प्रभास खण्ड · अध्याय 435
चन्द्रोद्भेद तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.435.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ चंद्रोद्भेदमनुत्तमम्॥ तीर्थं पापहरं नृणां निशानाथेन निर्मितम्
|| pulastya uvāca || tato gacchennṛpaśreṣṭha caṁdrodbhedamanuttamam|| tīrthaṁ pāpaharaṁ nṛṇāṁ niśānāthena nirmitam
पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात्, हे नृपश्रेष्ठ! उस सर्वोत्तम चन्द्रोद्भेद तीर्थ में जाना चाहिए, जो मनुष्यों के पापों का नाश करने वाला है और चन्द्रमा द्वारा निर्मित है।
श्लोक 2 (skanda.7.435.2)
प्रतिज्ञातं यदा राजन्ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः॥ राहुणा कृतवैरेण च्छिन्ने शिरसि विष्णुना
pratijñātaṁ yadā rājangrahaṇe caṁdrasūryayoḥ|| rāhuṇā kṛtavaireṇa cchinne śirasi viṣṇunā
हे राजन्! जब विष्णु द्वारा सिर काटे जाने पर वैर बाँधे हुए राहु ने चन्द्रमा और सूर्य को ग्रसने की प्रतिज्ञा की,
श्लोक 3 (skanda.7.435.3)
तदा भयान्वितश्चन्द्रो मत्वा दैत्यं दुरासदम्॥ पीयूषभक्षणोद्युक्तं ततश्चार्बुदमभ्यगात्
tadā bhayānvitaścandro matvā daityaṁ durāsadam|| pīyūṣabhakṣaṇodyuktaṁ tataścārbudamabhyagāt
तब चन्द्रमा भयभीत हो गया, यह जानकर कि अमृतपान में लीन रहा वह दैत्य दुर्धर्ष है, और तत्पश्चात् वह अर्बुद पर्वत पर चला गया।
श्लोक 4 (skanda.7.435.4)
तत्र भित्त्वा गिरेः शृंगे कृत्वा विवरमुत्तमम्॥ प्रविष्टस्तस्य मध्ये तु तपस्तेपे सुदुश्चरम्
tatra bhittvā gireḥ śṛṁge kṛtvā vivaramuttamam|| praviṣṭastasya madhye tu tapastepe suduścaram
वहाँ पर्वत के शिखर को भेदकर एक उत्तम गुहा बनाकर, उसके मध्य में प्रवेश करके उसने अत्यंत कठोर तपस्या की।
श्लोक 5 (skanda.7.435.5)
ततः कालेन महता तुष्टस्तस्य महेश्वरः॥ अब्रवीद्वृणु भद्रं ते वरं यत्ते हृदिस्थितम्
tataḥ kālena mahatā tuṣṭastasya maheśvaraḥ|| abravīdvṛṇu bhadraṁ te varaṁ yatte hṛdisthitam
तब बहुत काल के पश्चात् महेश्वर उससे प्रसन्न हुए और बोले - 'तुम्हारा कल्याण हो, जो वर तुम्हारे हृदय में स्थित है, वह माँगो।'
श्लोक 6 (skanda.7.435.6)
॥ चंद्र उवाच ॥ प्रतिज्ञातं सुरश्रेष्ठ राहुणा ग्रहणं मम॥ बलवानेष दुर्धर्षः प्रकृत्या सिंहिकासुतः
|| caṁdra uvāca || pratijñātaṁ suraśreṣṭha rāhuṇā grahaṇaṁ mama|| balavāneṣa durdharṣaḥ prakṛtyā siṁhikāsutaḥ
