प्रभास खण्ड · अध्याय 448
कलियुग में भगवान् की खोज हेतु ऋषियों का प्रश्न
श्लोक 1 (skanda.7.448.1)
॥ शौनक उवाच ॥ कथं सूत युगे ह्यस्मिन् रौद्रे वै कलिसंज्ञके। बहुपाखण्डसंकीर्णे प्राप्स्यामो मधुसूदनम्॥
śaunaka uvāca| kathaṁ sūta yuge hyasmin raudre vai kalisaṁjñake| bahupākhaṇḍasaṁkīrṇe prāpsyāmo madhusūdanam||
शौनक जी ने कहा — हे सूत! इस भयंकर कलि नामक युग में, जो अनेक पाखंडों से भरा हुआ है, हम मधुसूदन को कैसे प्राप्त करेंगे?
श्लोक 2 (skanda.7.448.2)
युगत्रये व्यतिक्रान्ते धर्माचारपरे सदा। प्राप्ते कलियुगे घोरे क्व विष्णुर्भगवानिति॥
yugatraye vyatikrānte dharmācārapare sadā| prāpte kaliyuge ghore kva viṣṇurbhagavāniti||
जब सदा धर्माचार में तत्पर रहने वाले तीनों युग बीत चुके हों और भयानक कलियुग आ गया हो, तब भगवान् विष्णु कहाँ मिलेंगे?
श्लोक 3 (skanda.7.448.3)
॥ सूत उवाच ॥ दिवं याते महाराजे रामे दशरथात्मजे। दुष्टराजन्यभारेण पीडिते धरणीतले॥
sūta uvāca| divaṁ yāte mahārāje rāme daśarathātmaje| duṣṭarājanyabhāreṇa pīḍite dharaṇītale||
सूत जी ने कहा — जब महाराज दशरथनन्दन राम स्वर्गलोक को चले गए और पृथ्वी दुष्ट राजाओं के भार से पीड़ित हुई,
श्लोक 4 (skanda.7.448.4)
देवानां कार्यसिद्ध्यर्थं भूभारहरणाय च। वसुदेवगृहे साक्षादाविर्भूते जनार्दने॥
devānāṁ kāryasiddhyarthaṁ bhūbhāraharaṇāya ca| vasudevagṛhe sākṣādāvirbhūte janārdane||
तब देवताओं के कार्य की सिद्धि तथा पृथ्वी का भार हरने के लिए भगवान् जनार्दन साक्षात् वसुदेव के घर में प्रकट हुए।
श्लोक 5 (skanda.7.448.5)
नन्दव्रजं गते देवे पूतनाशोषणे सति। घातिते च तृणावर्ते शकटे परिवर्तिते॥
nandavrajaṁ gate deve pūtanāśoṣaṇe sati| dhātite ca tṛṇāvarte śakaṭe parivartite||
भगवान् नन्द के व्रज में गए, पूतना का शोषण हुआ, तृणावर्त का वध हुआ और शकट उलट दिया गया।
श्लोक 6 (skanda.7.448.6)
दमिते कालिये नागे प्रलम्बे च निषूदिते। धृते गोवर्धने शैले परित्राते च गोकुले॥
damite kāliye nāge pralambe ca niṣūdite| dhṛte govardhane śaile paritrāte ca gokule||
काली नाग का दमन हुआ, प्रलम्ब का वध हुआ, गोवर्धन पर्वत को धारण किया गया और गोकुल की रक्षा हुई।
श्लोक 7 (skanda.7.448.7)
सुरभ्या चाभिषिक्ते तु इन्द्रे च विमदीकृते। रासक्रीडारते देवे दारिते केशिदानवे॥
surabhyā cābhiṣikte tu indre ca vimadīkṛte| rāsakrīḍārate deve dārite keśidānave||
सुरभि (कामधेनु) द्वारा अभिषेक हुआ, इन्द्र का गर्व चूर हुआ, भगवान् रासक्रीड़ा में रत हुए और केशी दानव का विदारण हुआ,
श्लोक 8 (skanda.7.448.8)
अक्रूरवचनाद्देवे मथुरायां गते हरौ। हते कुवलयापीडे मल्लराजे च घातिते॥
akrūravacanāddeve mathurāyāṁ gate harau| hate kuvalayāpīḍe mallarāje ca ghātite||
