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प्रभास खण्ड · अध्याय 447

अर्बुदखण्ड माहात्म्य की फलश्रुति

अध्याय 446अध्याय-सूचीअध्याय 448

श्लोक 1 (skanda.7.447.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि॥ अर्बुदस्य महाराज माहात्म्यं हि समासतः

|| pulastya uvāca || etatte sarvamākhyātaṁ yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi|| arbudasya mahārāja māhātmyaṁ hi samāsataḥ

पुलस्त्य ने कहा - जो कुछ तुमने मुझसे पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया - हे महाराज! यह अर्बुद पर्वत का माहात्म्य संक्षेप में कहा गया है।

श्लोक 2 (skanda.7.447.2)

विस्तरेण च संख्या स्यादपि वर्षशतैरपि॥ असंख्यानीह तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च॥ पदेपदे गृहाण्येव निर्मितानि महर्षिभिः

vistareṇa ca saṁkhyā syādapi varṣaśatairapi|| asaṁkhyānīha tīrthāni puṇyānyāyatanāni ca|| padepade gṛhāṇyeva nirmitāni maharṣibhiḥ

इसका विस्तार से वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी पूर्ण नहीं हो सकता। यहाँ असंख्य तीर्थ और पवित्र मंदिर हैं, तथा पद-पद पर महर्षियों द्वारा निर्मित निवास-स्थान हैं।

श्लोक 3 (skanda.7.447.3)

न तत्तीर्थं न सा सिद्धिर्न स वृक्षो महीपते॥ न सा नदी न देवेशो यस्य तत्रास्ति न स्थितिः

na tattīrthaṁ na sā siddhirna sa vṛkṣo mahīpate|| na sā nadī na deveśo yasya tatrāsti na sthitiḥ

हे राजन्! ऐसा कोई तीर्थ नहीं, ऐसी कोई सिद्धि नहीं, ऐसा कोई वृक्ष नहीं, ऐसी कोई नदी नहीं और ऐसा कोई देवेश नहीं, जिसकी वहाँ स्थिति न हो।

श्लोक 4 (skanda.7.447.4)

ये वसंति महाराज सुरम्येऽर्बुदपर्वते॥ नूनं ते पुण्यकर्माणो न वसंति त्रिविष्टपे

ye vasaṁti mahārāja suramye'rbudaparvate|| nūnaṁ te puṇyakarmāṇo na vasaṁti triviṣṭape

हे महाराज! जो लोग उस अत्यंत रमणीय अर्बुद पर्वत पर निवास करते हैं, वे निश्चय ही पुण्यकर्मी हैं, और स्वर्ग में निवास नहीं करते (क्योंकि वे यहीं रहना पसंद करते हैं)।

श्लोक 5 (skanda.7.447.5)

किं तस्य जीवितेनार्थः किं धनैः किं जपैर्नृप॥ यो न पश्यति मन्दात्मा समन्तादर्बुदाचलम्

kiṁ tasya jīvitenārthaḥ kiṁ dhanaiḥ kiṁ japairnṛpa|| yo na paśyati mandātmā samantādarbudācalam

हे राजन्! उस मंदबुद्धि व्यक्ति के जीवन से क्या लाभ, धन से क्या लाभ, जप से क्या लाभ, जो चारों ओर से अर्बुद पर्वत को नहीं देखता?

श्लोक 6 (skanda.7.447.6)

अपि कीटपतंगा ये पशवः पक्षिणो मृगाः॥ स्वेदजाश्चाण्डजाश्चापि ह्युद्भिज्जाश्च जरायुजाः

api kīṭapataṁgā ye paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ|| svedajāścāṇḍajāścāpi hyudbhijjāśca jarāyujāḥ

चाहे वे कीट-पतंगे हों, पशु हों, पक्षी हों, मृग हों, स्वेद (पसीने) से उत्पन्न हों, अंडज हों, उद्भिज्ज (वनस्पति से उत्पन्न) हों अथवा जरायुज (गर्भ से उत्पन्न) हों -

श्लोक 7 (skanda.7.447.7)

तस्मिन्मृता महाराज निष्कामाः कामतोऽपि वा॥ ते यान्ति शिवसायुज्यं जरा मरणवर्जितम्

tasminmṛtā mahārāja niṣkāmāḥ kāmato'pi vā|| te yānti śivasāyujyaṁ jarā maraṇavarjitam

हे महाराज! वहाँ मरने वाले प्राणी, चाहे निष्काम हों या सकाम, वे शिव-सायुज्य को प्राप्त होते हैं, जो वृद्धावस्था और मृत्यु से रहित है।

श्लोक 8 (skanda.7.447.8)

यश्चैतच्छुणुयान्नित्यं पुराणं श्रद्धयान्वितः॥ अर्बुदस्य महाराज स यात्राफलमश्नुते

yaścaitacchuṇuyānnityaṁ purāṇaṁ śraddhayānvitaḥ|| arbudasya mahārāja sa yātrāphalamaśnute

जो व्यक्ति श्रद्धायुक्त होकर इस पुराण को नित्य सुनेगा, हे महाराज! वह अर्बुद की यात्रा का फल प्राप्त कर लेगा।

श्लोक 9 (skanda.7.447.9)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यात्रां तत्र समाचरेत्॥ य इच्छेदात्मनः सिद्धिमिह लोके परत्र च

tasmātsarvaprayatnena yātrāṁ tatra samācaret|| ya icchedātmanaḥ siddhimiha loke paratra ca

इसलिए, जो अपने लिए इस लोक और परलोक में सिद्धि की कामना करता हो, उसे पूरे प्रयत्न से वहाँ यात्रा करनी चाहिए।

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