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प्रभास खण्ड · अध्याय 440

गुहेश्वर का माहात्म्य

अध्याय 439अध्याय-सूचीअध्याय 441

श्लोक 1 (skanda.7.440.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ गुहेश्वरमनुत्तमम्॥ गुहामध्ये गतं लिंगं सिद्धैः संपूजितं पुरा

|| pulastya uvāca || tato gacchennṛpaśreṣṭha guheśvaramanuttamam|| guhāmadhye gataṁ liṅgaṁ siddhaiḥ saṁpūjitaṁ purā

पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात्, हे नृपश्रेष्ठ! उस सर्वोत्तम गुहेश्वर में जाना चाहिए, जहाँ गुहा के भीतर स्थित लिंग की पूर्वकाल में सिद्धों द्वारा पूजा की जाती थी।

श्लोक 2 (skanda.7.440.2)

यंयं काममभिध्याय संपूजयति मानवः॥ तंतं स लभते राजन्निष्कामो मोक्षमाप्नुयात्

yaṁyaṁ kāmamabhidhyāya saṁpūjayati mānavaḥ|| taṁtaṁ sa labhate rājanniṣkāmo mokṣamāpnuyāt

जिस-जिस कामना का ध्यान करके मनुष्य यहाँ पूजा करता है, हे राजन्! उसे वही-वही प्राप्त होती है, और निष्काम व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।

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