अक्रूर के वचन से भगवान् हरि मथुरा गए, कुवलयापीड हाथी का वध हुआ और मल्लराज का संहार हुआ,
श्लोक 9 (skanda.7.448.9)
पश्यतां देवदैत्यानां भोजराजे निपातिते। यदुपुर्यामभिषिक्त उग्रसेने नराधिपे॥
paśyatāṁ devadaityānāṁ bhojarāje nipātite| yadupuryāmabhiṣikta ugrasene narādhipe||
देवताओं और दैत्यों के देखते-देखते भोजराज कंस का पतन हुआ, और यदुपुरी में उग्रसेन को राजा के पद पर अभिषिक्त किया गया,
श्लोक 10 (skanda.7.448.10)
जरासन्धबले रौद्रे यवने च हते क्षितौ। राजसूये क्रतुवरे चैद्ये चैव निपातिते॥
jarāsandhabale raudre yavane ca hate kṣitau| rājasūye kraturvare caidye caiva nipātite||
जरासन्ध की भयंकर सेना और यवन का पृथ्वी पर वध हुआ, तथा राजसूय यज्ञ में शिशुपाल (चैद्य) का पतन हुआ,
श्लोक 11 (skanda.7.448.11)
निवृत्ते भारते युद्धे भारे च क्षपिते भुवः। यात्राव्याजसमानीते प्रभासं यादवे कुले॥
nivṛtte bhārate yuddhe bhāre ca kṣapite bhuvaḥ| yātrāvyājasamānīte prabhāsaṁ yādave kule||
भारत का युद्ध समाप्त हुआ, पृथ्वी का भार उतर गया, और यात्रा के बहाने यादव कुल प्रभास क्षेत्र में लाया गया,
श्लोक 12 (skanda.7.448.12)
मद्यपानप्रसक्ते तु परस्परवधोद्यते। कलहेनातिरौद्रेण विनष्टे यादवे कुले॥
madyapānaprasakte tu parasparavadhodyate| kalahenātiraudreṇa vinaṣṭe yādave kule||
जब मद्यपान में लीन यादव कुल परस्पर वध में प्रवृत्त होकर अत्यंत भीषण कलह से नष्ट हो गया,
श्लोक 13 (skanda.7.448.13)
गात्रं संत्यज्य चात्रैव गतेऽनन्ते धरातलात्। अश्वत्थमूलमाश्रित्य समासीने जनार्दने॥
gātraṁ saṁtyajya cātraiva gate'nante dharātalāt| aśvatthamūlamāśritya samāsīne janārdane||
जब अनन्त (बलराम) शरीर त्यागकर उसी स्थान से पाताल में चले गए, और भगवान् जनार्दन पीपल वृक्ष की जड़ के सहारे विराजमान हुए,
श्लोक 14 (skanda.7.448.14)
व्याधप्रहारभिन्नाङ्गे परित्यक्ते कलेवरे। स्वधामसंस्थिते देवे पार्थे च पुनरागते॥
vyādhaprahārabhinnāṅge parityakte kalevare| svadhāmasaṁsthite deve pārthe ca punarāgate||
व्याध के बाण से शरीर बिंधने पर, देह त्यागने पर, भगवान् अपने धाम को पधारे, और अर्जुन (पार्थ) पुनः वहाँ लौट आए,
श्लोक 15 (skanda.7.448.15)
यदुपुर्य्यां प्लावितायां सागरेण समन्ततः। शक्रप्रस्थं ततो गत्वा कारयित्वा हरेर्गृहम्॥
yadupuryāṁ plāvitāyāṁ sāgareṇa samantataḥ| śakraprasthaṁ tato gatvā kārayitvā harergṛham||
जब यदुपुरी सब ओर से समुद्र द्वारा जलमग्न कर दी गई, तब अर्जुन शक्रप्रस्थ (इन्द्रप्रस्थ) जाकर वहाँ भगवान् हरि का मन्दिर बनवाकर,
श्लोक 16 (skanda.7.448.16)
द्वापरे च व्यतिक्रान्ते धर्माधर्मविमिश्रिते। सम्प्राप्ते च महारौद्रे युगे वै कलिसंज्ञिते॥
