प्रभास खण्ड · अध्याय 446
कटेश्वर और गंगेश्वर का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.446.1)
॥ पुलस्त्यस्य उवाच ॥ ततः कटेश्वरं गच्छेल्लिंगं गौरीविनिर्मितम्॥ तथा गंगेश्वरं चान्यद्गङ्गया निर्मितं स्वयम्
|| pulastyasya uvāca || tataḥ kaṭeśvaraṁ gacchelliṅgaṁ gaurīvinirmitam|| tathā gaṁgeśvaraṁ cānyadgaṅgayā nirmitaṁ svayam
पुलस्त्य ने कहा - तत्पश्चात् कटेश्वर जाना चाहिए, जो लिंग गौरी द्वारा निर्मित है, तथा उसी प्रकार दूसरा गंगेश्वर, जो स्वयं गंगा द्वारा निर्मित किया गया।
श्लोक 2 (skanda.7.446.2)
पुरा समभवद्युद्धमुमायाः सह गंगया॥ सौभाग्यं प्रति राजेन्द्र ततो गौरीत्यभाषत
purā samabhavadyuddhamumāyāḥ saha gaṁgayā|| saubhāgyaṁ prati rājendra tato gaurītyabhāṣata
पूर्वकाल में उमा और गंगा के बीच सौभाग्य को लेकर विवाद हुआ, हे राजेन्द्र! तब गौरी ने यह कहा।
श्लोक 3 (skanda.7.446.3)
यया संपूजितः शंभुः शीघ्रं यास्यति दर्शनम्॥ सा सौभाग्यवती नूनभावयोः संभविष्यति
yayā saṁpūjitaḥ śaṁbhuḥ śīghraṁ yāsyati darśanam|| sā saubhāgyavatī nūnabhāvayoḥ saṁbhaviṣyati
'हम दोनों में से जिसके द्वारा पूजित होकर शंभु शीघ्र ही दर्शन देने आएँगे, वही निश्चय ही सौभाग्यवती सिद्ध होगी।'
श्लोक 4 (skanda.7.446.4)
एवमुक्ता ततो गंगा सत्वरैत्यात्र पर्वते॥ लिंगमन्वेषयामास चिरकालादवाप सा
evamuktā tato gaṁgā satvaraityātra parvate|| liṅgamanveṣayāmāsa cirakālādavāpa sā
ऐसा कहे जाने पर, गंगा शीघ्रता से इस पर्वत पर आ गई, और लिंग की खोज करने लगी, जिसे उसने बहुत काल के बाद प्राप्त किया।
श्लोक 5 (skanda.7.446.5)
दृष्ट्वा गौर्याथ कटकं पर्वतस्य मनोहरम्॥ लिंगाकारं महाराज पूजयामास सा तदा
dṛṣṭvā gauryātha kaṭakaṁ parvatasya manoharam|| liṅgākāraṁ mahārāja pūjayāmāsa sā tadā
हे महाराज! तब गौरी ने पर्वत के मनोहर कटक (कगार) को देखकर, उसे लिंगाकार जानकर, उसकी पूजा की।
श्लोक 6 (skanda.7.446.6)
सम्यक्छ्रद्धासमोपेता ततस्तुष्टो महेश्वरः॥ प्रददौ दर्शनं तस्या वरदोऽस्मीति चाब्रवीत्
samyakchraddhāsamopetā tatastuṣṭo maheśvaraḥ|| pradadau darśanaṁ tasyā varado'smīti cābravīt
पूर्ण श्रद्धा से युक्त होने पर, तब महेश्वर प्रसन्न हुए, और उसे दर्शन देकर कहा - 'मैं वर देने वाला हूँ।'
श्लोक 7 (skanda.7.446.7)
॥ गौर्युवाच ॥ सापत्न्यजेर्ष्यया देव मया लिंगं प्रकल्पितम्॥ तस्मात्कटेश्वराख्या च लोके चास्य भविष्यति
|| gauryuvāca || sāpatnyajerṣyayā deva mayā liṅgaṁ prakalpitam|| tasmātkaṭeśvarākhyā ca loke cāsya bhaviṣyati
गौरी ने कहा - हे देव! सौत की ईर्ष्या के कारण मैंने इस लिंग की रचना की है, इसलिए लोक में इसका नाम 'कटेश्वर' होगा।
श्लोक 8 (skanda.7.446.8)
या नारी पतिना मुक्ता सपत्नीदुःखदुःखिता॥ अस्य संदर्शनादेव सा भविष्यति विज्वरा॥ सुतसौभाग्यसंपन्ना भर्तृप्राणसमा तथा
yā nārī patinā muktā sapatnīduḥkhaduḥkhitā|| asya saṁdarśanādeva sā bhaviṣyati vijvarā|| sutasaubhāgyasaṁpannā bhartṛprāṇasamā tathā
जो स्त्री अपने पति द्वारा त्यागी गई हो और सौतिया दुःख से पीड़ित हो, वह इसके दर्शन मात्र से ही व्यथारहित हो जाएगी, पुत्र और सौभाग्य से संपन्न होकर अपने पति को प्राणों के समान प्रिय हो जाएगी।
श्लोक 9 (skanda.7.446.9)
गंगयाराधितो देव एवमेव वरं ददौ॥ तस्माल्लिंगद्वयं तच्च द्रष्टव्यं मनुजाधिप
gaṁgayārādhito deva evameva varaṁ dadau|| tasmālliṅgadvayaṁ tacca draṣṭavyaṁ manujādhipa
गंगा द्वारा आराधित देव ने इसी प्रकार वर दिया। इसलिए, हे मनुजाधिप! उन दोनों लिंगों का दर्शन अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.7.446.10)
विशेषतश्च नारीभिः सपत्नीदोषहानिदम्॥ सुखसौभाग्यदं नित्यं तथाऽभीष्टप्रदं नृणाम्
viśeṣataśca nārībhiḥ sapatnīdoṣahānidam|| sukhasaubhāgyadaṁ nityaṁ tathā'bhīṣṭapradaṁ nṛṇām
विशेष रूप से स्त्रियों द्वारा, क्योंकि यह सौत के दोष को दूर करने वाला, सदा सुख-सौभाग्य प्रदान करने वाला, तथा मनुष्यों के लिए अभीष्ट फल देने वाला है।