प्रभास खण्ड · अध्याय 445
गंगाधर तीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.445.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ गंगाधरं ततो गच्छेत्सुपुण्यं विमलोदकम्॥ येन गंगा धृता राजन्निपतन्ती नभस्तलात्
|| pulastya uvāca || gaṁgādharaṁ tato gacchetsupuṇyaṁ vimalodakam|| yena gaṁgā dhṛtā rājannipatantī nabhastalāt
पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात् उस अत्यंत पवित्र, निर्मल जल वाले गंगाधर में जाना चाहिए, हे राजन्! जहाँ आकाश से गिरती हुई गंगा को धारण किया गया था।
श्लोक 2 (skanda.7.445.2)
आहूता देव देवेन ह्यचलेश्वररूपिणा॥ हरेण रभसा राजन्यत्पुरा कथितं तव
āhūtā deva devena hyacaleśvararūpiṇā|| hareṇa rabhasā rājanyatpurā kathitaṁ tava
देवों के देव, अचलेश्वर के रूप में विराजमान हर (शिव) द्वारा उसे वेग से बुलाया गया, हे राजन्! जैसा कि पूर्व में तुमसे कहा जा चुका है।
श्लोक 3 (skanda.7.445.3)
तत्र यः कुरुते स्नानमष्टम्यां च समाहितः॥ स गच्छेत्परमं स्थानं देवै रपि सुदुर्लभम्
tatra yaḥ kurute snānamaṣṭamyāṁ ca samāhitaḥ|| sa gacchetparamaṁ sthānaṁ devairapi sudurlabham
जो अष्टमी के दिन एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान करता है, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है, जो देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ है।