dvāpare ca vyatikrānte dharmādharmavimiśrite| samprāpte ca mahāraudre yuge vai kalisaṁjñite||
और धर्म-अधर्म से मिश्रित द्वापर युग बीत जाने पर, जब अत्यंत भयंकर कलि नामक युग आ गया,
श्लोक 17 (skanda.7.448.17)
क्षीयमाणे च सद्धर्मे विधर्मे प्रबले तथा। नष्टधर्मक्रियायोगे वेदवादबहिष्कृते। एकपादे स्थिते धर्मे वर्णाश्रमविवर्जिते॥
kṣīyamāṇe ca saddharme vidharme prabale tathā| naṣṭadharmakriyāyoge vedavādabahiṣkṛte| ekapāde sthite dharme varṇāśramavivarjite||
जब सद्धर्म क्षीण हो रहा था और अधर्म प्रबल हो रहा था, जब धर्मानुष्ठान नष्ट हो चुके थे और वेदवाद बहिष्कृत हो गया था, जब धर्म केवल एक चरण पर टिका था और वर्णाश्रम व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी थी,
श्लोक 18 (skanda.7.448.18)
अस्मिन्युगे विलुलिते ह्यृषयो वनचारिणः। समेत्यामन्त्रयन्सर्वे गर्गच्यवनभार्गवाः॥
asminyuge vilulite hyṛṣayo vanacāriṇaḥ| sametyāmantrayansarve gargacyavanabhārgavāḥ||
इस प्रकार युग के अस्त-व्यस्त हो जाने पर वनवासी ऋषिगण गर्ग, च्यवन, भार्गव आदि सब एकत्र होकर परस्पर विचार-विमर्श करने लगे,
श्लोक 19 (skanda.7.448.19)
असितो देवलो धौम्यः क्रतुरुद्दालकस्तथा। एते चान्ये च बहवः परस्परमथाब्रुवन्॥
asito devalo dhaumyaḥ kraturuddālakastathā| ete cānye ca bahavaḥ parasparamathābruvan||
असित, देवल, धौम्य, क्रतु, उद्दालक तथा और भी अनेक ऋषि — ये सब आपस में कहने लगे,
श्लोक 20 (skanda.7.448.20)
पश्यध्वं मुनयः सर्वे कलिव्याप्तं दिगन्तरम्। समन्तात्परिधावद्भिर्दस्युभिर्बाध्यते प्रजा॥
paśyadhvaṁ munayaḥ sarve kalivyāptaṁ digantaram| samantātparidhāvadbhirdasyubhirbādhyate prajā||
हे मुनियो! सब देखो, दिशाएँ कलि से व्याप्त हो गई हैं; चारों ओर घूमते हुए डाकुओं से प्रजा पीड़ित हो रही है।
श्लोक 21 (skanda.7.448.21)
अधर्मपरमैः पुंभिः सत्यार्जवनिराकृतैः। कथं स भगवान्विष्णुः सम्प्राप्यो मुनिसत्तमाः॥
adharmaparamaiḥ puṁbhiḥ satyārjavanirākṛtaiḥ| kathaṁ sa bhagavānviṣṇuḥ samprāpyo munisattamāḥ||
जिन पुरुषों ने सत्य और सरलता को त्यागकर अधर्म को ही सर्वोपरि मान लिया है, हे मुनिश्रेष्ठो! उनके द्वारा भगवान् विष्णु कैसे प्राप्त किए जा सकते हैं?
श्लोक 22 (skanda.7.448.22)
को वा भवाब्धौ पततस्तारयिष्यति सङ्गतान्। न कलौ सम्भवस्तस्य त्रियुगो मधुसूदनः। तं विना पुण्डरीकाक्षं कथं स्याम कलौ युगे॥
ko vā bhavābdhau patatastārayiṣyati saṅgatān| na kalau sambhavastasya triyugo madhusūdanaḥ| taṁ vinā puṇḍarīkākṣaṁ kathaṁ syāma kalau yuge||
भवसागर में गिरते हुए हम सबको कौन तारेगा? त्रियुग कहलाने वाले मधुसूदन का तो कलियुग में अवतार ही नहीं होता — फिर उन कमलनयन के बिना हम कलियुग में कैसे रहेंगे?
