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प्रभास खण्ड · अध्याय 444

जम्बूतीर्थ का प्रभाव

अध्याय 443अध्याय-सूचीअध्याय 445

श्लोक 1 (skanda.7.444.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ जंबूतीर्थमनुत्तमम्॥ तत्र स्नातो नरः सम्यगिष्टं फलमवाप्नुयात्॥ जंबूद्वीपसमुत्थानां तीर्थानां नृपसत्तम

|| pulastya uvāca || tato gacchennṛpaśreṣṭha jaṁbūtīrthamanuttamam|| tatra snāto naraḥ samyagiṣṭaṁ phalamavāpnuyāt|| jaṁbūdvīpasamutthānāṁ tīrthānāṁ nṛpasattama

पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात्, हे नृपश्रेष्ठ! उस सर्वोत्तम जंबूतीर्थ में जाना चाहिए। वहाँ स्नान करने वाला मनुष्य भलीभाँति इच्छित फल प्राप्त करता है, हे नृपसत्तम! क्योंकि वहाँ जंबूद्वीप से उत्पन्न हुए सभी तीर्थ विद्यमान हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.444.2)

आसीत्पुरा निमिर्नाम क्षत्रियः सूर्यवंशजः॥ वयसः परिणामे स पर्वतं चार्बुदं गतः

āsītpurā nimirnāma kṣatriyaḥ sūryavaṁśajaḥ|| vayasaḥ pariṇāme sa parvataṁ cārbudaṁ gataḥ

पूर्वकाल में निमि नामक एक सूर्यवंशी क्षत्रिय था। वृद्धावस्था आने पर वह अर्बुद पर्वत को चला गया।

श्लोक 3 (skanda.7.444.3)

प्रायोपवेशनं कृत्वा स्थितस्तत्र समाहितः॥ अथाजग्मुर्मुनिगणास्तस्य पार्श्वे सहस्रशः

prāyopaveśanaṁ kṛtvā sthitastatra samāhitaḥ|| athājagmurmunigaṇāstasya pārśve sahasraśaḥ

प्रायोपवेशन (आमरण अनशन) करके वह वहाँ एकाग्रचित्त होकर बैठ गया। तब हजारों मुनिगण उसके पास आए।

श्लोक 4 (skanda.7.444.4)

चक्रुर्धर्मकथां पुण्यां राजर्षीणां महात्मनाम्॥ देवर्षीणां पुराणानां तथान्येषां महात्मनाम्

cakrurdharmakathāṁ puṇyāṁ rājarṣīṇāṁ mahātmanām|| devarṣīṇāṁ purāṇānāṁ tathānyeṣāṁ mahātmanām

उन्होंने महात्मा राजर्षियों, देवर्षियों, पुराणों तथा अन्य महात्माओं से संबंधित पवित्र धर्मकथा की।

श्लोक 5 (skanda.7.444.5)

ततः कश्चित्कथांते च लोमशो नाम सन्मुनिः॥ कीर्त्तयामास माहात्म्यं सर्वतीर्थसमुद्भवम्

tataḥ kaścitkathāṁte ca lomaśo nāma sanmuniḥ|| kīrttayāmāsa māhātmyaṁ sarvatīrthasamudbhavam

तब कथा के अंत में लोमश नामक एक सत्पुरुष मुनि ने समस्त तीर्थों से उत्पन्न होने वाले माहात्म्य का वर्णन किया।

श्लोक 6 (skanda.7.444.6)

तच्छ्रुत्वा पार्थिवो राजन्निमिः परमदुर्मनाः॥ बभूव न कृतं पूर्वं यतस्तीर्थावगाहनम्

tacchrutvā pārthivo rājannimiḥ paramadurmanāḥ|| babhūva na kṛtaṁ pūrvaṁ yatastīrthāvagāhanam

यह सुनकर, हे राजन्! राजा निमि अत्यंत दुःखी हो गया, क्योंकि उसने पहले कभी तीर्थों में स्नान नहीं किया था।

श्लोक 7 (skanda.7.444.7)

ततः प्रोवाच तं विप्रमस्त्युपायो द्विजोत्तम॥ कश्चिद्येन च सर्वेषां तीर्थानां लभ्यते फलम्

tataḥ provāca taṁ vipramastyupāyo dvijottama|| kaścidyena ca sarveṣāṁ tīrthānāṁ labhyate phalam

तब उसने उस ब्राह्मण से कहा - हे द्विजोत्तम! क्या कोई ऐसा उपाय है, जिससे समस्त तीर्थों का फल प्राप्त हो सके?

