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प्रभास खण्ड · अध्याय 436

ईशानीशिखर का माहात्म्य (विनायक-जन्म)

अध्याय 435अध्याय-सूचीअध्याय 437

श्लोक 1 (skanda.7.436.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ ईशानीशिखरं महत्॥ यत्र गौर्या तपस्तप्तं सुपुण्यं लोकविश्रुतम्

|| pulastya uvāca || tato gacchennṛpaśreṣṭha īśānīśikharaṁ mahat|| yatra gauryā tapastaptaṁ supuṇyaṁ lokaviśrutam

पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात्, हे नृपश्रेष्ठ! उस महान ईशानीशिखर में जाना चाहिए, जहाँ गौरी ने वह अति पवित्र तथा लोकविख्यात तपस्या की थी।

श्लोक 2 (skanda.7.436.2)

यस्य संदर्शनेनापि नरः पापात्प्रमुच्यते॥ लभते चातिसौभाग्यं सप्तजन्मांतराणि च

yasya saṁdarśanenāpi naraḥ pāpātpramucyate|| labhate cātisaubhāgyaṁ saptajanmāṁtarāṇi ca

जिसके दर्शन मात्र से भी मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है, और सात जन्मों तक अति सौभाग्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.7.436.3)

॥ ययातिरुवाच ॥ कस्मिन्काले तपस्तप्तं देव्या तत्र मुनीश्वर॥ किमर्थं च महत्त्वेतत्कौतुकं वक्तुमर्हसि

|| yayātiruvāca || kasminkāle tapastaptaṁ devyā tatra munīśvara|| kimarthaṁ ca mahattvetatkautukaṁ vaktumarhasi

ययाति ने कहा - हे मुनीश्वर! किस काल में देवी ने वहाँ तपस्या की थी, और किस उद्देश्य से यह महत्व है? यह कौतुक मुझसे कहने योग्य है।

श्लोक 4 (skanda.7.436.4)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ शृणु राजन्कथां दिव्यामद्भुतां लोकविश्रुताम्॥ यस्याः संश्रवणादेव मुच्यते सर्वपातकैः

|| pulastya uvāca || śṛṇu rājankathāṁ divyāmadbhutāṁ lokaviśrutām|| yasyāḥ saṁśravaṇādeva mucyate sarvapātakaiḥ

पुलस्त्य ने कहा - हे राजन्! उस दिव्य, अद्भुत तथा लोकविख्यात कथा को सुनो, जिसके श्रवण मात्र से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 5 (skanda.7.436.5)

पुरा गौर्या समासक्तं ज्ञात्वा देवाः सवासवाः॥ मंत्रं चक्रुर्भयाविष्टा एकांते समुपाश्रिताः

purā gauryā samāsaktaṁ jñātvā devāḥ savāsavāḥ|| maṁtraṁ cakrurbhayāviṣṭā ekāṁte samupāśritāḥ

पूर्वकाल में गौरी को (शिव के साथ) रत जानकर इन्द्र सहित देवता भयभीत हो गए, और एकांत में जाकर उन्होंने मंत्रणा की।

श्लोक 6 (skanda.7.436.6)

वीर्यं यदि त्रिनेत्रस्य क्षेत्रे गौर्याः पतिष्यति॥ अस्माकं पतनं नूनं जगतश्च भविष्यति

vīryaṁ yadi trinetrasya kṣetre gauryāḥ patiṣyati|| asmākaṁ patanaṁ nūnaṁ jagataśca bhaviṣyati

यदि त्रिनेत्र (शिव) का वीर्य गौरी के गर्भ में गिर जाएगा, तो निश्चय ही हमारा और सारे जगत का पतन हो जाएगा।

श्लोक 7 (skanda.7.436.7)

संततेस्तु विनाशाय ततो गच्छामहे वयम्

saṁtatestu vināśāya tato gacchāmahe vayam

इसलिए उस संतति के विनाश हेतु हम वहाँ चलते हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.436.8)

एवं संमंत्र्य देवास्ते कैलासं पर्वतं गताः॥ ततस्तु नंदिना सर्वे निषिद्धाः समयं विना

evaṁ saṁmaṁtrya devāste kailāsaṁ parvataṁ gatāḥ|| tatastu naṁdinā sarve niṣiddhāḥ samayaṁ vinā

