दीक्षा ग्राह्या नृपश्रेष्ठ पुरश्चरणमादितः । कृत्वा कायविशुद्ध्यर्थं ततः श्रेयस्करी भवेत्
dīkṣā grāhyā nṛpaśreṣṭha puraścaraṇamāditaḥ | kṛtvā kāyaviśuddhyarthaṁ tataḥ śreyaskarī bhavet
हे नृपश्रेष्ठ! सबसे पहले शरीर की शुद्धि के लिए पुरश्चरण करके दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए; तत्पश्चात् वह कल्याणकारी होती है।
श्लोक 26 (skanda.7.432.26)
स त्वं पापसमाचारो बाल्यात्प्रभृति पार्थिव । असंख्यं पातकं तस्मात्तीर्थयात्रां समाचर
sa tvaṁ pāpasamācāro bālyātprabhṛti pārthiva | asaṁkhyaṁ pātakaṁ tasmāttīrthayātrāṁ samācara
हे राजन्! आप बाल्यकाल से ही पापाचारी रहे हैं और आपका पाप असंख्य है; अतः तीर्थयात्रा कीजिये।
श्लोक 27 (skanda.7.432.27)
सर्वतीर्थाभिषिक्तस्त्वं यदा स्यान्नृपसत्तम । प्रायश्चित्तेन योग्यः स्यास्ततो यज्ञस्य नान्यथा
sarvatīrthābhiṣiktastvaṁ yadā syānnṛpasattama | prāyaścittena yogyaḥ syāstato yajñasya nānyathā
हे नृपसत्तम! जब आप सम्पूर्ण तीर्थों से अभिषिक्त हो जाएँगे, तभी प्रायश्चित्त द्वारा यज्ञ के योग्य बनेंगे, अन्यथा नहीं।
श्लोक 28 (skanda.7.432.28)
प्रभासादीनि तीर्थानि यानि संति धरातले । गंतव्यं तेषु सर्वेषु स्नानं कुरु समाहितः
prabhāsādīni tīrthāni yāni santi dharātale | gantavyaṁ teṣu sarveṣu snānaṁ kuru samāhitaḥ
पृथ्वी पर प्रभास आदि जो भी तीर्थ हैं, उन सभी में आपको जाना चाहिए; एकाग्रचित्त होकर स्नान कीजिये।
श्लोक 29 (skanda.7.432.29)
मनसा गच्छ दुर्गाणि ददद्दानमनुत्तमम् । नश्येत्तेनाशुभं किंचिदपि ब्रह्मवधोद्भवम् । यन्न याति नृणां राजंस्तीर्थस्नानादिना भुवि
manasā gaccha durgāṇi dadaddānamanuttamam | naśyettenāśubhaṁ kiñcidapi brahmavadhodbhavam | yanna yāti nṛṇāṁ rājaṁstīrthasnānādinā bhuvi
मन से दुर्गम स्थानों तक भी जाइये, उत्तम दान देते हुए। इससे ब्रह्महत्या से उत्पन्न वह अशुभ भी नष्ट हो जाता है, जो पृथ्वी पर केवल तीर्थ-स्नान आदि से मनुष्यों से दूर नहीं होता।
श्लोक 30 (skanda.7.432.30)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ विप्राणां वचनं श्रुत्वा स राजा श्रद्धयाऽन्वितः । तीर्थयात्रापरो भूत्वा परिबभ्राम मेदिनीम्
pulastya uvāca | viprāṇāṁ vacanaṁ śrutvā sa rājā śraddhayā'nvitaḥ | tīrthayātrāparo bhūtvā paribabhrāma medinīm
पुलस्त्य ने कहा - ब्राह्मणों के वचन सुनकर वह राजा श्रद्धायुक्त होकर तीर्थयात्रा में तत्पर होकर पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा।
श्लोक 31 (skanda.7.432.31)
नियतो नियताहारो ददद्दानानि भूरिशः । राज्ये पुत्रं प्रतिष्ठाप्य वसुं सत्यपराक्रमम्
niyato niyatāhāro dadaddānāni bhūriśaḥ | rājye putraṁ pratiṣṭhāpya vasuṁ satyaparākramam
संयमित, नियमित आहार वाला होकर, प्रचुर दान देते हुए, अपने सत्यपराक्रमी पुत्र वसु को राज्य में स्थापित करके -
श्लोक 32 (skanda.7.432.32)
कस्यचित्त्वथ कालस्य तीर्थयात्रानुषंगतः । यातोऽसौ नृपतिश्चैव ह्यर्बुदे निर्मलोदकम्
kasyacittvatha kālasya tīrthayātrānuṣaṅgataḥ | yāto'sau nṛpatiścaiva hyarbude nirmalodakam
- तत्पश्चात् किसी समय, तीर्थयात्रा के प्रसंग में, वह राजा अर्बुद के निर्मल जल में पहुँचा।
श्लोक 33 (skanda.7.432.33)
स स्नानमकरोत्तत्र श्रद्धापूतेन चेतसा । स्नातमात्रस्य तस्याथ तस्मिन्नेव जलाशये
sa snānamakarottatra śraddhāpūtena cetasā | snātamātrasya tasyātha tasminneva jalāśaye