श्लोक 8 (skanda.7.444.8)

॥ लोमश उवाच ॥ दया मे नृप सञ्जाता त्वां दृष्ट्वा दुःखितं भृशम्॥ तीर्थयात्राकृते यस्मात्करिष्येऽहं तव प्रियम्

|| lomaśa uvāca || dayā me nṛpa sañjātā tvāṁ dṛṣṭvā duḥkhitaṁ bhṛśam|| tīrthayātrākṛte yasmātkariṣye'haṁ tava priyam

लोमश ने कहा - हे राजन्! तुम्हें तीर्थयात्रा के लिए इतना दुःखी देखकर मुझे दया आ गई है, इसलिए मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा।

श्लोक 9 (skanda.7.444.9)

अत्रैव चानयिष्यामि जंबूद्वीपोद्भवानि च॥ सर्वतीर्थानि राजेन्द्र मन्त्रशक्त्या न संशयः

atraiva cānayiṣyāmi jaṁbūdvīpodbhavāni ca|| sarvatīrthāni rājendra mantraśaktyā na saṁśayaḥ

मैं यहीं पर जंबूद्वीप में उत्पन्न हुए समस्त तीर्थों को मंत्रशक्ति से ला दूँगा, हे राजेन्द्र! इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 10 (skanda.7.444.10)

स्नानं कुरु महाराज ह्येकीभूतेषु तत्र च॥ अस्मिञ्जलाशये पुण्ये सत्यमेतद्ब्रवीम्यहम्

snānaṁ kuru mahārāja hyekībhūteṣu tatra ca|| asmiñjalāśaye puṇye satyametadbravīmyaham

हे महाराज! उन समस्त तीर्थों के एकत्रित होने पर, इस पवित्र जलाशय में स्नान करना। मैं यह सत्य कहता हूँ।

श्लोक 11 (skanda.7.444.11)

एवमुक्त्वा स विप्रर्षिर्ध्यानं चक्रे समाहितः॥ ततस्तीर्थानि सर्वाणि तत्रायातानि तत्क्षणात्

evamuktvā sa viprarṣirdhyānaṁ cakre samāhitaḥ|| tatastīrthāni sarvāṇi tatrāyātāni tatkṣaṇāt

ऐसा कहकर उस ब्राह्मण-ऋषि ने एकाग्रचित्त होकर ध्यान किया, और तत्क्षण ही समस्त तीर्थ वहाँ आ गए।

श्लोक 12 (skanda.7.444.12)

प्रत्ययार्थं च राजर्षे जंबूवृक्षो व्यजायत॥ तत्र स्नानं नृपश्चक्रे सर्वतीर्थमये ध्रुवे

pratyayārthaṁ ca rājarṣe jaṁbūvṛkṣo vyajāyata|| tatra snānaṁ nṛpaścakre sarvatīrthamaye dhruve

और प्रमाण के रूप में, हे राजर्षि! वहाँ एक जंबू वृक्ष उत्पन्न हो गया। तब राजा ने उस स्थिर, समस्त तीर्थों से युक्त स्थान में स्नान किया।

श्लोक 13 (skanda.7.444.13)

सदेहश्च गतः स्वर्गे तीर्थस्नानादनन्तरम्॥ ततः प्रभृति तत्तीर्थं जंबूतीर्थमनुस्मृतम्

sadehaśca gataḥ svarge tīrthasnānādanantaram|| tataḥ prabhṛti tattīrthaṁ jaṁbūtīrthamanusmṛtam

तीर्थ-स्नान के तुरंत बाद वह अपने ही शरीर सहित स्वर्ग को चला गया। उसी समय से वह तीर्थ 'जंबूतीर्थ' के नाम से स्मरण किया जाता है।

श्लोक 14 (skanda.7.444.14)

कन्यागते रवौ तत्र यः श्राद्धं कुरुते नरः॥ गयाशीर्षसमं तस्य पुण्यमाहुर्महर्षयः

kanyāgate ravau tatra yaḥ śrāddhaṁ kurute naraḥ|| gayāśīrṣasamaṁ tasya puṇyamāhurmaharṣayaḥ

जब सूर्य कन्या राशि में आता है, तब जो मनुष्य वहाँ श्राद्ध करता है, महर्षियों ने उसके पुण्य को गयाशीर्ष के समान बताया है।

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