इस प्रकार परस्पर मंत्रणा करके वे देवता कैलास पर्वत पर गए। परंतु वहाँ नंदी ने असमय आने के कारण उन सबको रोक दिया।

श्लोक 9 (skanda.7.436.9)

॥ नंद्युवाच ॥ एकांते भगवान्रुद्रः सहगौर्या व्यवस्थितः॥ तस्माद्देवगणाः सर्वे गच्छध्वं निलयं स्वकम्

|| naṁdyuvāca || ekāṁte bhagavānrudraḥ sahagauryā vyavasthitaḥ|| tasmāddevagaṇāḥ sarve gacchadhvaṁ nilayaṁ svakam

नंदी ने कहा - भगवान रुद्र गौरी के साथ एकांत में स्थित हैं, इसलिए हे समस्त देवगण! तुम अपने-अपने निवास को लौट जाओ।

श्लोक 10 (skanda.7.436.10)

अथ देवगणाः सर्वे वञ्चयित्वा च तं गणम्॥ प्रैषयंस्तत्र वायुं च गुप्तमूचुर्वचस्त्विदम्

atha devagaṇāḥ sarve vañcayitvā ca taṁ gaṇam|| praiṣayaṁstatra vāyuṁ ca guptamūcurvacastvidam

तब समस्त देवगणों ने उस गण (नंदी) को छलकर वहाँ वायु को भेजा, और गुप्त रूप से यह वचन कहा।

श्लोक 11 (skanda.7.436.11)

गत्वा वायो भवं ब्रूहि न कार्या संततिस्त्वया॥ एवं देवगणा देव प्रार्थयंति भयातुराः

gatvā vāyo bhavaṁ brūhi na kāryā saṁtatistvayā|| evaṁ devagaṇā deva prārthayaṁti bhayāturāḥ

'हे वायु! जाकर भव (शिव) से कहो कि तुम्हें संतान उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। हे देव! भय से आतुर होकर देवगण इस प्रकार प्रार्थना करते हैं।'

श्लोक 12 (skanda.7.436.12)

ततो वायुर्द्रुतं गत्वा स्थितो यत्र महेश्वरः॥ उच्चैर्जगाद तद्वाक्यं यदुक्तं त्रिदशालयैः

tato vāyurdrutaṁ gatvā sthito yatra maheśvaraḥ|| uccairjagāda tadvākyaṁ yaduktaṁ tridaśālayaiḥ

तब वायु शीघ्र जाकर, जहाँ महेश्वर स्थित थे, वहाँ पहुँचकर उच्च स्वर में वही वचन कहा, जो देवताओं द्वारा कहा गया था।

श्लोक 13 (skanda.7.436.13)

ततस्तु भगवाञ्छर्वो व्रीडया परया युतः॥ गौरीं त्यक्त्वा समुत्तस्थौ बाढमित्येव चाब्रवीत्

tatastu bhagavāñcharvo vrīḍayā parayā yutaḥ|| gaurīṁ tyaktvā samuttasthau bāḍhamityeva cābravīt

तब भगवान शर्व (शिव) अत्यंत लज्जा से युक्त होकर गौरी को छोड़कर उठ खड़े हुए, और केवल 'ऐसा ही हो' यह कह दिया।

श्लोक 14 (skanda.7.436.14)

ततो गौरी सुदुःखार्ता शशाप त्रिदशालयान्

tato gaurī suduḥkhārtā śaśāpa tridaśālayān

तब अत्यंत दुःख से पीड़ित गौरी ने देवताओं को शाप दे दिया।

श्लोक 15 (skanda.7.436.15)

॥ गौर्युवाच ॥ यस्मादहं कृता देवैः पुत्रहीना समागतैः॥ तस्मात्तेऽपि भविष्यन्ति सन्तानेन विवर्ज्जिताः

|| gauryuvāca || yasmādahaṁ kṛtā devaiḥ putrahīnā samāgataiḥ|| tasmātte'pi bhaviṣyanti santānena vivarjjitāḥ

गौरी ने कहा - चूँकि इकट्ठे हुए देवताओं ने मुझे पुत्रहीन बना दिया, इसलिए वे भी संतान से रहित हो जाएँगे।

श्लोक 16 (skanda.7.436.16)

