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प्रभास खण्ड · अध्याय 439

रुद्रह्रद का माहात्म्य

अध्याय 438अध्याय-सूचीअध्याय 440

श्लोक 1 (skanda.7.439.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ पुण्यं रुद्रह्रदं शुभम्॥ यत्र स्नातो नरो भक्त्या गणाधीशत्वमाप्नुयात्

|| pulastya uvāca || tato gacchennṛpaśreṣṭha puṇyaṁ rudrahradaṁ śubham|| yatra snāto naro bhaktyā gaṇādhīśatvamāpnuyāt

पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात्, हे नृपश्रेष्ठ! उस पवित्र और शुभ रुद्रह्रद में जाना चाहिए, जहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करने वाला मनुष्य गणों के अधिपतित्व को प्राप्त करता है।

श्लोक 2 (skanda.7.439.2)

पुरा हत्वांऽधकं दैत्यं सगणो वृषभध्वजः॥ ततः स्नातो ह्रदं कृत्वा ततो रुद्रह्रदोऽभवत्

purā hatvāṁ'dhakaṁ daityaṁ sagaṇo vṛṣabhadhvajaḥ|| tataḥ snāto hradaṁ kṛtvā tato rudrahrado'bhavat

पूर्वकाल में अंधक दैत्य को मारकर, अपने गणों सहित वृषभध्वज (शिव) ने वहाँ एक ह्रद (जलाशय) बनाकर स्नान किया, तभी से वह रुद्रह्रद कहलाया।

श्लोक 3 (skanda.7.439.3)

चतुर्द्दश्यां महाराज यस्तत्र कुरुते नरः॥ स्नानं तस्य भवेत्पुण्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम्

caturddaśyāṁ mahārāja yastatra kurute naraḥ|| snānaṁ tasya bhavetpuṇyaṁ sarvatīrthasamudbhavam

हे महाराज! जो मनुष्य चतुर्दशी के दिन वहाँ स्नान करता है, उसे समस्त तीर्थों से उत्पन्न होने वाला पुण्य प्राप्त होता है।

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