प्रभास खण्ड · अध्याय 454
चक्रतीर्थ का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.7.454.1)
॥ श्रीप्रह्लाद उवाच ॥ ततो गच्छेद्द्विजश्रेष्ठा रथांगाख्यं महोदधिम्। चक्रांका यत्र पाषाणा दृश्यंते मुक्तिदायकाः॥
śrīprahlāda uvāca| tato gacchedvijaśreṣṭhā rathāṅgākhyaṁ mahodadhim| cakrāṅkā yatra pāṣāṇā dṛśyante muktidāyakāḥ||
श्रीप्रह्लाद ने कहा — तत्पश्चात्, हे द्विजश्रेष्ठो! रथांग नामक महासागर के पास जाना चाहिए, जहाँ चक्र-चिह्नित पत्थर दिखाई देते हैं, जो मुक्ति प्रदान करने वाले हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.454.2)
यैः पूज्यते जगन्नाथः प्रत्यहं भावसंयुतैः। सदा नेत्रैरनिमिषैर्वीक्ष्यते च जनार्दनः॥
yaiḥ pūjyate jagannāthaḥ pratyahaṁ bhāvasaṁyutaiḥ| sadā netrairanimiṣairvīkṣyate ca janārdanaḥ||
जिन पत्थरों की, भावयुक्त होकर, प्रतिदिन जगन्नाथ के रूप में पूजा की जाती है, और जिन्हें सदा अनिमेष नेत्रों से जनार्दन के रूप में देखा जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.454.3)
यच्च साक्षाद्भगवता दृष्टं कृष्णेन दृष्टितः। तत्तीर्थं सर्वपापघ्नं चक्राख्यं परमं हरेः॥
yacca sākṣādbhagavatā dṛṣṭaṁ kṛṣṇena dṛṣṭitaḥ| tattīrthaṁ sarvapāpaghnaṁ cakrākhyaṁ paramaṁ hareḥ||
जो भगवान् कृष्ण द्वारा स्वयं अपनी दृष्टि से देखा गया था, वह तीर्थ, समस्त पापों का नाश करने वाला, हरि का परम 'चक्र' नामक तीर्थ है।
श्लोक 4 (skanda.7.454.4)
यस्य प्रसिद्धिः परमा त्रैलोक्ये सचराचरे। प्रयागादधिकं यच्च मुक्तिदं ह्यस्ति पावनम्॥
yasya prasiddhiḥ paramā trailokye sacarācare| prayāgādadhikaṁ yacca muktidaṁ hyasti pāvanam||
जिसकी सर्वोच्च ख्याति चराचर त्रिलोक में है, और जो प्रयाग से भी अधिक मुक्तिदायक और पावन है।
श्लोक 5 (skanda.7.454.5)
सुरैरपि प्रपूज्यंते यत्रांगानि शरीरिणाम्। अंकितानि च चक्रेण षण्मासान्नात्र संशयः॥
surairapi prapūjyante yatrāṅgāni śarīriṇām| aṅkitāni ca cakreṇa ṣaṇmāsānnātra saṁśayaḥ||
जहाँ छह मास तक चक्र से अंकित रहे हुए शरीरधारियों के अंग देवताओं द्वारा भी पूजे जाते हैं, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 6 (skanda.7.454.6)
यद्दृष्ट्वा मुच्यते पापात्प्रसंगेनापि मानवः। तत्तीर्थं सर्वतीर्थानां पावनं प्रवरं स्मृतम्॥
yaddṛṣṭvā mucyate pāpātprasaṅgenāpi mānavaḥ| tattīrthaṁ sarvatīrthānāṁ pāvanaṁ pravaraṁ smṛtam||
जिसे देखकर मनुष्य केवल प्रसंगवश ही पाप से मुक्त हो जाता है, वह तीर्थ समस्त तीर्थों में सबसे पावन और श्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक 7 (skanda.7.454.7)
तत्र गत्वा द्विजश्रेष्ठाः प्रक्षाल्य चरणौ मुदा। करौ चास्यं चैव पुनः प्रणमेद्दंडवत्पुनः॥
tatra gatvā dvijaśreṣṭhāḥ prakṣālya caraṇau mudā| karau cāsyaṁ caiva punaḥ praṇameddaṇḍavatpunaḥ||
हे द्विजश्रेष्ठो! वहाँ जाकर आनन्दपूर्वक चरण धोकर, हाथ और मुख भी धोकर, फिर दण्डवत् प्रणाम करे।