यस्माद्वायो समायातः स्थानेऽस्मिञ्जनवर्जिते॥ तस्मात्कायविनिर्मुक्तस्त्वं भविष्यसि सर्वदा

yasmādvāyo samāyātaḥ sthāne'smiñjanavarjite|| tasmātkāyavinirmuktastvaṁ bhaviṣyasi sarvadā

और हे वायु! चूँकि तुम इस निर्जन स्थान में आए, इसलिए तुम सदा शरीररहित (देहरहित) ही रहोगे।

श्लोक 17 (skanda.7.436.17)

एवमुक्त्वा ततो दीर्घं भर्तुः कोपपरायणा॥ त्यक्त्वा पार्श्वं गता राजन्नर्बुदं नगसत्तमम्

evamuktvā tato dīrghaṁ bhartuḥ kopaparāyaṇā|| tyaktvā pārśvaṁ gatā rājannarbudaṁ nagasattamam

इस प्रकार लंबे समय तक कहकर, अपने पति पर क्रोधित होकर, हे राजन्! वह उनका साथ छोड़कर सर्वश्रेष्ठ पर्वत अर्बुद पर चली गई।

श्लोक 18 (skanda.7.436.18)

सुतार्थं सा तपस्तेपे यतवाक्कायमानसा॥ ततो वर्षसहस्रान्ते देवदेवो महेश्वरः

sutārthaṁ sā tapastepe yatavākkāyamānasā|| tato varṣasahasrānte devadevo maheśvaraḥ

पुत्र-प्राप्ति के लिए वह वाणी, शरीर और मन को संयत रखकर तपस्या करने लगी। तब एक हजार वर्षों के अंत में देवाधिदेव महेश्वर,

श्लोक 19 (skanda.7.436.19)

इन्द्राद्यैर्विबुधैः सार्द्धं तदंतिकमुपागमत्॥ अथ शक्रो विनीतात्मा देवीं ता प्रत्यभाषत

iṁdrādyairvibudhaiḥ sārddhaṁ tadaṁtikamupāgamat|| atha śakro vinītātmā devīṁ tā pratyabhāṣata

इन्द्र आदि देवताओं के साथ उसके निकट आए। तब विनम्र हृदय वाले इन्द्र ने उस देवी से यह कहा।

श्लोक 20 (skanda.7.436.20)

एष देवः शिवः प्राप्तस्तव पार्श्वं स्वलज्जया॥ नायाति तत्प्रसादोऽस्य क्रियता महती भव

eṣa devaḥ śivaḥ prāptastava pārśvaṁ svalajjayā|| nāyāti tatprasādo'sya kriyatā mahatī bhava

'यह देव शिव अपनी लज्जा के कारण तुम्हारे पास नहीं आ पाते; अतः हे भवानी! उन पर कृपा करो, महती दया करो।'

श्लोक 21 (skanda.7.436.21)

॥ देव्युवाच ॥ त्यक्ताऽहं तव वाक्येन पतिना समयान्विता॥ पुत्रं लब्ध्वा प्रयास्यामि तस्य पार्श्वे सुरेश्वर

|| devyuvāca || tyaktā'haṁ tava vākyena patinā samayānvitā|| putraṁ labdhvā prayāsyāmi tasya pārśve sureśvara

देवी ने कहा - हे सुरेश्वर! तुम्हारे ही वचन से पति ने मुझे शर्तपूर्वक त्याग दिया था। पुत्र प्राप्त करके ही मैं उनके पास जाऊँगी।

श्लोक 22 (skanda.7.436.22)

तस्यास्तं निश्चयं ज्ञात्वा स्वयं देवः समाययौ॥ अब्रवीत्प्रहसन्वाक्यं प्रसादः क्रियतामिति

tasyāstaṁ niścayaṁ jñātvā svayaṁ devaḥ samāyayau|| abravītprahasanvākyaṁ prasādaḥ kriyatāmiti

उसके उस निश्चय को जानकर, देव (शिव) स्वयं वहाँ आए, और हँसते हुए यह वचन कहा - 'प्रसन्न हो जाओ।'

श्लोक 23 (skanda.7.436.23)

दृष्टिदानेन देवेशि भाषणेन वरानने॥ मया देवहितं कार्यं सर्वावस्थासु पार्वति

dṛṣṭidānena deveśi bhāṣaṇena varānane|| mayā devahitaṁ kāryaṁ sarvāvasthāsu pārvati