श्लोक 23 (skanda.7.448.23)
तेषां चिन्तयतामेवं दुःखितानां तपस्विनाम्। उवाच वचनं तत्र ऋषिरुद्दालकस्तदा॥
teṣāṁ cintayatāmevaṁ duḥkhitānāṁ tapasvinām| uvāca vacanaṁ tatra ṛṣiruddālakastadā||
जब वे सब दुःखी तपस्वी इस प्रकार चिन्तित थे, तब ऋषि उद्दालक ने वहाँ यह वचन कहा —
श्लोक 24 (skanda.7.448.24)
॥ उद्दालक उवाच ॥ यावन्न कलिदोषेण लिप्यामो मुनिसत्तमाः। अपापा ब्रह्मसदनं गच्छामः परिसङ्गताः॥
uddālaka uvāca| yāvanna kalidoṣeṇa lipyāmo munisattamāḥ| apāpā brahmasadanaṁ gacchāmaḥ parisaṅgatāḥ||
उद्दालक ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! जब तक हम कलि के दोष से लिप्त नहीं हुए हैं, तब तक निष्पाप होकर सब मिलकर ब्रह्मलोक चलें।
श्लोक 25 (skanda.7.448.25)
पृच्छामो लोकधातारं स्थितं विष्णुं कलौ युगे। यदि विष्णुः कलौ न स्याद्रुद्रेण ब्रह्मणाऽसह॥
pṛcchāmo lokadhātāraṁ sthitaṁ viṣṇuṁ kalau yuge| yadi viṣṇuḥ kalau na syādrudreṇa brahmaṇāsaha||
हम जगत् के विधाता से पूछेंगे कि कलियुग में विष्णु कहाँ स्थित हैं; और यदि रुद्र और ब्रह्मा के साथ भी कलियुग में विष्णु का पता न चले,
श्लोक 26 (skanda.7.448.26)
तं विना पुण्डरीकाक्षं त्यक्ष्यामः स्वकलेवरम्। विना भगवता लोके कः स्थास्यति कलौ युगे॥
taṁ vinā puṇḍarīkākṣaṁ tyakṣyāmaḥ svakalevaram| vinā bhagavatā loke kaḥ sthāsyati kalau yuge||
तो हम उन कमलनयन भगवान् के बिना अपने शरीर को त्याग देंगे; क्योंकि भगवान् के बिना कलियुग में इस लोक में कौन टिक सकता है?
श्लोक 27 (skanda.7.448.27)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य ऋषयः संशितव्रताः। साधुसाध्विति ते चोक्त्वा प्रस्थिता ब्रह्मणोऽन्तिकम्॥
tacchrutvā vacanaṁ tasya ṛṣayaḥ saṁśitavratāḥ| sādhusādhviti te coktvā prasthitā brahmaṇo'ntikam||
उसका यह वचन सुनकर कठोर व्रतधारी ऋषियों ने 'साधु-साधु' कहकर ब्रह्मा जी के समीप प्रस्थान किया।
श्लोक 28 (skanda.7.448.28)
कथयन्तः कथां विष्णोः स्वरूपमनुवर्णनम्। तापसाः प्रययुः सर्वे संहृष्टा ब्रह्मणोऽन्तिकम्॥
kathayantaḥ kathāṁ viṣṇoḥ svarūpamanuvarṇanam| tāpasāḥ prayayuḥ sarve saṁhṛṣṭā brahmaṇo'ntikam||
विष्णु की कथा और उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए वे सब तपस्वी हर्षित होकर ब्रह्मा के समीप चल पड़े।
श्लोक 29 (skanda.7.448.29)
ददृशुस्ते तदा देवमासीनं परमासने। पितामहभूतगणैर्मूर्तामूर्तैर्वृतं तथा॥
dadṛśuste tadā devamāsīnaṁ paramāsane| pitāmahabhūtagaṇairmūrtāmūrtairvṛtaṁ tathā||
उन्होंने तब उस देवता (ब्रह्मा) को परम आसन पर विराजमान देखा, जो मूर्त और अमूर्त भूतगणों से घिरे हुए थे।
श्लोक 30 (skanda.7.448.30)
दृष्ट्वा चतुर्मुखं देवं दण्डवत्प्रणताः क्षितौ। प्रणम्य देवदेवं तु स्तोत्रेण तुषुवुस्तदा॥
