प्रभास खण्ड · अध्याय 453
गोमती-सागर संगम में स्नान-दान का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.453.1)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ साधुसाधु महाभाग प्रह्लादा सुरसत्तम। येन नः कलिमध्ये तु दर्शितो भगवान्हरिः॥
ṛṣaya ūcuḥ| sādhusādhu mahābhāga prahlādā surasattama| yena naḥ kalimadhye tu darśito bhagavānhariḥ||
ऋषियों ने कहा — साधु, साधु, हे महाभाग प्रह्लाद, हे देवश्रेष्ठ! आपने ही हमें इस कलियुग के बीच भगवान् हरि का दर्शन कराया है।
श्लोक 2 (skanda.7.453.2)
त्वन्मुखक्षीरसिंधूत्था कथेयममृतोपमा। कर्णाभ्यां पिबतां तृप्तिर्मुनीनां न प्रजायते। कथयस्व महाबाहो तीर्थयात्रां सुविस्तराम्॥
tvanmukhakṣīrasindhūtthā katheyamamṛtopamā| karṇābhyāṁ pibatāṁ tṛptirmunīnāṁ na prajāyate| kathayasva mahābāho tīrthayātrāṁ suvistarām||
आपके मुखरूपी क्षीरसागर से उत्पन्न यह कथा अमृत के समान है; इसे कानों से पीते हुए भी मुनियों की तृप्ति नहीं होती। हे महाबाहो! तीर्थयात्रा का विस्तार से वर्णन कीजिए।
श्लोक 3 (skanda.7.453.3)
अस्माभिस्तत्र गंतव्यं वहते यत्र गोमती। तिष्ठते यत्र भगवांश्चक्रतीर्थावलोककः॥
asmābhistatra gantavyaṁ vahate yatra gomatī| tiṣṭhate yatra bhagavāṁścakratīrthāvalokakaḥ||
हमें वहाँ जाना है, जहाँ गोमती बहती है, जहाँ भगवान् चक्रतीर्थ के दर्शन में विराजमान हैं।
श्लोक 4 (skanda.7.453.4)
भवाब्धौ पतितांस्तात उद्धरस्व भवार्णवात्। तीर्थयात्राविधानं च कथयस्व महामते॥
bhavābdhau patitāṁstāta uddharasva bhavārṇavāt| tīrthayātrāvidhānaṁ ca kathayasva mahāmate||
हे तात! भवसागर में गिरे हुए हमें उससे उद्धार करो, और हे महामते! तीर्थयात्रा की विधि बताओ।
श्लोक 5 (skanda.7.453.5)
॥ प्रह्लाद उवाच ॥ गत्वा तु गोमतीतीरे प्रणमेद्दंडवच्च ताम्। प्रक्षाल्य पाणिपादौ च कृत्वा च करयोः कुशान्॥
prahlāda uvāca| gatvā tu gomatītīre praṇameddaṇḍavacca tām| prakṣālya pāṇipādau ca kṛtvā ca karayoḥ kuśān||
प्रह्लाद ने कहा — गोमती के तट पर जाकर उसे दण्डवत् प्रणाम करे; हाथ-पैर धोकर हाथों में कुश धारण करे।
श्लोक 6 (skanda.7.453.6)
गृहीत्वा तु फलं शुभ्रमक्षतैश्च समन्वितम्। प्राङ्मुखः प्रयतो भूत्वा दद्यादर्घ्यं विधानतः॥
gṛhītvā tu phalaṁ śubhramakṣataiśca samanvitam| prāṅmukhaḥ prayato bhūtvā dadyādarghyaṁ vidhānataḥ||
एक शुभ्र फल और अक्षत लेकर, पूर्वाभिमुख होकर, शुद्ध होकर, विधिपूर्वक अर्घ्य अर्पित करे।
श्लोक 7 (skanda.7.453.7)
ब्रह्मलोकात्समायाते वसिष्ठतनये शुभे। सर्वपापविशुद्ध्यर्थं ददाम्यर्घ्यं तु गोमति॥
brahmalokātsamāyāte vasiṣṭhatanaye śubhe| sarvapāpaviśuddhyarthaṁ dadāmyarghyaṁ tu gomati||
'हे शुभे! हे वसिष्ठतनये! ब्रह्मलोक से आई हुई हे गोमति! मैं समस्त पापों की शुद्धि के लिए तुम्हें अर्घ्य अर्पित करता हूँ।'
श्लोक 8 (skanda.7.453.8)
वसिष्ठतनये देवि सुरवंद्ये यशस्विनि। त्रैलोक्यवंदिते देवि पापं मे हर गोमति॥
