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प्रभास खण्ड · अध्याय 44

सोमेश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

श्लोक 1 (skanda.7.44.1)

॥ ईश्वर उवाच ॥ आदित्येशं समभ्यर्च्य पुनः सोमेश्वरं व्रजेत् ॥ तं संपूज्य विधानेन पंचांगेन विशेषतः

|| īśvara uvāca || ādityeśaṁ samabhyarcya punaḥ someśvaraṁ vrajet || taṁ saṁpūjya vidhānena paṁcāṁgena viśeṣataḥ

ईश्वर ने कहा - आदित्येश की पूजा करके फिर सोमेश्वर के पास जाना चाहिए; विशेषकर पंचांग-विधि से विधिपूर्वक उनकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.44.2)

दृष्ट्वा सोमेश्वरं चैव साष्टांगं प्रणिपत्य च ॥ प्रदक्षिणादिकं कुर्यात्संपश्येच्च पुनःपुनः

dṛṣṭvā someśvaraṁ caiva sāṣṭāṁgaṁ praṇipatya ca || pradakṣiṇādikaṁ kuryātsaṁpaśyecca punaḥpunaḥ

सोमेश्वर का दर्शन कर, साष्टांग प्रणाम करके, प्रदक्षिणा आदि करनी चाहिए तथा बार-बार उनका दर्शन करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.7.44.3)

सूर्याचन्द्रमसोर्लिंगं त्रिःकृत्वा प्रयतः शुचिः ॥ अग्नीषोमात्मकं कर्म तेन सर्वं कृतं भवेत्

sūryācandramasorliṁgaṁ triḥkṛtvā prayataḥ śuciḥ || agnīṣomātmakaṁ karma tena sarvaṁ kṛtaṁ bhavet

पवित्र होकर, संयमपूर्वक सूर्य-चंद्र के लिंग की तीन बार परिक्रमा करने से अग्नीषोम-संबंधी सम्पूर्ण कर्म पूर्ण हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.7.44.4)

उमादेवीं ततो गच्छेत्सोमेश्वरसमीपतः ॥ द्वितीयां तु ततो गच्छेद्दैत्यसूदनसन्निधौ

umādevīṁ tato gacchetsomeśvarasamīpataḥ || dvitīyāṁ tu tato gaccheddaityasūdanasannidhau

फिर सोमेश्वर के समीप उमादेवी के पास जाना चाहिए; और उसके पश्चात् दैत्यसूदन (विष्णु) के सांनिध्य में जाना चाहिए।

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