dṛṣṭvā caturmukhaṁ devaṁ daṇḍavatpraṇatāḥ kṣitau| praṇamya devadevaṁ tu stotreṇa tuṣuvustadā||
चतुर्मुख देवता को देखकर वे भूमि पर दण्डवत् प्रणाम कर गिर पड़े, और देवाधिदेव को प्रणाम करके स्तोत्र द्वारा उनकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 31 (skanda.7.448.31)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ नमस्ते पद्मसम्भूत चतुर्वक्त्राक्षयाव्यय। नमस्ते सृष्टिकर्त्रे तु पितामह नमोऽस्तु ते॥
ṛṣaya ūcuḥ| namaste padmasambhūta caturvaktrākṣayāvyaya| namaste sṛṣṭikartre tu pitāmaha namo'stu te||
ऋषियों ने कहा — हे कमल से उत्पन्न, चतुर्मुख, अक्षय, अव्यय! आपको नमस्कार है। हे सृष्टिकर्ता पितामह! आपको नमस्कार है।
श्लोक 32 (skanda.7.448.32)
एवं स्तुतः सन्मुनिभिः सुप्रीतः कमलोद्भवः। पाद्यार्घ्येणाभिवन्द्यैतान्पप्रच्छ मुनिपुङ्गवान्॥
evaṁ stutaḥ sanmunibhiḥ suprītaḥ kamalodbhavaḥ| pādyārghyeṇābhivandyaitānpapraccha munipuṅgavān||
इस प्रकार सत्पुरुष मुनियों द्वारा स्तुत होकर, अत्यंत प्रसन्न कमलजन्मा ब्रह्मा ने पाद्य-अर्घ्य से उनका सम्मान करके उन मुनिश्रेष्ठों से पूछा —
श्लोक 33 (skanda.7.448.33)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ किमागमनकृत्यं वो ब्रूत तत्त्वेन पुत्रकाः। कुशलं वो महाभागाः पुत्रशिष्याग्निबन्धुषु॥
brahmovāca| kimāgamanakṛtyaṁ vo brūta tattvena putrakāḥ| kuśalaṁ vo mahābhāgāḥ putraśiṣyāgnibandhuṣu||
ब्रह्मा ने कहा — हे पुत्रो! अपने आगमन का प्रयोजन यथार्थ रूप से बताओ। हे महाभागो! क्या तुम्हारे पुत्र, शिष्य, अग्नि और बन्धु-बान्धव कुशल से हैं?
श्लोक 34 (skanda.7.448.34)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ भवत्प्रसादात्सकलं प्राप्तं नस्तपसः फलम्। यद्भवन्तं प्रपश्यामः सर्वदेवगुरुं प्रभुम्॥
ṛṣaya ūcuḥ| bhavatprasādātsakalaṁ prāptaṁ nastapasaḥ phalam| yadbhavantaṁ prapaśyāmaḥ sarvadevaguruṁ prabhum||
ऋषियों ने कहा — आपकी कृपा से हमें अपनी तपस्या का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो गया है, क्योंकि हम आप सर्वदेवगुरु प्रभु का दर्शन कर रहे हैं।
श्लोक 35 (skanda.7.448.35)
शृणु एतत्कारणं शम्भो एते प्राप्तास्तवान्तिकम्। युगत्रये व्यतिक्रान्ते कृतादिद्वापरान्तके॥
śṛṇu etatkāraṇaṁ śambho ete prāptāstavāntikam| yugatraye vyatikrānte kṛtādidvāparāntake||
हे शम्भो! सुनिए, इसी कारण से ये सब आपके समीप आए हैं — जब कृत आदि से लेकर द्वापर तक तीनों युग बीत चुके हैं,
श्लोक 36 (skanda.7.448.36)
प्राप्ते कलियुगे घोरे क्व विष्णुः पृथिवीतले। यं दृष्ट्वा परमां मुक्तिं यास्यामो मुक्तबन्धनाः॥
prāpte kaliyuge ghore kva viṣṇuḥ pṛthivītale| yaṁ dṛṣṭvā paramāṁ muktiṁ yāsyāmo muktabandhanāḥ||