श्लोक 8 (skanda.7.454.8)
प्रणिपत्य गृहीत्वार्घ्यं पंचरत्नसमन्वितम्। सपुष्पाक्षतगंधैश्च फलहेमसुचंदनैः॥
praṇipatya gṛhītvārghyaṁ pañcaratnasamanvitam| sapuṣpākṣatagandhaiśca phalahemasucandanaiḥ||
प्रणाम करके पंचरत्नों से युक्त, पुष्प, अक्षत, गन्ध, फल, स्वर्ण और उत्तम चन्दन से युक्त अर्घ्य ग्रहण करे।
श्लोक 9 (skanda.7.454.9)
संपन्नमर्घ्यमादाय मंत्रमेतमुदीरयेत्। प्रत्यङ्मुखः सुनियतः संमुखो वा महोदधेः॥
sampannamarghyamādāya mantrametamudīrayet| pratyaṅmukhaḥ suniyataḥ saṁmukho vā mahodadheḥ||
इस उत्तम अर्घ्य को लेकर, पश्चिमाभिमुख या महासागर के सम्मुख भलीभाँति संयत होकर, यह मंत्र बोले —
श्लोक 10 (skanda.7.454.10)
ॐ नमो विष्णुरूपाय विष्णुचक्राय ते नमः। गृहाणार्घ्यं मया दत्तं सर्वकामप्रदो भव॥
oṁ namo viṣṇurūpāya viṣṇucakrāya te namaḥ| gṛhāṇārghyaṁ mayā dattaṁ sarvakāmapradobhava||
'ॐ, विष्णुरूप को नमस्कार, हे विष्णुचक्र! तुम्हें नमस्कार है। मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य ग्रहण करो और सर्वकामप्रद बनो।'
श्लोक 11 (skanda.7.454.11)
अग्निश्च तेजो मृडया च रुद्रो रेतोधा विष्णुरमृतस्य नाभिः। एतद्ब्रुवन्वाडवाः सत्यवाक्यं ततोऽवगाहेत पतिं नदीनाम्॥
agniśca tejo mṛḍayā ca rudro retodhā viṣṇuramṛtasya nābhiḥ| etadbruvanvāḍavāḥ satyavākyaṁ tato'vagāheta patiṁ nadīnām||
'अग्नि तेज है, रुद्र सुखदाता है, विष्णु अमृत की नाभि हैं और बीजदाता हैं' — यह सत्यवचन बोलकर विद्वान् जन उसके पश्चात् नदियों के स्वामी में अवगाहन करें।
श्लोक 12 (skanda.7.454.12)
मृदमालभ्य सजलां विप्रा देवकरच्युताम्। धारयित्वा तु शिरसा स्नानं कुर्य्याद्यथाविधि॥
mṛdamālabhya sajalāṁ viprā devakaracyutām| dhārayitvā tu śirasā snānaṁ kuryādyathāvidhi||
हे विप्रो! देवता के हाथ से गिरी हुई, जलयुक्त मिट्टी को छूकर, उसे मस्तक पर धारण करके विधिपूर्वक स्नान करे।
श्लोक 13 (skanda.7.454.13)
तर्पयेच्च पितॄन्देवान्मनुष्यांश्च यथाक्रमम्। तर्पयित्वा हविर्द्रव्यं प्रोक्षयित्वा च भक्तितः॥
tarpayecca pitṝndevānmanuṣyāṁśca yathākramam| tarpayitvā havirdravyaṁ prokṣayitvā ca bhaktitaḥ||
क्रमशः पितरों, देवताओं और मनुष्यों को तर्पण दे; तर्पण देकर, भक्तिपूर्वक हवि-द्रव्य का प्रोक्षण करे।
श्लोक 14 (skanda.7.454.14)
अश्वमेधसहस्रेण सम्यग्यष्टेन यत्फलम्। स्नानमात्रेण तत्प्रोक्तं चक्रतीर्थे द्विजोत्तमाः॥
aśvamedhasahasreṇa samyagyaṣṭena yatphalam| snānamātreṇa tatproktaṁ cakratīrthe dvijottamāḥ||
हे द्विजोत्तमो! सहस्र अश्वमेध यज्ञों को भलीभाँति सम्पन्न करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल चक्रतीर्थ में केवल स्नान मात्र से कहा गया है।
श्लोक 15 (skanda.7.454.15)
प्रयागे यत्फलं प्रोक्तं माघ्यां माधवपूजने। स्नानमात्रेण तत्प्रोक्तं चक्रतीर्थे द्विजोत्तमाः॥
prayāge yatphalaṁ proktaṁ māghyāṁ mādhavapūjane| snānamātreṇa tatproktaṁ cakratīrthe dvijottamāḥ||