vasiṣṭhatanaye devi suravaṁdye yaśasvini| trailokyavaṁdite devi pāpaṁ me hara gomati||
'हे देवी वसिष्ठतनये, देवताओं द्वारा वंदनीय, यशस्विनी, त्रैलोक्यवन्दिते! हे गोमति! मेरे पाप को हर लो।'
श्लोक 9 (skanda.7.453.9)
इत्युच्चार्य्य द्विजश्रेष्ठा मृदमालभ्य पाणिना। विष्णुं संस्मृत्य मनसा मंत्रमेतमुदीरयेत्॥
ityuccārya dvijaśreṣṭhā mṛdamālabhya pāṇinā| viṣṇuṁ saṁsmṛtya manasā mantrametamudīrayet||
यह उच्चारण करके, हे द्विजश्रेष्ठो! हाथ में मिट्टी लेकर, मन में विष्णु का स्मरण करते हुए यह मंत्र बोले —
श्लोक 10 (skanda.7.453.10)
अश्वक्रांते रथक्रांते विष्णुक्रांते वसुंधरे। उद्धृताऽसि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना॥
aśvakrānte rathakrānte viṣṇukrānte vasuṁdhare| uddhṛtā'si varāheṇa kṛṣṇena śatabāhunā||
'हे वसुंधरे! तुम अश्व से आक्रांत, रथ से आक्रांत, विष्णु से आक्रांत हो; शतबाहु कृष्ण ने वराह रूप में तुम्हारा उद्धार किया था।'
श्लोक 11 (skanda.7.453.11)
मृत्तिके हर मे पापं यन्मया पूर्वसंचितम्। त्वया हतेन पापेन पूतः संवत्सरं भवेत्॥
mṛttike hara me pāpaṁ yanmayā pūrvasaṁcitam| tvayā hatena pāpena pūtaḥ saṁvatsaraṁ bhavet||
'हे मृत्तिका! जो पाप मैंने पूर्वकाल में संचित किया है, उसे हर लो। तुम्हारे द्वारा पाप नष्ट होने पर मनुष्य एक वर्ष तक पवित्र रहता है।'
श्लोक 12 (skanda.7.453.12)
इत्येवं मृदमालिप्य स्नानं कुर्य्याद्यथाविधि। आपो अस्मानिति स्नात्वा शृणुध्वं यत्फलं लभेत्॥
ityevaṁ mṛdamālipya snānaṁ kuryādyathāvidhi| āpo asmāniti snātvā śṛṇudhvaṁ yatphalaṁ labhet||
इस प्रकार शरीर पर मिट्टी लगाकर विधिपूर्वक स्नान करे। 'आपो अस्मान्' मंत्र से स्नान करने पर जो फल प्राप्त होता है, वह सुनो।
श्लोक 13 (skanda.7.453.13)
कुरुक्षेत्रे च यत्पुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे। स्नानमात्रेण तत्पुण्यं गोमत्यां कृष्णसन्निधौ॥
kurukṣetre ca yatpuṇyaṁ rāhugraste divākare| snānamātreṇa tatpuṇyaṁ gomatyāṁ kṛṣṇasannidhau||
कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय जो पुण्य प्राप्त होता है, वही पुण्य केवल स्नान मात्र से कृष्ण की निकटता में गोमती में प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.7.453.14)
भक्त्या स्नात्वा तु तत्रैवं कुर्यात्कर्म यथोदितम्। देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च तर्पयेद्भावसंयुतः॥
bhaktyā snātvā tu tatraivaṁ kuryātkarma yathoditam| devānpitṝnmanuṣyāṁśca tarpayedbhāvasaṁyutaḥ||
इस प्रकार भक्तिपूर्वक स्नान करके वहीं यथोक्त कर्म करना चाहिए, और भावपूर्वक देवताओं, पितरों और मनुष्यों का तर्पण करना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.7.453.15)
ये च रौरवसंस्था हि ये च कीटत्वमागताः। गोमतीनीरदानेन मुक्तिं यांति न संशयः॥
ye ca rauravasaṁsthā hi ye ca kīṭatvamāgatāḥ| gomatīnīradānena muktiṁ yānti na saṁśayaḥ||
