प्रभास खण्ड · अध्याय 45
अंगारेश्वर (भौम) माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.45.1)
॥ ईश्वर उवाच ॥ ततो गच्छेन्महादेवि अंगारेश्वरमुत्तमम् ॥ स्थापितं भूमिपुत्रेण सोमेशादीश गोचरे
|| īśvara uvāca || tato gacchenmahādevi aṁgāreśvaramuttamam || sthāpitaṁ bhūmiputreṇa someśādīśa gocare
ईश्वर ने कहा - फिर हे महादेवि! उत्तम अंगारेश्वर के पास जाना चाहिए, जिसे भूमिपुत्र ने सोमेश से ईशान दिशा में स्थापित किया था।
श्लोक 2 (skanda.7.45.2)
त्रिपुरं दग्धुकामस्य पुरा मम वरानने ॥ क्रोधादश्रु विनिष्क्रांतं लोचनत्रितयेन तु
tripuraṁ dagdhukāmasya purā mama varānane || krodhādaśru viniṣkrāṁtaṁ locanatritayena tu
हे वरानने! पूर्वकाल में जब मैं त्रिपुर को जलाने की इच्छा कर रहा था, तब क्रोधवश मेरे तीनों नेत्रों से एक अश्रु-बिंदु निकला।
श्लोक 3 (skanda.7.45.3)
तच्च भूमौ निपतितं ततो भूभिसुतोऽभवत् ॥ स प्रभासं ततो गत्वा बाल्यात्प्रभृति शंकरम्
tacca bhūmau nipatitaṁ tato bhūbhisuto'bhavat || sa prabhāsaṁ tato gatvā bālyātprabhṛti śaṁkaram
वह पृथ्वी पर गिरा और उससे भूमिपुत्र (भौम) उत्पन्न हुआ। वह तब प्रभास में जाकर बाल्यकाल से ही शंकर की -
श्लोक 4 (skanda.7.45.4)
तपसाऽऽराधयामास बहून्वर्षगणान्प्रिये ॥ तस्य तुष्टो महादेवः सुप्रीतात्मा वरं ददौ
tapasā''rādhayāmāsa bahūnvarṣagaṇānpriye || tasya tuṣṭo mahādevaḥ suprītātmā varaṁ dadau
- हे प्रिये! अनेक वर्षों तक तपस्या से आराधना करता रहा। उससे संतुष्ट होकर महादेव ने अत्यंत प्रसन्न मन से वर दिया।
श्लोक 5 (skanda.7.45.5)
सोऽब्रवीद्यदि मे देव तुष्टोसि वृषभध्वज ॥ ग्रहत्वं देहि सर्वेश न चान्यं वरमुत्सहे
so'bravīdyadi me deva tuṣṭosi vṛṣabhadhvaja || grahatvaṁ dehi sarveśa na cānyaṁ varamutsahe
उसने कहा - हे देव! हे वृषभध्वज! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो हे सर्वेश! मुझे ग्रहत्व प्रदान कीजिए; मैं अन्य कोई वर नहीं चाहता।
श्लोक 6 (skanda.7.45.6)
स तथेति प्रतिज्ञाय पुनस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ इहागत्य नरो यो मां पूजयिष्यति भक्तितः
sa tatheti pratijñāya punastaṁ vākyamabravīt || ihāgatya naro yo māṁ pūjayiṣyati bhaktitaḥ
उन्होंने "ऐसा ही हो" कहकर स्वीकार किया और पुनः उससे यह वचन कहा - जो मनुष्य यहाँ आकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करेगा -
श्लोक 7 (skanda.7.45.7)
न भविष्यति वै पीडा तावकी तस्य कुत्रचित् ॥ पुष्पाणि रक्तवर्णानि मध्वाज्याक्तानि भूरिशः
na bhaviṣyati vai pīḍā tāvakī tasya kutracit || puṣpāṇi raktavarṇāni madhvājyāktāni bhūriśaḥ
- उसे तुम्हारी (मंगल की) पीड़ा कहीं भी नहीं होगी। जो लाल रंग के पुष्प, शहद और घी में डुबोकर बहुतायत में -
श्लोक 8 (skanda.7.45.8)
होमयिष्यति यो भक्त्या लक्षमेकं तदग्रतः ॥ पंचोपचारविधिना त्वां तु संपूज्य यत्नतः
homayiṣyati yo bhaktyā lakṣamekaṁ tadagrataḥ || paṁcopacāravidhinā tvāṁ tu saṁpūjya yatnataḥ
- एक लाख भक्तिपूर्वक उसके सम्मुख हवन करेगा, तथा यत्नपूर्वक पंचोपचार विधि से तुम्हारी पूजा करेगा -
श्लोक 9 (skanda.7.45.9)
तस्य जन्मावधिर्नैव तव पीडा भविष्यति ॥। तथा विद्रुमदानेन लप्स्यते फलमीप्सितम्
tasya janmāvadhirnaiva tava pīḍā bhaviṣyati ||| tathā vidrumadānena lapsyate phalamīpsitam
- उसे जीवनभर तुम्हारी पीड़ा कभी नहीं होगी; तथा मूँगे का दान करने से वह इच्छित फल प्राप्त करेगा।
श्लोक 10 (skanda.7.45.10)
एवमुक्त्वा स भगवानत्रैवांतरधीयन ॥ भौमोऽपि ग्रहमध्यस्थो विमानेन विराजते
evamuktvā sa bhagavānatraivāṁtaradhīyana || bhaumo'pi grahamadhyastho vimānena virājate
यह कहकर वह भगवान वहीं अंतर्धान हो गए; और भौम भी ग्रहों के मध्य स्थित होकर विमान से सुशोभित होते हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.45.11)
एवं संक्षेपतः प्रोक्तं भौममाहात्म्यमुत्तमम्॥ श्रुतं हरति पापानि तथारोग्यं प्रयच्छति
evaṁ saṁkṣepataḥ proktaṁ bhaumamāhātmyamuttamam|| śrutaṁ harati pāpāni tathārogyaṁ prayacchati
इस प्रकार संक्षेप में भौम की उत्तम महिमा कही गई है; इसे सुनने से पापों का नाश होता है तथा आरोग्य प्राप्त होता है।