चन्द्रमा ने कहा - हे देवश्रेष्ठ! राहु ने मुझे ग्रसने की प्रतिज्ञा की है। यह सिंहिका-पुत्र स्वभाव से ही बलवान और दुर्धर्ष है।
श्लोक 7 (skanda.7.435.7)
सांप्रतं भक्षितं तेन पीयूषं सुरसत्तम॥ अहं मध्ये धृतश्चापि राहुणाऽसौ दुरासदः
sāṁprataṁ bhakṣitaṁ tena pīyūṣaṁ surasattama|| ahaṁ madhye dhṛtaścāpi rāhuṇā'sau durāsadaḥ
हे देवश्रेष्ठ! अभी हाल ही में उसने अमृत का पान कर लिया है, और मैं भी उस दुर्धर्ष राहु द्वारा बीच में पकड़ लिया गया।
श्लोक 8 (skanda.7.435.8)
पीयमानेऽमृते देव देवैः पूर्वं पराजितैः॥ दैवतं रूपमास्थाय दानवोऽसौ समागतः
pīyamāne'mṛte deva devaiḥ pūrvaṁ parājitaiḥ|| daivataṁ rūpamāsthāya dānavo'sau samāgataḥ
हे देव! जब पूर्व में पराजित देवों द्वारा अमृत का पान किया जा रहा था, तब वह दानव देवता का रूप धारण करके वहाँ आ गया।
श्लोक 9 (skanda.7.435.9)
अपिबच्चामृतं राहुस्तेनास्य मृत्युवर्जितम्॥ अमृतं चाक्षयं जातं शिरो देवभयप्रदम्
apibaccāmṛtaṁ rāhustenāsya mṛtyuvarjitam|| amṛtaṁ cākṣayaṁ jātaṁ śiro devabhayapradam
और राहु ने अमृत पी लिया, जिससे उसका सिर मृत्यु से रहित और अक्षय हो गया, तथा देवताओं के लिए भयदायक बन गया।
श्लोक 10 (skanda.7.435.10)
ततो देवैः कृतं साम ग्रहमध्ये प्रतिष्ठितः॥ प्रतिज्ञाते ग्रहेऽस्माकं ततो मे भयमाविशत्
tato devaiḥ kṛtaṁ sāma grahamadhye pratiṣṭhitaḥ|| pratijñāte grahe'smākaṁ tato me bhayamāviśat
तब देवताओं ने ग्रहों के बीच उसे स्थापित करते हुए सामनीति की। हमारे ग्रहण की प्रतिज्ञा किए जाने पर, तब से मुझमें भय समा गया।
श्लोक 11 (skanda.7.435.11)
भयात्तस्य सुरश्रेष्ठ भित्त्वा शृंगं गिरेरिदम्॥ कृतं श्वभ्रमगाधं च तपोऽर्थं सुरसत्तम॥ तस्मादत्र प्रसादं मे कुरु कामनिषूदन
bhayāttasya suraśreṣṭha bhittvā śṛṁgaṁ gireridam|| kṛtaṁ śvabhramagādhaṁ ca tapo'rthaṁ surasattama|| tasmādatra prasādaṁ me kuru kāmaniṣūdana
हे देवश्रेष्ठ! उसके भय से ही इस पर्वत-शिखर को भेदकर यह अथाह गुहा तपस्या के लिए बनाई गई, हे देवश्रेष्ठ! इसलिए हे कामनाशक! मुझ पर यहाँ कृपा कीजिए।
श्लोक 12 (skanda.7.435.12)
॥ भगवानुवाच ॥ अवध्यः सर्वदेवानामजेयः स महाबलः॥ करिष्यति ग्रहं नूनं राहुः कोपपरायणः॥ परं तव निशानाथ करिष्येऽहं प्रतिक्रियाम्
|| bhagavānuvāca || avadhyaḥ sarvadevānāmajeyaḥ sa mahābalaḥ|| kariṣyati grahaṁ nūnaṁ rāhuḥ kopaparāyaṇaḥ|| paraṁ tava niśānātha kariṣye'haṁ pratikriyām
