प्रभास खण्ड · अध्याय 437
ब्रह्मपद की उत्पत्ति और माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.437.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेद्ब्रह्मपदं तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्॥ यत्र पूर्वं पदं न्यस्तं ब्रह्मणा लोककारिणा
|| pulastya uvāca || tato gacchedbrahmapadaṁ tīrthaṁ trailokyaviśrutam|| yatra pūrvaṁ padaṁ nyastaṁ brahmaṇā lokakāriṇā
पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात् उस त्रैलोक्यविख्यात ब्रह्मपद तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ लोकों के रचयिता ब्रह्मा ने पूर्वकाल में अपना चरण रखा था।
श्लोक 2 (skanda.7.437.2)
पुरा ब्रह्मादयो देवास्तत्र सर्वे समाहिताः॥ अर्बुदे पर्वते रम्य ऋषयश्च सुनिर्मलाः
purā brahmādayo devāstatra sarve samāhitāḥ|| arbude parvate ramya ṛṣayaśca sunirmalāḥ
पूर्वकाल में ब्रह्मा आदि सभी देवता तथा अत्यंत निर्मल ऋषिगण उस रमणीय अर्बुद पर्वत पर एकत्रित हुए।
श्लोक 3 (skanda.7.437.3)
अचलेश्वरयात्रायां सुभक्त्या भाविता नृप॥ अथ ते मुनयः सर्वे प्रोचुर्देवं पितामहम्
acaleśvarayātrāyāṁ subhaktyā bhāvitā nṛpa|| atha te munayaḥ sarve procurdevaṁ pitāmaham
हे राजन्! अचलेश्वर की यात्रा में सुंदर भक्ति से भावित होकर, तब उन सभी मुनियों ने देव पितामह (ब्रह्मा) से कहा।
श्लोक 4 (skanda.7.437.4)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ प्रभूतनियमैर्होमैर्व्रतस्नानैश्च नित्यशः॥ उपवासैश्च निर्विण्णा वयं सर्वे पितामह
|| ṛṣaya ūcuḥ || prabhūtaniyamairhomairvratasnānaiśca nityaśaḥ|| upavāsaiśca nirviṇṇā vayaṁ sarve pitāmaha
ऋषियों ने कहा - अत्यधिक नियमों, होमों, व्रत-स्नानों तथा नित्य उपवासों से, हे पितामह! हम सब खिन्न हो गए हैं।
श्लोक 5 (skanda.7.437.5)
तस्मात्सदुपदेशं त्वं किंचिद्दातुमिहार्हसि॥ तरामो येन देवेश दुर्गं संसारसागरम्
tasmātsadupadeśaṁ tvaṁ kiṁciddātumihārhasi|| tarāmo yena deveśa durgaṁ saṁsārasāgaram
इसलिए आपको यहाँ कोई सद्उपदेश देना चाहिए, जिससे हे देवेश! हम दुर्गम संसार-सागर को पार कर सकें।
श्लोक 6 (skanda.7.437.6)
अयाचितोपचारैश्च जपहोमैः सुदुष्करैः॥ मन्त्रैर्व्रतैस्तथा दानैः स्वर्गप्राप्तिं वदस्व नः
ayācitopacāraiśca japahomaiḥ suduṣkaraiḥ|| mantrairvrataistathā dānaiḥ svargaprāptiṁ vadasva naḥ
बिना माँगे किए गए उपचारों, अत्यंत कठिन जप-होमों, मंत्रों, व्रतों तथा दानों के द्वारा स्वर्गप्राप्ति का उपाय हमें बताइए।
श्लोक 7 (skanda.7.437.7)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा तदा देवः कृपान्वितः॥ चिंतयामास सुचिरमिह किंचित्प्रहस्य च
teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā tadā devaḥ kṛpānvitaḥ|| ciṁtayāmāsa suciramiha kiṁcitprahasya ca
उनका वह वचन सुनकर, तब कृपा से युक्त देव (ब्रह्मा) ने कुछ हँसते हुए बहुत देर तक इस विषय में विचार किया।
श्लोक 8 (skanda.7.437.8)
ततः स्वकं पदं त्यक्त्वा रम्ये पर्वतरोधसि॥ अथोवाच मुनीन्सर्वान्ब्रह्मा संश्लक्ष्णया गिरा
tataḥ svakaṁ padaṁ tyaktvā ramye parvatarodhasi|| athovāca munīnsarvānbrahmā saṁślakṣṇayā girā
तब अपना चरण उस रमणीय पर्वत-तट पर रखकर, ब्रह्मा ने कोमल वाणी में सभी मुनियों से यह कहा।
श्लोक 9 (skanda.7.437.9)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ एतन्महापदं रम्यं सर्वपातकनाशनम्॥ स्पृशंतु ऋषयः सर्वे ततो यास्यथ सद्गतिम्
|| brahmovāca || etanmahāpadaṁ ramyaṁ sarvapātakanāśanam|| spṛśaṁtu ṛṣayaḥ sarve tato yāsyatha sadgatim
ब्रह्मा ने कहा - यह सुंदर महापद समस्त पापों का नाश करने वाला है। सभी ऋषि इसका स्पर्श करें, तत्पश्चात् तुम सद्गति को प्राप्त होगे।
श्लोक 10 (skanda.7.437.10)
विना स्नानेन दानेन व्रतहोमजपादिभिः॥ हितार्थं सर्वलोकानां मया न्यस्तं पदं शुभम्
vinā snānena dānena vratahomajapādibhiḥ|| hitārthaṁ sarvalokānāṁ mayā nyastaṁ padaṁ śubham
स्नान, दान, व्रत, होम, जप आदि के बिना ही, समस्त लोकों के हित के लिए मैंने यहाँ यह शुभ चरण-चिह्न रखा है।
श्लोक 11 (skanda.7.437.11)
अस्मिन्पदे मया न्यस्ते यांति लोकाः सहस्रशः॥ स्पृशंतु ऋषयः सर्वे देवाश्चापि पदं मम
asminpade mayā nyaste yāṁti lokāḥ sahasraśaḥ|| spṛśaṁtu ṛṣayaḥ sarve devāścāpi padaṁ mama
जब यह चरण मेरे द्वारा यहाँ रखा गया, तब सहस्रों लोक (इसके प्रभाव से) प्राप्त होते हैं। सभी ऋषि तथा देवता भी मेरे इस चरण का स्पर्श करें।
श्लोक 12 (skanda.7.437.12)
एकैवात्र प्रकर्त्तव्या श्रद्धा वाऽव्यभिचारिणी॥ यश्च श्रद्धान्वितः सम्यक्पदमेतन्मुनीश्वराः
ekaivātra prakarttavyā śraddhā vā'vyabhicāriṇī|| yaśca śraddhānvitaḥ samyakpadametanmunīśvarāḥ
यहाँ केवल एक अव्यभिचारिणी (अचल) श्रद्धा ही की जानी चाहिए। और जो, हे मुनीश्वरो! इस चरण के प्रति भलीभाँति श्रद्धायुक्त होगा,
श्लोक 13 (skanda.7.437.13)
पूजयिष्यति संप्राप्ते कार्तिके पूर्णिमादिने॥ तोयैः फलैश्च विविधैर्गंधमाल्यानुलेपनैः
pūjayiṣyati saṁprāpte kārtike pūrṇimādine|| toyaiḥ phalaiśca vividhairgaṁdhamālyānulepanaiḥ
जब कार्तिक की पूर्णिमा का दिन आए, तब जल, विविध फलों, गंध, माला और अनुलेपन से इसकी पूजा करेगा,
श्लोक 14 (skanda.7.437.14)
