प्रभास खण्ड · अध्याय 442
उमामाहेश्वर तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.442.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ उमामाहेश्वरं गच्छेत्ततो राजन्सुपुण्यदम्॥ स्थापितं भक्तियुक्तेन धुन्धुमारेण यत्पुरा
|| pulastya uvāca || umāmāheśvaraṁ gacchettato rājansupuṇyadam|| sthāpitaṁ bhaktiyuktena dhundhumāreṇa yatpurā
पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात्, हे राजन्! उस अत्यंत पुण्यदायक उमामाहेश्वर में जाना चाहिए, जिसे पूर्वकाल में भक्तियुक्त धुन्धुमार ने स्थापित किया था।
श्लोक 2 (skanda.7.442.2)
दांपत्यं पूजयेद्भक्त्या यस्तत्र मनुजाधिप॥ सप्त जन्मांतराण्येव न स दौर्भाग्यमाप्नुयात
dāṁpatyaṁ pūjayedbhaktyā yastatra manujādhipa|| sapta janmāṁtarāṇyeva na sa daurbhāgyamāpnuyāta
हे मनुजाधिप! जो वहाँ भक्तिपूर्वक इस दंपति (उमा-महेश्वर) की पूजा करता है, वह सात जन्मों तक दुर्भाग्य को प्राप्त नहीं होता।