भगवान ने कहा - वह महाबली राहु समस्त देवताओं के लिए अवध्य और अजेय है, वह क्रोधपरायण होकर निश्चय ही ग्रहण करेगा। परंतु हे निशानाथ! मैं तुम्हारे लिए प्रतिकार करूँगा।
श्लोक 13 (skanda.7.435.13)
ग्रहणे तव संप्राप्ते स्नानदानादिकाः क्रियाः॥ करिष्यंति जना लोके सम्यक्छ्रेयःसमन्विताः
grahaṇe tava saṁprāpte snānadānādikāḥ kriyāḥ|| kariṣyaṁti janā loke samyakchreyaḥsamanvitāḥ
जब तुम्हारा ग्रहण होगा, तब लोक में लोग स्नान-दान आदि कर्म करेंगे और भलीभाँति कल्याण से युक्त होंगे।
श्लोक 14 (skanda.7.435.14)
ताभिस्तव न संतापः स्वल्पोऽप्येवं भविष्यति॥ अक्षयं सुकृतं तेषां कृतं कर्म भविष्यति
tābhistava na saṁtāpaḥ svalpo'pyevaṁ bhaviṣyati|| akṣayaṁ sukṛtaṁ teṣāṁ kṛtaṁ karma bhaviṣyati
इन क्रियाओं से तुम्हें तनिक भी संताप नहीं होगा, इस प्रकार होगा, और उनके द्वारा किया गया वह कर्म अक्षय पुण्यरूप होगा।
श्लोक 15 (skanda.7.435.15)
ग्रहणे तव संजाते मम वाक्यादसंशयम्॥ एतद्भिन्नं त्वया यस्मात्तपोऽर्थं शिखरं गिरेः॥ चन्द्रोद्भेदमिति ख्यातं तीर्थं लोके भविष्यति
grahaṇe tava saṁjāte mama vākyādasaṁśayam|| etadbhinnaṁ tvayā yasmāttapo'rthaṁ śikharaṁ gireḥ|| candrodbhedamiti khyātaṁ tīrthaṁ loke bhaviṣyati
तुम्हारा ग्रहण मेरे वचन से निश्चय ही होगा। और चूँकि तुमने तपस्या के लिए पर्वत का यह शिखर भेदा है, इसलिए यह तीर्थ लोक में 'चन्द्रोद्भेद' नाम से विख्यात होगा।
श्लोक 16 (skanda.7.435.16)
ग्रहणे तव संप्राप्ते योऽत्र स्नानं करिष्यति॥ न तस्य पुनरेवात्र जन्म लोके भविष्यति
grahaṇe tava saṁprāpte yo'tra snānaṁ kariṣyati|| na tasya punarevātra janma loke bhaviṣyati
जब तुम्हारा ग्रहण होगा, उस समय जो यहाँ स्नान करेगा, उसका इस लोक में पुनः जन्म नहीं होगा।
श्लोक 17 (skanda.7.435.17)
यो वा सोमदिने स्नानं दर्शनं तत्र चाचरेत्॥ तव लोके ध्रुवं वासस्तस्य चंद्र भविष्यति
yo vā somadine snānaṁ darśanaṁ tatra cācaret|| tava loke dhruvaṁ vāsastasya caṁdra bhaviṣyati
अथवा जो सोमवार के दिन वहाँ स्नान और दर्शन करेगा, हे चन्द्र! उसका निश्चय ही तुम्हारे लोक में निवास होगा।
श्लोक 18 (skanda.7.435.18)
एवमुक्त्वा स भगवांस्ततश्चांतर्दधे हरः॥ चन्द्रोऽपि प्रययौ हृष्टः स्वस्थानं नृपसत्तम
evamuktvā sa bhagavāṁstataścāṁtardadhe haraḥ|| candro'pi prayayau hṛṣṭaḥ svasthānaṁ nṛpasattama
ऐसा कहकर वे भगवान हर तत्पश्चात् अंतर्धान हो गए। चन्द्रमा भी प्रसन्न होकर अपने स्थान को चला गया, हे नृपसत्तम!