जब भयानक कलियुग आ जाए, तब पृथ्वी पर विष्णु कहाँ हैं? जिनका दर्शन करके हम बन्धनमुक्त होकर परम मुक्ति को प्राप्त हो सकें।
श्लोक 37 (skanda.7.448.37)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ मत्स्यकूर्मादिरूपैश्च भगवाञ्ज्ञायते मया। विष्णोः पारमिकां मूर्तिं न जानामि द्विजोत्तमाः॥
brahmovāca| matsyakūrmādirūpaiśca bhagavāñjñāyate mayā| viṣṇoḥ pāramikāṁ mūrtiṁ na jānāmi dvijottamāḥ||
ब्रह्मा ने कहा — मैं भगवान् को मत्स्य, कूर्म आदि रूपों में ही जानता हूँ। हे द्विजोत्तमो! मैं विष्णु के परम स्वरूप को नहीं जानता।
श्लोक 38 (skanda.7.448.38)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ यदि त्वं न विजानासि तात विष्णोरवस्थितिम्। गत्वा प्रयागं तत्रैव सन्त्यक्ष्यामः कलेवरम्॥
ṛṣaya ūcuḥ| yadi tvaṁ na vijānāsi tāta viṣṇoravasthitim| gatvā prayāgaṁ tatraiva santyakṣyāmaḥ kalevaram||
ऋषियों ने कहा — हे तात! यदि आप विष्णु के निवास-स्थान को नहीं जानते, तो हम प्रयाग जाकर वहीं अपने शरीर का त्याग कर देंगे।
श्लोक 39 (skanda.7.448.39)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ मा विषादं व्रजध्वं हि उपदेक्ष्यामि वो हितम्। इतो व्रजध्वं पातालं यत्रास्ते दैत्यसत्तमः॥
brahmovāca| mā viṣādaṁ vrajadhvaṁ hi upadekṣyāmi vo hitam| ito vrajadhvaṁ pātālaṁ yatrāste daityasattamaḥ||
ब्रह्मा ने कहा — विषाद मत करो; मैं तुम्हें हितकारी उपदेश दूँगा। यहाँ से पाताल को जाओ, जहाँ दैत्यश्रेष्ठ (प्रह्लाद) निवास करते हैं।
श्लोक 40 (skanda.7.448.40)
तं गत्वा परिपृच्छध्वं प्रह्लादं दैत्यसत्तमम्। स ज्ञास्यति हरेः स्थानं याथातथ्येन भो द्विजाः॥
taṁ gatvā paripṛcchadhvaṁ prahlādaṁ daityasattamam| sa jñāsyati hareḥ sthānaṁ yāthātathyena bho dvijāḥ||
उन दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद के पास जाकर पूछो; हे ब्राह्मणो! वे ही हरि के निवास-स्थान को यथार्थ रूप से जानते हैं।
श्लोक 41 (skanda.7.448.41)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य ब्रह्मणः परमात्मनः। प्रणिपत्य च देवेशं प्रस्थितास्ते तपोधनाः॥
tacchrutvā vacanaṁ tasya brahmaṇaḥ paramātmanaḥ| praṇipatya ca deveśaṁ prasthitāste tapodhanāḥ||
परमात्मा ब्रह्मा का यह वचन सुनकर और देवेश को प्रणाम करके वे तपोधन ऋषि प्रस्थान कर गए।
श्लोक 42 (skanda.7.448.42)
जग्मुः संहृष्टमनसः स्तुवन्तो दैत्यसत्तमम्। धन्यः स दैत्यराजोऽयं यो जानाति जनार्दनम्॥
jagmuḥ saṁhṛṣṭamanasaḥ stuvanto daityasattamam| dhanyaḥ sa daityarājo'yaṁ yo jānāti janārdanam||
वे प्रसन्नचित्त होकर उस दैत्यश्रेष्ठ की प्रशंसा करते हुए चले, कहते हुए — धन्य है वह दैत्यराज, जो जनार्दन को जानता है।