प्रयाग में माघ मास में माधव-पूजन से जो फल कहा गया है, वही फल चक्रतीर्थ में केवल स्नान मात्र से प्राप्त होना कहा गया है।
श्लोक 16 (skanda.7.454.16)
कारयेच्च ततः श्राद्धं पितॄणां श्रद्धयान्वितः। विश्वेदेवान्सुवर्णेन राजतेन तथा पितॄन्॥
kārayecca tataḥ śrāddhaṁ pitṝṇāṁ śraddhayānvitaḥ| viśvedevānsuvarṇena rājatena tathā pitṝn||
फिर श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करे; सोने से विश्वेदेवों को और चाँदी से पितरों को तर्पित करे।
श्लोक 17 (skanda.7.454.17)
संतर्प्य भोजनेनैव वस्त्रालंकारभूषणैः। दीनान्धकृपणेभ्यश्च दानं देयं स्वशक्तितः॥
saṁtarpya bhojanenaiva vastrālaṁkārabhūṣaṇaiḥ| dīnāndhakṛpaṇebhyaśca dānaṁ deyaṁ svaśaktitaḥ||
भोजन से तर्पण करके, वस्त्र और आभूषणों से भी; और दीन, अन्ध, दरिद्रों को अपनी शक्ति के अनुसार दान देना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.7.454.18)
चक्रतीर्थे तीर्थवरे विशेषाद्द्विजसत्तमाः। रत्नदानं प्रकुर्वीत प्रीणनार्थं जगत्पतेः॥
cakratīrthe tīrthavare viśeṣāddvijasattamāḥ| ratnadānaṁ prakurvīta prīṇanārthaṁ jagatpateḥ||
हे द्विजसत्तमो! उस श्रेष्ठ चक्रतीर्थ में विशेष रूप से जगत्पति को प्रसन्न करने के लिए रत्नदान करना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.7.454.19)
गन्त्रीमनडुहा युक्तां सर्वास्तरणसंयुताम्। सोपस्करां च दद्याद्वै विष्णुर्मे प्रीयतामिति॥
gantrīmanaḍuhā yuktāṁ sarvāstaraṇasaṁyutām| sopaskarāṁ ca dadyādvai viṣṇurme prīyatāmiti||
बैलों से युक्त, सब प्रकार के आस्तरणों से सज्जित, उपकरणों सहित एक शकट दान दे — 'विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों' — ऐसा कहते हुए।
श्लोक 20 (skanda.7.454.20)
सुविनीतं शीलयुतं तथा सोपस्करं हयम्। भूषयित्वा च विप्राय दद्याद्दक्षिणया सह॥
suvinītaṁ śīlayutaṁ tathā sopaskaraṁ hayam| bhūṣayitvā ca viprāya dadyāddakṣiṇayā saha||
अच्छी तरह प्रशिक्षित, सुशील तथा साज-सज्जा सहित एक घोड़ा, सुसज्जित करके ब्राह्मण को दक्षिणा सहित दे।
श्लोक 21 (skanda.7.454.21)
एवं कृते द्विजश्रेष्ठाः कृतकृत्यो भवेन्नरः। मुक्तिं प्रयांति तस्यैव पितरस्त्रिकुलोद्भवाः॥
evaṁ kṛte dvijaśreṣṭhāḥ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ| muktiṁ prayānti tasyaiva pitarastrikulodbhavāḥ||
हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार करने से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है, और उसके त्रिकुल में उत्पन्न पितर भी मुक्ति को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 22 (skanda.7.454.22)
प्रेतयोनिं गता ये च ये च कीटत्वमागताः। पच्यंते नरके ये च महारौरवसंज्ञके॥
pretayoniṁ gatā ye ca ye ca kīṭatvamāgatāḥ| pacyante narake ye ca mahārauravasaṁjñake||