हे देवेशी! हे सुमुखी! दृष्टि प्रदान करके और वार्तालाप द्वारा, हे पार्वती! मुझे सभी अवस्थाओं में देवताओं का हित करना है।

श्लोक 24 (skanda.7.436.24)

अकाले तेन मुक्ताऽसि निवृत्तिः सुरते कृता॥ पुत्रार्थं ते समारंभो यतश्चासीत्सुरेश्वरि

akāle tena muktā'si nivṛttiḥ surate kṛtā|| putrārthaṁ te samārambho yataścāsītsureśvari

इसलिए असमय में तुम्हें छोड़ना पड़ा और संभोग से निवृत्ति करनी पड़ी। हे सुरेश्वरी! क्योंकि तुम्हारा यह प्रयास पुत्र-प्राप्ति के लिए ही था,

श्लोक 25 (skanda.7.436.25)

तस्मात्ते भविता पुत्रो निजदेहसमुद्भवः॥ मत्प्रसादादसंदिग्धं चतुर्थे दिवसे प्रिये

tasmātte bhavitā putro nijadehasamudbhavaḥ|| matprasādādasaṁdigdhaṁ caturthe divase priye

इसलिए, हे प्रिये! मेरी कृपा से निश्चित रूप से चौथे दिन तुम्हारे अपने ही शरीर से उत्पन्न पुत्र होगा।

श्लोक 26 (skanda.7.436.26)

निजांगमलमादाय यादृग्रूपं सुरेश्वरि॥ करिष्यसि न सन्देहस्तादृगेव भविष्यति

nijāṁgamalamādāya yādṛgrūpaṁ sureśvari|| kariṣyasi na saṁdehastādṛgeva bhaviṣyati

हे सुरेश्वरी! अपने अंगों के मैल को लेकर तुम जैसा रूप बनाओगी, निःसंदेह वह वैसा ही हो जाएगा।

श्लोक 27 (skanda.7.436.27)

सद्यो देवगणानां च दैत्यानां च विशेषतः॥ तथा वै सर्वमर्त्त्यानां सिद्धिदो बहुरूपधृक्

sadyo devagaṇānāṁ ca daityānāṁ ca viśeṣataḥ|| tathā vai sarvamarttyānāṁ siddhido bahurūpadhṛk

वह तत्काल देवगणों तथा विशेष रूप से दैत्यों के, और उसी प्रकार समस्त मनुष्यों के लिए भी सिद्धिदायक और अनेक रूप धारण करने वाला होगा।

श्लोक 28 (skanda.7.436.28)

एवमुक्ता त्रिनेत्रेण परितुष्टा सुरेश्वरी॥ आलापं पतिना चक्रे सार्द्धं हर्षसमन्विता

evamuktā trinetreṇa parituṣṭā sureśvarī|| ālāpaṁ patinā cakre sārddhaṁ harṣasamanvitā

त्रिनेत्र (शिव) द्वारा ऐसा कहे जाने पर, संतुष्ट होकर सुरेश्वरी ने प्रसन्नतापूर्वक अपने पति से वार्तालाप किया।

श्लोक 29 (skanda.7.436.29)

चतुर्थे दिवसे प्राप्ते ततः स्नात्वा शिवा नृप॥ तदोद्वर्त्तनजं लेपं गृहीत्वा कौतुकात्किल॥ चतुर्भुजं चकाराऽथ हरवाक्याद्विनायकम्

caturthe divase prāpte tataḥ snātvā śivā nṛpa|| tadodvarttanajaṁ lepaṁ gṛhītvā kautukātkila|| caturbhujaṁ cakārā'tha haravākyādvināyakam

हे राजन्! चौथा दिन आने पर, स्नान करके शिवा (पार्वती) ने कौतूहलवश उबटन से बने लेप को लेकर, शिव के वचनानुसार चतुर्भुज विनायक को रच दिया।

श्लोक 30 (skanda.7.436.30)

ततः सजीवतां प्राप्य हरवाक्येन तं तदा॥ विशेषेण महाराज नायकोऽसौ कृतः क्षितौ॥ सर्वेषां चैव मर्त्यानां ततः ख्यातो बभूव ह

tataḥ sajīvatāṁ prāpya haravākyena taṁ tadā|| viśeṣeṇa mahārāja nāyako'sau kṛtaḥ kṣitau|| sarveṣāṁ caiva martyānāṁ tataḥ khyāto babhūva ha