वहाँ उसने श्रद्धा से पवित्र चित्त से स्नान किया। स्नान करते ही, उसी जलाशय में -
श्लोक 34 (skanda.7.432.34)
विमुक्ताः पितरो रौद्रान्नरकात्सुप्रहर्षिताः । ततो दिव्यविमानस्था दिव्यमाल्यांबरान्विताः
vimuktāḥ pitaro raudrānnarakātsuprahaṛṣitāḥ | tato divyavimānasthā divyamālyāmbarānvitāḥ
- उसके पितर भयंकर नरक से मुक्त होकर अत्यन्त हर्षित हो गये; तब दिव्य विमानों पर आरूढ़, दिव्य माला-वस्त्रों से युक्त होकर -
श्लोक 35 (skanda.7.432.35)
तमूचुस्तारिताः सर्वे वयं पुत्र त्वयाऽधुना । तीर्थस्यास्य प्रभावेण भविष्याश्च तथा दश
tamūcustāritāḥ sarve vayaṁ putra tvayā'dhunā | tīrthasyāsya prabhāveṇa bhaviṣyāśca tathā daśa
- उन सब मुक्त हुए पितरों ने उससे कहा - "हे पुत्र! इस तीर्थ के प्रभाव से अब तुमने हमें तार दिया है, और इसी प्रकार दस भावी वंशजों को भी -"
श्लोक 36 (skanda.7.432.36)
आत्मा च पार्थिवश्रेष्ठ स्नानाच्च जलतर्पणात् । यस्मात्कुलं त्वया पुत्र तीर्थेऽस्मिंस्तारितं ततः
ātmā ca pārthivaśreṣṭha snānācca jalatarpaṇāt | yasmātkulaṁ tvayā putra tīrthe'sminstāritaṁ tataḥ
"- और हे नृपश्रेष्ठ! स्नान और जलतर्पण से स्वयं तुम्हारा भी उद्धार हो गया है। हे पुत्र! चूँकि तुमने इस तीर्थ में अपने कुल का उद्धार किया है -"
श्लोक 37 (skanda.7.432.37)
कुलसंतारणंनाम तीर्थमेतद्भविष्यति । तस्मात्त्वमपि राजेंद्र सहाऽस्माभिर्दिवं प्रति । आगच्छानेन देहेन तीर्थस्यास्य प्रभावतः
kulasaṁtāraṇaṁnāma tīrthametadbhaviṣyati | tasmāttvamapi rājendra sahā'smābhirdivaṁ prati | āgacchānena dehena tīrthasyāsya prabhāvataḥ
"- इसलिए यह तीर्थ 'कुलसंतारण' नाम से प्रसिद्ध होगा। अतः हे राजेन्द्र! तुम भी इस तीर्थ के प्रभाव से इसी शरीर के साथ हमारे साथ स्वर्ग को चलो।"
श्लोक 38 (skanda.7.432.38)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्तः स राजेंद्रो दिव्यकांतिवपुस्तदा । तं विमानमथारुह्य गतः स्वर्गं च तैः सह
pulastya uvāca | evamuktaḥ sa rājendro divyakāntivapustadā | taṁ vimānamathāruhya gataḥ svargaṁ ca taiḥ saha
पुलस्त्य ने कहा - इस प्रकार कहे जाने पर वह राजेन्द्र, तत्काल दिव्य कान्तियुक्त शरीर वाला होकर, उस विमान पर आरूढ़ होकर उनके साथ स्वर्ग को चला गया।
श्लोक 39 (skanda.7.432.39)
एष प्रभावो राजर्षे कुलसंतारणस्य च । मया ते वर्णितः सम्यग्भूयः किं परिपृच्छसि
eṣa prabhāvo rājarṣe kulasaṁtāraṇasya ca | mayā te varṇitaḥ samyagbhūyaḥ kiṁ paripṛcchasi
हे राजर्षे! कुलसंतारण का यह प्रभाव मैंने तुम्हें भलीभाँति बता दिया; अब और क्या पूछते हो?
श्लोक 40 (skanda.7.432.40)
॥ ययातिरुवाच ॥ स किंप्रभावो राजा स तथा पापसमन्वितः । स्वदेहेन गतः स्वर्गमेतन्मे कौतुकं महत्
yayātiruvāca | sa kiṁprabhāvo rājā sa tathā pāpasamanvitaḥ | svadehena gataḥ svargametanme kautukaṁ mahat
ययाति ने कहा - वह राजा, जो इतना पापयुक्त था, अपने ही शरीर से स्वर्ग कैसे गया? यह मेरा महान् कौतूहल है।
श्लोक 41 (skanda.7.432.41)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ राकासोमव्यतीपात समकाले नृपोत्तम । स स्नातो यत्र भूपालस्तन्महच्छ्रेयसे परम्
pulastya uvāca | rākāsomavyatīpāta samakāle nṛpottama | sa snāto yatra bhūpālastanmahacchreyase param
पुलस्त्य ने कहा - हे नृपोत्तम! जिस समय पूर्णिमा व्यतीपात योग के साथ हुई, उसी समय उस राजा ने स्नान किया था - यही उसके परम कल्याण का कारण है।