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प्रभास खण्ड · अध्याय 434

कोटितीर्थ का प्रभाव

अध्याय 433अध्याय-सूचीअध्याय 435

श्लोक 1 (skanda.7.434.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ कोटितीर्थं ततो गच्छेत्सर्वपातकनाशनम्॥ तीर्थानां यत्र संजाता कोटिः पार्थिव हेलया

|| pulastya uvāca || koṭitīrthaṁ tato gacchetsarvapātakanāśanam|| tīrthānāṁ yatra saṁjātā koṭiḥ pārthiva helayā

पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात् समस्त पापों का नाश करने वाला कोटितीर्थ जाना चाहिए, हे राजन्! जहाँ लीलामात्र से करोड़ों तीर्थ उत्पन्न हुए।

श्लोक 2 (skanda.7.434.2)

यदा स्यात्कलिकालस्तु रौद्रो राजन्महीतले॥ म्लेच्छभूता जनाः सर्वे तत्स्पर्शात्तीर्थविप्लवः

yadā syātkalikālastu raudro rājanmahītale|| mlecchabhūtā janāḥ sarve tatsparśāttīrthaviplavaḥ

जब पृथ्वी पर भयंकर कलिकाल आएगा, हे राजन्! तब सब लोग म्लेच्छ हो जाएँगे और उनके स्पर्श से तीर्थों का विनाश होगा।

श्लोक 3 (skanda.7.434.3)

तिस्रः कोट्योऽर्धकोटिश्च तीर्थानां भूमिवासिनाम्॥ तेषां कोटिस्ततोऽवात्सीत्पर्वतेऽर्बुदसंज्ञके

tisraḥ koṭyo'rdhakoṭiśca tīrthānāṁ bhūmivāsinām|| teṣāṁ koṭistato'vātsītparvate'rbudasaṁjñake

पृथ्वी पर निवास करने वाले तीर्थों की साढ़े तीन करोड़ संख्या है। उनमें से एक करोड़ तब अर्बुद नामक पर्वत पर आकर बस गए।

श्लोक 4 (skanda.7.434.4)

पुष्करे च तथा कोटिः कुरुक्षेत्रे च पार्थिव॥ वाराणस्यामर्धकोटिः स्तुता देवैः सवासवैः॥ राजन्नेतानि रक्षंति सर्वे देवाः सवासवाः

puṣkare ca tathā koṭiḥ kurukṣetre ca pārthiva|| vārāṇasyāmardhakoṭiḥ stutā devaiḥ savāsavaiḥ|| rājannetāni rakṣaṁti sarve devāḥ savāsavāḥ

इसी प्रकार, हे राजन्! एक करोड़ पुष्कर में और एक करोड़ कुरुक्षेत्र में हैं, तथा वाराणसी में आधा करोड़ तीर्थ हैं, जो इन्द्र सहित देवताओं द्वारा स्तुत हैं। हे राजन्! इन सबकी रक्षा इन्द्र सहित समस्त देवता करते हैं।

श्लोक 5 (skanda.7.434.5)

यदा यदा भयार्त्तानि म्लेच्छस्पर्शात्समंततः॥ स्थानेष्वेतेषु तिष्ठंति तीर्थान्युक्तेषु सत्वरम्

yadā yadā bhayārttāni mlecchasparśātsamaṁtataḥ|| sthāneṣveteṣu tiṣṭhaṁti tīrthānyukteṣu satvaram

जब-जब वे तीर्थ चारों ओर से म्लेच्छों के स्पर्श से पीड़ित होते हैं, तब-तब वे शीघ्र ही इन उपर्युक्त स्थानों में जाकर स्थित हो जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.434.6)

कोटितीर्थानि त्रीण्येव तत्र जातानि भूतले॥ अर्ध कोटिसमेतानि सर्वपापहराणि च

koṭitīrthāni trīṇyeva tatra jātāni bhūtale|| ardha koṭisametāni sarvapāpaharāṇi ca

इस प्रकार पृथ्वी पर तीन कोटितीर्थ उत्पन्न हुए, जो अर्ध कोटि तीर्थों से युक्त हैं और समस्त पापों का हरण करने वाले हैं।

श्लोक 7 (skanda.7.434.7)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत्॥ कृष्णपक्षे त्रयोदश्यां नभस्ये च विशेषतः

tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret|| kṛṣṇapakṣe trayodaśyāṁ nabhasye ca viśeṣataḥ

इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से वहाँ स्नान करना चाहिए, विशेषरूप से भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को।

श्लोक 8 (skanda.7.434.8)

तत्र स्नानादिकं सर्वं जपहोमादिकं च यत्॥ सर्वं कोटिगुणं राजंस्तत्प्रसादादसंशयम्

tatra snānādikaṁ sarvaṁ japahomādikaṁ ca yat|| sarvaṁ koṭiguṇaṁ rājaṁstatprasādādasaṁśayam

वहाँ किया गया सारा स्नानादि तथा जप-होम आदि जो कुछ भी है, हे राजन्! उसकी कृपा से वह सब करोड़ों गुना फलदायी होता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

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