श्लोक 43 (skanda.7.448.43)
इति सञ्चिन्तयानास्ते प्राप्ता वै सुतलं द्विजाः। गत्वा ते तस्य नगरं विविशुर्भवनोत्तमम्॥
iti sañcintayānāste prāptā vai sutalaṁ dvijāḥ| gatvā te tasya nagaraṁ viviśurbhavanottamam||
इस प्रकार सोचते हुए वे ब्राह्मण सुतल लोक पहुँचे, और उसके नगर में जाकर उस उत्तम भवन में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 44 (skanda.7.448.44)
दूरादेव स तान्दृष्ट्वा बलिर्वैरोचनिस्तदा। प्रत्युत्थायार्हयाञ्चक्रे प्रह्लादेन समन्वितः॥
dūrādeva sa tāndṛṣṭvā balirvairocanistadā| pratyutthāyārhayāñcakre prahlādena samanvitaḥ||
उन्हें दूर से ही देखकर विरोचन-पुत्र बलि, प्रह्लाद के साथ, उठकर खड़े हो गए और उनका सत्कार किया।
श्लोक 45 (skanda.7.448.45)
मधुपर्कं च गां चैव दत्त्वा चार्घ्यं तथैव च। उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रहृष्टेनान्तरात्मना॥
madhuparkaṁ ca gāṁ caiva dattvā cārghyaṁ tathaiva ca| uvāca prāñjalirbhūtvā prahṛṣṭenāntarātmanā||
मधुपर्क, गौ और अर्घ्य अर्पित करके उन्होंने हाथ जोड़कर प्रसन्न हृदय से कहा —
श्लोक 46 (skanda.7.448.46)
स्वागतं वो महाभागाः सुव्युष्टा रजनी मम। भवतो यत्प्रपश्यामि ब्रूत किं करवाणि च॥
svāgataṁ vo mahābhāgāḥ suvyuṣṭā rajanī mama| bhavato yatprapaśyāmi brūta kiṁ karavāṇi ca||
हे महाभागो! तुम्हारा स्वागत है। मेरी रात्रि सुफल हो गई कि मैं आप लोगों का दर्शन कर रहा हूँ। बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?
श्लोक 47 (skanda.7.448.47)
एवं हि दैत्यराजेन सत्कृतास्ते द्विजोत्तमाः। ऊचुः प्रहृष्टमनसो दानवेन्द्रसुतं तदा॥
evaṁ hi daityarājena satkṛtāste dvijottamāḥ| ūcuḥ prahṛṣṭamanaso dānavendrasutaṁ tadā||
इस प्रकार दैत्यराज द्वारा सत्कृत होकर वे द्विजोत्तम प्रसन्नचित्त होकर उस दानवेन्द्रपुत्र (प्रह्लाद) से कहने लगे —
श्लोक 48 (skanda.7.448.48)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ कार्यार्थिनस्तु सम्प्राप्ताः प्रह्लाद हरिवल्लभ। तदस्माकं महाबाहो भवांस्त्राता भवार्णवात्॥
ṛṣaya ūcuḥ| kāryārthinastu samprāptāḥ prahlāda harivallabha| tadasmākaṁ mahābāho bhavāṁstrātā bhavārṇavāt||
ऋषियों ने कहा — हे प्रह्लाद, हरि के प्रिय भक्त! हम एक प्रयोजन लेकर आपके पास आए हैं। हे महाबाहो! आप ही हमारे लिए भवसागर से उद्धारकर्ता हैं।
श्लोक 49 (skanda.7.448.49)
कथं दैत्य युगे ह्यस्मिन्रौद्रे वै कलिसंज्ञके। भविष्यामो विना विष्णुं भीतानामभयप्रदम्॥
kathaṁ daitya yuge hyasminraudre vai kalisaṁjñake| bhaviṣyāmo vinā viṣṇuṁ bhītānāmabhayapradam||
हे दैत्य! इस भयंकर कलि नामक युग में, भयभीतों को अभय देने वाले विष्णु के बिना हम कैसे रह पाएँगे?