जो रौरव नरक में स्थित हैं और जो कीट-योनि को प्राप्त हुए हैं, वे भी गोमती के जल-दान से मुक्ति प्राप्त करते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 16 (skanda.7.453.16)
विनाप्यक्षतदर्भैर्वा विना भावनया तथा। वारिमात्रेण गोमत्यां गयाश्राद्धफलं लभेत्॥
vināpyakṣatadarbhairvā vinā bhāvanayā tathā| vārimātreṇa gomatyāṁ gayāśrāddhaphalaṁ labhet||
अक्षत और कुश के बिना भी, भावना के बिना भी, गोमती में केवल जल से ही गया-श्राद्ध का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 17 (skanda.7.453.17)
ततश्च विप्रानाहूय वेदज्ञांस्तीरसंश्रयान्। विश्वेदेवादि संपूज्य पितॄणां श्राद्धमाचरेत्॥
tataśca viprānāhūya vedajñāṁstīrasaṁśrayān| viśvedevādi sampūjya pitṝṇāṁ śrāddhamācaret||
फिर उस तट पर निवास करने वाले वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाकर, विश्वेदेव आदि की पूजा करके पितरों का श्राद्ध करे।
श्लोक 18 (skanda.7.453.18)
श्रद्धया परया युक्तः श्राद्धं कृत्वा विधानतः। दक्षिणां च ततो दद्यात्सुवर्णं रजतं तथा॥
śraddhayā parayā yuktaḥ śrāddhaṁ kṛtvā vidhānataḥ| dakṣiṇāṁ ca tato dadyātsuvarṇaṁ rajataṁ tathā||
अत्यंत श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक श्राद्ध करके, तत्पश्चात् दक्षिणास्वरूप सोना और चाँदी दान करे।
श्लोक 19 (skanda.7.453.19)
सुवर्णशृंगसहितां राजतखुरभूषिताम्। रत्नपुच्छां वस्त्रयुतां ताम्रपृष्ठां सवत्सकाम्॥
suvarṇaśṛṅgasahitāṁ rājatakhurabhūṣitām| ratnapucchāṁ vastrayutāṁ tāmrapṛṣṭhāṁ savatsakām||
सुवर्ण के सींगों से युक्त, रजत खुरों से सुसज्जित, रत्नजटित पूँछ वाली, वस्त्रयुक्त, ताम्रवर्ण पीठ वाली, बछड़े सहित गाय —
श्लोक 20 (skanda.7.453.20)
दद्याद्विप्रं समभ्यर्च्य वस्त्रालंकारभूषणैः। सप्तधान्ययुतां दद्याद्विष्णुर्मे प्रीयतामिति॥
dadyādvipraṁ samabhyarcya vastrālaṁkārabhūṣaṇaiḥ| saptadhānyayutāṁ dadyādviṣṇurme prīyatāmiti||
इस गाय को, वस्त्र-आभूषणों से पूजित ब्राह्मण को दे, और सात प्रकार के धान्यों सहित दान दे — 'विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों' — ऐसा कहते हुए।
श्लोक 21 (skanda.7.453.21)
आसीमांतं विसृज्यैतान्ब्राह्मणान्नियतेंद्रियः। दीनांधकृपणेभ्यश्च दानं दद्यात्स्वशक्तितः॥
āsīmāntaṁ visṛjyaitānbrāhmaṇānniyatendriyaḥ| dīnāndhakṛpaṇebhyaśca dānaṁ dadyātsvaśaktitaḥ||
इन ब्राह्मणों को सीमा तक पहुँचाकर विदा करे, इन्द्रियों को संयत रखते हुए; और दीन, अन्ध, दरिद्र जनों को अपनी शक्ति के अनुसार दान दे।
श्लोक 22 (skanda.7.453.22)
गोमती गोमयस्नानं गोदानं गोपिचन्दनम्। दर्शनं गोपिनाथस्य गकाराः पंच दुर्लभाः॥
gomatī gomayasnānaṁ godānaṁ gopicandanam| darśanaṁ gopināthasya gakārāḥ pañca durlabhāḥ||
गोमती, गोमय-स्नान, गोदान, गोपीचन्दन, और गोपीनाथ का दर्शन — ये पाँच 'ग' अक्षर से आरम्भ होने वाली वस्तुएँ दुर्लभ हैं।
श्लोक 23 (skanda.7.453.23)
