प्रभास खण्ड · अध्याय 443
महौजस तीर्थ का प्रभाव
श्लोक 1 (skanda.7.443.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो महौजसं गच्छेत्तीर्थं पातकनाशनम्॥ यस्मिन्स्नातो नरो राजंस्तेजसा युज्यते ध्रुवम्॥ ब्रह्महत्याग्निना शक्रः पुरा दैन्यं परं गतः
|| pulastya uvāca || tato mahaujasaṁ gacchettīrthaṁ pātakanāśanam|| yasminsnāto naro rājaṁstejasā yujyate dhruvam|| brahmahatyāgninā śakraḥ purā dainyaṁ paraṁ gataḥ
पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात् उस महौजस तीर्थ में जाना चाहिए, जो पापों का नाश करने वाला है। हे राजन्! जहाँ स्नान करने वाला मनुष्य निश्चय ही तेज से युक्त हो जाता है। पूर्वकाल में ब्रह्महत्या की अग्नि से इन्द्र अत्यंत दीनता को प्राप्त हुए थे।
श्लोक 2 (skanda.7.443.2)
निःश्रीकस्तेजसा हीनो दुर्गन्धेन समन्वितः॥ परित्यक्तः सुरैः सर्वैर्विषादं परमं गतः
niḥśrīkastejasā hīno durgandhena samanvitaḥ|| parityaktaḥ suraiḥ sarvairviṣādaṁ paramaṁ gataḥ
श्रीहीन, तेजरहित तथा दुर्गंध से युक्त होकर, समस्त देवताओं द्वारा त्यागे जाने पर, वह परम विषाद को प्राप्त हुआ।
श्लोक 3 (skanda.7.443.3)
ततः पप्रच्छ देवेन्द्रो द्विजश्रेष्ठं बृहस्पतिम्॥ भगवंस्तेजसो वृद्धिः कथं स्यान्मे यथा पुरा
tataḥ papraccha devendro dvijaśreṣṭhaṁ bṛhaspatim|| bhagavaṁstejaso vṛddhiḥ kathaṁ syānme yathā purā
तब देवेन्द्र ने द्विजश्रेष्ठ बृहस्पति से पूछा - हे भगवन्! मेरे तेज की वृद्धि पूर्वकाल की भाँति कैसे हो सकती है?
श्लोक 4 (skanda.7.443.4)
॥ बृहस्पतिरुवाच ॥ तीर्थयात्रां सुरश्रेष्ठ कुरुष्व धरणीतले॥ तीर्थं विना ध्रुवं वृद्धिस्तेजसो न भविष्यति
|| bṛhaspatiruvāca || tīrthayātrāṁ suraśreṣṭha kuruṣva dharaṇītale|| tīrthaṁ vinā dhruvaṁ vṛddhistejaso na bhaviṣyati
बृहस्पति ने कहा - हे देवश्रेष्ठ! पृथ्वी पर तीर्थयात्रा करो। तीर्थ के बिना निश्चय ही तेज की वृद्धि नहीं होगी।
श्लोक 5 (skanda.7.443.5)
ततस्तीर्थान्यनेकानि भ्रांत्वा शक्रो नराधिप॥ क्रमेणैवार्बुदं प्राप्तस्तत्र दृष्ट्वा जलाशयम्॥ स्नानं चक्रे ततः श्रान्तो महौजाः प्रत्यपद्यत
tatastīrthānyanekāni bhrāṁtvā śakro narādhipa|| krameṇaivārbudaṁ prāptastatra dṛṣṭvā jalāśayam|| snānaṁ cakre tataḥ śrānto mahaujāḥ pratyapadyata
तब हे राजन्! अनेक तीर्थों में भ्रमण करते हुए इन्द्र क्रमशः अर्बुद पर्वत पर पहुँचे, वहाँ जलाशय को देखकर, थके हुए उन्होंने स्नान किया, और तब वे महौजा (महातेजस्वी) हो गए।
श्लोक 6 (skanda.7.443.6)
दुर्गन्धेन विनिर्मुक्तस्ततो देवैः समावृतः॥ उवाच प्रहसन्वाक्यं शृणुध्वं सर्वदेवताः
durgandhena vinirmuktastato devaiḥ samāvṛtaḥ|| uvāca prahasanvākyaṁ śṛṇudhvaṁ sarvadevatāḥ
दुर्गंध से मुक्त होकर, तब देवताओं से घिरे हुए उन्होंने हँसते हुए यह वचन कहा - 'हे समस्त देवगण! सुनो।'
श्लोक 7 (skanda.7.443.7)
येऽत्र स्नानं करिष्यन्ति प्राप्ते शक्रोच्छ्रये सदा॥ आश्विने शुक्लपक्षांते ते यास्यंति परां गतिम्॥ सुश्रीकाश्च भविष्यंति सदा जन्मनिजन्मनि
ye'tra snānaṁ kariṣyanti prāpte śakrocchraye sadā|| āśvine śuklapakṣāṁte te yāsyaṁti parāṁ gatim|| suśrīkāśca bhaviṣyaṁti sadā janmanijanmani
जो सदा यहाँ स्नान करेंगे, जब शक्रोच्छ्रय (इन्द्र का उत्थान-पर्व) आश्विन मास के शुक्ल पक्ष के अंत में आए, वे परम गति को प्राप्त होंगे, और जन्म-जन्म में सदा अत्यंत श्रीसंपन्न होंगे।