श्लोक 50 (skanda.7.448.50)
अस्मिन्युगे ह्यधर्मेण जितो धर्मः सनातनः। अनृतेन जितं सत्यं विप्राश्च वृषलैर्जिताः॥
asminyuge hyadharmeṇa jito dharmaḥ sanātanaḥ| anṛtena jitaṁ satyaṁ viprāśca vṛṣalairjitāḥ||
इस युग में अधर्म ने सनातन धर्म को जीत लिया है, असत्य ने सत्य को जीत लिया है, और शूद्रों ने ब्राह्मणों को पराजित कर दिया है।
श्लोक 51 (skanda.7.448.51)
विटैर्जिता वेदमार्गाः स्त्रीभिश्च पुरुषा जिताः। ब्राह्मणाश्चापि वध्यन्ते म्लेच्छराजन्यरूपिभिः॥
viṭairjitā vedamārgāḥ strībhiśca puruṣā jitāḥ| brāhmaṇāścāpi vadhyante mlecchrājanyarūpibhiḥ||
दुष्टों ने वेदमार्ग को परास्त कर दिया है, स्त्रियों ने पुरुषों को जीत लिया है, और ब्राह्मण भी म्लेच्छ राजाओं के रूप में मारे जा रहे हैं।
श्लोक 52 (skanda.7.448.52)
अस्मिन्विलुलितप्राये वर्णाश्रमविवर्जिते। अविलुप्ते वेदमार्गे क्व विष्णुर्भगवानिति॥
asminvilulitaprāye varṇāśramavivarjite| avilupte vedamārge kva viṣṇurbhagavāniti||
जब यह संसार प्रायः अस्त-व्यस्त हो चुका है और वर्णाश्रम व्यवस्था से रहित हो गया है, फिर भी वेदमार्ग अभी तक पूर्णतः लुप्त नहीं हुआ है — तो ऐसे में भगवान् विष्णु कहाँ हैं?
श्लोक 53 (skanda.7.448.53)
विना ज्ञानाद्विना ध्यानाद्विना चेन्द्रियनिग्रहात्। प्राप्यते भगवान्यत्र तद्गुह्यं कथयस्व नः॥
vinā jñānādvinā dhyānādvinā cendriyanigrahāt| prāpyate bhagavānyatra tadguhyaṁ kathayasva naḥ||
बिना ज्ञान के, बिना ध्यान के, बिना इन्द्रियनिग्रह के भी जहाँ भगवान् प्राप्त हो सकें, वह गुह्य रहस्य हमें बताइए।
श्लोक 54 (skanda.7.448.54)
दैत्यराज त्वमस्माकं सुहृन्मार्गप्रदर्शकः। कथयस्व महाभाग यत्र तिष्ठति केशवः॥
daityarāja tvamasmākaṁ suhṛnmārgapradarśakaḥ| kathayasva mahābhāga yatra tiṣṭhati keśavaḥ||
हे दैत्यराज! आप हमारे सुहृद् और मार्गदर्शक हैं। हे महाभाग! बताइए, केशव कहाँ निवास करते हैं?
श्लोक 55 (skanda.7.448.55)
एवं स द्विजमुख्यैश्च सम्पृष्टो दैत्यसत्तमः। प्रणम्य ब्राह्मणान्सर्वान्भक्त्या संहृष्टमानसः॥
evaṁ sa dvijamukhyaiśca sampṛṣṭo daityasattamaḥ| praṇamya brāhmaṇānsarvānbhaktyā saṁhṛṣṭamānasaḥ||
इस प्रकार उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा पूछे जाने पर, उस दैत्यश्रेष्ठ ने प्रसन्नचित्त होकर भक्तिपूर्वक सभी ब्राह्मणों को प्रणाम किया,
श्लोक 56 (skanda.7.448.56)
स नमस्कृत्य देवेभ्यो ब्रह्मणे परमात्मने। भगवद्भक्तियुक्तः सन्व्याहर्तुमुपचक्रमे॥
sa namaskṛtya devebhyo brahmaṇe paramātmane| bhagavadbhaktiyuktaḥ sanvyāhartumupacakrame||
और देवताओं को तथा परमात्मा ब्रह्मा को नमस्कार करके, भगवद्भक्ति से युक्त होकर वे बोलने लगे।