तस्माच्चैव प्रकर्तव्यं गोदानं गोमतीतटे। एवं कृत्वा द्विजश्रेष्ठाः कृतकृत्यो भवेन्नरः॥
tasmāccaiva prakartavyaṁ godānaṁ gomatītaṭe| evaṁ kṛtvā dvijaśreṣṭhāḥ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ||
इसलिए गोमती के तट पर गोदान अवश्य करना चाहिए। हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार करने से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.7.453.24)
ये गता नरकं घोरं ये च प्रेतत्वमागताः। पूर्वकर्मविपाकेन स्थावरत्वं गताश्च ये॥
ye gatā narakaṁ ghoraṁ ye ca pretatvamāgatāḥ| pūrvakarmavipākena sthāvaratvaṁ gatāśca ye||
जो घोर नरक को गए हैं, जो प्रेतत्व को प्राप्त हुए हैं, और जो पूर्वकर्मों के फल से स्थावरत्व को प्राप्त हुए हैं,
श्लोक 25 (skanda.7.453.25)
पितृपक्षे च ये केचिन्मातृपक्षे कुलोद्भवाः। सर्वे ते मुक्तिमायांति गोमत्या दर्शनात्कलौ॥
pitṛpakṣe ca ye kecinmātṛpakṣe kulodbhavāḥ| sarve te muktimāyānti gomatyā darśanātkalau||
तथा पितृपक्ष और मातृपक्ष के कुल में जन्मे जो भी हों — वे सब कलियुग में गोमती के दर्शन मात्र से मुक्ति प्राप्त करते हैं।
श्लोक 26 (skanda.7.453.26)
कृतं श्राद्धं नरैर्यैस्तु गोमत्यां भूसुरोत्तमाः। हयमेधस्य यज्ञस्य फलमायांत्यसंशयम्॥
kṛtaṁ śrāddhaṁ narairyaistu gomatyāṁ bhūsurottamāḥ| hayamedhasya yajñasya phalamāyāntyasaṁśayam||
हे भूसुरोत्तमो! जिन मनुष्यों ने गोमती में श्राद्ध किया है, वे निःसंदेह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करते हैं।
श्लोक 27 (skanda.7.453.27)
गंगास्नानेन यत्पुण्यं प्रयागे परिकीर्त्तितम्। तत्पुण्यं समवाप्नोति गोमत्यां श्राद्धकृन्नरः॥
gaṅgāsnānena yatpuṇyaṁ prayāge parikīrtitam| tatpuṇyaṁ samavāpnoti gomatyāṁ śrāddhakṛnnaraḥ||
गंगा में स्नान करने से प्रयाग में जो पुण्य कहा गया है, वही पुण्य गोमती में श्राद्ध करने वाला मनुष्य प्राप्त करता है।
श्लोक 28 (skanda.7.453.28)
विष्णुलोकं हि गच्छंति पितरस्तत्कुलोद्भवाः। अनेकजन्मसाहस्रं पापं याति न संशयः॥
viṣṇulokaṁ hi gacchanti pitarastatkulodbhavāḥ| anekajanmasāhasraṁ pāpaṁ yāti na saṁśayaḥ||
उसके पितर और कुल में जन्मे लोग विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं, और अनेक हजारों जन्मों का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है।
श्लोक 29 (skanda.7.453.29)
वाचा च यत्कृतं पापं कर्मणा मनसा तथा। तत्सर्वं विलयं याति गोमतीदर्शनेन हि॥
vācā ca yatkṛtaṁ pāpaṁ karmaṇā manasā tathā| tatsarvaṁ vilayaṁ yāti gomatīdarśanena hi||
वाणी से, कर्म से और मन से जो भी पाप किया गया हो, वह सब गोमती के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 30 (skanda.7.453.30)
यो नरः कार्त्तिके स्नानं गोमत्यां कुरुते द्विजाः। प्रसन्नो भगवांस्तस्य लक्ष्म्या सह न संशयः॥
yo naraḥ kārttike snānaṁ gomatyāṁ kurute dvijāḥ| prasanno bhagavāṁstasya lakṣmyā saha na saṁśayaḥ||
