Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 433

रामतीर्थ का माहात्म्य

अध्याय 432अध्याय-सूचीअध्याय 434

श्लोक 1 (skanda.7.433.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ रामतीर्थं ततो गच्छेत्पुण्यमृषिनिषेवितम्॥ तत्र स्नातस्य मर्त्त्यस्य जायते पापसंक्षयः

|| pulastya uvāca || rāmatīrthaṁ tato gacchetpuṇyamṛṣiniṣevitam|| tatra snātasya marttyasya jāyate pāpasaṁkṣayaḥ

पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात् राजा को ऋषियों द्वारा सेवित पवित्र रामतीर्थ जाना चाहिए। वहाँ स्नान करने वाले मनुष्य के पापों का नाश होता है।

श्लोक 2 (skanda.7.433.2)

पितॄणां च परा तुष्टिर्यावदाभूतसंप्लवम्॥ पुरासीद्भार्गवो रामः सर्वशस्त्रभृतां वरः

pitṝṇāṁ ca parā tuṣṭiryāvadābhūtasaṁplavam|| purāsīdbhārgavo rāmaḥ sarvaśastrabhṛtāṁ varaḥ

और प्रलयकाल तक के लिए पितरों की परम तुष्टि होती है। पूर्वकाल में भृगुवंशी राम समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे।

श्लोक 3 (skanda.7.433.3)

तेन पूर्वं तपस्तप्तं शत्रूणामिच्छता क्षयम्॥ ततः पाशुपतं नाम तस्यास्त्रं परमं ददौ

tena pūrvaṁ tapastaptaṁ śatrūṇāmicchatā kṣayam|| tataḥ pāśupataṁ nāma tasyāstraṁ paramaṁ dadau

शत्रुओं के नाश की इच्छा रखने वाले उसने पूर्व में तपस्या की। तब उसे पाशुपत नामक परम अस्त्र प्रदान किया गया।

श्लोक 4 (skanda.7.433.4)

तपस्तुष्टो महादेवो गते वर्षशतत्रये॥ अब्रवीद्वरदोऽस्मीति स वव्रे शत्रुसंक्षयम्

tapastuṣṭo mahādevo gate varṣaśatatraye|| abravīdvarado'smīti sa vavre śatrusaṁkṣayam

तीन सौ वर्ष बीत जाने पर, तपस्या से संतुष्ट महादेव ने कहा 'मैं वर देने वाला हूँ', तब उसने शत्रुओं के नाश का वर माँगा।

श्लोक 5 (skanda.7.433.5)

ततः पाशुपतं नाम तस्यास्त्रं परमं ददौ॥ स्मरणेनापि शत्रूणां यस्य संजायते क्षयः

tataḥ pāśupataṁ nāma tasyāstraṁ paramaṁ dadau|| smaraṇenāpi śatrūṇāṁ yasya saṁjāyate kṣayaḥ

तब उसे पाशुपत नामक वह परम अस्त्र प्रदान किया, जिसके स्मरण मात्र से भी शत्रुओं का नाश हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.7.433.6)

अब्रवीद्वचनं चापि प्रहस्य वृषभध्वजः॥ जामदग्न्य महाबाहो शृणु मे परमं वचः

abravīdvacanaṁ cāpi prahasya vṛṣabhadhvajaḥ|| jāmadagnya mahābāho śṛṇu me paramaṁ vacaḥ

और वृषभध्वज (शिव) ने हँसते हुए यह वचन कहा - हे जमदग्निपुत्र महाबाहो! मेरा परम वचन सुनो।

श्लोक 7 (skanda.7.433.7)

अस्त्रेणानेन युक्तस्त्वमजेयः सर्वदेहिनाम्॥ भविष्यसि न संदेहो मत्प्रसादाद्भृगूद्वह

astreṇānena yuktastvamajeyaḥ sarvadehinām|| bhaviṣyasi na saṁdeho matprasādādbhṛgūdvaha

इस अस्त्र से युक्त होकर तुम समस्त प्राणियों के लिए अजेय हो जाओगे। हे भृगुकुलोद्भव! मेरी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 8 (skanda.7.433.8)

एतज्जलाशयं पुण्यं त्रैलोक्ये सचराचरे॥ रामतीर्थमिति ख्यातं मत्प्रसादाद्भविष्यति

etajjalāśayaṁ puṇyaṁ trailokye sacarācare|| rāmatīrthamiti khyātaṁ matprasādādbhaviṣyati

यह पवित्र जलाशय चराचर सहित तीनों लोकों में मेरी कृपा से 'रामतीर्थ' के नाम से विख्यात होगा।

श्लोक 9 (skanda.7.433.9)