तब हर के वचन से उसे जीवन प्राप्त हुआ, हे महाराज! और विशेष रूप से पृथ्वी पर उसे नायक बनाया गया। तत्पश्चात् वह समस्त मनुष्यों में विख्यात हो गया।

श्लोक 31 (skanda.7.436.31)

विनायक इति श्रीमान्पूज्यस्त्रैलोक्यवासिनाम्॥ सर्वेषां देवमुख्यानां बभूव हि विनायकः

vināyaka iti śrīmānpūjyastrailokyavāsinām|| sarveṣāṁ devamukhyānāṁ babhūva hi vināyakaḥ

'विनायक' के नाम से वह श्रीमान तीनों लोकों के निवासियों के लिए पूज्य हो गया, और वह सभी प्रमुख देवताओं का भी विनायक (अग्रणी) बन गया।

श्लोक 32 (skanda.7.436.32)

ततो देवगणाः सर्वे देवीप्रियहिते रताः॥ तस्मै ददुर्वरान्दिव्यान्प्रोचुर्देवीं च पार्थिव

tato devagaṇāḥ sarve devīpriyahite ratāḥ|| tasmai dadurvarāndivyānprocurdevīṁ ca pārthiva

तब समस्त देवगण, देवी के प्रिय हित में रत होकर, उसे दिव्य वर देने लगे और देवी से यह कहा, हे राजन्!

श्लोक 33 (skanda.7.436.33)

॥ देवा ऊचुः ॥ तवायं तनयो देवि सर्वेषां नः पुरःसरः॥ प्रथमं पूजिते चास्मिन्पूजा ग्राह्या ततः सुरैः

|| devā ūcuḥ || tavāyaṁ tanayo devi sarveṣāṁ naḥ puraḥsaraḥ|| prathamaṁ pūjite cāsminpūjā grāhyā tataḥ suraiḥ

देवताओं ने कहा - हे देवी! तुम्हारा यह पुत्र हम सबका अग्रणी है। इसकी पूजा पहले किए जाने पर ही देवताओं की पूजा ग्राह्य होगी।

श्लोक 34 (skanda.7.436.34)

एतच्छृंगं गिरे रम्यं तव संसेवनाच्छुभे॥ सर्वपापहरं नृणां दर्शनाच्च भविष्यति

etacchṛṁgaṁ gire ramyaṁ tava saṁsevanācchubhe|| sarvapāpaharaṁ nṛṇāṁ darśanācca bhaviṣyati

हे शुभे! यह पर्वत का सुंदर शिखर तुम्हारी सेवा के कारण मनुष्यों के दर्शन मात्र से समस्त पापों को हरने वाला होगा।

श्लोक 35 (skanda.7.436.35)

येऽत्र स्नानं करिष्यन्ति सुपुण्ये सलिलाश्रये॥ ते यांस्यंति परं स्थानं जरामरणवर्जितम्

ye'tra snānaṁ kariṣyanti supuṇye salilāśraye|| te yāṁsyaṁti paraṁ sthānaṁ jarāmaraṇavarjitam

जो यहाँ इस अत्यंत पवित्र जलाशय में स्नान करेंगे, वे वृद्धावस्था और मृत्यु से रहित परम स्थान को प्राप्त होंगे।

श्लोक 36 (skanda.7.436.36)

माघमासे तृतीयायां शुक्लायां ये समाहिताः॥ सप्तजन्मांतराण्येव भविष्यन्ति सुखान्विताः

māghamāse tṛtīyāyāṁ śuklāyāṁ ye samāhitāḥ|| saptajanmāṁtarāṇyeva bhaviṣyanti sukhānvitāḥ

जो लोग माघ मास की शुक्ल तृतीया को एकाग्रचित्त होकर यहाँ आएँगे, वे सात जन्मों तक सुख से युक्त रहेंगे।

श्लोक 37 (skanda.7.436.37)

एवमुक्त्वा सुराः सर्वे स्वस्थानं तु ततो गताः॥ देवोऽपि सहितो देव्या कैलासं पर्वतं गतः

evamuktvā surāḥ sarve svasthānaṁ tu tato gatāḥ|| devo'pi sahito devyā kailāsaṁ parvataṁ gataḥ

ऐसा कहकर समस्त देवता तत्पश्चात् अपने-अपने स्थान को चले गए। भगवान भी देवी के साथ कैलास पर्वत को चले गए।

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