हे द्विजो! जो मनुष्य कार्तिक मास में गोमती में स्नान करता है, उस पर भगवान् लक्ष्मी सहित प्रसन्न होते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 31 (skanda.7.453.31)
प्रत्यहं हुतं भोक्तारं तर्पयेत्सुसमाहितः। प्रत्यहं षड्रसं देयं भोजनं च द्विजातये॥
pratyahaṁ hutaṁ bhoktāraṁ tarpayetsusamāhitaḥ| pratyahaṁ ṣaḍrasaṁ deyaṁ bhojanaṁ ca dvijātaye||
प्रतिदिन हवन करके, एकाग्रचित्त होकर उपासकों को तृप्त करे; प्रतिदिन षड्रस भोजन ब्राह्मणों को देना चाहिए।
श्लोक 32 (skanda.7.453.32)
पूजयेत्कृष्णदेवं च प्रत्यहं भक्तितत्परः। येन केनापि विप्रेन्द्राः स्थातव्यं नियमेन तु॥
pūjayetkṛṣṇadevaṁ ca pratyahaṁ bhaktitatparaḥ| yena kenāpi viprendrāḥ sthātavyaṁ niyamena tu||
प्रतिदिन भक्तिपूर्वक कृष्णदेव की पूजा करे; हे विप्रेन्द्रो! जिस किसी भी उपाय से नियमपूर्वक वहाँ निवास करना चाहिए।
श्लोक 33 (skanda.7.453.33)
ब्राह्मणानुज्ञया तत्र गृह्णीयान्नियमान्नरः। संपूर्णे कार्त्तिके मासि संप्राप्ते बोधवासरे॥
brāhmaṇānujñayā tatra gṛhṇīyānniyamānnaraḥ| sampūrṇe kārttike māsi samprāpte bodhavāsare||
वहाँ ब्राह्मणों की अनुमति से मनुष्य नियमों को ग्रहण करे; कार्तिक मास पूर्ण होने पर, देवोत्थान एकादशी के दिन,
श्लोक 34 (skanda.7.453.34)
पंचामृतेन देवेशं स्नापयेत्तीर्थवारिणा। श्रीखण्डं कुंकुमोन्मिश्रं मृगनाभिसमन्वितम्। विलेपयेच्च देवेशं भक्त्या दामोदरं हरिम्॥
pañcāmṛtena deveśaṁ snāpayettīrthavāriṇā| śrīkhaṇḍaṁ kuṅkumonmiśraṁ mṛganābhisamanvitam| vilepayecca deveśaṁ bhaktyā dāmodaraṁ harim||
पंचामृत और तीर्थजल से देवेश को स्नान कराए; कुमकुम मिश्रित चन्दन और कस्तूरी से भक्तिपूर्वक देवेश दामोदर हरि का लेपन करे।
श्लोक 35 (skanda.7.453.35)
कुसुमैर्वारिसंभूतैस्तुलस्या करवीरकैः। तद्देशसंभवैः पुष्पैः पूजयेद्गरुडध्वजम्॥
kusumairvārisaṁbhūtaistulasyā karavīrakaiḥ| taddeśasaṁbhavaiḥ puṣpaiḥ pūjayedgaruḍadhvajam||
जल में उत्पन्न पुष्पों से, तुलसी से, कनेर के पुष्पों से, और उस प्रदेश में उत्पन्न होने वाले फूलों से गरुड़ध्वज की पूजा करे।
श्लोक 36 (skanda.7.453.36)
नैवेद्यं रुचिरं दद्याद्विष्णुर्मे प्रीयतामिति। गीतवाद्यादिनृत्येन तथा पुस्तकवाचनैः॥
naivedyaṁ ruciraṁ dadyādviṣṇurme prīyatāmiti| gītavādyādinṛtyena tathā pustakavācanaiḥ||
स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पित करे — 'विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों' — कहते हुए, तथा गीत, वाद्य, नृत्य और पुस्तक-पाठ से भी पूजा करे।
श्लोक 37 (skanda.7.453.37)
रात्रौ जागरणं कार्य्यं स्तोत्रैर्नानाविधैरपि। आहूय ब्राह्मणान्भक्त्या भोजयेच्च स्वशक्तितः॥
rātrau jāgaraṇaṁ kāryaṁ stotrairnānāvidhairapi| āhūya brāhmaṇānbhaktyā bhojayecca svaśaktitaḥ||
रात्रि में नाना प्रकार के स्तोत्रों से जागरण करना चाहिए, और ब्राह्मणों को आमंत्रित करके भक्तिपूर्वक अपनी शक्ति के अनुसार भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.7.453.38)