ब्राह्मणान्भोजयित्वा तु मिष्टान्नेन स्वशक्तितः॥ स यास्यति न सन्देहो मम लोकं सुदुर्लभम्
brāhmaṇānbhojayitvā tu miṣṭānnena svaśaktitaḥ|| sa yāsyati na sandeho mama lokaṁ suduralabham
और अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन कराकर, वह निःसंदेह मेरे परम दुर्लभ लोक को प्राप्त होगा।
श्लोक 15 (skanda.7.437.15)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो मुनिगणाः सर्वे सम्यक्छ्रद्धासमन्विताः॥ पूजयित्वा पदं तत्र ब्रह्मलोकं समागताः
|| pulastya uvāca || tato munigaṇāḥ sarve samyakchraddhāsamanvitāḥ|| pūjayitvā padaṁ tatra brahmalokaṁ samāgatāḥ
पुलस्त्य ने कहा - तब समस्त मुनिगण भलीभाँति श्रद्धा से युक्त होकर, वहाँ उस चरण की पूजा करके ब्रह्मलोक को प्राप्त हुए।
श्लोक 16 (skanda.7.437.16)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पदं पूज्यं नरोत्तम॥ पितामहपदं सम्यक्छ्रद्धया स्वर्गदायकम्
tasmātsarvaprayatnena padaṁ pūjyaṁ narottama|| pitāmahapadaṁ samyakchraddhayā svargadāyakam
इसलिए, हे नरोत्तम! उस पितामह के चरण की सम्पूर्ण प्रयत्न से पूजा करनी चाहिए; सच्ची श्रद्धा के साथ यह स्वर्गदायक है।
श्लोक 17 (skanda.7.437.17)
अन्यत्कौतूहलं राजन्महद्दृष्टं महाद्भुतम्॥ पदस्य तस्य यच्छ्रुत्वा जायते विस्मयो महान्
anyatkautūhalaṁ rājanmahaddṛṣṭaṁ mahādbhutam|| padasya tasya yacchrutvā jāyate vismayo mahān
हे राजन्! उस चरण से संबंधित एक और महान् आश्चर्य देखा गया है, जिसे सुनकर महान विस्मय उत्पन्न होता है।
श्लोक 18 (skanda.7.437.18)
आयामविस्तरेणाऽपि प्राप्ते कृतयुगे नृप॥ न संख्या जायते राजञ्छुक्लवर्णस्य मानवैः
āyāmavistareṇā'pi prāpte kṛtayuge nṛpa|| na saṁkhyā jāyate rājañchuklavarṇasya mānavaiḥ
हे राजन्! सतयुग के आने पर, उसकी लम्बाई-चौड़ाई तक की भी, मनुष्यों द्वारा उसके शुक्ल वर्ण की संख्या नहीं की जा सकती।
श्लोक 19 (skanda.7.437.19)
ततस्त्रेतायुगे प्राप्ते रक्तवर्णं प्रदृश्यते॥ सुव्यक्तं संख्यया युक्तं सर्वलोकनमस्कृतम्
tatastretāyuge prāpte raktavarṇaṁ pradṛśyate|| suvyaktaṁ saṁkhyayā yuktaṁ sarvalokanamaskṛtam
फिर त्रेतायुग के आने पर वह लाल रंग में दिखाई देता है, स्पष्ट रूप से गणनायुक्त, तथा समस्त लोकों द्वारा नमस्कृत होता है।
श्लोक 20 (skanda.7.437.20)
द्वापरे कपिलं तच्च लघुमात्रं प्रदृश्यते॥ कलौ कृष्णं सुसूक्ष्मं च रम्ये पर्वतरोधसि
dvāpare kapilaṁ tacca laghumātraṁ pradṛśyate|| kalau kṛṣṇaṁ susūkṣmaṁ ca ramye parvatarodhasi
द्वापर में वह तांबे के रंग का और छोटा दिखाई देता है, और कलियुग में उस रमणीय पर्वत-तट पर वह काला और अत्यंत सूक्ष्म हो जाता है।