येऽत्र श्राद्धं करिष्यंति पौर्णमास्यां समाहिताः॥ संप्राप्ते कार्त्तिके मासि कृत्तिकायोगसंयुते

ye'tra śrāddhaṁ kariṣyaṁti paurṇamāsyāṁ samāhitāḥ|| saṁprāpte kārttike māsi kṛttikāyogasaṁyute

जो लोग एकाग्रचित्त होकर, कार्तिक मास में कृत्तिका योग से युक्त पूर्णिमा के दिन यहाँ श्राद्ध करेंगे,

श्लोक 10 (skanda.7.433.10)

पितृमेधफलं तेषामशेषं च भविष्यति॥ तथा शत्रुक्षयो राजन्वासः स्वर्गेषु चाक्षयः

pitṛmedhaphalaṁ teṣāmaśeṣaṁ ca bhaviṣyati|| tathā śatrukṣayo rājanvāsaḥ svargeṣu cākṣayaḥ

उन्हें पितृमेध का सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा, हे राजन्! साथ ही शत्रुओं का नाश और स्वर्ग में अक्षय निवास भी होगा।

श्लोक 11 (skanda.7.433.11)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्त्वा महादेवस्ततश्चादर्शनं गतः॥ रामोऽप्यसूदयत्क्षत्रं पितृदुःखेन दुःखितः

|| pulastya uvāca || evamuktvā mahādevastataścādarśanaṁ gataḥ|| rāmo'pyasūdayatkṣatraṁ pitṛduḥkhena duḥkhitaḥ

पुलस्त्य ने कहा - ऐसा कहकर महादेव तत्पश्चात् अदृश्य हो गए। राम भी पिता के दुःख से दुःखी होकर क्षत्रियों का संहार करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.7.433.12)

त्रिःसप्त तर्पयामास पितॄंस्तत्र प्रहर्षितः॥ जमदग्नौ मृते तेन प्रतिज्ञातं महात्मना

triḥsapta tarpayāmāsa pitṝṁstatra praharṣitaḥ|| jamadagnau mṛte tena pratijñātaṁ mahātmanā

वहाँ उन्होंने हर्षित होकर इक्कीस बार पितरों का तर्पण किया। जमदग्नि के मारे जाने पर उस महात्मा ने यह प्रतिज्ञा ली थी।

श्लोक 13 (skanda.7.433.13)

दृष्ट्वा मातुः क्षतान्यंगे त्रिःसप्त मनुजाधिप॥ शस्त्रजातानि विप्राणां समाजे समुपस्थिते

dṛṣṭvā mātuḥ kṣatānyaṁge triḥsapta manujādhipa|| śastrajātāni viprāṇāṁ samāje samupasthite

हे राजन्! अपनी माता के अंगों पर इक्कीस शस्त्र-घाव देखकर, ब्राह्मणों की सभा उपस्थित होने पर,

श्लोक 14 (skanda.7.433.14)

पिता मे निहतो यस्मात्क्षत्रियैस्तापसो द्विजः॥ अयुध्यमान एवाथ तस्मात्कृत्वा त्रिसप्त वै

pitā me nihato yasmātkṣatriyaistāpaso dvijaḥ|| ayudhyamāna evātha tasmātkṛtvā trisapta vai

'क्योंकि मेरे तपस्वी ब्राह्मण पिता युद्ध न करते हुए भी क्षत्रियों द्वारा मार डाले गए, इसलिए इक्कीस बार वैसा करके...'

श्लोक 15 (skanda.7.433.15)

क्षत्त्रहीनामहं पृथ्वीं प्रदास्ये सलिलं पितुः॥ तत्सर्वं तस्य संजातं तीर्थमाहात्म्यतो नृप

kṣattrahīnāmahaṁ pṛthvīṁ pradāsye salilaṁ pituḥ|| tatsarvaṁ tasya saṁjātaṁ tīrthamāhātmyato nṛpa

'मैं क्षत्रियों से रहित पृथ्वी को अपने पिता को जल-तर्पण के रूप में अर्पित करूँगा' - हे राजन्! उस तीर्थ के माहात्म्य से उसका वह सब कुछ पूर्ण हो गया।

श्लोक 16 (skanda.7.433.16)

तस्मात्सर्वं प्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत्॥ क्षत्रियश्च विशेषेण य इच्छेच्छत्रुसंक्षयम्

tasmātsarvaṁ prayatnena śrāddhaṁ tatra samācaret|| kṣatriyaśca viśeṣeṇa ya icchecchatrusaṁkṣayam

इसलिए सभी को पूरे प्रयत्न से वहाँ श्राद्ध करना चाहिए, और विशेष रूप से उस क्षत्रिय को, जो शत्रुओं के नाश की इच्छा रखता हो।

अध्याय 432अध्याय-सूचीअध्याय 434