ततो रथस्थितं देवं पूजयेद्गरुडध्वजम्। कार्त्तिकांते च विप्रेंद्रा गोमत्युदधिसंगमे॥
tato rathasthitaṁ devaṁ pūjayedgaruḍadhvajam| kārttikānte ca viprendrā gomatyudadhisaṅgame||
फिर रथ में विराजमान गरुड़ध्वज देव की पूजा करे। हे विप्रेन्द्रो! कार्तिक मास के अन्त में गोमती-सागर संगम पर,
श्लोक 39 (skanda.7.453.39)
स्नात्वा पितॄंश्च संतर्प्य पूजयेच्च जनार्द्दनम्। सुवस्त्रैर्भूषणैश्चापि समभ्यर्च्य रमापतिम्। अनुज्ञया तु विप्राणां व्रतं संपूर्णतां नयेत्॥
snātvā pitṝṁśca saṁtarpya pūjayecca janārdanam| suvastrairbhūṣaṇaiścāpi samabhyarcya ramāpatim| anujñayā tu viprāṇāṁ vrataṁ saṁpūrṇatāṁ nayet||
स्नान करके पितरों को तृप्त करे और जनार्दन की पूजा करे। उत्तम वस्त्रों और आभूषणों से रमापति की पूजा करके, ब्राह्मणों की अनुमति से व्रत को पूर्णता प्रदान करे।
श्लोक 40 (skanda.7.453.40)
एवं यः स्नाति विप्रेन्द्राः कार्त्तिके कृष्णसन्निधौ। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥
evaṁ yaḥ snāti viprendrāḥ kārttike kṛṣṇasannidhau| sarvapāpavinirmukto viṣṇulokaṁ sa gacchati||
हे विप्रेन्द्रो! जो इस प्रकार कार्तिक में कृष्ण की निकटता में स्नान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 41 (skanda.7.453.41)
माघस्नानं नरो भक्त्या गोमत्यां कुरुते तु यः। वैनतेयोदये नित्यं संतुष्टः सह भार्यया॥
māghasnānaṁ naro bhaktyā gomatyāṁ kurute tu yaḥ| vainateyodaye nityaṁ saṁtuṣṭaḥ saha bhāryayā||
जो मनुष्य माघ मास में गोमती में भक्तिपूर्वक स्नान करता है, वह वैनतेय के उदय के समय, अपनी पत्नी सहित सदा संतुष्ट रहता है।
श्लोक 42 (skanda.7.453.42)
तिला हिरण्यसहिता देया ब्राह्मणसत्तमे। मोदका गुडसंमिश्राः प्रत्यहं दक्षिणान्विताः॥
tilā hiraṇyasahitā deyā brāhmaṇasattame| modakā guḍasaṁmiśrāḥ pratyahaṁ dakṣiṇānvitāḥ||
सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण को सोने सहित तिल देना चाहिए, और गुड़ मिश्रित मोदक प्रतिदिन दक्षिणा सहित देने चाहिए।
श्लोक 43 (skanda.7.453.43)
तिलैराज्याप्लुतैर्होमः कर्त्तव्यः प्रत्यहं नरैः। होमार्थं सेवयेद्वह्निं न शीतार्थं कदाचन॥
tilairājyāplutairhomaḥ kartavyaḥ pratyahaṁ naraiḥ| homārthaṁ sevayedvahniṁ na śītārthaṁ kadācana||
मनुष्यों को प्रतिदिन घी में डूबे हुए तिलों से हवन करना चाहिए; अग्नि का सेवन हवन के लिए करे, कभी शीत से बचने के लिए न करे।
श्लोक 44 (skanda.7.453.44)
गोमत्यां स्नाति यो भक्त्या माघं माधववल्लभम्। समाप्तौ रक्तवस्त्राणि कञ्चुकोष्णीषमेव च॥
gomatyāṁ snāti yo bhaktyā māghaṁ mādhavavallabham| samāptau raktavastrāṇi kañcukoṣṇīṣameva ca||
जो कोई गोमती में भक्तिपूर्वक माधव को प्रिय माघ मास में स्नान करता है, उसे व्रत की समाप्ति पर लाल वस्त्र, अंगरखा और पगड़ी —
श्लोक 45 (skanda.7.453.45)