जो प्रेत-योनि को प्राप्त हुए हैं, जो कीट-योनि को प्राप्त हुए हैं, और जो महारौरव नामक नरक में पक रहे हैं,
श्लोक 23 (skanda.7.454.23)
ते सर्वे तृप्तिमायांति चक्रतीर्थ प्रभावतः। श्राद्धे कृते द्विजश्रेष्ठा गयाश्राद्धफलं लभेत्॥
te sarve tṛptimāyānti cakratīrtha prabhāvataḥ| śrāddhe kṛte dvijaśreṣṭhā gayāśrāddhaphalaṁ labhet||
वे सभी चक्रतीर्थ के प्रभाव से तृप्ति को प्राप्त होते हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! श्राद्ध करने से गया-श्राद्ध का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 24 (skanda.7.454.24)
या गतिर्मातृभक्तानां यज्वनां या गतिः स्मृता। चक्रतीर्थे द्विजश्रेष्ठाः स्नात्वा तां लभते नरः॥
yā gatirmātṛbhaktānāṁ yajvanāṁ yā gatiḥ smṛtā| cakratīrthe dvijaśreṣṭhāḥ snātvā tāṁ labhate naraḥ||
जो गति मातृभक्तों की और जो गति यज्ञकर्ताओं की स्मरण की गई है, हे द्विजश्रेष्ठो! चक्रतीर्थ में स्नान करके मनुष्य उसे प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (skanda.7.454.25)
श्राद्धं प्रशस्तं विप्रेंद्राः संप्राप्ते चंद्रसंक्षये। सूर्यग्रहे विशेषेण कुरुक्षेत्रफलं स्मृतम्। श्राद्धे स्नाने तथा दाने पितॄणां तर्पणे तथा॥
śrāddhaṁ praśastaṁ viprendrāḥ samprāpte candrasaṁkṣaye| sūryagrahe viśeṣeṇa kurukṣetraphalaṁ smṛtam| śrāddhe snāne tathā dāne pitṝṇāṁ tarpaṇe tathā||
हे विप्रेन्द्रो! अमावस्या के दिन किया गया श्राद्ध प्रशस्त है; विशेष रूप से सूर्यग्रहण के समय, श्राद्ध, स्नान, दान और पितृतर्पण में कुरुक्षेत्र का फल स्मरण किया गया है।
श्लोक 26 (skanda.7.454.26)
प्रशस्तं चक्रतीर्थं च नात्र कार्य्या विचारणा। सर्वदा पावनं विप्राश्चक्रतीर्थं न संशयः॥
praśastaṁ cakratīrthaṁ ca nātra kāryā vicāraṇā| sarvadā pāvanaṁ viprāścakratīrthaṁ na saṁśayaḥ||
और चक्रतीर्थ भी उतना ही प्रशस्त है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं। हे विप्रो! चक्रतीर्थ सदा पावन है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 27 (skanda.7.454.27)
यस्तु श्राद्धं प्रकुर्वीत यात्रायामागतो नरः। चक्रतीर्थे द्विजश्रेष्ठाः संपूज्य मधुसूदनम्॥
yastu śrāddhaṁ prakurvīta yātrāyāmāgato naraḥ| cakratīrthe dvijaśreṣṭhāḥ sampūjya madhusūdanam||
जो मनुष्य यात्रा में आकर चक्रतीर्थ में मधुसूदन की पूजा करके श्राद्ध करता है,
श्लोक 28 (skanda.7.454.28)
पूजितेषु द्विजेंद्रेषु विष्णुसांनिध्यमाप्नुयात्। वाचा कृतं कर्मकृतं मनसां समुपार्जितम्॥
pūjiteṣu dvijendreṣu viṣṇusāṁnidhyamāpnuyāt| vācā kṛtaṁ karmakṛtaṁ manasāṁ samupārjitam||
और श्रेष्ठ ब्राह्मणों की पूजा करके, विष्णु के सान्निध्य को प्राप्त करता है। वाणी से किया गया, कर्म से किया गया, और मन से उपार्जित पाप —
श्लोक 29 (skanda.7.454.29)
स्नानमात्रेण तत्पापं नश्यते नात्र संशयः॥
snānamātreṇa tatpāpaṁ naśyate nātra saṁśayaḥ||
वह पाप केवल स्नान मात्र से नष्ट हो जाता है, इसमें संशय नहीं।