दद्यादुपानहौ भक्त्या कुंकुमं च विशेषतः। कम्बलं तैलपक्वं च विष्णुर्मे प्रीयतामिति॥
dadyādupānahau bhaktyā kuṅkumaṁ ca viśeṣataḥ| kambalaṁ tailapakvaṁ ca viṣṇurme prīyatāmiti||
भक्तिपूर्वक जूते, विशेष रूप से कुमकुम, और तेल में पका हुआ कम्बल भी दान करे — 'विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों' — ऐसा कहते हुए।
श्लोक 46 (skanda.7.453.46)
स्वामिकार्य्यमृतानां च संग्रामे शस्त्रसंकुले। गवार्थे ब्राह्मणार्थे च मृतानां या गतिः स्मृता॥
svāmikāryamṛtānāṁ ca saṁgrāme śastrasaṅkule| gavārthe brāhmaṇārthe ca mṛtānāṁ yā gatiḥ smṛtā||
जो गति उन लोगों के लिए स्मरण की गई है, जो अपने स्वामी के कार्य में, शस्त्रों से भरे युद्ध में, गौ के लिए या ब्राह्मण के लिए मृत्यु को प्राप्त होते हैं,
श्लोक 47 (skanda.7.453.47)
माघस्नाने च सा प्रोक्ता गोमत्यां नात्र संशयः। सर्वदानफलं तस्य सर्वतीर्थफलं तथा॥
māghasnāne ca sā proktā gomatyāṁ nātra saṁśayaḥ| sarvadānaphalaṁ tasya sarvatīrthaphalaṁ tathā||
वही गति माघस्नान से गोमती में प्राप्त होती है, इसमें संशय नहीं; उसे समस्त दानों का फल और समस्त तीर्थों का फल भी प्राप्त होता है।
श्लोक 48 (skanda.7.453.48)
माघस्नानान्नरो याति विष्णुलोकं सनातनम्। सर्वान्कामानवाप्नोति समभ्यर्च्य जनार्द्दनम्॥
māghasnānānnaro yāti viṣṇulokaṁ sanātanam| sarvānkāmānavāpnoti samabhyarcya janārdanam||
माघस्नान से मनुष्य सनातन विष्णुलोक को प्राप्त होता है, और जनार्दन की पूजा करके अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।
श्लोक 49 (skanda.7.453.49)
माघं यः क्षपते सर्वं गोमत्युदधिसंगमे। ब्राह्मणानुज्ञया विप्राः सर्वं संपूर्णतां व्रजेत्॥
māghaṁ yaḥ kṣapate sarvaṁ gomatyudadhisaṅgame| brāhmaṇānujñayā viprāḥ sarvaṁ saṁpūrṇatāṁ vrajet||
जो पूरे माघ मास को गोमती-सागर संगम में बिताता है, हे विप्रो! ब्राह्मणों की अनुमति से उसका व्रत पूर्णता को प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 50 (skanda.7.453.50)
पापिनोऽपि द्विजश्रेष्ठा ये स्नाता गोमतीजले। यज्विनां च गतिं यांति प्रसादाच्चक्रपाणिनः॥
pāpino'pi dvijaśreṣṭhā ye snātā gomatījale| yajvināṁ ca gatiṁ yānti prasādāccakrapāṇinaḥ||
हे द्विजश्रेष्ठो! जो पापी भी गोमती के जल में स्नान करते हैं, वे भी चक्रपाणि की कृपा से यज्ञकर्ताओं की गति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 51 (skanda.7.453.51)
ब्रह्मरुद्रपदादूर्ध्वं यत्पदं चक्रपाणिनः। स्नानमात्रेण गोमत्यां तत्प्रोक्तं कृष्णसंनिधौ॥
brahmarudrapadādūrdhvaṁ yatpadaṁ cakrapāṇinaḥ| snānamātreṇa gomatyāṁ tatproktaṁ kṛṣṇasannidhau||
ब्रह्मा और रुद्र के पद से भी ऊपर जो चक्रपाणि का पद है, वह गोमती में केवल स्नान करने मात्र से, कृष्ण की निकटता में, प्राप्त होना कहा गया है।
श्लोक 52 (skanda.7.453.52)
मित्रद्रोहे च यत्पापं यत्पापं गुरुघातिनि। तत्पापं समवाप्नोति यात्राभंगं करोति यः॥
mitradrohe ca yatpāpaṁ yatpāpaṁ gurughātini| tatpāpaṁ samavāpnoti yātrābhaṅgaṁ karoti yaḥ||
मित्रद्रोह में जो पाप होता है, गुरुघात में जो पाप होता है, वही पाप उसे प्राप्त होता है, जो इस यात्रा में विघ्न डालता है।
श्लोक 53 (skanda.7.453.53)
ब्रह्मस्वहारिणः पापास्तथा देवस्वहारिणः। स्नानमात्रेण शुध्यंति गोमत्यां नात्र संशयः॥
brahmasvahāriṇaḥ pāpāstathā devasvahāriṇaḥ| snānamātreṇa śudhyanti gomatyāṁ nātra saṁśayaḥ||
जो पापी ब्राह्मण-धन को हरने वाले हैं और जो देव-धन को हरने वाले हैं, वे भी गोमती में केवल स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 54 (skanda.7.453.54)
भीताऽभयप्रदानेन यत्पुण्यं लभते नरः। तत्पुण्यं समवाप्नोति गोमत्यां स्नानमात्रतः॥
bhītā'bhayapradānena yatpuṇyaṁ labhate naraḥ| tatpuṇyaṁ samavāpnoti gomatyāṁ snānamātrataḥ||
भयभीत को अभयदान देने से जो पुण्य मनुष्य प्राप्त करता है, वही पुण्य गोमती में केवल स्नान मात्र से प्राप्त होता है।
श्लोक 55 (skanda.7.453.55)
भीताभयप्रदानेन पुत्रानिष्टान्न संशयः। धनकामस्तु विपुलं लभते धनमूर्जितम्॥
bhītābhayapradānena putrāniṣṭānna saṁśayaḥ| dhanakāmastu vipulaṁ labhate dhanamūrjitam||
भयभीत को अभयदान से इच्छित पुत्र निश्चय ही प्राप्त होते हैं; धन की कामना करने वाला विपुल और समृद्ध धन प्राप्त करता है।
श्लोक 56 (skanda.7.453.56)
प्राप्नुयादीप्सितान्कामान्गोमतीनीरसंगमे। कृतकृत्यो भवेद्विप्रा ऋणान्मुच्येत पैतृकात्॥
prāpnuyādīpsitānkāmāngomatīnīrasaṅgame| kṛtakṛtyo bhavedviprā ṛṇānmucyeta paitṛkāt||
गोमती के जल के संगम में स्नान करने से मनुष्य अपनी इच्छित कामनाओं को प्राप्त करता है; हे विप्रो! वह कृतकृत्य होकर पितृ-ऋण से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 57 (skanda.7.453.57)
मनसा वचसा चैव कर्मणा यदुपार्जितम्। तत्सर्वं नश्यते पापं गोमतीनीरसंगमात्॥
manasā vacasā caiva karmaṇā yadupārjitam| tatsarvaṁ naśyate pāpaṁ gomatīnīrasaṅgamāt||
मन, वचन और कर्म से जो कुछ भी पाप उपार्जित किया गया हो, वह सब गोमती के जल के संगम से नष्ट हो जाता है।
श्लोक 58 (skanda.7.453.58)
पीतांबरधरो भूत्वा तथा गरुडवाहनः। वनमाली चतुर्बाहुर्दिव्यगन्धानुलेपनः। याति विष्ण्वालयं विप्रा अपुनर्भवलक्षणम्॥
pītāṁbaradharo bhūtvā tathā garuḍavāhanaḥ| vanamālī caturbāhurdivyagandhānulepanaḥ| yāti viṣṇvālayaṁ viprā apunarbhavalakṣaṇam||
पीत वस्त्र धारण किए, गरुड़वाहन, वनमाली, चतुर्भुज, दिव्य सुगन्ध से लिप्त होकर, हे विप्रो! वह मनुष्य विष्णु के उस धाम को जाता है, जहाँ से पुनर्जन्म नहीं होता।
श्लोक 59 (skanda.7.453.59)
गोमतीस्नानमात्रेण मानवो नात्र संशयः। सर्वपापविनिर्मुक्तो याति विष्णुं सनातनम्॥
gomatīsnānamātreṇa mānavo nātra saṁśayaḥ| sarvapāpavinirmukto yāti viṣṇuṁ sanātanam||
गोमती में स्नान करने मात्र से मनुष्य, इसमें संशय नहीं, समस्त पापों से मुक्त होकर सनातन विष्णु को प्राप्त होता है।